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क्या कर पाएंगे प्रतिकार

>> Tuesday, January 12, 2010





धरती से


धन धान्य मिला है


अम्बर से


                                मिलता पानी


फिर भी खाली


झोली ले


फिरता क्यूँ हर प्राणी ?


प्रभु ने हमको


झोली भर - भर


दिए अनेकों उपहार


इन उपहारों का


क्या कभी हम


कर पाएंगे प्रतिकार ?






माँ के आँचल से


जो हमको



छाँव घनेरी   मिलती                          


हर गलती पर भी मिलता


माँ का असीम दुलार


इस दुलार का भी


क्या कभी हम


कर पायेंगे प्रतिकार ?






                           संगी - साथी


                          संग खेले हैं


   हर सुख - दुःख में


   रहते साथ


बिना किसी शर्तों के मिलता


हमको उनका प्यार


इस प्यार का भी


क्या कभी हम


कर पायेंगे प्रतिकार ?

15 comments:

अनामिका की सदाये...... 1/12/2010 10:40 PM  

bahut acchhi rachna...kash insaan ye sab samajh kar kuch samajh paye, kuchh tasalli/santushti kar paye.
lekin afsos ki insaan har prakar se prakriti ki hariyali khatam kar kankreet k jangle khade kar k aur dharti ka dohan kar k insaniyet ki takat dikha raha hai.

achhi rachna.badhayi.

संजय भास्कर 1/12/2010 10:41 PM  

फिर भी खाली


झोली ले


फिरता क्यूँ हर प्राणी ?


प्रभु ने हमको


झोली भर - भर


दिए अनेकों उपहार
लाजवाब पंक्तियाँ

संजय भास्कर 1/12/2010 10:42 PM  

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन

Sanjay kumar
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

मनोज कुमार 1/12/2010 10:46 PM  

इस प्यार का भी
क्या कभी हम
कर पायेंगे प्रतिकार ?
कभी नहीं।
बहुत अच्छी कविता। बधाई।

Udan Tashtari 1/13/2010 6:24 AM  

बिल्कुल सही कहा!!


बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!!

Rekhaa Prahalad 1/13/2010 9:02 AM  

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने!

Apanatva 1/13/2010 11:29 AM  

bahut pyaree rachana hai sath hee pictures bhee badee acchee lagee 1

रश्मि प्रभा... 1/13/2010 12:58 PM  

aapki kalam kee dhaar paini hoti jaa rahi hai, sidha dil par asar chhodti hai

वन्दना 1/13/2010 1:14 PM  

bahut hi sundar bhav.........bahut bada karz hai ise utarna har kisi ke vash ki baat nhi......aur niswarth prem ka karz to utara bhi nhi ja sakta.

रचना दीक्षित 1/13/2010 5:19 PM  

सच कहा इतना कुछ मिला है उसके ऋणी होने की जगह हम जो नहीं मिला उसकी शिकायत करते हैं.बहुत खूब

Creative Manch-क्रिएटिव मंच 1/14/2010 11:36 AM  

बहुत ही अच्‍छी कविता
बधाई
मकर संक्रांति कि शुभकामनाएं


★☆★☆★☆★☆★☆★
'श्रेष्ठ सृजन प्रतियोगिता'
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क्रियेटिव मंच

दिगम्बर नासवा 1/14/2010 1:29 PM  

सच है उस ईश्वर ने तो बिन माँगे ही सब कुछ दिया है ........ तेरा मेरा तो हम सब करते हैं ........ बहुत ही सुंदर रचना है .......
आपको मकर संक्रांति की बहुत बहुत बधाई ...........

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ 8/13/2010 4:47 PM  

संगीता जी, इतने आसान शब्दों में इतनी प्रभावी बातें कैसे लिख लेती हैं आप?
………….
सपनों का भी मतलब होता है?
साहित्यिक चोरी का निर्लज्ज कारनामा.....

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