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टुकड़े टुकड़े ख्वाब

>> Monday, February 22, 2010



गर्भ -गृह से



आँखों की खिड़की खोल


पलकों की ओट से


मेरे ख़्वाबों ने


धीरे से बाहर झाँका


कोहरे की गहन चादर से


सब कुछ ढका हुआ था .






धीरे धीरे


हकीक़त के ताप ने


कम कर दी


गहनता कोहरे की


और


ख़्वाबों ने डर के मारे


बंद कर लीं अपनी आँखे .






क्यों कि -


उन्हें दिखाई दे गयीं थी


एक नवजात कन्या शिशु


जो कचरे के डिब्बे में


निर्वस्त्र सर्दी से ठिठुर


दम तोड़ चुकी थी
 
 

27 comments:

shikha varshney 2/22/2010 7:02 PM  

बाप रे दी ! कितना मार्मिक वर्णन किया है आपने अधूरे ख़्वाबों का ..एक नवजात कन्या की हत्या से.....और तस्वीरें ....निशब्द हूँ मैं.

निर्मला कपिला 2/22/2010 7:06 PM  

उन्हें दिखाई दे गयीं थी


एक नवजात कन्या शिशु


जो कचरे के डिब्बे में


निर्वस्त्र सर्दी से ठिठुर


दम तोड़ चुकी थी
मैं भी निशब्द हूँ । दिल को छू गयी आपकी ये रचना
धन्यवाद्

anjana 2/22/2010 7:29 PM  

बहुत अच्छी मार्मिक रचना |

अनामिका की सदाये...... 2/22/2010 7:35 PM  

कितना मार्मिक विषय है..

ख्वाबो ने दर के मरे
बंद कर ली अपनी आँखे...

क्या कहू...निशब्द हु...

rashmi ravija 2/22/2010 8:02 PM  

ओह्ह बडा ही करुण दृश्य दिखा दिया,आपने...बड़ी मार्मिक रचना..रूह कंपा देने वाली

Apanatva 2/22/2010 8:18 PM  

मैं भी निशब्द हूँ । दिल को छू गयी आपकी ये रचना
धन्यवाद्

ρяєєтι 2/22/2010 8:26 PM  

ek najaat kanyaa ki vyatha... mann vichlit ho gaya Didi...

AJEET 2/22/2010 8:59 PM  

bahut achi rachna hai

संजय भास्कर 2/22/2010 9:11 PM  

बहुत अच्छी मार्मिक रचना |

रोहित 2/22/2010 9:13 PM  

'aah,kitna maarmik wa karun chitran kiya aapne maa'm!
ek chhoti si kanya ke vayatha ne to nihshabd hi kar diya!

रश्मि प्रभा... 2/22/2010 9:19 PM  

oh, ek masoom ka darr, chatpatahat......bahut hi marmikta se likha hai

RaniVishal 2/22/2010 9:37 PM  

उफ़ !! क्या कह डाला आपने ..बहुत ही गहरी अभिव्यक्ति !
आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 2/22/2010 9:39 PM  

बहुत ही मार्मिक रचना प्रस्तुत की है आपने!
शायद इसकी गूँज से समाज जाग जाये!

aarya 2/22/2010 9:59 PM  

सादर वन्दे!
बहुत ही ह्रदयस्पर्शी रचना, इस दुनिया के लिए बच्चियां आज का सच हैं और कल कि किस्मत!
रत्नेश त्रिपाठी

महफूज़ अली 2/22/2010 10:19 PM  

मार्मिक रचना.... .

रंजना 2/22/2010 10:25 PM  

निःशब्द हूँ.......

काश कि यह रचना उन सभी तक पहुंचे जिनके ह्रदय पत्थर के हो चुके हैं...काश ,यह उन खूनी हाथों को कंपा सकें.....उनकी आत्माओं को झकझोर सकें......
मैं ईश्वर से प्राथना करती हूँ कि आपकी यह रचना असंख्य हृदयों तक पहुंचे और यह अमानुषिक कृत्य बंद हो....

मनोज कुमार 2/22/2010 11:07 PM  

इस कविता में बहुत बेहतर, बहुत गहरे स्तर पर एक बहुत ही छुपी हुई करुणा और गम्भीरता है।

M VERMA 2/23/2010 4:51 AM  

कारूणिक और मार्मिक

हिमांशु । Himanshu 2/23/2010 10:38 AM  

मार्मिक रचना ! कितना कुछ सघन व्यक्त हो गया है इन पंक्तियों में ! अर्थ-संस्पर्श बहुत है इस रचना में । आभार ।

दिगम्बर नासवा 2/23/2010 2:08 PM  

मार्मिक ... यथार्थ लिखा है इस रचना में ... काड़ुवा सच जो उद्दत से जहर की तरह घुला हुवा है हमारे समाज में ...

परमजीत बाली 2/23/2010 2:10 PM  

बहुत अच्छी मार्मिक रचना |

वन्दना 2/23/2010 4:42 PM  

uff .......bahut hi marmik aur samvedansheel rachna.

देवेश प्रताप 2/24/2010 6:58 PM  

कोई जवाब नहीं इस रचना का .......

Pawan Nishant 2/27/2010 9:40 AM  

achchhi rachna hai.
holi ki aapko aur aapke pariwar ko dher sari shubhkamnayen.

शहरोज़ 2/27/2010 2:01 PM  

मार्मिक वर्णन!

आप सभी को ईद-मिलादुन-नबी और होली की ढेरों शुभ-कामनाएं!!
इस मौके पर होरी खेलूं कहकर बिस्मिल्लाह ज़रूर पढ़ें.

वन्दना अवस्थी दुबे 2/28/2010 6:29 PM  

होली की बहुत-बहुत शुभकामनायें.

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