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सोच के उफान

>> Tuesday, September 23, 2008

सोच ,
सर्फ़ के झाग की तरह
कुछ देर
फेनिल झागों के समान उभरी
और ख़त्म हो गई
दूध में उफान की तरह
विचार उफनते हैं
और कुछ समय बाद
ठंडे हो जाते हैं
उन झागों की तरह
जो स्वयं नीचे बैठ गए हों ।
और फ़िर -
वही बेरौनक सी ज़िन्दगी
कैसे , कब और कहाँ शुरू हुई
एहसास नही रहता
कल आज और कल
बीतते जाते हैं
पर उनका हिसाब नही रहता
इस बेहिसाबी दुनिया में
तुम बीता कल ढूँढते हो
पर यहाँ तो अब
आज का हिसाब नही मिलता
वक्त नही है
अब सोचने का
कल का क्या सोचें
कर्म किए जाओ
फ़िर -
वक्त कहीं का कहीं पहुंचे.

10 comments:

taanya 9/23/2008 4:55 PM  

hmmmm ye socho ka tufan kaha se kaha le jata hai...aur ham is tufaan me udte huai kon si duniya me pahuch jate hai..kya kya soch jate hai...pata hi nahi chalta..lekin jab hosho-hawas k duniya me aate hai to lagta hai..ki kya nirthark si soche thi...

bahut acchhi rachna...mujhe b socho ke tufaan me le jati hui si lagi...

आशा 8/08/2011 6:22 AM  

सच में सोच होता ही है ऐसा बिलकुल साबुन के झाग सा |बहुत अच्छी पोस्ट बधाई |
आशा

अनुपमा त्रिपाठी... 8/08/2011 7:44 AM  

कर्म किए जाओ
फ़िर -
वक्त कहीं का कहीं पहुंचे.

बहुत सुंदर रचना ...बेहिसाबी दुनिया के बीच घिरा.. कर्तव्य करता ...कर्म करता मन ....बात सही कहता है ..!!
कर्म करते रहो तो वक़्त कहाँ है ....?
सादर ..शुभकामनायें.

ana 8/08/2011 8:06 AM  

soch ko naye ayam se samjhaya hai aapne.....sahi khaha karma kiye jao fal ki chinta na karo ....abhar

सदा 8/08/2011 10:06 AM  

वाह ...बहुत ही बढि़या ..।

prerna argal 8/08/2011 10:41 AM  

आज का हिसाब नही मिलता
वक्त नही है
अब सोचने का
कल का क्या सोचें
कर्म किए जाओ
फ़िर -
वक्त कहीं का कहीं पहुंचे.bahut badiyaa.sunder abhibyakti.badhaai aapko. "ब्लोगर्स मीट वीकली {३}" के मंच पर सभी ब्लोगर्स को जोड़ने के लिए एक प्रयास किया गया है /आप वहां आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/ हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। सोमवार०८/०८/11 को
ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।

वन्दना 8/08/2011 12:18 PM  

बहुत सुन्दर रचना।

रेखा 8/08/2011 3:14 PM  

बहुत गहरी अनुभूतियाँ हैं ........

musafir 8/08/2011 10:37 PM  

बेहिसाब भागम भाग, अन्धा दौड़ किसे फ़ुर्सत है, कि गुजरे कल कि सोचे.. गुजरे कल को सोचने के लिये आज मे वक्त होना चहिये....... आज कि हि दौड ही यूँ है कि आज की ही फ़ुर्सत नही कल की कौन सोचे.

///////इस बेहिसाबी दुनिया में
तुम बीता कल ढूँढते हो
पर यहाँ तो अब
आज का हिसाब नही मिलता
वक्त नही है
अब सोचने का
कल का क्या सोचें/////

shikha varshney 10/25/2013 10:45 PM  

बहुत मुश्किल है..

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