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अकुलाहट

>> Wednesday, February 10, 2010


आकुल से मन की

व्याकुल सी भाषा है
छंद लिखूं कोई तो
वो भी तो आधा है




प्रखर है सोच, पर
वेग ज़रा ज्यादा है
बह जाता आवेश
लिखने में बाधा है




अवरुद्ध हुए भाव
बस स्वार्थ ही साधा है
संतुष्टि मिले कहाँ
मन पर बोझ ही लादा है .




आकुल से मन की
व्याकुल सी भाषा है
बह जाता आवेग
लिखने में बाधा है ....

20 comments:

shikha varshney 2/10/2010 11:44 PM  

व्याकुल मन की व्यथा को कितने सुन्दर ढंग से लिखा है आपने वाकई कभी कभी बिलकुल यही हालत होती है पर शब्द नहीं मिलते....बहुत बहुत बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

आओ बात करें .......! 2/11/2010 12:00 AM  

भाव अवरुद्ध सही, साध्य स्वार्थ सही
वेग-आवेश-सोच-लेखन में बाधाएँ सही
आशा फिर भी ताज़ा है.........क्योंकि....
आकुल मन की व्याकुल भाषा
छंद तो लिखा चाहे है वो आधा

परमजीत बाली 2/11/2010 12:05 AM  

बहुत बढिया लिखा।बधाई।

अनामिका की सदाये...... 2/11/2010 12:23 AM  

bahut badhiya
aakulta ko shabd dene ki koshish.

विचारों का दर्पण 2/11/2010 1:26 AM  

बहुत अच्छी रचना ......

M VERMA 2/11/2010 4:58 AM  

बह जाता आवेग
लिखने में बाधा है ....
व्याकुल मन लिखने को मजबूर भी करता है और बाधा भी बनता है.

RaniVishal 2/11/2010 7:25 AM  

Bahut Sundar hai ye geet...Dhanyawad!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

Udan Tashtari 2/11/2010 7:51 AM  

बाधा के बावजूद इतना उम्दा रच गईं आप तो..अच्छा है बाधा बनी रहे.

वाणी गीत 2/11/2010 8:45 AM  

आकुल से मन की व्याकुल भाषा ...वेग को बहने दीजिये ...छंद ज्यादा दिन अधूरे नहीं रहेंगे ...
बहुत अच्छी लगी यह अकुलाहट ...!!

वन्दना 2/11/2010 11:30 AM  

vyakul man ki badha ko bahut hi sundar abhivyakti di hai.

अनिल कान्त : 2/11/2010 12:45 PM  

निसंदेह यह अच्छी कविताओं में से एक है.

मोहिन्दर कुमार 2/11/2010 1:02 PM  

सुन्दर भाव भरी रचना...सचमुच लिखते समय कुछ न कुछ आडे आ ही जाता है.

दिगम्बर नासवा 2/11/2010 1:10 PM  

व्याकुल मन के आवेश को बाँधना आसान तो नही था ...... पर आपने बहुत ही सुंदर रचना की पंक्तियों में उसे बँधा है ..... बहुत अच्छा लिखा .........

रश्मि प्रभा... 2/11/2010 2:31 PM  

vyakul mann hi panne par bahut kuch kahte hain......

शहरोज़ 2/11/2010 5:07 PM  

आप से हुई क्षणिक भेंट स्मरणीय है!!
सुघड़ कविता इतनी सुघड़ है कि क्या कहूं!! ऐसा लेखन आप जैसा परिपक्व-ज़ेहन का रचनाकार ही कर सकता है.

rashmi ravija 2/11/2010 10:25 PM  

मन की आकुलता को बहुत ही अच्छी तरह बयाँ किया है...सच कभी कभी सोच इतनी प्रखर होती है...और आवेश इतना ज्यादा कि लिखने में बाधा आती है...सुन्दर रचना...हर रचनाकार के मन की व्यथा

Arvind Mishra 2/11/2010 10:48 PM  

सुदर सहज गेय कविता

वन्दना अवस्थी दुबे 2/11/2010 11:00 PM  

अवरुद्ध हुए भाव
बस स्वार्थ ही साधा है
संतुष्टि मिले कहाँ
मन पर बोझ ही लादा है .
बहुत सुन्दर भाव हैं संगीता जी. बधाई.

Babli 2/12/2010 4:12 PM  

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें !
बहुत ही ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! इस शानदार और उम्दा रचना के लिए बधाई!

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