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सीमायें

>> Wednesday, November 26, 2008



रिश्तों की गांठें खोल दो
और
आजाद हो जाओ सारे रिश्तों से
फिर देखो
ज़िन्दगी कितनी
सुकून भरी हो जाती है
एक तरफ़
न तुम किसी के होंगे
और न कोई तुम्हारा
दूसरी तरफ़
तुम सबके होंगे
और सारा जग तुम्हारा
फिर तुम उम्मीदों को
सीमाओं में नही बाँधोगे
और दूसरे की कमियां गिनाने की
सीमा नहीं लांघोगे .

2 comments:

NirjharNeer 11/26/2008 4:18 PM  

man ko bhav vibhor karne vale ahsas
bahot khoobsurti se piroya hai aapne lafzo ko bhavo ki dor mai

daad hazir hai ..

Dev 11/29/2008 6:43 PM  

Bahut khubshurat rachana hai..
Badhai

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