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खामोशियाँ

>> Thursday, March 11, 2010

खामोशियाँ



जब बोलती हैं


ज़ेहन का

वर्क  -  दर- वर्क


खोलती हैं


होठ हिलते नहीं हैं


मगर


मन ही मन


ना जाने कितने


राज़ खोलती हैं






आँखों में


उतर आते हैं


कितने ही सैलाब


जब खामोश लब


बोलते हैं


लफ्ज़ जुबां से


निकलते नहीं


फिर भी


तास्सुरात


चेहरे के


बोलते हैं .






आज मेरे तुम्हारे

दरमियान

पसरी है

सन्नाटे की चादर


जिस पर


मेरी खामोशी ने


लिख दी है


एक इबारत .






इबारत की खामोशी को


खामोश ही रहने दो


मुझे आज खुद से


खुद को कुछ कहने दो







26 comments:

shikha varshney 3/11/2010 6:59 PM  

वाह सन्नाटे पर ख़ामोशी की इबारत...बहुत खुबसूरत अंदाज है,,,,बहुत कुछ कह गई आपकी ये खामोशियाँ.

राकेश कौशिक 3/11/2010 7:29 PM  

"जब बोलती हैं
ज़ेहन का
बर्क - दर- बर्क
खोलती हैं
होठ हिलते नहीं हैं
मगर
मन ही मन
ना जाने कितने
राज़ खोलती हैं"
ख़ामोशी की भाषा बहुत भायी - हार्दिक बधाई

Apanatva 3/11/2010 7:34 PM  
This comment has been removed by the author.
Apanatva 3/11/2010 7:36 PM  

इबारत की खामोशी को
खामोश ही रहने दो
मुझे आज खुद से
खुद को कुछ कहने दो

bahut khoobsoorat.......

M VERMA 3/11/2010 7:53 PM  

इबारत की खामोशी को
खामोश ही रहने दो
मुझे आज खुद से
खुद को कुछ कहने दो

खामोशी जब कुछ कहती है
सब्र की दीवारें तब ढहती हैं
बहुत खूब

vikas 3/11/2010 7:55 PM  

आखिर की दो पंक्तियाँ बहुत उच्च हैं ,मैंने तो अपने आपको जोड़ा लिया इन दो पक्तियो से ,सच में बहुत ही अच्छी .

विकास पाण्डेय

www.विचारो का दर्पण.blogspot.com

rashmi ravija 3/11/2010 8:02 PM  

आज मेरे तुम्हारे
दरम्याँ
पसरी है
सन्नाटे की चादर
जिस पर
मेरी खामोशी ने
लिख दी है
एक इबारत .
.आपकी कलम ने तो खामोशी की कई परतें खोल कर रख दिन......बहुत बढ़िया...

अनामिका की सदाये...... 3/11/2010 8:15 PM  

kitna sahi likha he...
khamoshiya jehan ka vark-dar-vark kholti hai...
TASSURAT lafz ka prayog ati uttam laga.

aur rachna par kya kahu...itni acchhi lagi ki mere vicharo par bhi khamoshi ki ibarat izad ho gayi hai..aur maun aankho se maun daad de rahi hai..

kabool farmaiyega..

mridula pradhan 3/11/2010 8:32 PM  

wah bahut hi achchi kavita.

विजयप्रकाश 3/11/2010 8:51 PM  

बहुत बढ़िया...थोड़े से शब्दों में आपने जितना भावपूर्ण गीत रचा है उतना ही चित्र भी मनोहारी है.

विनोद कुमार पांडेय 3/11/2010 8:59 PM  

बेहतरीन अभिव्यक्ति...कभी कभी.खामोशियाँ बहुत कुछ कह जाती है.....बढ़िया रचना बधाई

मनोज कुमार 3/11/2010 9:07 PM  

आज मेरे तुम्हारे
दरम्याँ
पसरी है
सन्नाटे की चादर
इबारत की खामोशी को
खामोश ही रहने दो
मुझे आज खुद से
खुद को कुछ कहने दो
बहुत अच्छी रचना। चुपचाप सहना और स्वयं से वर्तालाप ही एकमात्र विकल्प रह गया है?

रहिमन एक दिन वे रहे, बीच न सोहत हार
वायु जु ऐसी बह गई, बीचन परे पहार

अजय कुमार 3/11/2010 9:09 PM  

शानदार होती है खामोशी की भाषा ।

RaniVishal 3/12/2010 5:31 AM  

Waah! kya kahu main aapki is rachana ke aage waah waah waah bahut kam hai Khamoshi ko itani sundar zubaan di hai aapane ki wo bhi bol uthi ...bahut pasand aai yah rachana!
Aabhar

रंजना [रंजू भाटिया] 3/12/2010 12:50 PM  

बहुत खूब सन्नाटे की अपनी आवाज़ होती है शुक्रिया

संजय भास्कर 3/12/2010 12:54 PM  

मगर
मन ही मन
ना जाने कितने
राज़ खोलती हैं"
ख़ामोशी की भाषा बहुत भायी - हार्दिक बधाई

Mithilesh dubey 3/12/2010 1:16 PM  

बहुत ही लाजवाब लगी रचना , बधाई ।

रश्मि प्रभा... 3/12/2010 1:16 PM  

meri khamosh vismit aankhen vark dar vark kah rahi hain.......kya likha hai, bemisaal

JHAROKHA 3/12/2010 3:00 PM  

wakai kavita apane aap me khamoshi samete huye hai gaharai se ek khoobsurat andaaj me.
poonam

निर्मला कपिला 3/12/2010 7:48 PM  

जब बोलती हैं
ज़ेहन का
बर्क - दर- बर्क
खोलती हैं
होठ हिलते नहीं हैं
मगर
मन ही मन
ना जाने कितने
राज़ खोलती हैं"
क्या कहूँ निशब्द हूँ आपकी इस रचना पर ।बधाई

निर्झर'नीर 3/13/2010 3:00 PM  

आपके भावो की गहराई सागर से कम नहीं होती ..हमेशा की तरह जवाब नहीं रचना का लाजवाब
बंधाई स्वीकारें .......

Babli 3/14/2010 1:26 PM  

बहुत ख़ूबसूरत रचना! अक्सर ख़ामोशी हर बात कह देती हैं और ज़ुबान खोलने की ज़रुरत नहीं होती! सुन्दर प्रस्तुती!

शहरोज़ 3/15/2010 12:12 PM  

kitni saadgi se ..gunjit hota hai khamoshi ka shor......kya ham sabhi is shor se bach paate hain...

रचना दीक्षित 3/16/2010 2:32 PM  

कितनी मुखर हो उठी है ख़ामोशी की बिना कुछ बोले ही बहुत कुछ कह गयी
आभार
आज मेरे तुम्हारे
दरमियान
पसरी है
सन्नाटे की चादर
जिस पर
मेरी खामोशी ने
लिख दी है
एक इबारत .

Avinash Chandra 3/16/2010 8:35 PM  

bahut khoob....bahut hi shaandaar lekhan
badhayee ho

ALOK KHARE 3/20/2010 12:12 PM  

bahut hi sundar bhav piroye hain di aapne is kavita me

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