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ज़िंदगी, मात्र कल्पना नही होती है.

>> Saturday, January 30, 2010


ज़िंदगी, मात्र कल्पना नही होती है.



मानती हूँ कि-


कल्पना की ज़िंदगी से बेहतर


कोई ज़िंदगी नही होती है,


जहाँ हर पल


अपने ख्वाबों के अनुसार


ढाल लिया जाता है


हर सवाल,


जी लेते हैं हर पल


अपने ही ढंग से


मन में नही रहता


फिर कोई मलाल


पर फिर भी


ज़िंदगी,


मात्र कल्पना नही होती है.






ना जाने कितने तूफान


मन में पले होते हैं


ना जाने कितने सैलाब


दिल में भरे होते हैं


सबको बांधना भी


कुछ आसान नही होता है


इनको रोकना भी कभी - कभी


नामुमकिन सा होता है.


पर धैर्य वो बाँध है कि


आई बाढ़ भी सिमट जाती है


ज़िंदगी की कल्पना में


फिर हक़ीकत ही नज़र आती है


गमों का सैलाब भी


थमता सा नज़र आता है


ज्वार - भाटे का समुद्र से तो


हर पल का नाता है,






धीरज ही है जो इंसान को


जीना सिखाता है


कल्पना में ही सही


पर विस्तृत आकाश में


विचरण करता है


पर जब यथार्थ के कठोर धरातल से


कल्पना टकराती है


लगता है कि जैसे


ज़िंदगी, चूर - चूर हो जाती है


क्यों कि--ज़िंदगी


ज़िंदगी,


मात्र कल्पना नही होती है.

22 comments:

shikha varshney 1/30/2010 9:22 PM  

आह काश जिन्दगी कल्पना ही होती....पर नहीं होती वैसी होती है जैसी आपने कहा...बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

मनोज कुमार 1/30/2010 9:24 PM  

आपकी मान्यता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

Manoj Bharti 1/30/2010 9:34 PM  

एक सुंदर रचना ...ज़िंदगी का अर्थ बताती हुई ।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 1/30/2010 9:35 PM  

कल्पनाओ का सार्थक विस्तार ....

धन्यवाद.



आरंभ

ह्रदय पुष्प 1/30/2010 9:43 PM  

धैर्य वो बाँध है कि
आई बाढ़ भी सिमट जाती है
ज़िंदगी की कल्पना में
फिर हक़ीकत ही नज़र आती है
गमों का सैलाब भी
थमता सा नज़र आता है
ज्वार - भाटे का समुद्र से तो
हर पल का नाता है,
अटल सत्य "धैर्य" अति आवश्यक है - जो नहीं जनता सीख ले - आभार

अनामिका की सदाये...... 1/30/2010 10:15 PM  

गर दो पल ख़ुशी
कल्पना से ही मिले
तो वो ही बेहतर है
वर्ना जिंदगी को
यथार्थ की धरा पर
जीना तो बदतर है.
ख़ुशी कोई मिलती नहीं..
अश्को का एक रेला है..
स्याह रात का एक
घुप्प अँधेरा है..
जहा जिन्दगी का
न कोई ओर है..
न कोई छोर है..

संगीता जी में आपकी रचना की आलोचना में ये लिनेस नहीं लिख रही हु...बस ऐसे ही कुछ ख्याल आये और उतर दिए...वरना...सच तो यही है..जो आप बयान कर रही है.

संजय भास्कर 1/30/2010 11:19 PM  

एक सुंदर रचना ...ज़िंदगी का अर्थ बताती हुई ।

संजय भास्कर 1/30/2010 11:20 PM  

संगीता जी kamaal ka likhti hai aap...

हिमांशु । Himanshu 1/31/2010 6:37 AM  

बेहतरीन रचना । आभार ।

वाणी गीत 1/31/2010 7:03 AM  

जिंदगी सिर्फ कल्पना नहीं होती मगर कलाप्नों में जिंदगी गुजर जाती है ...
कल्पना बिखर जाए तो ठेस लगती है ...मगर जिन्दगी के बिखरने से कम ...
तो क्या हुआ ...जो जिन्दगी कल्पना में ही बीत जाए ...
सुन्दर रचना ....!!

Apanatva 1/31/2010 8:25 AM  

धैर्य वो बाँध है कि
आई बाढ़ भी सिमट जाती है
ज़िंदगी की कल्पना में
फिर हक़ीकत ही नज़र आती है

sangeeta jee bahut acchee rachana hai aur ye panktiya to saar hai.......jeevan ko khush hal banane ka mantr bhee
ati sunder

M VERMA 1/31/2010 9:16 AM  

कल्पना और जिन्दगी साथ साथ चलती ही रहती है
बहुत सुन्दर

Razi Shahab 1/31/2010 12:58 PM  

vaaqai... zindagi sirf kalpana nahi hoti...haan bahut sari kalpanayein zindgi zaroor hoti hain....achchi rachna

वन्दना 1/31/2010 2:41 PM  

BAHUT HI SUNDAR LIKHA HAI SATH HI ZINDAGI KA EK KHOOBSOORAT PAHLU BHI DARSHA DIYA HAI.

गीता पंडित (शमा) 1/31/2010 6:40 PM  

धैर्य वो बाँध है कि


आई बाढ़ भी सिमट जाती है


बहुत सुंदर ....

विनोद कुमार पांडेय 1/31/2010 6:55 PM  

बढ़िया भाव लिए एक सुंदर कविता...

●๋• नीर ஐ 1/31/2010 8:57 PM  

Bahut khoob maasi ji....haqiqat ki zindagi mein jeene ka jo maza hai wo khwaab ki zindagi mein nahin..... :)

'अदा' 2/01/2010 5:24 AM  

धैर्य वो बाँध है कि
आई बाढ़ भी सिमट जाती है
ज़िंदगी की कल्पना में
फिर हक़ीकत ही नज़र आती है
गमों का सैलाब भी
थमता सा नज़र आता है
ज्वार - भाटे का समुद्र से तो
हर पल का नाता है,

जीवन एक संग्राम है और धीरज हथियार...
चाचे कुछ भी हो जाए धीरज नहीं खोना है...
हकीकत को दिखाती कविता..है आपकी दीदी,
बहुत सशक्त...

दिगम्बर नासवा 2/01/2010 12:49 PM  

बहुत अच्छा लिखा है ...... सच में जीवन बस कल्पनाओं के सहारे नही जिया जा सकता ...... हिम्मत, धैर्य, साहस और भी बहुत कुछ चाहिए ...... सार्थक लिखा है ..........

ज्योति सिंह 2/02/2010 2:14 AM  

bahut sundar rachna padhi aakar ,vande matram .

GAURAV VASHISHT 2/02/2010 2:24 PM  

bahut hi sarthak likha hai di,
meme to jindgi ko kuch is tarha se dekha hai

"hum to jindgi ko bas khuawo me hi dekha karte hain,
isiliye har roz khuda se marne ki dua karte hain"

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