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भाषा

>> Monday, September 14, 2009

जब भी

मैं देखती हूँ

मूक प्राणियों की

आँखों में

तो उनकी

आँखों की

चमक के साथ

एक भाषा

उभर कर आती है

जिसमें शब्द नहीं होते

बस होता है प्यार ।

काश -इंसान भी

केवल

इसी भाषा को जानता ,

समझता सोचता

और जीता

यदि ऐसा होता तो

उसकी भाषा में

नफरत जैसे शब्द

नहीं होते....

7 comments:

दिगम्बर नासवा 9/14/2009 12:30 PM  

लाजवाब और खूबसूरत लिखा है .......हिंदी दिवस पर bhashaa का सही gyan dikhlatio shashakt rachna है .........

ओम आर्य 9/14/2009 5:03 PM  

बिल्कुल ही सही कहा आपने ........आज सिर्फ और सिर्फ प्यार की भाषा की जरुरत है ..........बहुत ही सुन्दर

JHAROKHA 9/16/2009 9:31 PM  

काश -इंसान भी
केवल
इसी भाषा को जानता ,
ुसमझता सोचता
और जीता
यदि ऐसा होता तो
उसकी भाषा में
नफरत जैसे शब्द
नहीं होते....
आदरणीया संगीता जी,
बहुत ही सार्थक बात कही आपने इस कविता में।
पूनम

"लोकेन्द्र" 9/19/2009 9:09 PM  

खूबसूरत सोच की खूबसूरत प्रस्तुति......

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