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उष्ण कण

>> Saturday, September 5, 2009


सोचों की
काली घटायें
जब हो जाती हैं
व्याकुल
उमड़ती हैं,
घुमड़ती हैं,
गरजती हैं .
और तब
ज्ञान की बिजलियाँ
चमकती हैं जोर से .
फट पड़ता है
मन का आसमां
गिर पड़ता है
औंधे मुंह
ज़मीन पर .

फिर
विक्षिप्त सा मन
चाहता है
शीतल बूंदों का
आस्वादन .....
लेकिन
गिर जाते हैं
कुछ
उष्ण कण .

2 comments:

दिगम्बर नासवा 9/06/2009 5:07 PM  

फिर
विक्षिप्त सा मन
चाहता है
शीतल बूंदों का
आस्वादन .....
लेकिन
गिर जाते हैं
कुछ
उष्ण कण ....

MAN KE JAJBAATON KO SHABDON MEIN BAAKHOOBI UTAARA HAI AAPNE .... SUNDAR RACHNA

JHAROKHA 9/06/2009 5:59 PM  

Adarniiya Sangeeta ji,
man ke bhavon aur antrdvnd ko apane is kavita men bahut sahaj roop men abhivyakt kiya hai.
shubhkamnayen.
Poonam

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