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मोहब्बत

>> Friday, October 23, 2009


मैंने तुमसे

मोहब्बत की है

बेपनाह मोहब्बत की है ।

इसीलिए

कभी तुमसे

कुछ माँगा नहीं

सुना है मैंने

कि

मोहब्बत में

पाने से ज्यादा

देने की चाहत होती है

इसीलिए

कभी तेरे सामने

मैंने अपना हाथ

फैलाया नहीं।

और वैसे भी

भला मैं तुझे

क्या दूंगी ?

ये आंसू के

कुछ कतरे हैं

जिन्हें तेरे

चरणों पर रख दूंगी ।

सच में मैंने तुझसे

मोहब्बत की है

ऐ मेरे खुदा

बेपनाह मोहब्बत की है.

5 comments:

Anamika 10/23/2009 11:56 PM  

एक खुदा का दर ही ऐसा होता है की जहा बिना रोक-टोक अपना दुःख कह सकते है बहा सकते है...is se jyada shraddha ham aur kisi tareh se dikha bhi nahi sakte shayed.

bahut acchhi rachna.

दिगम्बर नासवा 10/24/2009 1:19 PM  

AANSU KE SACHHE KATRE BHI APNE AAP MEIN PREM HI TO HAIN .... BAHOOT HI BHAAVOK LIKHA HAI ....

Mumukshh Ki Rachanain 10/24/2009 3:56 PM  

मुहब्बत के गीत के साथ" बाल ब्रह्मचारी बजरंगबली" का चित्र, बात कुछ समझ नहीं आई?????
थोडा ज्ञान बाधाएं तो उपकृत हूँगा.

कहीं यह प्रभु के शरण में आपकी अरदास तो नहीं????

रचना प्रभावशाली रही.

बधाई...........

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

sangeeta 10/24/2009 6:44 PM  

आप सबका आभार....

चन्द्र मोहन जी,
आपने सही कहा, ये प्रभु के चरणों में मेरी अरदास ही है....अंतिम पंक्तियों में यही लिखा है..

शुक्रिया

Rakesh 10/24/2009 7:02 PM  

sangeeta
bahut acha likhti hai aap...aapko jab bhi padha sukun mila hai ...main aapki kavitaon ko padhne ka entizar kerta reha hun shayrfamily mein aaj blog mil gaya to maja aa gaya ...

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