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ख्वाहिशों के पंख

>> Tuesday, September 22, 2009


मैंने

अपने ख़्वाबों की तितली के

पंखों में भर दी थीं

सारी रंगीन ख्वाहिशें

और सोचा कि

बंद कर लूँ

इस तितली को

अपनी मुट्ठी में ।

पर वो उड़ कर

कभी इधर और

कभी उधर

बैठ जाती है ।

मैं जब भागती हूँ

उसके पीछे

तो वो हाथ नहीं आती
बस दूर से

मुस्कुराती है ।

एक दिन अचानक

आ बैठी मेरी हथेली पर

और मुझसे पूछा

कि तुम मेरे पीछे

क्यों भागती हो?

मुझे

क्यों पकड़ना चाहती हो?

गर तुमने मुझे

पकड़ लिया

तो तुम्हारी

रंगीन चाहतें

मर जाएँगी

और ख्वाब ख्वाब न रह

हकीकत बन जायेंगे

मैं उसकी बात सुन

देर तक सोचती रह गयी

और वो

मेरी ख्वाहिशों के

नए रंग ले

फिर से उड़ गयी

13 comments:

masoomshayer 9/22/2009 10:34 PM  

ek nayee komalata hai aap kee kavitaon men aaj kal titlee jaisee har rachana amar kah raheen hai aaj kal bahut khoon

रश्मि प्रभा... 9/22/2009 10:41 PM  

तितली कहीं जाये,ख़्वाबों के ,ख्वाहिशों के जज़्बात तो आपके हैं

Basanta 9/23/2009 6:09 AM  

Lovely and sweet poem! Life is best lived in dreams.

दिगम्बर नासवा 9/23/2009 9:10 AM  

बहुत ही सुन्दर एहसास से रंगी है आपकी कविता ........ सच में ख्वाहिशों को पा लेने के बाद जीवन से उमंग, उसके रंग निकल जाते हैं ......... उनकी तो बस उड़ान होनी चाहिए ....... और हमारी कोशिश ....... मन को छूती है आपकी रचना ..... लाजवाब ...

shikha varshney 9/23/2009 2:37 PM  

दी! बहुत कोमल एहसास लिए है ये कविता बहुत ही सुंदर .ऐसे ही सपनो में रंग भरते रहिये.

ओम आर्य 9/23/2009 3:53 PM  

बेहद नाजुक और कोमल भाव/पढने के बाद ख्वाहिशे रंगीन सी होने लगी/बहुत बहुत सुन्दर!

निर्झर'नीर 9/23/2009 3:53 PM  

kisi ne kaha hai ki..

tamanna ne zindgi ke daman mein sar rakhkar kaha ki mai kab poori hungi ,to zindagi ne muskrakar kaha ki ..........jo poori ho jaye vo tamanna hi kya.

Anamika 9/23/2009 6:46 PM  

संगीता जी..
कविता इस बार आपकी अन्य रचनाओ से हटकर है..एक ताजगी का सा एहसास हो रहा है सोचो में इस बार आपकी इस रचना में..
एक जगह jaha aapne likha hai..ki gar tumne mujhe pakad liya to tumhari रंगीन चाहते मर जाएँगी..
इसकी जगह ये हो सकता था...गर तुमने मुझे पकड़ लिया तो मेरे रंगीन पंखो में समाई सारी तुम्हारी रंगीन खवाहिशे तुम्हारे हाथो पर बिखर जाएँगी..और ये सरे खाब बे-रंग हो जायेंगे..

बहुत अच्छी कविता..बधाई..

Anamika 9/23/2009 6:47 PM  

संगीता जी..
कविता इस बार आपकी अन्य रचनाओ से हटकर है..एक ताजगी का सा एहसास हो रहा है सोचो में इस बार आपकी इस रचना में..
एक जगह jaha aapne likha hai..ki gar tumne mujhe pakad liya to tumhari रंगीन चाहते मर जाएँगी..
इसकी जगह ये हो सकता था...गर तुमने मुझे पकड़ लिया तो मेरे रंगीन पंखो में समाई सारी तुम्हारी रंगीन खवाहिशे तुम्हारे हाथो पर बिखर जाएँगी..और ये सरे खाब बे-रंग हो जायेंगे..

बहुत अच्छी कविता..बधाई..

Mumukshh Ki Rachanain 9/24/2009 3:36 PM  

अहसास की अच्छी और भावभीनी प्रस्तुति.

हार्दिक बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

sangeeta 12/13/2009 11:00 PM  

निपुण पाण्डेय said...
वाह!
कितनी खूबसूरत बात कह दी आपने इन पंक्तियों में !!!

6 December 2009 19:57

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