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अवमूल्यन

>> Friday, September 24, 2010



हीरे से ज्यादा कठोर 

कुछ भी नहीं 

उसे तराशना भी 

मुकम्मल हाथों से ही 

संभव है 

ज़रा सी ठेस 

और उसमें 

खिंची  एक लकीर

कर देती है 

अवमूल्यन हीरे का ..


आज मैं भी 

हो गयी हूँ 

मूल्य विहीन 

मैं हीरा नहीं 

पत्थर भी नहीं 

फिर भी 

खिंच गयी है 

भीतर तक 

कोई लकीर 

जिसे पारखी नज़रें 

छोड़ देती हैं 

बिना ही कोई 

मोल लगाये ....


68 comments:

AlbelaKhatri.com 9/24/2010 6:15 PM  

बहुत बोले तो बहुत ही बढ़िया
वाह
वाह
शब्द विन्यास !

rashmi ravija 9/24/2010 6:40 PM  

मैं हीरा नहीं

पत्थर भी नहीं

फिर भी

खिंच गयी है

भीतर तक

कोई लकीर
यही खींची लकीर तो दिल के दर्द को शब्द दे देती है...बहुत ही सुन्दर ,अभिव्यक्ति

Patali-The-Village 9/24/2010 6:47 PM  

बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति|

राजेश उत्‍साही 9/24/2010 6:47 PM  

संगीता जी आप भी शब्‍दों को हीरे की तरह ही तराशती हैं। सचमुच हर अगर किसी को शब्‍दों को तराशना सीखना हो तो आपकी कविताओं को पढ़ता रहे।

shikha varshney 9/24/2010 6:51 PM  

दी ! अरे आप तो अमूल्य हो फिर आपका मोल कोई कैसे लगायेगा भला?
आप न हीरा हो, न पत्थर. आप तो अनमोल रत्न हो जिसका मोल लगाने की क्षमता ही नहीं किसी में :)
वैसे कविता अच्छी है :)

वन्दना 9/24/2010 7:16 PM  

यही जीवन की विडंबना है…………………ह्रास तो हर चीज़ का एक ना एक दिन होना ही है……………बहुत सुन्दरता से उकेरा है।

सम्वेदना के स्वर 9/24/2010 7:28 PM  

संगीता दी! हीरे की तरह तराशी हुई रचना... अमूल्य और देदीप्यमान!

रश्मि प्रभा... 9/24/2010 7:48 PM  

yahaan to paarkhi nazron ko aap tarash rahi hain..... anmol ehsaason ka saath dekar

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 9/24/2010 7:51 PM  

पत्थर भी नहीं

फिर भी

खिंच गयी है

भीतर तक

कोई लकीर
--

इस लकीर का ही कमाल है कि जौहरी पत्थर और हीरे की पहचान कर लेता है!
--
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 9/24/2010 7:54 PM  

अरे...
नहीं संगीता जी...
आपके पास तो भावनाओं के नायब हीरे हैं.

अनामिका की सदायें ...... 9/24/2010 8:01 PM  

जिस बहुमूल्य रत्न को बिना कोई मोल लगाये छोड़ दिया गया हो, या उस पर खींची लकीर मुकम्मल ना हो तो उसमे उस बहुमूल्य रत्न की कमी तो नहीं कही जा सकती ना....इसमें तो कसूर उस उस पारखी नज़र का है या उस हीरे तराशने वाले का जो मुकम्मल नहीं कहा जा सकता.

अपने भावो को बहुत सुंदरता से तराश कर अमूल्य रचना का रूप दिया है.

बधाई.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 9/24/2010 8:08 PM  

संगीता दी!
ऊ हीरा जिसपर लकीर पड़ जाए पत्थर रह जाता है ,बिना मोल का.. लेकिन ई राम का देस है, यहाँ हीरा पर पड़ा हुआ लकीर से भले हीरा पत्थर रह जाए, उनके स्पर्स से ऊ पत्थर भी नारी हो जाता है.
बहुत सुंदर!!
सलिल

ashish 9/24/2010 8:15 PM  

आप की लेखनी के कितने आयाम है , हमे अचम्भा होता है . आप किस सरलता से अपने विचारो को शब्द दे देती है , प्रणम्य हो देवी .रही बात हीरा के अवमूल्यन की , तो कोई लकीर अभी ऐसी नहीं बनी जो आपके अवमूल्यन का कारण बने .

डा. अरुणा कपूर. 9/24/2010 8:39 PM  

हीरे से ज्यादा कठोर


कुछ भी नहीं


उसे तराशना भी


मुकम्मल हाथों से ही


संभव है

....सही कहा आपने...हीरा जितना कठोर है, उतनाही अनमोल है!

राजकुमार सोनी 9/24/2010 8:56 PM  

मैं शिखाजी की बात से इत्तेफाक रखता हूं.
संगीता जी हमारे लिए अनमोल है
अब यह मत कहना कि अरे भाई यह तो कविता है। मेरा मानना है कि ज्यादातर अच्छी कविता दिल से निकली हुई किसी टीस या आवाज का ही नतीजा है.

राजकुमार सोनी 9/24/2010 8:57 PM  

मैं शिखाजी की बात से इत्तेफाक रखता हूं.
संगीता जी हमारे लिए अनमोल है
अब यह मत कहना कि अरे भाई यह तो कविता है। मेरा मानना है कि ज्यादातर अच्छी कविता दिल से निकली हुई किसी टीस या आवाज का ही नतीजा है.

रेखा श्रीवास्तव 9/24/2010 9:34 PM  

हीरे की तो कीमत होती है चाहे कितना ही कीमती क्यों न हो? लेकिन आपकी कोई कीमत नहीं है और ये कलम तो पता नहीं कितनी सुन्दर लिख डालती है.

मनोज कुमार 9/24/2010 9:49 PM  

कविता यह संदेश देती है कि जीवन के संवेदनशील मुद्दों पर जरा सी भूल जिंदगी भर की सजा का कारण बन सकती है। अतः इन मुद्दों पर सजग और गंभीर रहना बेहद जरूरी है ।

दीप्ति शर्मा 9/24/2010 9:59 PM  

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

mahendra verma 9/24/2010 10:28 PM  
This comment has been removed by the author.
mahendra verma 9/24/2010 10:48 PM  

आपने शब्दों को ऐसा तराशा है कि उनमें एक भी खरोंच नहीं...वाह...बहुत सुंदर।

Sadhana Vaid 9/24/2010 10:51 PM  

हीरे से दमकती अनमोल रचना सगीता जी ! किसीकी क्या मजाल जो आपका मोल लगाने की जुर्रत करे ! कुछ अनमोल लोगों में आपका स्थान भी सुरक्षित है ! बहुत सुन्दर रचना !

Madhu chaurasia, journalist 9/25/2010 1:03 AM  

आपकी लिखी कविती तराशे हुए हीरे से क्या कम है मैडम!...बेहद अच्छी रचना

Mrs. Asha Joglekar 9/25/2010 4:30 AM  

पत्थर भी नहीं

फिर भी

खिंच गयी है

भीतर तक

कोई लकीर

सुंदर रचना ।

Kusum Thakur 9/25/2010 5:37 AM  

पारखी नज़रें भले ही हीरे को छोड़ दे .........परन्तु भावनाओं की कोई मोल नहीं !!

दीपक 'मशाल' 9/25/2010 5:47 AM  

सुन्दर और सादा शब्दों में कही गई असाधारण बात लगी ये कविता मैम.

M VERMA 9/25/2010 6:05 AM  

खिंच गयी है
भीतर तक
कोई लकीर
अवमूल्यन कितना भी हो हीरा आम आदमी की क्रय शक्ति की जद में तो नही आ पाता है... आखिर हीरा तो हीरा ही है.
अत्यंत भावपूर्ण रचना

ali 9/25/2010 7:54 AM  

हीरे के सहारे बहुत बड़ी बात कह डाली आपने !

वाणी गीत 9/25/2010 8:10 AM  

मैं शिखा और रश्मि प्रभाजी से पूर्णतया सहमत हूँ ...
खिंच गयी भीतर तक लकीर ...
जाने इस कविता में ऐसा क्या है जो भीतर तक लकीर की तरह खिंच गया है ..
भावपूर्ण ..!

प्रतिभा सक्सेना 9/25/2010 9:42 AM  

वाह,
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

राजभाषा हिंदी 9/25/2010 10:48 AM  

किसी भी वस्‍तु की सुन्‍दरता आपकी मूल्‍यांकन करने की योग्‍यता में छिपी हुई है। संगीता जी आपने अपनी कविताओं में अपने समय को लेकर हमेशा जरूरी सवाल खड़े किए हैं। लोगों द्वारा दिए गए ठेस से आक्रांत मनस्थितियों का आपने प्रभावी चित्रण किया है। आपने यहां अन्‍योक्ति से एक गहरा संकेत किया है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-बाबा नागार्जुन, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Priyankaabhilaashi 9/25/2010 11:04 AM  

बहुत सुंदर..हर बार की तरह..!!

ajit gupta 9/25/2010 11:50 AM  

किसी भी गुणी लेकिन कठोर या दृढ़ निश्‍चयी व्‍यक्तित्‍व को तराशना बहुत ही कठिन कार्य है। यदि तराश लिया जाए तो वे बेशकीमती बन जाता है और उसके कोई ठेस पहुंचा दे तो फिर उसके गुणों का कोई मौल नहीं रहता है। हीरे के माध्‍यम से मानव स्‍वभाव की अच्‍छी पड़ताल की है आपने। तभी तो कई गुणवान व्‍यक्ति हमारे मध्‍य होते हैं लेकिन किसी ना समझ के कारण उनके गुण अवगुण से दिखायी देने लगते है।

हास्यफुहार 9/25/2010 12:08 PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

अजय कुमार 9/25/2010 12:21 PM  

प्रभावपूर्ण रचना ,बहुत ही सुंदर ।

ZEAL 9/25/2010 1:20 PM  

बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति|

राज भाटिय़ा 9/25/2010 1:30 PM  

आप ने इस कविता को तरास कर हीरे सी चमक दे दी है, बहुत सुंदर, धन्यवाद

Akanksha~आकांक्षा 9/25/2010 1:37 PM  

जिसे पारखी नज़रें


छोड़ देती हैं


बिना ही कोई


मोल लगाये ....बहुत सुन्दर भाव ..अभिव्यक्तियों का सटीक चित्रण.

______________
'शब्द-शिखर'- 21 वीं सदी की बेटी.

अरुणेश मिश्र 9/25/2010 1:56 PM  

हीरे का अवमूल्यन कहीँ नहीँ . निकष नही मिलते । प्रशंसनीय ।

monali 9/25/2010 4:31 PM  

Aap johari hain... aapka mil kaun laga sakta hai... bahut sundar kavita...

प्रवीण पाण्डेय 9/25/2010 8:51 PM  

हीरे का मूल्य है कि वह औरों जैसा नहीं है और कम पाया जाता है। मूल्य दुनिया तभी ही लगाती है।

विरेन्द्र सिंह चौहान 9/25/2010 9:23 PM  

सुंदर और सार्थक भावपूर्ण रचना.
आप हमेशा ही बहुत अच्छा लिखती हैं.
इसके लिए आपको आभार ...

गजेन्द्र सिंह 9/26/2010 12:46 AM  

शानदार प्रस्तुति .......

पढ़िए और मुस्कुराइए :-
क्या आप भी थर्मस इस्तेमाल करते है ?

Akshita (Pakhi) 9/26/2010 1:16 AM  

बहुत सुन्दर कविता....बधाई.

_________________________
'पाखी की दुनिया' में- डाटर्स- डे पर इक ड्राइंग !

ALOK KHARE 9/26/2010 8:08 AM  

aapne bhi khoob tarasha he,

sundar abhivyakti

डॉ. मोनिका शर्मा 9/26/2010 9:16 AM  

जिसे पारखी नज़रें


छोड़ देती हैं


बिना ही कोई


मोल लगाये ....
----------------------------
और ऐसे हालात में मन अन्दर तक दुखी हो जाता है..... अफ़सोस की
यह विडम्बना हकीकत है....सुंदर विचार

Mahendra Arya 9/26/2010 9:51 AM  

हीरा एक कठोर चमकदार पत्थर जिसमे लकीरें नहीं होती ; लेकिन उसे तराशने वाले हाथ नरम, खुरदुरे , जिनका सब कुछ लकीरें ही होती हैं ! बहुत सुन्दर तुलना .

उपेन्द्र " the invincible warrior " 9/26/2010 11:56 AM  

bahoot hi sunder abhivayakti............
itana sunder bimb, ki dil ko chhoo gaya.

डॉ. नूतन गैरोला " अमृता " 9/26/2010 4:44 PM  

संगीता जी ! आपने हीरे के साथ जड़ कर इस कविता को बेहद बहुमूल्य बना दिया है .. विचार एक के बाद ऐसे जुडे हैं की कविता की हर एक पंक्ति बेसकीमती | किसी एक पंक्ति को उठा के बताऊँ की सुन्दर - संभव नहीं क्यूंकि हर पंक्ति का महत्व आगे और पीछे की कड़ी से जुड़ा है | एक दर्द है कविता का ..कविता बेमिसाल ..और यह बात सही है की हीरा तो हीरा है उसे समय भी नहीं मिटा सकता - जिसको परख नहीं उसका दोष | शुभकामनायें

Apanatva 9/26/2010 7:06 PM  

shikha ke vicharo se shat pratishat sahmat hoo............
Aabhar

गजेन्द्र सिंह 9/27/2010 12:02 AM  

बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने ........

पढ़िए और मुस्कुराइए :-
आप ही बताये कैसे पर की जाये नदी ?

Anjana (Gudia) 9/27/2010 12:53 AM  

Aap bahut achha sochti hain aur bahut achha likhti hain... bahut sunder andaaz hai aapka. main bhi aapko di kehna chahti hoon... keh sakti hoon?

डॉ. हरदीप संधु 9/27/2010 2:38 AM  

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति....
आपकी कविता क्या किसी हीरे से कम है !!!

saanjh 9/27/2010 10:40 AM  

aise johri ko aisi ki taisi.....jo vo aise heere ko pehchaan na paaye.....



sorry dadi....mujhse kabhi tameez aur formal tareeke se comment dena ni hoga...but u kno what i mean ;)

luvv u

रंजना 9/27/2010 2:19 PM  

क्या बात कह दी है आपने....
एकदम मोहित कर लिया...
बरसों पहले इसी भाव से मिलते जुलते अपनी एक कविता का स्मरण हो आया...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 9/27/2010 8:30 PM  

adbhut rachna hai mumma.. "mukammal hath " ek behad khubsurat bat lagi ye mujhe... aur heere ke bhetar lakeer pad jane wali bat to dhansu hai

शरद कोकास 9/28/2010 1:59 AM  

इसीलिये तो यह हीरा कहलाता है ।

'अदा' 9/28/2010 7:54 AM  

बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति..!

Babli 9/28/2010 10:02 AM  

अद्भुत सुन्दर रचना! आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है!

सत्यप्रकाश पाण्डेय 9/28/2010 3:05 PM  

सुन्दर अभिव्यक्ति

यहाँ भी पधारें:-
ईदगाह कहानी समीक्षा

दिगम्बर नासवा 9/28/2010 3:08 PM  

दर्द की लकीर को मिटाना आसान नही होता ... बहुत संवेदनशील लिखा है ...

sada 9/28/2010 3:20 PM  

मैं हीरा नहीं

पत्थर भी नहीं

फिर भी

खिंच गयी है

भीतर तक

कोई लकीर

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द, हमेशा की तरह अनुपम प्रस्‍तुति ।

निर्झर'नीर 10/01/2010 4:57 PM  

जिसे पारखी नज़रें
छो़ देती हैं
बिना ही कोई
मोल लगाये ....

awaysome unchhua ,uniqe khayal

bandhaii

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