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वृद्धाश्रम

>> Monday, December 28, 2009



दर्जनों बूढी आँखें



थक गयी हैं



पथ निहारते हुए



कि शायद



उस बड़े फाटक से



बजरी पर चलता हुआ



कोई अन्दर आए



और हाथ पकड़



चुपचाप खड़ा हो जाये


कान विह्वल हैं



सुनने को किसी



अपने की पदचाप



चाहत है बस इतनी सी



कि आ कर कोई कहे



हमें आपकी ज़रुरत है



और हम हैं आपके साथ



पर अब



उम्मीदें भी पथरा गयी हैं



अंतस कि आह भी



सर्द हो गयी है



निराशा ने कर लिया है



मन में बसेरा



अब नहीं छंटेगा



अमावस का अँधेरा



ये मंज़र है उस जगह का



जहाँ बहुत से बूढ़े लोग



पथरायी सी नज़र से



आस लगाये जीते हैं



जिसे हम जैसे लोग



बड़े सलीके से



वृद्धाश्रम कहते हैं........

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तन्हा

>> Wednesday, December 23, 2009


मन में

ना जाने कितनी

गिरह लगी हैं

एक - एक खोलूं

तो

सदियों लग जाएँ

और होता है

अक्सर यूँ

कि -

खोलने की कोशिश में

नयी गाँठ

पड़ जाती है ,

सोचती हूँ कि

जिस दिन

खुल गयीं

सारी गांठें

तो ज़िन्दगी में

जलजला ही आ जायेगा

ना तो

कोई राह सूझेगी

और ना ही कोई

खेवनहार आएगा ।

और रह जाउंगी

मैं केवल

तन्हा तन्हा तन्हा !

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मुखौटा

>> Saturday, December 19, 2009



मैंने नहीं चाहा कि



कोई मेरे दिल के नासूरों को



रिसते हुए देखे ,



और ये भी नहीं चाहा कभी कि



कोई मेरे मन के छालों पर



फाहे रक्खे ।



पर फिर भी दिल



दुखता तो है



दर्द होता तो है ।




लोग कहते हैं कि



दर्द हद से गुज़र जाये तो



ग़ज़ल होती है



सच ही है ये



क्यों कि



मेरी लेखनी भी



कागज़ से लिपट रोती है



नहीं चाहा कभी किसी को



मेरे दर्द का अहसास हो पाए



इसीलिए आ जाती हूँ



सबके बीच



हंसी का मुखौटा लगाये .

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सागर

>> Friday, December 18, 2009


तुम सागर हो


मैं इसके साहिल पे


सीली सी रेत पर बैठ


तुम्हारी लहरों की


अठखेलियाँ निहारती हूँ


और उन लहरों को देख


सुकून पाती हूँ ।


जानती हूँ कि


तुम्हारे गर्भ में


दर्द की


ना जाने कितनी


वनस्पति उगी है


हर छोटे बड़े


पेड़ पर


एक दर्द टंगा है


पर तुम उन्हें


सुप्तावस्था में ही


रहने दो


बस अपनी लहरों से


सबको उल्लसित करो


लेकिन


जब भी कोई पेड़


सिर उठाये


और अपना तेज़ाब


तुम तक पहुंचाए


तुम मुझे आवाज़ देना


मैं वो सब दर्द


पी जाउंगी


और थोड़ी सी


तुम्हारी उम्र


जी जाउंगी.

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छुअन

>> Sunday, December 13, 2009


स्मृति की मञ्जूषा से

एक और पन्ना

निकल आया है

लिए हाथ में

पढ़ गयी हूँ विस्मृत

सी हुई मैं ।


आँखों की लुनाई

छिपी नहीं थी

तुम्हारा वो एकटक देखना

सिहरा सा देता था मुझे

और मैं अक्सर

नज़रें चुरा लेती थी ।


प्रातः बेला में

बगीचे में घूमते हुए

तोड़ ही तो लिया था

एक पीला गुलाब मैंने ।

और ज्यों ही

केशों में टांकने के लिए

हाथ पीछे किया

कि थाम लिया था

गुलाब तुमने

और कहा कि

फूल क्या खुद

लगाये जाते हैं वेणी में ?

लाओ मैं लगा दूँ

मेरा हाथ

लरज कर रह गया था।

और तुमने

फूल लगाते लगाते ही

जड़ दिया था

एक चुम्बन

मेरी ग्रीवा पर ।

आज भी गर्दन पर

तुम्हारे लबों की

छुअन का एहसास है.

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अलगनी पर टंगे ख्वाब

>> Wednesday, December 9, 2009



चाहत की अलगनी पर


टांग दी थी


मैंने अपने


ख़्वाबों की पैरहन ।


उम्मीद का चाँद भी


देख रहा था उन्हें


बड़ी हसरत से


ख़ुशी की शबनम ने


भिगो दिया था


और कर दिया था


सीला - सीला सा


प्यार की बयार ने भी


सहलाया था धीरे से ।



पर


वक़्त के सूरज ने


भेज दिया था


नाउम्मीद का


प्रचंड ताप


और अलगनी पर ही


टंगे टंगे


झुलस गए थे


सारे मेरे ख्वाब ॥



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दस्तूर

>> Friday, December 4, 2009


आंधियों ने कर दिया है


बर्बाद गुलिस्ताँ को


और धुंध चारो ओर


छा गयी हैं


किसी को भी


हाथों - हाथ


कुछ सूझता है


धूल उड़ कर


आँखों में आ गयी है


बंद हो गयीं हैं


सभी की आँखें


कुछ भी अब


दृष्टि गोचर नहीं है


कौन किसको क्या


दिखाना चाहता है


खुद की आँखें भी तो


खुली नहीं हैं ।


हर चेहरे पर हैं


बहुत से मुखौटे


एक उतारो तो


दूसरा टंग जाता है


किसके और कितने


उतारोगे मुखौटे


हर बार नया चेहरा


सामने आ जाता है॥


रखते हैं सब जेब में


एक - एक आइना


पर खुद को आइने में


कभी कोई देखता नहीं


दुनिया का है


शायद यही दस्तूर


कि खुद को कोई


पहचानता नहीं .

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लक्ष्य

>> Saturday, November 21, 2009



उम्र की ढलान पर
ज़िन्दगी जैसे
लक्ष्य - विहीन सी
हो जाती है
पंखों की क्षमता जैसे
सारी त्वरित शून्य सी
हो जाती है .
कटे - फटे पंखों से
कब कोई विहग
उड़ पाता है
अपने परों को देख - देख
मन उदास सा
हो जाता है .

जब ताकत थी पंखों में तो
क्षितिज भी
दूर नहीं लगता था
उन्मुक्त गगन में जैसे
मन का पंछी
विचरण करता था .

अब एक उड़ान के लिए
मन विह्वल हो जाता है
गर चाहूँ पाना कुछ भी
लक्ष्य कहीं खो जाता है.

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सख्त ज़मीन

>> Tuesday, November 17, 2009

अहम् जब
जमा लेता हैं जड़ें
सोच के वृक्ष पर
और
हर टहनी से
निकलने लगती हैं
छोटी - छोटी जड़ें
जो तेजी से
बढ़ती हैं
धरती की ओर
अन्दर धंसने के लिए .

जब ये
धंस जाती हैं
पूरी तरह से तो
धरती सख्त हो जाती है
और इन जड़ों को
निकालने की हर कोशिश
व्यर्थ हो जाती है
क्यों कि ये
मन की ज़मीन के
अन्दर ही अन्दर
एक दूसरे से
इस कदर उलझ जाती हैं
कि एक को
निकालने की कोशिश में
दूसरी बाहर आ जाती है

फिर इस वृक्ष को
अपने हाल पर ही
छोड़ना होता है
हर टहनी पर उगी
जड़ का बोझ
इसे स्वयं ही
ढोना होता है
वक़्त के साथ - साथ
ये जड़ें भी
सूख जाती हैं और
सख्त होती ज़मीन
कुछ नर्म भी हो जाती है

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वादा

>> Monday, November 9, 2009


सांझ समय
बैठी थी
पुष्प वाटिका में
कि
यादों के झुरमुट से
निकल कर आ गया था
चेहरा तुम्हारा सामने
आँखों में प्यास लिए।
तुम्हें देख
थिरक आई थी
मुस्कान मेरे लबों पर ।
ये देख
लगे थे करने चहलकदमी ।
जैसी कि
तुम्हारी आदत थी ।
तुम्हें देखते हुए
थक जाती थी
ग्रीवा मेरी
इधर से उधर
करते - करते।
तभी ऐसा लगा कि
तुम कह रहे हो
क्या होगा ?
हमारे अरमानो का
सपनो का
चाहतों का ।
धीरे से मैंने कहा कि
सब बिखर गए हैं
और
अब बिखरे हुए
ख़्वाबों को
चुना नहीं जाता है
गर चुनना भी चाहूँ तो
हाथ लहू - लुहान
हुआ जाता है ।
लगा कि तुमने
मेरे कंधे झिंझोड़ दिए हैं
और मैं जैसे
नींद से जाग गयी ।
मेरी बेटी
मेरे कन्धों पर
हाथ रख कर
कह रही थी कि
माँ, सपने क्यों
बिखर जाते हैं ?
मन के छाले
क्यों फूट जाते हैं ?
ये आंसू भी सब कुछ
क्यों कह जाते हैं ?
मुझे लगा कि
मेरी बेटी
अब बड़ी हो गयी है
मैंने उसे देखा
एक गहरी नज़र से
और कहा कि
मैं तुम्हारे हर ख्वाब
चुन लुंगी
अरमानो का खून
नहीं होने दूंगी
आँख से कतरा
नहीं बहने दूंगी
ये वादा है मेरा तुमसे
एक माँ का वादा है
जिसे मैं ज़रूर
पूरा करुँगी.

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मौन

>> Wednesday, November 4, 2009



जब व्यापता है

मौन मन में

बदरंग हो जाता है

हर फूल उपवन में

मधुप की गुंजार भी


तब श्रृव्य होती नहीं


कली भी गुलशन में


कोई खिलती नहीं ।



शून्य को बस जैसे


ताकते हैं ये नयन


अगन सी धधकती है


सुलग जाता है मन ।


चंद्रमा की चांदनी भी


शीतलता देती नहीं


अश्क की बूंदें भी


तब शबनम बनती नहीं ।


पवन के झोंके आ कर


चिंगारी को हवा देते हैं


झुलसा झुलसा कर वो


मुझे राख कर देते हैं



हो जाती है स्वतः ही


ठंडी जब अगन


शांत चित्त से फिर


होता है कुछ मनन



मौन भी हो जाता है


फिर से मुखरित


फूलों पर छा जाती है

इन्द्रधनुषी रंजित

अलि की गुंजार से

मन गीत गाता है

विहग बन अस्मां में

उड़ जाना चाहता है ..

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तृष्णा की आंच

>> Tuesday, October 27, 2009



यादों के रेगिस्तान में

भटकता है मन यूँ ही

कि जैसे

कस्तूरी की चाह में

भटकता है कस्तूरी मृग

जंगल - जंगल ।


ख़्वाबों के तारे


छिप जातें हैं जब

निकलता है

हकीक़त का आफताब

और उसकी तपिश से

ख्वाहिशों का चाँद भी

नज़र नहीं आता ।


और इस मन का


पागलपन देखो

चाहता है कि

ख्वाहिशों को

हकीक़त बना दे

और

ख़्वाबों को आइना ।

पर ये आइना

टूट जाता है

छनाक से

चुभ जाती हैं किरचें

मन के हर कोने में

और सुलग जाता है मन

तृष्णा की आंच से .



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चपला चंचला

>> Sunday, October 25, 2009


एक दिन अचानक

भीड़ के बीच

बस स्टाप पर

मेरी नज़र पड़ गयी थी

तुम पर

मुझे लगा कि

बहुत देर से

टकटकी लगा कर

देख रहे थे तुम ।

तभी बस आई

और भीड़ के साथ

मैं भी सवार हो गयी थी

बस में ।

पर तुम

किंकर्तव्यमूढ़ से

खड़े रह गए थे ।

और ये सिलसिला

रोज़ का ही

हो गया था शुरू।


मैं

अपनी सहेलियों के साथ

हंसती थी , खिलखिलाती थी

मद मस्त हुई जाती थी ।

और कुछ जान बुझ कर भी

अदा दिखाती थी ।

और एक नज़र भर

देख कर

चली जाती थी।

तुम रह जाते थे

खड़े वहीँ के वहीँ।


और एक दिन

तुम

मेरे करीब से गुज़रे

और धीरे से

कहा कान में

चपला चंचला ।

सुनते ही जैसे मैं

जड़ हो गयी थी ।


आज भी वही

बस स्टाप है

रोज़ मेरी नज़रें

तुम्हें खोजती हैं

और निराश हो

लौट आती हैं ।

अब मेरे साथ

न सहेलियां हैं

न हंसी है

न खिलखिलाहट है

न मस्ती है ।

बस

है तो

बस एक ख्वाहिश

कि

एक बार फिर से

सुन सकूँ तुमसे

चपला चंचला

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मोहब्बत

>> Friday, October 23, 2009


मैंने तुमसे

मोहब्बत की है

बेपनाह मोहब्बत की है ।

इसीलिए

कभी तुमसे

कुछ माँगा नहीं

सुना है मैंने

कि

मोहब्बत में

पाने से ज्यादा

देने की चाहत होती है

इसीलिए

कभी तेरे सामने

मैंने अपना हाथ

फैलाया नहीं।

और वैसे भी

भला मैं तुझे

क्या दूंगी ?

ये आंसू के

कुछ कतरे हैं

जिन्हें तेरे

चरणों पर रख दूंगी ।

सच में मैंने तुझसे

मोहब्बत की है

ऐ मेरे खुदा

बेपनाह मोहब्बत की है.

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दीपावली मनाएंगे

>> Sunday, October 18, 2009


लौटे थे राम

वनवास से

इसलिए हम

दीपावली मनाएंगे

और अपने

अंतस के राम को

वनवास दे आयेंगे ।


बिजली से चमकते

अपने घर में

और दिए जलाएंगे

पर किसी गरीब की

अँधेरी कोठरी में

एक दिया भी

नहीं रख पायेंगे ।


जिनके भरे हों

पेट पहले से

उन्हें और

मिष्टान्न खिलाएंगे

लेकिन भूखे पेट

किसी को हम

भोजन नहीं कराएँगे


पटाखे चलाएंगे

फुलझडी छुटायेंगे

और इसी तरह से

हर साल दीपावली मनाएंगे ।

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निर्वाण

>> Thursday, October 15, 2009


मृत्यु पर आरूढ़ हो

सोचता है इन्सान कि

शायद जीवन से उसको

मिल गया है निर्वाण ।


पर ये शब्द भी

आरूढ़ हो चुका है

एक अर्थ के लिए

प्राप्त नहीं होता

सबको निर्वाण


जब छूट जाती हैं साँसें

और तन हो जता है जड़

उस अवस्था को केवल

कह सकते हैं देहावसान ।


जो मनुष्य होता है मुक्त

काम , क्रोध , लोभ ,से

उसे ही मिल जाता है

जीते जी निर्वाण ।

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नन्हा पौधा

>> Wednesday, October 14, 2009


जिस तरह

नन्हे पौधे को

रोप कर

हवा ,रोशनी के बिना

यदि केवल सींचा जाये

तो सड़ जाता है


उसी तरह

प्यार का पौधा भी

रोशनी और

बाहरी हवा के बिना

मात्र नेह के जल से

मर जाता है

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कृत्रिमता

>> Saturday, October 10, 2009

ज़िन्दगी है

कृत्रिम सी

और

कृत्रिम से ही

रिश्ते हैं

जानते हैं लोग

एक दूसरे को
पर

पहचानते नहीं हैं ।



इस जानने और

पहचानने के

बीच की दूरी ही

पैदा कर देती है

कृत्रिमता ।


पुराने रिश्तों में


खड़ी हो जाती है

दीवार

जब होता है शुरू

सिलसिला

पहचानने का ।


नए रिश्ते बन नहीं पाते


पुरानों के खँडहर पर

और हम

कृत्रिमता को ओढे हुए

बेमानी सी ज़िन्दगी

ढोते रहते हैं उम्र भर ।

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उत्सव

>> Friday, October 9, 2009


तुमसे ये कहना तो

बेमानी है

कि

राह तकते तकते

मेरी आँखें पथरा गयी हैं।

इनकी तपिश से

मेरे घर के

सामने की सड़क भी

कुछ पिघल सी गयी है

मौसम कुछ

बदल सा गया है ।

हवाएं शुष्क

हो चली है

और चल रही है

ठंडी बयार

पर मन में आँधियाँ हैं

और उठ रहा है

गुबार ।

साँसों के धधकने से

जैसे धुआं सा उठ रहा है ।

पर सच मानो

तुमसे कोई शिकवा नहीं है ।

आज मैं तर्पक

बन गयी हूँ

और कर दिया है

तर्पण मैंने

अपने रिश्ते का ।

आज उसी रिश्ते का

श्राद्ध है

इस उत्सव में

तुम ज़रूर आना..

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दिवस का अवसान

>> Thursday, October 8, 2009




भोर का कुछ यूँ आगमन हुआ

रवि रश्मि - रथ पर सवार हुआ

कर रहा था

अपने तेज से प्रहार

तारावली छिप गयी

और रजनीकर भी

गया था हार ।

दिनकर के आते ही

महक उठा

चमन - चमन

प्रफुल्लित हो गया

सारा वातावरण ।

कलरव से गुंजरित थीं

चहुँ दिशाएं

धरती के जीवन में

अंकुरित थीं

नयी आशाएं।

त्रण- त्रण पर

सोना बरस रहा था

पात - पात पर

चांदी थी

प्रकृति की सारी चीजें

जैसे सूरज ने

चमका दी थीं।

कर्मठ

छोड़ चुके थे आलस

निशा की

निद्रा त्याग चुके थे

हर चेतन में

अब जीवन था

सब अपने कार्यों में

क्रियान्वित थे ।

जैसे जैसे रथ बढ़ता था

प्रचंड धूप सताती थी

पर रवि की सवारी तो

आगे ही बढ़ती जाती थी।

फिर हुआ सिंदूरी आसमां

दिवाकर ने किया प्रस्थान

चेतन के भी थक गए प्राण

यूँ हुआ दिवस का अवसान ।

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अग्नि और ध्यान

>> Sunday, October 4, 2009




अग्नि
कर देती है
सब कचरे को भस्म ,
समाहित कर लेती है
खुद में
फिर भी
उसकी लौ
रहती है
उत्तुग .

ध्यान भी
कर देता है
मन के विकारों का
शमन
कर देता है
शांत मन .
बना देता है
शिरोमण.

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गुलमोहर

>> Sunday, September 27, 2009


याद है तुम्हें ?

एक दिन

अचानक आ कर

खड़े हो गए थे

मेरे सामने तुम

और पूछा था तुमने

कि - तुम्हें

गुलमोहर के फूल

पसंद हैं ?

तुम्हारा प्रश्न सुन

मैं स्वयं

पूरी की पूरी

प्रश्नचिह्न बन गयी थी ।

न गुलाब , न कमल

न मोगरा , न रजनीगंधा ।

पूछा भी तो क्या

गुलमोहर?

आँखों में तैरते

मेरे प्रश्न को

शायद तुमने

पढ़ लिया था

और मेरा हाथ पकड़

लगभग खींचते हुए से

ले गए थे

निकट के पार्क में ।

जहाँ बहुत से

गुलमोहर के पेड़ थे।

पेड़ फूलों से लदे थे

और वो फूल

ऐसे लग रहे थे मानो

नवब्याहता के

दहकते रुखसार हों ।

तुमने मुझे

बिठा दिया था

एक बेंच पर

जिसके नीचे भी

गुलमोहर के फूल

ऐसे बिछे हुए थे

मानो कि सुर्ख गलीचा हो।

मेरी तरफ देख

तुमने पूछा था

कि
कभी गुलमोहर का फूल

खाया है ?

मैं एकदम से

अचकचा गयी थी

और तुमने

पढ़ ली थी

मेरे चेहरे की भाषा ।

तुमने उचक कर

तोड़ लिया था

एक फूल

और उसकी

एक पंखुरी तोड़

थमा दी थी मुझे ।

और बाकी का फूल

तुम खा गए थे कचा-कच ।

मुस्कुरा कर

कहा था तुमने

कि - खा कर देखो ।

ना जाने क्या था

तुम्हारी आँखों में

कि

मैंने रख ली थी

मुंह में वो पंखुरी।


आज भी जब

आती है

तुम्हारी याद

तो

जीव्हा पर आ जाता है

खट्टा - मीठा सा

गुलमोहर का स्वाद।



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कन्या पूजन

>> Saturday, September 26, 2009



कन्या पूजन का पर्व आया
सबने मिल नवरात्र मनाया 

नौ दिन देवी को अर्घ्य चढाया

कन्या के पग पखार

माथे तिलक लगाया

धार्मिक ग्रंथों में कन्या को

देवी माना है

क्रमशः उनको - कुमारी , त्रिमूर्ति

कल्याणी , रोहणी, कलिका ,

चंडिका , शाम्भवी , दुर्गा

और सुभद्रा जाना है

पूजा - अर्चना कर

घर की समृधि चाही है

पर कन्या के जन्म से

घर में उदासी छाई है ।

नवरात्र में जिसकी

विधि- विधान से

पूजा की जाती है

कन्या-भ्रूण पता चलते ही

उसकी हत्या

कर दी जाती है ।

कैसा है हमारा ये

दोगला व्यवहार ?

पूजते जिस नारी को

करते उसी पर अत्याचार

धार्मिक कर्म - कांडों से

नहीं होगा उसका उद्धार

खोलने होंगे तुमको

निज मन के द्वार ।

जिस दिन तुम

मन से कन्या को

देवी मानोगे 


तब ही तुम

सच्ची सुख - समृद्धि पाओगे.

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मन का रथ

>> Friday, September 25, 2009


मन के रथ पर

सवार हो जाती हैं

मेरी भावनाएं

और एहसास के घोडे

हो जाते हैं तैयार

ख्वाहिशों की चाबुक

देखने भर से ही

दौड़ पड़ते हैं सरपट

सोच की पवन से

लग जाती है होड़

और रथ पर बैठी

भावनाएं

खाती हैं हिचकोले ।


दिखते हैं असीम दृश्य -

कहीं कोई कली है

तो कहीं वल्लरी है

कहीं हरियाली है

तो कहीं सूखी क्यारी है।

कहीं आभाव हैं

तो कहीं खुश-हाली है

कहीं चहकते परिंदे हैं

तो कहीं मायूस बन्दे हैं

दिखता है ज़िन्दगी का

विरोधाभास

यही ज़िन्दगी है

ऐसा होता है आभास ।


जब मंद होती है पवन

और घोडे भी

जाते हैं थक

तो हिचकोले खाती

भावनाएं भी

थम जाती हैं
दृश्य भी सारे

हो जाते हैं अदृश्य

और रूक जाता है

मन का रथ।

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ख्वाहिशों के पंख

>> Tuesday, September 22, 2009


मैंने

अपने ख़्वाबों की तितली के

पंखों में भर दी थीं

सारी रंगीन ख्वाहिशें

और सोचा कि

बंद कर लूँ

इस तितली को

अपनी मुट्ठी में ।

पर वो उड़ कर

कभी इधर और

कभी उधर

बैठ जाती है ।

मैं जब भागती हूँ

उसके पीछे

तो वो हाथ नहीं आती
बस दूर से

मुस्कुराती है ।

एक दिन अचानक

आ बैठी मेरी हथेली पर

और मुझसे पूछा

कि तुम मेरे पीछे

क्यों भागती हो?

मुझे

क्यों पकड़ना चाहती हो?

गर तुमने मुझे

पकड़ लिया

तो तुम्हारी

रंगीन चाहतें

मर जाएँगी

और ख्वाब ख्वाब न रह

हकीकत बन जायेंगे

मैं उसकी बात सुन

देर तक सोचती रह गयी

और वो

मेरी ख्वाहिशों के

नए रंग ले

फिर से उड़ गयी

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चेतावनी


पुरुष ! तुम सावधान रहना ,
बस है चेतावनी कि
तुम अब ! सावधान रहना .

पूजनीय कह नारी को
महिमा- मंडित करते हो
उसके मान का हनन कर
प्रतिमा खंडित करते हो .
वन्दनीय कह कर उसके
सारे अधिकारों को छीन लिया
प्रेममयी ,वात्सल्यमयी कह
तुमने उसको दीन किया .

पर भूल गए कि नारी में
एक शक्ति - पुंज जलता है
उसकी एक नज़र से मानो
सिंहांसन भी हिलता है.

तुम जाते हो मंदिर में
देवी को अर्घ्य चढाने
उसके चरणों की धूल ले
अपने माथे तिलक सजाने
घंटे - घड़ियाल बजा कर तुम
देवी को प्रसन्न करते हो
प्रस्तर- प्रतिमा पर केवल श्रृद्धा रख
खुद को भ्रमित करते हो.
पुष्पांजलि दे कर चाहा तुमने कि
देवी प्रसन्न हो जाएँ
जीवन में सारी तुमको
सुख - समृद्धि मिल जाएँ .

घर की देवी में तुमको कभी
देवी का रूप नहीं दिखता ,
उसके लिए हृदय तुम्हारा
क्यों नहीं कभी पिघलता ?
उसकी सहनशीलता को बस
तुमने उसकी कमजोरी जाना
हर पल - हर क्षण तुमने उसको
खुद से कम तर माना..

नारी गर सीता - पार्वती बन
सहनशीलता धरती है
तो उसके अन्दर शक्ति रूप में
काली औ दुर्गा भी बसती है.
हुंकार उठी नारी तो ये
भूमंडल भी डोलेगा
नारी में है शक्ति - क्षमा
पुरुषार्थ भी ये बोलेगा.
इसीलिए -
बस सावधान रहना
अब तुम सावधान रहना .

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भाषा

>> Monday, September 14, 2009

जब भी

मैं देखती हूँ

मूक प्राणियों की

आँखों में

तो उनकी

आँखों की

चमक के साथ

एक भाषा

उभर कर आती है

जिसमें शब्द नहीं होते

बस होता है प्यार ।

काश -इंसान भी

केवल

इसी भाषा को जानता ,

समझता सोचता

और जीता

यदि ऐसा होता तो

उसकी भाषा में

नफरत जैसे शब्द

नहीं होते....

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ज्वालामुखी

>> Saturday, September 12, 2009


आँखों के समंदर में

ये कैसा तूफां है

खींच ले जाता है

साहिल से

मेरी हर ख्वाहिश को ,


दम तोड़ देती है

हर चाहत

जूझ कर खुद ही

सागर की लहरों के

हर थपेडे को सह कर ।


जज्ब कर लेता है

सिन्धु

अपनी ही गहराई में

देखे - अनदेखे

मेरे हर ख़्वाबों को ।


होती है सिहरन

बस भीगी सी रेत से

और ये रेत भी भीगी है

मेरे अश्कों की धारों से।


शुष्क है मन और

अब आँखें भी खुश्क हैं

न ख्वाहिश है कोई मन में

न ख्वाब आँखों में है।


कोशिश थी मेरी कि

बच जाए महल सपनों का

पर फूटा ऐसा ज्वालामुखी

कि समां गया

सुनामी की बाहों में...

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दिग्भ्रमित

>> Thursday, September 10, 2009

संसार की मोह माया से

है हर प्राणी ग्रसित

इसीलिए रहता है

वो हर क्षण दिग्भ्रमित ।

छूटता नहीं है मोह कभी भी

स्वयं का स्वयं से

जूझता रहता है पल - पल

अपने अधूरेपन से

स्वार्थ को अंगीकार कर

वो जीना चाहता है

जीने का शायद उसे

यही सलीका आता है ।

भ्रम जाल से मुक्त हो

कब मुमुक्षु बनेगा

गरल और अमृत को कब

एक समान वरेगा ?

गर हुआ ऐसा कभी तो

भ्रमित इच्छाएं ध्वस्त होंगी

और मंजिल को पाने की

सारी राहें प्रशस्त होंगी.

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पीले फूल

>> Wednesday, September 9, 2009


मैंने

यादों के दरख्त पर

टांग दिए थे

अपनी चाहतों के

पीले फूल

और

देखा करती थी

उनको अपनी

निर्निमेष आँखों से

जब भी

कोई चाहत

होती थी पूरी

तो एक फूल

वहां से झर

आ गिरता था

मेरी झोली में

और मैं

उसे बड़े जतन से

सहेज कर

रख लेती थी

अपने दिल के

मखमली डिब्बे में।

बहुत से

फूलों की सुगंध से

सुवासित है

मेरा मन

पर

अभी भी

इंतज़ार है मुझे

उस फूल का

जो मैंने

तुम्हारे नाम का

टांगा था....

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हमारी वाणी

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