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माँ ! मुझे जन्म दो / रचयिता सृष्टि की

>> Wednesday, September 10, 2008


माँ के गर्भ में साँस लेते हुए
मैं खुश हूँ बहुत
मेरा आस्तित्व आ चुका है
बस प्रादुर्भाव होना बाकी है।

मैं माँ की कोख से ही
इस दुनिया को देख पाती हूँ
पर माँ - बाबा की बातें समझ नही पाती हूँ
माँ मेरी सहमी रहती हैं और बाबा मेरे खामोश
बस एक ही प्रश्न उठता है दोनों के बीच
कि परीक्षण का परिणाम क्या होगा ?
आज बाबा कागज़ का एक पुर्जा लाये हैं
और माँ की आँखों में चिंता के बादल छाये हैं
मैं देख रही हूँ कि माँ बेसाख्ता रो रही है
हर बार किसी बात पर मना कर रही है
पर बाबा हैं कि अपनी बात पर अड़े हैं
माँ को कहीं ले जाने के लिए खड़े हैं
इस बार भी परीक्षण में कन्या- भ्रूण ही आ गया है
इसीलिए बाबा ने मेरी मौत पर हस्ताक्षर कर दिया है।

मैं गर्भ में बैठी बिनती कर रही हूँ कि-
बाबा मैं तुम्हारा ही बीज हूँ-
क्या मुझे इस दुनिया में नही आने दोगे?
अपने ही बीज को नष्ट कर मुझे यूँ ही मर जाने दोगे?

माँ ! मैं तो तुम्हारा ही प्रतिरूप हूँ , तुम्हारी ही कृति हूँ
तुम्हारी ही संरचना हूँ , तुम्हारी ही सृष्टि हूँ।
माँ ! मुझे जन्म दो, हे माँ ! मुझे जन्म दो
मैं दुनिया में आना चाहती हूँ
कन्या हूँ ,इसीलिए अपना धर्म निबाहना चाहती हूँ।
यदि इस धरती पर कन्या नही रह पाएगी
तो सारी सृष्टि तहस - नहस हो जायेगी ।

हे स्वार्थी मानव ! ज़रा सोचो-
तुम हमारी शक्ति को जानो
हम ही इस सृष्टि कि रचयिता हैं
इस सत्य को तो पहचानो.

8 comments:

roohshine 9/10/2008 8:14 PM  

didi bahut hi marmsparshi rachna aur bahut hi sateek chitran dil ko chhoo gayi aapki rachna.. man dominating society ki sthapna pata nahin kab aur kanahn shuru hui.. shayad isi inferiority complex ke tehat ki naari rachaiyita hai srishti ki.. shayad isi liye nar ne usko neecha dikhate hue swaym ko upar rakhne ki cheshta ki.. jabki dono mein se koi bhi upar ya neeche ho hi nahin skata ..srishti ki rachna ek ke hathon mein nahin hai.. aur dono ek doosre ke poorak hain.. par pata nahin ye kyun samjh nahin aata aise pitaon ko jo kanya ko broonawastha mein hi khatam kar dena chahte hain..shayad yanahn bhi humari society ke maapdand jo ek pita ke man mein ladki pe hone wale kharche aur return mein kuchh na milne ke bhay ko jagrit karte hain.. poora system hi doshi ho jata hai aise mein.. is bhaav ke hone ki jad mein..bus yahi kamna hai ki hey prabhu ..is bhav ko jad se hi khatam kar aur is srishti ke santulan ko banaye rakh .. AMEN !!!!

रश्मि प्रभा 9/10/2008 8:47 PM  

काश.....आपकी यह उत्कृष्ट रचना जागरण गीत बन जाये
परिवर्तन का बीजारोपण तो होगा ही
बहुत अच्छी,सार्थक कविता

"Nira" 9/11/2008 2:52 AM  

sangeeta ji
bahut hi marmsparshi rachna likhi hai, aajkal ke halaat par iski bahut zaroorat hain
badhai ho

Dr. RAMJI GIRI 9/11/2008 1:12 PM  

आज के सामाजिक मानस -पटल पर छाई विद्रूपता पर सटीक प्रासंगिक रचना, जो मर्माहत मन-मस्तिष्क को उद्वेलित करती है .......

manish 9/11/2008 6:19 PM  

shabd heen sa mahsoos kar raha hu khud ko...kuchh samajh hi nahi aa raha hai..kya likhun..."roohshine" ne jo kaha sahi hi kaha hai...mein to sirf itna kah paaunga ki jis angle se kaha gaya hai bhaav...wo kabhi dekha, suna aur socha hi nahi.... kanya bhroon gharb me khud hi dekh raha hai aur vinti / kaamna kar raha hai...wow... sach me aapki abhivyakti....aapko ek "khaas" banati hai...

कुणाल किशोर (Kunal Kishore) 9/14/2008 4:09 PM  

रोयें खडे हो गये इसे पढ कर.... मर्म स्पर्षी लेखन| क्या कहुँ, बस इतना ही की भगवान इन कुरीतीयो और बर्बर मानसिकता से हमे बचाये और हम ऐसे स्वस्थ समाज का निर्मान करे जहाँ स्त्री-पुरुष समानता हो, दहेज का दानव ना हो, सब के लिये सुरक्षा हो, सब के लिये संभावना हो, अधनंगी नजर ना हो, आँखो मे यौन पिपाषा ना हो ताकि कोई माँ-बाप गर्व से भय-मुक्त अपने बेटी को जन्म दे और गर्व से कहे की मै एक बेटी का बाप हुँ....

संगीता जी, कलेजे को चीरती हुई समाज को आईना दिखाती इस रचना के लिये बधाई| ऐसे ही लिखते रहिये, माँ सरस्वती की आप पर कृपा बनी रहे, यही कामना है|

RaniVishal 1/29/2010 12:14 AM  

आदरणीय,

अपनी इतनी उत्कृष्ट रचना साँझा करने के लिए आभार !!
बहुत ही उत्कंठित कर देने वाली अभिव्यक्ति है ! इस समस्या का सबसे गिरा हुआ पहलू यह है की चिकीत्सक जिसे जीवनरक्षक (भगवान का अवतार स्वरूप) माना जाता है वही इस कुरीति को बढावा देने में अतिसक्रिय भूमिका निभा राहे है !! इस जाग्रति के लिए सक्रिय होने के लिए बधाई !!

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) 9/19/2011 11:15 PM  

माँ ! मैं तो तुम्हारा ही प्रतिरूप हूँ , तुम्हारी ही कृति हूँ
तुम्हारी ही संरचना हूँ , तुम्हारी ही सृष्टि हूँ।
माँ ! मुझे जन्म दो, हे माँ ! मुझे जन्म दो
मैं दुनिया में आना चाहती हूँ
कन्या हूँ ,इसीलिए अपना धर्म निबाहना चाहती हूँ।
यदि इस धरती पर कन्या नही रह पाएगी
तो सारी सृष्टि तहस - नहस हो जायेगी ।

किसी की भी पलकों को भिगोने के लिये यह पंक्तियाँ सक्षम हैं.अतुलनीय रचना.

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