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महिला दिवस पर एक दृष्टिकोण ये भी....

>> Monday, March 8, 2010

ये  रचना मेरी छोटी बहन  मुदिता  ने आज महिला दिवस पर मुझे भेजी थी ...इसे मैं आप सभी के साथ बाँटना चाहती  हूँ....
आप इस रचना को इस ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं --

http://roohshine-lovenlight.blogspot.com/2010/03/blog-post_07.html

नारी दिवस के परिपेक्ष्य में अक्सर अभिव्यक्ति की अतिवादी विचारधारा देखने को मिलती है ..नारी को हमेशा एक सहज मानुष ना समझ कर एक रहस्यमय पहेली माना गया है..हमारे साहित्यकारों ने भी नारी की प्रशंसा या अवमानना में अतिवादी दृष्टिकोण अपनाया है..
कुछ उदहारण..
"त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम
देवो न जानाति कुतो मनुष्य: "
"न नारी स्वातन्त्र्यमर्हती !"
और एक अति ..
"यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता !!!"

या तो उसे इतना तुच्छ मानना कि उसकी तुलना तुलसीदास जी ने ढोर गंवार शूद्र और पशु से करी या पूजनीय ,देवी स्वरूप, ..उसको एक सहज इंसान क्यूँ समझा नहीं जाता .. पौराणिक संस्कृति में राधा -कृष्ण जैसा सखा भाव देखने को मिलता है..उन दोनों में कोई श्रेष्ठ या हीन नहीं था ..कृष्ण श्रेष्ठतम पुरुष होते हुए भी कभी ये प्रतिपादित करते नज़र नहीं आये कि वो नारी जाति से श्रेष्ठ हैं. उनके लिए हर गोपी उनकी सखी थी, उनके सामने नारी अपने भावों की सहज अभिव्यक्ति करने में सक्षम थी .परन्तु अपनी स्वार्थ साधना के लिए पुरुष उनका उदहारण देते हुए कभी नजर नहीं आते.. मनुस्मृति से उद्धृत या तुसलीदास जी के कहे हुए दोहों से नारी को ये एहसास दिलाते हैं कि जब इतने बड़े ज्ञानी नारी के लिए ऐसा कह गए हैं तो सत्य ही होगा ..


आज ऐसे ही एक दोहे को आधार बना कर एक रचना प्रस्तुत कर रही हूँ ..आशा है प्रयास को पसंद किया जाएगा
****************************************

रामचरित मानस में रावण मंदोदरी से कहता है-

नारी सुभाऊ सत्य सब कहहिं
अवगुन आठ सदा उर रहहिं
संशय,अनृत ,चपलता,माया
भय,अविवेक,अशौच,अदाया !


***********************************
पुरुष प्रधान समाज ने जिन मान्यताओं को नारी के लिए प्रतिपादित किया उनके लिए ये भावाभिव्यक्ति..

किया भ्रमित
नारी को तूने
अवगुण दिए
गिनाय
आठ भाव
ये सहज रूप में
हर मानुस ही पाय ..


१) संशय-
दमित वासना
करने पूरी
राह रहे निर्द्वंद
कह संशय
अवगुण है तेरा
दिया नारी को
द्वन्द ..


२)अनृत (झूठ)-
नहीं दिया
विश्वास उसे जो
कह पाए
वह सत्य
डरी दबी सकुची
नारी का
अवगुण बना
असत्य ...


३) चपलता-
रहे सहज चंचला
यदि तरुणी
उच्छंऋखल  वह
कहलाती
सपना बन
रह गयी चपलता
जो बचपन की
थी थाती ..


४) माया-
कहा सभी ने
माया उसको
बन गयी
एक पहेली
कभी ना समझा
कभी ना जाना
निज की
एक सहेली......


५)भय-
भय तुझको
अस्तित्व का
अपने
कर जाता है
छोटा
बता बता
भय अवगुण
उसमें
निर्भय क्या
तू होता.......??


६) अविवेक-
कर उपेक्षा
विवेक की उसके
दिया हीन एहसास
काट सके ना
बात को तेरी
रहा यही प्रयास


७) अशौच -
सहज खिले
नारीत्व को तू ने
दिया
अशौच का नाम
जगजाहिर कर
निजता उसकी
उचित किया
क्या काम .....??


८) अदया -
अदया
उसका अवगुण
कह कर
खुद को
झुठला बैठा
दया भाव
नारी से ज्यादा
कौन हृदय में
पैठा.....??




इन भावों का
कर अनुरोपण
बाँधा नारी को ऐसे
छोड़ के इनको
जीना उसको
पाप लगे है जैसे.....


सिंचित कर
स्नेह सहज से
जीवन की
फुलवारी को
तुच्छ-श्रेष्ठ का
भाव नहीं
बस
समझ संगिनी
नारी को ...

 
मुदिता गर्ग
http://roohshine-lovenlight.blogspot.com/2010/03/blog-post_07.html



http://charchamanch.blogspot.com/2010/03/blog-post_5252.html

27 comments:

RaniVishal 3/08/2010 9:49 PM  

Behad sunadar rachana hai sabd chayan ki tarif karu ya bhavo ki mugd kar diya aapane. itane sudar bhav sanjoye aapane is kavita me ...aapako bahut bahut dhanywad!
Mahila Divas Ki shubhkaamnae aapko bh!!

'अदा' 3/08/2010 9:59 PM  

Sangeeta didi,
ravan ki paribhasha aur 8 gun/avgun ko sahi uttar mila hai aaj..
aapka dhnywaad..

shikha varshney 3/08/2010 10:20 PM  

अब मुदिता से ऐसी ही जोरदार रचनाओं की उम्मीद थी ...सारे जबाब ठोक - ठोक कर दिए हैं...मजा आ गया पड़कर.बहुत शुक्रिया दी यहाँ पोस्ट करने का

अनामिका की सदाये...... 3/08/2010 10:28 PM  

जिन ८ गुणों का रावण ने नारी के लिए बखान किया है तो देखिये रावण का क्या हाल हुआ...सो संभल जाये पुरुष जो यह भाव रखते है नारी के लिए तो आज कलयुग में तो क्या ही हाल होने वाला है..

सशक्त रचना...मेरी तरफ से मुदिता जी को बधाई दीजियेगा.

roohshine 3/08/2010 10:40 PM  

Didi..

aapko bahut bahut shukriya jo aapne meri rachna ko apne blog ke madhyam se itne padhne walon tak pahunchaya..

sabhi padhne aur pasand karne walon ka aabhaar ...

मनोज कुमार 3/08/2010 10:43 PM  

सशक्त रचना।

vikas 3/09/2010 12:30 AM  

बहुत उच्च पक्तियां हैं,बहुत ही सुन्दर रचना

विकास पाण्डेय

www.विचारो का दर्पण.blogspot.com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 3/09/2010 8:36 AM  

सुन्दर रहे आपके शब्द-चित्र!
यहाँ भी कुछ है-
http://uchcharandangal.blogspot.com/2010/03/blog-post_08.html

निर्मला कपिला 3/09/2010 8:42 AM  

संगीता जी इसे कालजयी रचना कहूँ ? शायद रावण की पँक्तियों का उत्तर आज तक किसी ने नही दिया था। फिर रावण वो तुल्य पुरूष ही तो हैं जो नारी की ऐसी परिभाशा आज भी गढ्ते हैं। कमाल की रचना है आपकी। बधाई स्वीकार करें और इसे बहुत सी पत्र पत्रिकायों को भेजें। आभार्

निर्मला कपिला 3/09/2010 8:43 AM  

रगर आप कहें तो इसे अपने ब्लाग पर भी लगाना चाहूँगी अगर इसे मेल कर दें। धन्यवाद्

sangeeta swarup 3/09/2010 11:04 AM  
This comment has been removed by the author.
sangeeta swarup 3/09/2010 11:05 AM  

आप सभी ने इस रचना को सराहा...बहुत खुशी हुई..

मैं अपने सभी पाठक साथियों से विनम्र निवेदन करना चाहूंगी कि ये रचना मेरी छोटी बहन मुदिता की है....

इसलिए सराहना उसी के नाम प्रेषित करें...मैं केवल माध्यम हूँ इन भावों को आप तक पहुँचाने का...

शुक्रिया

Apanatva 3/09/2010 11:05 AM  

bahut kuch spasht karatee rachana...........
adhik se adhik log pad sake ye yatn kariyega .

दिगम्बर नासवा 3/09/2010 1:14 PM  

बहुत ही अच्छा लिखा है ... नारी शक्ति है किसी से कम नही है .... बधाई है इन लाजवाब रचनाओं पर ...

rashmi ravija 3/09/2010 1:45 PM  

मुदिता ने बहुत ही अच्छा और बड़ी बेबाकी से खरा विश्लेषण किया है...किसी ने इस तरह से नहीं सोचा होगा...उसे मुबारकबाद दें,इस अभिनव दृष्टि के लिए...सही है...एक पहेली बना कर रख दिया है नारी को...सिर्फ निज सहेली समझ लें..इतना काफी है..

हिमांशु । Himanshu 3/09/2010 6:31 PM  

उत्कृष्ट ! आभार प्रस्तुति के लिये ।

रावेंद्रकुमार रवि 3/10/2010 12:26 AM  

नारी शक्ति को नमन!
बहुत बढ़िया लिखा है!

roohshine 3/10/2010 8:32 AM  

kritagya hun aap sabhi ke sneh ke liye..

didi ne meri rachna ko vistaar de kar mujhe anugrahit kiya hai..

shukriya

Babli 3/10/2010 11:27 AM  

बहुत ही सुन्दरता से आपने नारी के हर रूप का चित्रण बखूबी प्रस्तुत किया है! उम्दा रचना!

बेचैन आत्मा 3/10/2010 8:26 PM  

बहुत अच्छी पोस्ट.

Deepak Shukla 3/11/2010 1:58 PM  

Hi ji..
Mudita ji ki kavita Mahila divas par padhne ka saubhagya mila ye humare liye ek vilakshan anubhav.. Enka vishya vastu ka gyan, shodh aur uttar ke rup main likhi kavita dono hi sarahneey hain..

Mudita ji aaj ki Naari hain jo pursh se barabari ki pakshdar hain.. Ve devtaon sa pujya bhi nahi banna chahtin jo anya ke liye garv ki baat ho sakti hai..
Main vyaktigat rup se,'YATR NARIYASYA PUJYANTE, RAMANTE TATR DEVTA..' shlok se apni sanskruti par garv mahsus karta tha.. Par ab lagta hai naari hruday ki sahi baat janna kisi pursh ke bas ki baat nahi..
Mudita ji ne mujhe es vishaya par punah vichar karne ke liye udvelit kiya hai..

Main unki baat se sahmat hun..par ve vichar fir bhi dil main aa raha hai..
Ki samanta ke es yug main alag se Mahila Divas ka kya auchitya jabki ab tak Purush Divas shayad maine nahi suna..

Barhal.. Ek vicharneev kavita padhne ka avsar mila..krupya Mudita ji ko humara dhanyavad avashya pahuncha deejiyega..

DEEPAK SHUKLA..

roohshine 3/11/2010 9:46 PM  

deepak ji ,
aapka comment bahut pasand aaya ..aapne kavita mein nihit bhavon ko pramukhta di main kritagya hun ..

aapne kaha ki main aaj ki nari hun ..purush se barabari ki pakshdhar..mera kehna ye hai ki ye aaj ki nari ki baat nahin..stri purush ek doosre ke poorak hain barabari ki hod unko apne 'essence ' ko khone par majboor karti hai.. nari ke swabhavik gun 'mamtav,sneh,kshma,karuna ' ye gun nareetva ki shreni mein rakhe gaye hain..aur shaurya,tej,bal aur sanrakshak ye pirushochit gun kahe gaye hain.. har vyakti mein dono hi gun samahit hote hain.. kisi mein nareetv ki pramukhta hoti hai kisi mein purushatv ki..sadiyon se nari ko doyam darja purush ke aham ne diya usi baat ko maine apni kavita mein kehne ki koshish ki hai.. har sadi mein purush ko nari dwara poojne ki parmapra hamari sanskriti mein dikhayi deti hai.. pati parmeshwar hai uska samman devta jaisa karna chahiye.. isi ko compensate karne ke liye shayad kisi ne likh diya hoga ki jahan nari ki pooja hoti hai wahan devta baste hain.. aur is ke hisaab se to shayad hi kisi ghar mein devta baste hon :)
baat atai hai women's day manane ki..to wo paschim ki den hain jahan pizza day se le kar har roz koi na koi din manaya jata hai.. aur ham bhartiya un sanskaron ko adapt karne mein bahut tatpar hote hain.. doosra aspect yahan bhi shoshan ka hi hai..sadiyon se apne ehsaason ko abhivyakt na kar paane ki feeling shayad ek din apne naam ho jaane par sukoon mehsoos karti hai aur us din nari hriday ki abhivyakti apne charam par hoti hai

aapke comment ne mujhe itna vimarsh karne ko prerit kiya main abhari hun..
Mudita

Deepak Shukla 3/12/2010 2:10 PM  

Hi...
Apni tippani par aapke comment ki adheerta se pratiksha kar raha tha par ye nahi pata tha ki Mudita ji swayan uttar dengi..

Aapki baaton se main bhi shat prati shat sahmat hun.. aapne bina kisi raag dwesh ke sahajta se meri baat ka uttar hai wo aapki swasth mansikta ka parichayak hai..

Aapki anya kavitaon ko bhi padhne ka avsar mile to achha lagega..

Bahut bahut dhanyawad....aapke shabdon ka...

Deepak Shukla...

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