copyright. Powered by Blogger.

इंतज़ार

>> Friday, October 31, 2008

न जाने कितनी बार
मेरे हिस्से ज़हर आया है
जब -जब भी ज़िन्दगी ने
मंथन किया
मैंने विष ही पाया है।
इतना गरल पा कर भी
मन मेरा शिव नही बन पाया
क्यों कि ये ज़हर
मेरे कंठ में नही रुक पाया है।
उगल दिया मैंने सब
बिना ज़मीं देखे हुए
बंजर हो गई वो धरती
जहाँ प्रेम की पौध
उगा करती थी
जल गए वो दरख्त
जिनकी टहनी मिला करती थी
सूख गए वो अरमान
जो इन पेडों पर रहा करते थे
मर गए वो एहसास
जो इन पर
झूले झूला करते थे ।
आज बस रह गया है तो
एक राख का अम्बार है
इसे उड़ने के लिए हवा के
हल्के से झोंके का इंतज़ार है.

18 comments:

masoomshayer 10/31/2008 5:20 PM  

kuch baten advitiy lagtee hain

jause kie ye rakh ka ambar aur hawa ka jhonka

bahut khoob likha hai aaj bhee

Anil

Dr. RAMJI GIRI 10/31/2008 6:38 PM  

Achhi rachna hai...

But why to wait 4 wind?
Arise Like SPHINX n give new meaning to life...

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" 10/31/2008 7:50 PM  

मन मेरा शिव नही बन पाया
क्यों कि ये ज़हर
मेरे कंठ में नही रुक पाया है।
ati sunder

vinsaint 10/31/2008 9:15 PM  

"उगल दिया मैंने सब बिना ज़मीं देखे हुए,
बंजर हो गई वो धरती जहाँ प्रेम की पौध उगा करती थी,जल गए वो दरख्त जिनकी टहनी मिला करती थी,सूख गए वो अरमान जो इन पेडों पर रहा करते थे,मर गए वो एहसास जो इन पर झूले झूला करते थे."
yah kaisi atmasweekarti? hum shiv to nahin jo neelkanth ho jayen, aise viparit tatva ko uglane se pahile jamin nahin dekhi jati, jo hota hai sahaz swabhavik...uske liye itna sinhavalokan nahin.....aisi jamin jo banjar honi hai ho jaye, jinde rahe to aaur jamin milegi jise hum apne avdan se harit kar sakenge. AWESOME..great creation.

shikha varshney 10/31/2008 9:45 PM  

bahut khubsurat rachna hai

"Nira" 11/01/2008 8:36 AM  

aaj bas rah gaya hai to
ek raakh ka ambaar hai
ise udane ke liye hawaa ke
halke se jhaunke ka intzaar hai..

har aor se ek uttam rachna likhi hai.

nira

NirjharNeer 11/01/2008 12:31 PM  

speechless

koi lafz nahi hai jo aapke bhaavo ki tariif mai kah sakoon

NirjharNeer 11/01/2008 12:36 PM  

har ahsaas ko shiddat se mehsoos kiya hai aapne .
har rachna mai sacchai ka pritibibm dikhta hai

Avinash Chandra 11/02/2008 10:58 AM  

bahut hi achchha likha hai aapne

Rani Mishra 11/06/2008 12:05 PM  

हर शब्द में मन के भावो का पूर्ण समर्पण है....
मन के विष रूपी भावो का
शिव के नीलकंठ सा न हो पाना,
अपने आप में एक अद्भुत अभिव्यक्ति है.....
जो पाया इस जहाँ से वही जब वापस किया तो.....
जला डाला प्रेम रूती पोधो को,...
सूख गए वो अरमान जो इन पेडों पर रहा करते थे,
मर गए वो एहसास जो इन पर झूले झूला करते थे."
कितने सुंदर भावो के साथ मन के दर्पण की अभिव्यक्ति....
मैं क्या कहू आज मेरी समझ को शब्द नहीं मिल रहे है....
एक अद्भुत रचना, जिसकी तारीफ़ के लिए मैं नतमस्तक हूँ आपके समक्ष......

taanya 11/06/2008 4:48 PM  

oh thank god...tum shiv nahi ban paye..varna koi paarvati dhoondni padti na.. anyway just kidding..

ab aati hu seriously apki rachna per..

aah garal ko kanth lagate to saanse kaha reh jati..
ham tum shiv to nahi jo zeher pi k bhi ji jate..
insaan hai to ugalna munasib hai..
na ugalte to bhi zindgi ko banzer hona hi hai..

na ye zami banzer hai..na darakht sukhe hai..
na prem ki paudh khatam hui kahi, bas kuch ehsaso ki uljhan hai..
aaj bhi vahi jhoole hai..aaj bhi vahi arma hai..
vahi tehniya hai..bas umeedo, aashao ki kami hai..

na maayus ho tum itna, kuch waqt ki mazburi hai..
na raakh ho tum..na hawa k jhoke me itni jora jori hai..


shubhkaamnao k saath urs tanya

वन्दना 6/18/2011 12:18 PM  

आपकी पुरानी नयी यादें यहाँ भी हैं .......ज़रा गौर फरमाइए
http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/

Sadhana Vaid 6/19/2011 7:32 AM  

बहुत धारदार एवं पैनी रचना है संगीता जी ! नि:शब्द हो गयी हूँ ! जिस गरल ने उर्वरा धरती की यह दशा कर दी वह अंदर नहीं गया यही उचित था ! शिव में अलौकिक गुण हैं तभी तो उन्होंने विष को अपने कंठ में रोक लिया लेकिन उन गुणों के अभाव में मानव तो शिव नहीं बन सकता उसे तो बृह्मा बन कर सृष्टि की रचना करनी है विष्णू बन कर उसका पालन करना है ! नये उपमानों के साथ बहुत ही सुन्दर रचना है ! मेरी बधाई स्वीकार करें !

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 6/19/2011 9:11 AM  

आज बस रह गया है तो
एक राख का अम्बार है
इसे उड़ने के लिए हवा के
हल्के से झोंके का इंतज़ार है.

ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं.

सादर

अनामिका की सदायें ...... 6/19/2011 9:31 PM  

bahut sunder marmsparshi rachna. tanya ki baat par gaur farmaayen. :)

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 12/24/2011 9:27 AM  

यह तो बहुत ही सुन्दर रचना है दी....
सादर.

Amrita Tanmay 12/24/2011 5:51 PM  

बेहद खुबसूरत.

Post a Comment

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है...

आपकी टिप्पणियां नयी उर्जा प्रदान करती हैं...

आभार ...

हमारी वाणी

www.hamarivani.com

About This Blog

आगंतुक


ip address

  © Blogger template Snowy Winter by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP