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झंझावात

>> Wednesday, October 15, 2008

दूर तक नज़र
ढूढ़ती है कि
कोई नेह का बादल
अपना छोटा सा टुकड़ा
कहीं छोड़ गया हो
और वो बरस कर
मुझे भिगो दे .

पर-
मंद समीर भी
उड़ा ले जाता है
हर टुकड़े को
अपने साथ .

और आ जाता है
मेरी ज़िंदगी में
कुछ ऐसा झंझावात
कि भीगने को
तरसते मन को
जैसे रेतीली हवाओं ने
घेर लिया हो
चारों ओर से .

11 comments:

shikha varshney 10/15/2008 3:41 PM  

Wah di!aakhiri peragraph ne to sach main jhijhod dia.

masoomshayer 10/15/2008 5:18 PM  

bahut achee rachna hai udas hai par man ko bahut achhe se choo rahee hai

Anil

PARVINDER SINGH 10/15/2008 6:35 PM  

कुछ ऐसा झंझावात
कि भीगने को
तरसते मन को
जैसे रेतीली हवाओं ने
घेर लिया हो
चारों ओर से .....

वह संगीता जी क्या खूब लिखा है
सच मे मन तरस गया
एक सुंदर रचना के लिए तहे दिल् से बधाई

आपका

परविंदर

रश्मि प्रभा 10/15/2008 8:03 PM  

इस रचना को पढ़कर एक ही ख्याल आया है-कि कही से एक टुकडा बादल का,नेह भरा लाऊं और आपके निकट रख दूँ...........इस बेचैन भाषा को मैंने गहराई से महसूस किया

NirjharNeer 10/16/2008 10:34 AM  

mai jab bhi aapko padhta hun bas ek sher rah rah kar yaad aata hai jo mujhe bahot pasand hai..

kuch sapne ban dhal jayenge !
kuch dard chitaa tak jayenge !!

shyad aise hi dard ka samavesh hai aapki rachnaoon mai kahin.

kala ki drishti se sundar abhivyakti

sangeeta 10/16/2008 12:30 PM  

shikha, anil ji,parvindar ,rashmi ji,aur nirjharneer,
aap sabka bahut bahut shukriya.

"Nira" 10/17/2008 6:25 AM  

मंद समीर भी
उड़ा ले जाता है
हर टुकड़े को
अपने साथ .

bahut bhavookta se pesh kiya hai khayal ko
badhai

nira

taanya 10/17/2008 9:49 AM  

har insan per kabhi aisa bhi waqt aata hai..
raah me chhod kar apna saaya bhi chala jata hai...

lekin.....

har raat ke jaane ke baad din bhi niklega kabhi..tu raaj k jaane pe na jaa...

to sangeeta ji yahi gaane k bol yaad aaye apko kuch kehne k liye...

aur rachna per kya tippani du..aapne bahut saadgi se apne man ki baat keh di...ati sunder rachna..sidhe man ki baat man tak pahuchti hui....!!

shubhkaamnao k saath..apki taanya..

Rani Mishra 10/17/2008 3:32 PM  

दूर तक नज़र
ढूढ़ती है कि
कोई नेह का बादल
अपना छोटा सा टुकड़ा
कहीं छोड़ गया हो
और वो बरस कर
मुझे भिगो दे .

कितनी सुंदर कल्पना,
पढ़कर मन बोछारो में भीगने लगा है......
कल्पना या आस?
और फिर ऐसा न होने का दर्द.....
मन को हिला कर रख देता है.....
जब आस के बादलो को रेतीले हवा के झोंके उड़ा ले जाते है.....
और आसपास सिवा रेत के कुछ नहीं है.......
सिर्फ एक शुन्य....... निराशा भरा......

Rani Mishra 10/17/2008 3:46 PM  

ये बादलों के आने की आहट थी...
की कब तक नज़र चुरायेंगे.......
धरती से मिलने की चाहत में
कभी तो हम पर भी बरस जायेंगे.......

Chaitanya 10/17/2008 8:57 PM  

man ki hi becheni bayan karti hai yah rachna.............

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