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भगदड़.....

>> Tuesday, August 3, 2010






ज़िन्दगी के 

प्लैटफार्म  पर  

कभी कभी 

भावनाओं की  

मच जाती है 

ऐसी भगदड़ 

जब होता है 

एहसास कि 

ख्वाहिशों की गाड़ी

दूसरी लाइन 

पर आ रही है 

सारे  सपने 

और भावनाएं 

एक दूसरे को

कुचलते हुए 

कोशिश करते हैं कि

उस गाड़ी को 

पकड़  लें .

और 

इस कोशिश में 

हो जाती हैं 

कितनी ही घायल 

और कुछ 
समा जाती हैं 
असमय ही 

मौत के क्रूर 

गाल में ....

 






57 comments:

वन्दना 8/03/2010 6:17 PM  

आज क्या बात है ………………ये इतना दर्द कैसे उतार दिया।बेहद भावप्रवण प्रस्तुति।

Pandit Kishore Ji 8/03/2010 6:25 PM  

dil ko chune yogya prastuti

रश्मि प्रभा... 8/03/2010 6:30 PM  

per kuchalker bhi bhawnayen dam nahi todti, kisi n kisi kee kalam kee dost ban jati hain

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 8/03/2010 7:00 PM  

zindagi ki badi philosphy....ek dum solid nazm mumma...

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ 8/03/2010 7:02 PM  

बहुत सुन्दर तरीके से व्यक्त किया है। बधाई

शहरोज़ 8/03/2010 7:08 PM  

ज़िन्दगी के

प्लैटफार्म पर

भावनाओं की

मच जाती है

भगदड़ !!!

अनामिका की सदायें ...... 8/03/2010 7:32 PM  

इस कोशिश में
हो जाती हैं
कितनी ही घायल
और कुछ
कर लेती हैं
अंगीकार मौत को .....

कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है ना...और वो जो कुछ हम खो कर पाना चाहते हैं वो हमारे निर्णय पर आद्धारित होता है तो फिर इस बात का मलाल कहाँ रह जाता है की कुछ भावनाएं कुचली गयी...आखिर उनको नज़र अंदाज़ करने का फैसला भी तो हमारा ही होता है...सो...बैरी मनुवा दुःख की चिंता क्यों सताती है...दुःख तो अपना साथी है...:):):)

सम्वेदना के स्वर 8/03/2010 7:32 PM  

ज़िंदगी का प्लैटफॉर्म, ख़्वाहिशों की गाड़ी और भावनाओं और सपनों के मुसाफिर...और उन मुसाफिरों की मौत... ये कविता तो हर रोज़ सड़कों पर, बाज़ारों में, समाज में हर तरफ कभी आँसुओं और कभी ख़ून के हरफ में लिखी दिखती है... संगीता दी! आज तो बस चुप से बेहतर कोई कमेंट नहीं!!!

प्रवीण पाण्डेय 8/03/2010 7:35 PM  

यह रेल का थीम पैटेन्ट करा लें, नहीं तो मैं चुरा लूँगा।

महेन्द्र मिश्र 8/03/2010 7:50 PM  

सुन्दर प्रस्तुति ....

सुज्ञ 8/03/2010 8:00 PM  

अभिभुत, सुन्दर भावनाओं की अभिव्यक्ति!! बधाई!!

विरले ही ख्वाहिशों की गाड़ी पकड पाते है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 8/03/2010 8:13 PM  

rashmi ravija to me


कमेंट्स बॉक्स नहीं खुल रहा...इसे पोस्ट कर दीजिये..


ओह बहुत ही उम्दा रचना...ये ख्वाहिशों की रेल हमेशा दूसरी लाइन पर ही क्यूँ आती है...जिसे पकड़ने में मन यूँ घायल हो जाता है...बहतु कुछ बयाँ कर गयी ये रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 8/03/2010 8:25 PM  

भगदड़़ दुनिया में मची, मारा-मारी होय।
क्रूर-काल के चक्र से, बाकी बचा न कोय।।

मनोज कुमार 8/03/2010 8:45 PM  

जीवन की आपाधापी से त्रस्‍त, व्‍यवस्‍था की विसंगतियों से आहत और आंतकित करते परिवेश से आक्रांत मनस्थितियों का आपने प्रभावी चित्रण किया है। अन्‍योक्ति से एक गहरा संकेत है।

डा. अरुणा कपूर. 8/03/2010 9:37 PM  

...और जब ऐसा होता है तो पीछे रह जाता है एक शून्य!...जो कि स्थिरता की चरम सीमा पर होता है!...एक मर्म-वेधक अहसास!...उत्तम रचना!

Mithilesh dubey 8/03/2010 9:39 PM  

सुन्दर प्रस्तुति ....

रचना दीक्षित 8/03/2010 9:43 PM  

सच इस भगदड़ में जाने क्या क्या खो गया अब तो वो भी याद नहीं!!!!!!!!!!!

राजभाषा हिंदी 8/03/2010 9:47 PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

संगीता पुरी 8/03/2010 10:06 PM  

क्‍या लिखती हैं आप .. सच में ऐसा ही तो होता है !!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 8/03/2010 10:19 PM  

संगीता दी,
आम आदमी के जीबन जात्रा का मार्मिक बर्नन...
सलिल

Deepak Shukla 8/03/2010 10:34 PM  

Hi..di..

Khwahish ki es rail main dekhi..
Bhavon ki jo railam pel..
Kuchle, dabe ahsaas hain dekhe..
Ajab hai jeevan ka ye khel..

DEEPAK..

Deepak Shukla 8/03/2010 10:34 PM  

Hi..di..

Khwahish ki es rail main dekhi..
Bhavon ki jo railam pel..
Kuchle, dabe ahsaas hain dekhe..
Ajab hai jeevan ka ye khel..

DEEPAK..

Deepak Shukla 8/03/2010 10:35 PM  

Hi..di..

Khwahish ki es rail main dekhi..
Bhavon ki jo railam pel..
Kuchle, dabe ahsaas hain dekhe..
Ajab hai jeevan ka ye khel..

DEEPAK..

Deepak Shukla 8/03/2010 10:36 PM  

Hi..di..

Khwahish ki es rail main dekhi..
Bhavon ki jo railam pel..
Kuchle, dabe ahsaas hain dekhe..
Ajab hai jeevan ka ye khel..

DEEPAK..

Apanatva 8/03/2010 10:41 PM  

sunder abhivykti....

Tej Pratap Singh 8/03/2010 10:58 PM  

Aaap lag raha apne sahi lekhan se bhatak rahi hain

Neeru 8/03/2010 11:02 PM  

bahut hi marmik chitran hua mumma.......platform par logon ki bheed ka drishya ghoom gaya ankhon ke aage.....................bahut achhi lagi ye rachna...:)

badhayi...:)

महफूज़ अली 8/04/2010 12:53 AM  

bahut bhaavpradhaan aur sunder kavita...

Mired Mirage 8/04/2010 1:14 AM  

वाह, बहुत बढ़िया!
घुघूती बासूती

अजय कुमार 8/04/2010 7:07 AM  

तमाम दिलों की व्यथा-कथा ।

Bhavesh (भावेश ) 8/04/2010 7:33 AM  

भावनाओं की बेहतरीन और अदभुद अभिव्यक्ति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 8/04/2010 7:34 AM  

भगदड़ दुनिया में मची, मारा-मारी होय।
क्रूर-काल के चक्र से, नही अछूता कोय।।
--
http://charchamanch.blogspot.com/2010/08/235.html

देवेश प्रताप 8/04/2010 9:21 AM  

बहुत बढ़िया प्रस्तुति .....

पी.सी.गोदियाल 8/04/2010 10:30 AM  

मच जाती है


ऐसी भगदड़


जब होता है


एहसास कि


ख्वाहिशों की गाड़ी


दूसरी लाइन


पर आ रही है


सारे सपने


और भावनाएं


एक दूसरे को


कुचलते हुए


कोशिश करते हैं कि


उस गाड़ी को


पकड़ लें .

सुन्दर भाव संगीता जी , नसीब का स्टेशन मास्टर भी अपने रेलवे के स्टेशन मास्टरों से कुछ कम नहीं !

काजल कुमार Kajal Kumar 8/04/2010 11:01 AM  

ज़िन्दगी अपने आप में ही समुंदर है कभी शांत तो कभी एकदम अशांत.

सत्यप्रकाश पाण्डेय 8/04/2010 12:47 PM  

सुन्दर प्रस्तुति,
आभार....

Babli 8/04/2010 1:08 PM  

ज़िन्दगी की सच्चाई को आपने बड़े ही सुन्दरता से वर्णन किया है ! बहुत बढ़िया लगा!

Akshita (Pakhi) 8/04/2010 2:25 PM  

आपने बहुत सुन्दर लिखा...बधाई.

शिवम् मिश्रा 8/04/2010 2:36 PM  

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

shikha varshney 8/04/2010 3:04 PM  

han sach hai ..par isi bhagdad men shayad 1-2 khwaishen manjil paa jayen ..yahi umeed hai :)
behtareen abhivyakti hamesha kee tarah.

Arvind Mishra 8/04/2010 3:34 PM  

मैं तो बस भगदड़ देख बेतहाशा भागा चला आया हूँ -magar yahaann तो bheed lagee है ,सुन्दर कविता !

honesty project democracy 8/04/2010 3:48 PM  

ब्लोगरों की अभिव्यक्ति में दर्द ही दर्द से यह साबित होता है की सामाजिक परिवेश दर्दनाक होता जा रहा है जहाँ इन्सान और इंसानी जज्बात के लिए जगह कम होता जा रहा है ,निश्चय ही हमसब को गंभीरता से मिलकर सोचना होगा ...अच्छी भावनात्मक पोस्ट ..

Udan Tashtari 8/04/2010 4:46 PM  

बहुत सुन्दर से बिम्ब जोड़ा है रेल और प्लेटफार्म और दूसरी पटरी के साथ.

दर्द छलक उठा हर पंक्ति में.

बधाई.

Virendra Singh Chauhan 8/04/2010 6:02 PM  

Itni achhi baat ki comments kerne vaalon ki bhi Bhaag-bhaag ker aa rahe hai.

In lines men jeevan ki sachhai hai.

Avinash Chandra 8/04/2010 7:07 PM  

hmm...soch raha hun, likhun to kya..sach par kahna bharee ho jata hai na

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 8/04/2010 7:13 PM  

वाह संगीता जी ! बेहतरीन रचना ... जिंदगी के प्लात्फोर्म पर भावनाओं की भगदड़ ... क्या बात है ...!

संजय भास्कर 8/05/2010 6:32 AM  

भावनाओं की बेहतरीन और अदभुद अभिव्यक्ति

बेचैन आत्मा 8/05/2010 8:48 AM  

..ख्वाहिशों की गाड़ी दूसरी लाइन पर आ रही है..
..यह एहसास जीने नहीं देता.
..अच्छी कविता.

नीरज गोस्वामी 8/05/2010 12:08 PM  

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है
आगे जो बढे सारे उसे मिल के गिराओ

Mera ye sher aapki kahi baat ko siddh kar raha hai...Behtariin rachna...badhai...

राजेश उत्‍साही 8/05/2010 3:40 PM  

पर न ख्‍याहिशों की गाड़ी रुकती है न उसमें चढ़ने वाले। दौड़ जारी है।

मुकेश कुमार तिवारी 8/05/2010 6:49 PM  

शायद एहसासों, इच्छाओं और्र सपनों को हम भी अकेला छोड़ देते हैं जब भी कोई नया मौका/अवसर देखते हैं। गहराई के साथ अपनी बात रखती हुई कविता...दिल को छू लेती है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

JHAROKHA 8/07/2010 11:49 AM  

बहुत सुन्दर----भावनाओं की बेहतरीन प्रस्तुति।

अरुणेश मिश्र 8/07/2010 10:35 PM  

रचना मे प्रशंसनीय शिल्प और अधुनातम कल्पना है ।

राजकुमार सोनी 8/08/2010 2:57 PM  

एक दर्द का दरिया है जो आपके भीतर जाने कब से बह रहा है
इसे बहने दीजिए... मुझे अच्छी रचना पढ़ने मिल जाती है. मुझे इस दरिया ने बहुत कुछ दिया है.
आपका शुक्रिया.

manukavya 8/17/2010 11:54 AM  

बेमिसाल! इतनी गहरी बात और इतने सरल शब्दों में ... वाकई कमाल है

दिगम्बर नासवा 8/17/2010 2:50 PM  

ये आज के युग का सत्य है ... एक दूसरे को कुचलना ...
सुंदर बिंब बनाए हैं इस रचना में आपने ...

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