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तथागत ..

>> Thursday, May 5, 2011


सिद्धार्थ -
कौन से ज्ञान की खोज
में
किया था तुमने पलायन
जीवन से ?
सुना है कि  तुम
नहीं देख पाए रोगी
काया को
या फिर
बृद्ध होते शरीर को
और मृत्यु ने तो
हिला ही दिया था तुमको भीतर तक
थे इतने संवेदनशील
तो कहाँ लुप्त हो गयीं थीं
तुम्हारी सारी संवेदनाएं
जब पुत्र और पत्नि को
छोड़ गए थे सोता हुआ
और अपने कर्तव्य से विमुख हो
चल पड़े थे दर - बदर भटकने .
क्या तुम्हे हुयी कभी ग्लानि
बिना बताये जाने की ?

बोधि सत्व के नीचे
अचानक ही तुम्हें
हो गया  ज्ञान प्राप्त
और तुम बन गए बुद्ध ..
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक --
तुमने कहा कि
प्राणी मात्र से प्रेम करो
प्राणी मात्र की  सेवा करो
प्राणी मात्र को कष्ट मत दो
पता है तुमको कि तुमने
दिया है कितना कष्ट
यशोधरा और राहुल को
हे तथागत -
आज तक नहीं समझ पायी
मैं तुम्हारे ज्ञान का सार
कर्तव्यों से च्युत हुए बिना
क्या नहीं हो सकता था
तुम्हारे ज्ञान का प्रसार ?

तब भी बनते तुम्हारे
अनुयायी
गर तुम ज़रा
सुनते यशोधरा का
मन
भावनाओं से परे
सिखा दिया तुमने तो बस --
बुद्धं शरणम्  गच्छामि
धर्मंम्  शरणम्  गच्छामि
संघम्  शरणम्  गच्छामि |

93 comments:

anupama's sukrity ! 5/05/2011 7:08 PM  

एक संवेदनशील नारी की व्यथा आपने कितनी खूबसूरती से व्यक्त की है ...!!ये प्रश्न बार बार कौंधता तो है मन में ...!!!और मैं भी बिलकुल वैसा ही सोचती हूँ जैसा आप सोच रही हैं ...!!
सुंदर रचना के लिए बधाई...!!

Bhola-Krishna 5/05/2011 7:22 PM  

आपका कथन बिलकुल सच है ! भावोत्पादक विचार ! अहिंसा कैसी जहां प्रेम न हो? उन्होंने स्वयम को कष्ट दिया, परिवार स्त्री संतान को पीड़ा पहुंचायी ! ये किस कोण से "धर्म" है ?

ashish 5/05/2011 7:25 PM  

सखि वो मुझसे कह कर जाते " कविता की पंक्तियाँ बरबस ही ही सोचने को मजबूर करती है . कई सारे प्रश्न अनुत्तरित है . क्या सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी को निभाते हुए किसी बुद्ध का अभ्युदय संभव नहीं है ? गहन विचार से प्रेरित रचना के लिए आभार .

shikha varshney 5/05/2011 7:28 PM  

दी! अपनों को तकलीफ देकर दूसरों को ज्ञान देना, उनका उद्धार करना ...शायद यही महानता है.
हालाँकि इस महानता का अर्थ मुझे आजतक समझ में नहीं आया.
मेरे जैसे कईयों के मन में उठते हुए प्रश्नों को शब्द दे दिए हैं आज आपने.
बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना..

प्रवीण पाण्डेय 5/05/2011 7:35 PM  

समाज के लिये परिवार की पीड़ा सदियों से नहीं देख रहे हैं महापुरुष।

Kailash C Sharma 5/05/2011 7:50 PM  

नारी मन की पीड़ा को बहुत गहराई और संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है..अंतस को छूती बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति..आभार

संजय भास्कर 5/05/2011 8:01 PM  

आदरणीय संगीता स्वरुप जी
नमस्कार !
नारी की व्यथा को बहुत गहराई और संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है

Vaanbhatt 5/05/2011 8:14 PM  

बुद्ध को जानने के लिए जरुर पढ़िए...जहं जंह चरण पड़े गौतम के (Old Path White Cloud, by Thich Nhat Hanh)...नियति पर किसका जोर चलता है...बचपन में ही उनके माँ-पिता को आभास हो गया था कि इसे किधर जाना है...यशोधरा और राहुल तो उसे रोकने के लिए थे...हर कोई कवि या लेखक नहीं हो जाता...दूसरे का दर्द खुद भोगना पड़ता है...आपने यशोधरा और राहुल कि व्यथा को कैसे महसूस किया...ऐसे लोग न हों तो किसी को दूसरों की क्या पड़ी है...बेहद मार्मिक तरह से आपने अपनों के दर्द को बयां किया है...पर फिलहाल मैं बुद्ध के पाले में हूँ...

kshama 5/05/2011 8:20 PM  

Haan! Yahee sawaal kayee baar man me aata hai....gar patnee ko bataa hee dete to kya wo unke raaste me baadha laatee? Sach batane se Gautam buddh ne bhee muh mod liya!Charaag tale andhera!
Bahut sundar rachana hai! Badee saraltaa se wyatha bayaan huee hai!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 5/05/2011 8:24 PM  

यशोधरा ने एक बार कहा था,"सखि वे मुझसे कहकर जाते." और बुद्ध बनकर जब वे यशोधरा से मिले तो उसने कहा:
ये किस रूट में तुम आये हमारे आँगन में,
सब फूल गए कुम्हलाये हमारे आँगन में!
साहिर लुधियानवी ने कहां था,"संसार से भागे फिरते हो"
और आज आपने प्रश्न किया है उसी बुद्ध से. कई नारी/बाल मन का प्रतिनिधित्व करती है यह कविता.
संगीता दी! बहुत सुन्दर!!

डॉ॰ मोनिका शर्मा 5/05/2011 8:34 PM  

तब भी बनते तुम्हारे
अनुयायी
गर तुम ज़रा
सुनते यशोधरा का
मन
भावनाओं से परे
सिखा दिया तुमने तो बस --
बुद्धं शरणम् गच्छामि
धर्मंम् शरणम् गच्छामि
संघम् शरणम् गच्छामि |

स्त्री के अंतर्मन के कितने गहरे भाव ....संगीताजी उत्कृष्ट रचना हेतु बधाई ...

अनामिका की सदायें ...... 5/05/2011 8:35 PM  

bahut hi dukh ki baat hai ki jo dusro ke liye dard mehsoos karte hain vahi adhikter apno k hi armaano ka daman kar ke apni raah prashast karte hain aur duniya ki nazer me mahan bante hain.

bahut hi komalta aur marmikta se apne is takleef-deh satye ko sehzta se rachna ke roop me ukera hai. gehen vicharpoorn rachna aur iski safalta ke liye badhayi.

रजनीश तिवारी 5/05/2011 8:39 PM  

बहुत ही अच्छी रचना है । शायद बुद्ध जानते थे कि जो उद्देश्य अपने जीवन का उन्होने निर्धारित किया था वो पारिवारिक जीवन के साथ पूर्ण सफल नहीं हो पाता । और वो पूर्णतया सफल रहे, उनका त्याग सफल रहा । उनके विचार, उनके सिद्धांत, उनकी शिक्षा, उनकी फ़िलासफ़ी, उनका धर्म आज भी जीवित है उन्होने एक तरह से सारे समाज को ही अपना लिया था । कठिन निर्णय जरूर रहा होगा , विचार जरूर किया होगा उन्होने ऐसा मैं मानता हूँ , पर उनके लिए कुछ और ही निर्धारित था । इस तरह सत्य जीवन में कभी भी घटित हो सकता है। बुद्ध के परिवार की भावनाओं का आपने बहुत ही मार्मिक भावपूर्ण चित्रण किया है । सोचने को मजबूर करती है और कुछ प्रश्न खड़े करती है आपकी कविता ।

Rakesh Kumar 5/05/2011 8:57 PM  

महान आत्माओं का जीवन शायद निजी बनकर नहीं रह पाता.बुद्ध के पिता उनकी विरक्ति को जानते थे ,इसीलिए उन्हें गृहस्थी में डालना चाहा.परन्तु,घोर विरक्ति के कारण अपना कर्तव्य
छोड़ गहन साधना को ध्येय बनाया उन्होंने.हमारे यहाँ चार आश्रम (ब्रह्मचर्य,गृहस्थ.वानप्रस्थ और संन्यास)जीवन की अवस्था अनुसार क्रमानुसार ही हैं.लेकिन,इनके अपवाद अनेक महापुरुष हैं.
आपकी प्रस्तुति भावमयी व सहज प्रश्न
प्रस्तुत कर रही है,जो दिल को छूती है.

मैंने भी आज नई पोस्ट जारी करदी है.आपके सुविचारों का स्वागत है.

बाबुषा 5/05/2011 9:13 PM  

यह होना ही था ! सिद्धार्थ को जाना ही था ! कपिलवस्तु तो छूटना ही था ! क्या किया जाए संगीता माँ ? जब भी किसी ने 'अनहद' को चुना है ..यह तो घटता ही है . वह किसी का पुत्र/पुत्री ,पिता/माँ , बेटा/बेटी , पति / पत्नी होता ही है ! कोई हल नहीं है इसका ? क्या राणा ने मीरा को कहीं से भी कम प्रेम किया ! दीवाने थे राणा तो मीरा के ...! क्या किया जाए ? सिद्धार्थ का बस नहीं था ! अस्तित्व स्वयं बुलाता है ...ले जाता है..डूबा देता है ! और इसके बाद कुछ भी नहीं बचता ..! राहुल और यशोधरा बस नहीं रह गए थे उनके...समस्त सृष्टि थी उनकी !

'सखी वे मुझसे कह के जाते' या फिर 'संसार से भागे फिरते हो ' या फिर गुलज़ार की 'सिद्धार्थ' ...सब ने कोशिश की है मायने खोजने की...पर सबकी निजी यात्रा है ...कौन जाने कौन किस तरह से जाएगा ...और उस दरिया में डूब जाएगा !

बुद्धं शरणं गच्छामि का जाप मुसलसल जारी है ..मेरे भीतर भी !

रचना दीक्षित 5/05/2011 9:15 PM  

नारी मन और उसकी व्यथा.अंदर तक झकझोड़ गई आपकी ये प्रस्तुति.संवेदनशील प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 5/05/2011 9:24 PM  

बहुत प्रेरक रचना!
अच्छे सवाल किये हैं आपने!

मनोज कुमार 5/05/2011 9:25 PM  

स्‍वयं की खोज के लिए स्‍वयं के प्रति सच्‍चा बनना पड़ेगा।
तभी ‘सत्यं शरणं ग्च्छामि’

ललित शर्मा 5/05/2011 9:37 PM  

sundar bhav hain kavita ke.

shubhakamnayen.

रश्मि प्रभा... 5/05/2011 9:59 PM  

हे तथागत -
आज तक नहीं समझ पायी
मैं तुम्हारे ज्ञान का सार ... yahi baat mere saath bhi hai, main bhi nahin samajh paayi , prayaas jaari hai

इस्मत ज़ैदी 5/05/2011 10:45 PM  

हृदय स्पर्शी रचना ,नारी मन का सटीक और मार्मिक चित्रण
शायद हर नारी हृदय यही प्रश्न पूछना चाहता है गौतम बुद्ध से

Sadhana Vaid 5/05/2011 11:04 PM  

मन को झकझोरती चिंतनीय रचना ! मर्यादा पुरुषोत्तम राम हों या गौतम बुद्ध, नारी के मन की पीड़ा को किसीने भी समझने का प्रयास नहीं किया ! किसीके आगे राजधर्म आ गया तो किसीके आगे वैराग्य की भावना ! दोनों ने ही अपनी इच्छा ऊपर रख स्त्री को ही शोषित किया और अपनी निरपराध पूर्ण समर्पिता पत्नियों के साथ अन्याय किया ! सनातन काल से नारी ही दण्ड भोगती आ रही है आज भी भोग रही है ! बहुत सुन्दर रचना संगीता जी बधाई स्वीकार करें !

वन्दना अवस्थी दुबे 5/05/2011 11:39 PM  

पता है तुमको कि तुमने
दिया है कितना कष्ट
यशोधरा और राहुल को
हे तथागत -
आज तक नहीं समझ पायी
मैं तुम्हारे ज्ञान का सार
कर्तव्यों से च्युत हुए बिना
क्या नहीं हो सकता था
तुम्हारे ज्ञान का प्रसार ?
क्या कहूं संगीता जी? ये बात जब भी मैने बुद्ध को पढाया, या पढा तभी मेरे ज़ेहन में आई, और आपने कितनी खूबसूरती से लिख भी दिया.

जयकृष्ण राय तुषार 5/06/2011 12:09 AM  

बहुत सुंदर और दर्शन से ओत -प्रोत एक अच्छी कविता आपको बधाई |

जयकृष्ण राय तुषार 5/06/2011 12:09 AM  

बहुत सुंदर और दर्शन से ओत -प्रोत एक अच्छी कविता आपको बधाई |

Dr Varsha Singh 5/06/2011 12:09 AM  

संगीता जी, आपकी सृजनात्मकता को मेरा नमन..
उत्कृष्ट अभिव्यक्ति....उत्कृष्ट रचना....
आभार एवं हार्दिक शुभकामनाएं।

सतीश सक्सेना 5/06/2011 12:30 AM  

नए प्रश्न पूंछे है आपने गौतम से ! शुभकामनायें !!

वाणी गीत 5/06/2011 6:58 AM  

बुद्ध को पढ़ते हुए कई बार यही सवाल गूंजता है ...क्या सिद्धार्थ को बुद्ध बनने के लिए यशोधरा और राहुल का त्याग आवश्यक था ! मगर शायद महान पुरुष वही होते हैं जो एक व्यक्ति , एक परिवार नहीं अपितु विश्व के कल्याण के लिए बड़े से बड़ा त्याग कर सकते हों ...

नारी के अंतर्मन के सूक्ष्म भावों को की खूबसूरत अभिव्यक्ति !

veerubhai 5/06/2011 9:31 AM  

behtreen pravaah aur oj ,bhaav bodh se sansikt rachnaa .
veerubhai .

Kajal Kumar 5/06/2011 9:37 AM  

बहुत कठिन सवाल उठाया है आपने.

Khare A 5/06/2011 10:55 AM  

A big Questution MArk????

Kammal ki Rachna!
badhai kabule!

udaya veer singh 5/06/2011 11:14 AM  

kathy to vivadit hai , rachana ,shabd , sansar achha hai ." parhit saris dharm nahin bhayi.....adhamayi " / sarv -sukh ke liye ,swa-sukh ka tyag vanchhaniy &
maryadit bhi hai . sansar ke samast ,pravartakon ne kamo bes yahi kiya hai
kavy men aatmik & bhav-pravarata nihitarth hai. shukriya ji .

mridula pradhan 5/06/2011 11:19 AM  

behad bebaki ke saath aapne is prasang ko uthaya hai.aap nishchay hi badhyee ki patr hain....

डा. अरुणा कपूर. 5/06/2011 11:39 AM  

...सिद्धार्थ की जीवनी से यही साबित होता है कि उपदेश सिर्फ दूसरों को देने के लिए होता है...अपने लिए नही!....बहुत बढिया कथन, उत्तम प्रस्तुति!..मेरा ब्लोग 'बात का बतंगड..' है...यहां भी...

सदा 5/06/2011 12:51 PM  

हे तथागत -
आज तक नहीं समझ पायी
मैं तुम्हारे ज्ञान का सार
कर्तव्यों से च्युत हुए बिना
क्या नहीं हो सकता था
तुम्हारे ज्ञान का प्रसार ?

गहन भावों का समावेश ...

वन्दना 5/06/2011 12:58 PM  

आपने तो बुद्ध को भी कटघरे मे खडा कर दिया…………नारी मन की पीडा का दर्शन करा दिया………बेहद गहन अभिव्यक्ति।

nilesh mathur 5/06/2011 4:54 PM  

प्रश्न तो ठीक है, शायद मोह माया को त्यागे बिना सत्य या ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है! सुन्दर अभिव्यक्ति!

cmpershad 5/06/2011 6:18 PM  

कैसे सुनते यशोधरा की बात। बौध मठ में तो स्त्री का आना भी वर्जित था:( सुंदर कविता - बधाई॥

Yogesh Amana 5/06/2011 6:49 PM  

Very Nice ..plz visit my blog http://yogeshamana.blogspot.com/

रेखा श्रीवास्तव 5/06/2011 6:54 PM  

बुद्ध को संसार में धर्म गुरु के रूप में पूजा जाता है और unake peechhe chalane valon ne bhi shayad isa dard को samajhane के bare में socha hi nahin है. yashodhara और rahul के drishtikon se siddharth को prashnon के kathghare में khada karke unase jo prashna kiye ve nari के sanvedanasheelata को pradarshiht kar rahe hain. bahut gahari soch के liye badhai.
isa khichadi ke liye kshama.

दर्शन कौर धनोए 5/06/2011 7:42 PM  

आपका कथन एक दम सच है --एक नारी को छोड़ कर बच्चे को पिता का प्यार न देकर तथागत ने बोध्य का सम्मान तो पा लिया पर वो उन दोनों के अपराधी भी साबित हुऐ --क्या इंसान गृहस्थ जीवन त्याग कर ही मोक्ष प्राप्त कर सकता है --

प्रतुल वशिष्ठ 5/06/2011 8:28 PM  

प्रायः प्रकाश देने वाला स्वयं को जलाकर ही प्रकाश दे पाता है, तो कैसी शिकायत, कैसा शिकवा?
मैथिलीशरण गुप्त की 'यशोधरा' का कथन याद हो आया..."सखी वे मुझसे कहकर जाते..."

तुलसी हों अथवा जितने भी सन्त स्वभावी हों बिना अपना शारीरिक सुख छोड़े परमार्थ को नहीं साध पाये ....
अरे स्त्रियों में मीराबाई जी को ही ले लो.... लेकिन उन्हें तो अपनी गृहस्थी प्यारी न होकर श्याम धुन प्यारी थी...

ब भी बनते तुम्हारे
अनुयायी
गर तुम ज़रा
सुनते यशोधरा का
मन
भावनाओं से परे
सिखा दिया तुमने तो बस --
बुद्धं शरणम् गच्छामि
धर्मंम् शरणम् गच्छामि
संघम् शरणम् गच्छामि

@ न जाने क्या परिस्थितियाँ रही हों उनके सामने? ... क्या सामाजिक दबाव बना हो?... किस मानसिक तनाव से मुक्त होना चाहते हों? ... प्रायः जब सुख और विलासिता बढ़ जाते हैं... तब ही किसी की आत्मा में ... वैराग्य का दिव्य आलोक प्रस्फुटित होता है.. स्यात... गौतम के मन से भी तम विवाह के उपरान्त ही छँट पाया हो!
इसका मतलब यह नहीं कि आपकी कविता किसी भी दृष्टि से कमतर है... बस सोचने को बाध्य करती है.

Kunwar Kusumesh 5/07/2011 8:54 AM  

तथागत भगवान बुद्ध को कटघरे में इस तरह खड़ा करना उचित नहीं.

सुज्ञ 5/07/2011 11:25 AM  

जन्म दिन की हार्दिक बधाईयाँ, दीदी!!

आपका जीवन सदैव मंगलमय हो, शुभकामनाएँ!!

KAVITA 5/07/2011 12:11 PM  

बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना..

जन्म दिन की हार्दिक बधाईयाँ,
आपका जीवन सदैव मंगलमय हो, शुभकामनाएँ!!

शालिनी कौशिक 5/07/2011 12:30 PM  

sangeeta ji jo jan dharti ke kalya ke liye janm lete hain ve ek parivar se bandhkar nahi rahte yahi gyan hame mila hai apnee mummy se is liye aise mahatmaon par kataksh nahi kiye jate halanki hamare grand father aisee hi soch rakhte the jo aapne yahan prastut kee hai .par ye sab sansarik baten hai jabki ve param tatva se jude mahatmea hain.
aapke gyan ko main kuchh nahi kah rahi hoon kintu main nahi chahti ki un mahatma par bhi koi ungli uthaye.sarthak post
ab meri aur se janam din kee shubhkamnayen swwekar karen.happy birthday to you.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 5/07/2011 1:05 PM  

सभी पाठकों का आभार ...

जन्मदिन की शुभकामनायें देने वालों को शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया ...

@@ प्रतुल जी , कुसुमेश जी शालिनीजी

आपने सही लिखा है कि - "तुलसी हों अथवा जितने भी सन्त स्वभावी हों बिना अपना शारीरिक सुख छोड़े परमार्थ को नहीं साध पाये ....
अरे स्त्रियों में मीराबाई जी को ही ले लो.... लेकिन उन्हें तो अपनी गृहस्थी प्यारी न होकर श्याम धुन प्यारी थी..."

बस मन में यही द्वंद्व उठता है कि अपने साथ जुड़े दूसरों के सुख का क्या ?
गौतम बुद्ध की महानता को कोई चुनौती नहीं दी है ...बस यशोधरा की जगह खुद को रख जो मन में आया वही प्रश्न किये हैं ..महान आत्माओं के प्रति असम्मान की भावना नहीं है .... उनके ज्ञान से यह संसार लाभान्वित हुआ है ... रचना की पृष्ठ भूमि मात्र मन में जन्मी जिज्ञासा है ...

मैंने उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं किया है ...सहज प्रश्न किये हैं ..क्या संसार के प्रति दायित्त्व के सामने पत्नि के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी ? बस
यही प्रश्न मन में उठता है ... आभार आप सबका ...

Rakesh Kumar 5/07/2011 1:24 PM  

टिप्पणियाँ कह रहीं हैं ki आज आपका जन्म-दिन है.
आपके जन्मदिन पर मेरी भी आपको हार्दिक शुभ एवं मंगल कामनाएँ.आपके सक्षम लेखन से ब्लॉग जगत में ज्ञान और आशा का संचार हों और निर्मल मधुर 'संगीत' का 'स्वरुप' 'गीत' बन समस्त वातावरण में व्याप्त हों.आभार.

Patali-The-Village 5/07/2011 7:33 PM  

आपके जन्मदिन पर मेरी भी आपको हार्दिक शुभ एवं मंगल कामनाएँ|

हरकीरत ' हीर' 5/07/2011 9:05 PM  

संगीता जी जन्मदिन की ढेरों शुभकामनायें .....

Rachana 5/07/2011 10:56 PM  

nari man ki baat aap ne kitne sunder tarike se kahi hai .me bhi aesa bahut bar sochti thi pr itna sunder likh nahi pai
badhai
rachana

manukavya 5/07/2011 11:45 PM  

हे तथागत -
आज तक नहीं समझ पायी
मैं तुम्हारे ज्ञान का सार
कर्तव्यों से च्युत हुए बिना
क्या नहीं हो सकता था
तुम्हारे ज्ञान का प्रसार ?

सही लिखा अपने संगीता जी, सन्यास घर-परिवार को त्यागने से या जिम्मेदारियों से भागने से नहीं होता... सन्यास मन से होना चाहिये. मै भी जब भगवान बुद्ध के विषय में पढ़ती हूँ या सोचती हूँ तो उनकी पलायनवादी सोच को सही नहीं ठहरा पाती. वो अंग्रेजी में कहते हैं न Charity begins at home... पूजा-पाठ, सन्यास सब घर-परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करते हुये होना चाहिये न कि जिम्मेदारियों से भाग कर.

ZEAL 5/08/2011 6:37 AM  

कर्तव्यों से च्युत हुए बिना
क्या नहीं हो सकता था
तुम्हारे ज्ञान का प्रसार ? ...

Wow !...Great question .

.

S.M.HABIB 5/08/2011 8:41 AM  

अद्भुत दी, सर्वथा नया दृष्टिकोण....
मातृदिवस पर सादर वंदन....

mahendra verma 5/08/2011 11:33 AM  

हे तथागत
आज तक नहीं समझ पायी
मैं तुम्हारे ज्ञान का सार
कर्तव्यों से च्युत हुए बिना
क्या नहीं हो सकता था
तुम्हारे ज्ञान का प्रसार ?

तथागत से सटीक प्रश्न किया है आपने।
संसार से विमुख हुए बिना भी ज्ञान की प्राप्ति और उसका प्रसार तथागत के द्वारा किया जा सकता था।
यशोधरा और राहुल की पीड़ा को स्वर देती संवेदनशील कविता।

Babli 5/08/2011 12:20 PM  

बहुत ख़ूबसूरत कविता प्रस्तुत किया है आपने! हैपी मदर्स डे!

आशा 5/08/2011 4:21 PM  

भावपूर्ण अभिव्यक्ति |बधाई |
आशा

smshindi By Sonu 5/08/2011 6:40 PM  

आप सहित हर माँ को मातृ-दिवस पर वंदन!

smshindi By Sonu 5/08/2011 6:40 PM  

सुंदर रचना

Udan Tashtari 5/08/2011 6:57 PM  

भावपूर्ण अभिव्यक्ति!!


मातृदिवस की शुभकामनाएँ..

सादर

समीर लाल
http://udantashtari.blogspot.com/

Suman 5/08/2011 7:06 PM  

टिप्पणीयोंसे लगता है आपका जन्मदिन है !
माफ़ कीजिये मै देरसे पहुँच गई !
जनम दिन बहुत बहुत मुबारक हो !

दिगम्बर नासवा 5/08/2011 7:28 PM  

जो अपना जीवन सबको दे देता है फिर उसका कोई नही होता ... सब उसके होते हैं ... ये प्रश्न विचारणीय तो होते हैं .. पर समाज उत्थान के लिए गौण हैं ...

Anand Dwivedi 5/08/2011 11:05 PM  

दीदी...आज बुद्ध को नए परिप्रेक्ष में देखा मैंने ....और सोंचा कि संभव था ...वह बता कर भी आ सकते थे...आज यशोधरा कि पीड़ा से जोड़ा मैंने अपने आप को...अबतक कभी नहीं देखा था इस नजरिये से...
सोंचता हूँ कि क्या तात्कालिक सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था पर सारा दोष डाल कर सिद्धार्थ को दोषमुक्त कर दूं ... पर आपकी कविता...ऐसा करने से रोक रही है दीदी बार बार !यही खास लेखन कि पहचान होती है...संदर्भो को युगों से पार ले जाती है....शायद स्वयं बुद्ध को भी पता नहीं रहा होगा कि कभी समय उनसे ऐसा जटिल सवाल करेगा...
साधुवाद दीदी बहुत ही उच्च कोटि कि रचना. !!

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 5/09/2011 5:36 PM  

यशोधरा का दर्द क्यों नहीं देखा प्रभु ?.........बहुत ही साहसभरी ,सटीक सवाल उठाती -सार्थक रचना

Anita 5/09/2011 5:41 PM  

बुद्ध यदि घर छोड़ कर न गए होते तो संसार की कितनी बड़ी क्षति होती और तब न कोई यशोधरा का नाम जानता न राहुल का, लाखों नारियों की तरह एक अनाम जिंदगी उसने भी जी होती...

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" 5/09/2011 7:55 PM  

budhdham sharanam gachhami....

तब भी बनते तुम्हारे
अनुयायी
गर तुम ज़रा
सुनते यशोधरा का
मन
भावनाओं से परे.....

vistrit bhaaw.....

bahut sunder rachna.....

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" 5/09/2011 7:55 PM  

budhdham sharanam gachhami....

तब भी बनते तुम्हारे
अनुयायी
गर तुम ज़रा
सुनते यशोधरा का
मन
भावनाओं से परे.....

vistrit bhaaw.....

bahut sunder rachna.....

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" 5/09/2011 7:55 PM  

budhdham sharanam gachhami....

तब भी बनते तुम्हारे
अनुयायी
गर तुम ज़रा
सुनते यशोधरा का
मन
भावनाओं से परे.....

vistrit bhaaw.....

bahut sunder rachna.....

रंजना 5/10/2011 1:54 PM  

सार्थक प्रश्न ......

सत्य है, गृहस्थ धर्म के साथ वृहत्तर मानव धर्म निबाहा जाता तो बात ही कुछ और होती...

बहुत ही सुन्दर रचना...

RAJPUROHITMANURAJ 5/10/2011 2:23 PM  

आदरणीय संगीता स्वरुप जी
नमस्कार !बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना..

Nutan 5/10/2011 8:52 PM  

क्या तुम्हे हुयी कभी ग्लानि
बिना बताये जाने की ?
जवाब दोगे या यहाँ भी महाभिनिष्क्रमण

girish pankaj 5/10/2011 9:26 PM  

man kee komal bhavnaon se hi upaj sakati hai aisee marmsparshee kavitaa..

संजय भास्कर 5/11/2011 6:25 PM  

आदरणीय संगीता स्वरुप जी
नमस्कार
........बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना..

निर्झर'नीर 5/12/2011 12:41 PM  

आप हमेशा कुछ न कुछ अनछुआ ख्याल लेकर आती है जो हर कोई नहीं कर पाता एक अच्छी कविता फिर से .. मानव मन मोहमाया का त्याग नहीं कर पाता ,प्रभु सब जानते है इसलिए वो ऐसी लीला रचते है ..कृष्ण भगवान् ने अर्जुन को कैसे युद्ध के लिए तैयार किया था .ये मानव मन कहाँ स्वीकार करता है ऐसी स्तिथि को.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 5/14/2011 6:59 PM  

Neer has left a new comment on your post "तथागत ..":

आप हमेशा कुछ न कुछ अनछुआ ख्याल लेकर आती है जो हर कोई नहीं कर पाता एक अच्छी कविता फिर से .. मानव मन मोहमाया का त्याग नहीं कर पाता ,प्रभु सब जानते है इसलिए वो ऐसी लीला रचते है ..कृष्ण भगवान् ने अर्जुन को कैसे युद्ध के लिए तैयार किया था .ये मानव मन कहाँ स्वीकार करता है ऐसी स्तिथि को.

निवेदिता 5/14/2011 9:48 PM  

संगीता दी ,
सच में बहुत अच्छा लिखा है .....काश बुद्धपना बुद्धत्व प्राप्त करने के पहले अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर जाते ....आभार!

M VERMA 5/15/2011 5:45 AM  

कर्तव्यों से च्युत हुए बिना
क्या नहीं हो सकता था
तुम्हारे ज्ञान का प्रसार ?
एक बड़े सच को आपने प्रश्न बना दिया. कर्तव्य च्युत होकर तो बहुत ज्ञान बखारा जा सकता है पर कर्तव्य रत होकर सच को परखा जाये तो शायद सही मायने में ज्ञान का प्रसार होगा.

अमित श्रीवास्तव 5/15/2011 8:46 AM  

"क्योंकि व्यक्ति से बड़ा परिवार एवं परिवार से बड़ा समाज और समाज से बड़ा देश और अन्त में देश से बड़ा संसार" शायद यही एकमात्र कारण होगा ’महापुरुषों के अन्तर्मन में ।

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" 5/15/2011 10:38 AM  

तो कहाँ लुप्त हो गयीं थीं
तुम्हारी सारी संवेदनाएं
जब पुत्र और पत्नि को
छोड़ गए थे सोता हुआ
और अपने कर्तव्य से विमुख हो
चल पड़े थे दर - बदर भटकने .
क्या तुम्हे हुयी कभी ग्लानि
बिना बताये जाने की ?

bahut bahut bahut sunder.....

SIDDHART= SIDDH+ARTH, ne shayad kahi apne aapko sahee arthon me siddh karne me galti ki...........

Dr. shyam gupta 5/15/2011 6:21 PM  

Anita said...

बुद्ध यदि घर छोड़ कर न गए होते तो संसार की कितनी बड़ी क्षति होती और तब न कोई यशोधरा का नाम जानता न राहुल का, लाखों नारियों की तरह एक अनाम जिंदगी उसने भी जी होती...

----यही एक सही टिप्पणी है....बताइये क्या नहीं देदिया बुद्ध ने अपने परिवार को....कालजयी नाम...

विनोद कुमार पांडेय 5/16/2011 12:01 AM  

अपनी भावनाएँ आपने एक अलग नज़रिए से व्यक्त किया है..बहुत सुंदर भाव पिरोए है आपने..बढ़िया कविता के लिए बधाई!!

प्रतिभा सक्सेना 5/16/2011 11:51 AM  

यहाँ अभी तक अंतर्जाल से दूर थी .
जन्म -दिवस की हार्दिक शुभ-कामनाएँ -देर से ही सही ,स्वीकारें !
इन पंथों की पलायनवादिता ,निवृत्ति को प्रोत्साहन देती है .गीता का कर्म-योग मुझे तो जीवन-समर का सबसे वांछित समाधान लगता है -दैन्य रहित हो कर प्रवृत्तिमार्ग का अनुशीलन.
वैसे जिसकी जैसी प्रवृत्ति .

ज्ञानचंद मर्मज्ञ 5/16/2011 5:09 PM  

सोचने पर मजबूर करती संवेदनशील रचना

कुश्वंश 5/17/2011 11:22 AM  

पता है तुमको कि तुमने
दिया है कितना कष्ट
यशोधरा और राहुल को
हे तथागत -
आज तक नहीं समझ पायी
मैं तुम्हारे ज्ञान का सार
कर्तव्यों से च्युत हुए बिना
क्या नहीं हो सकता था
तुम्हारे ज्ञान का प्रसार ?

गहन विचार से प्रेरित रचना,संवेदनशीलता से अंतस को छूती बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति..आभार

के लिए आभार

Avinash Chandra 5/19/2011 4:52 PM  

सहज प्रश्न उठते हैं, उठना स्वाभाविक है, प्रक्रिया सीखने की इसे ही कहते होंगे।
और जो बधाई नहीं दी मैंने वक़्त पर, उसके लिए मेरे कान खींचे जाने चाहियें।

Amrita Tanmay 5/20/2011 5:49 PM  

बेहद भावप्रधान..एक अलग ही भाव-संसार में ले जाती सुंदर कविता

Anjana (Gudia) 5/26/2011 12:19 AM  

wah!!! kya kamaal sawaal uthae hain... sach hai, unki patni ko kitni badi kimat chukaani badi! ese to kabhi socha hi nahi... wah!

Dr.J.P.Tiwari 6/12/2011 8:01 AM  

तू मेरे प्रथम -ज्ञान की प्रतिमा
तेरे स्फुलिंग मेरी ज्योति जली.
देखा जगत को अग्नि में जलते
क्या 'यश' मेरी भी जल जाएगी?


क्या जायेगी सूख ये बगिया मेरी
ये वाटिका आज जो है हरी-भरी.
सच मनो तेरे चिंतन ने ही मेरे
अंतर्मन में अति उत्साह भरी.


तुझे अजर अमर-अजीर्ण बनाने
छोड़ के प्रासाद निकल पड़ा हूँ.
दवा तेरी जग - दंश हरेगा ,
धरा की यश का सुयश होगा .


नहीं चाहता था तुझे खोना
अब भी नहीं चाहता हूँ खोना.
लेकिन खोना और पाना क्या
बिना 'निर्वाण' सब खुछ सूना.


एक प्रतनिधि छोड़ मैं आया हूँ
तेरे मन को वह बहलायेगा.
लेकिन वह भी मोह ही ...है..
'निर्वाण' में बाधा लाएगा....


जब तू सचेत हो जायेगी
मुझे दोष न तब दे पाएगी.
मेरा क्या, मै तो करूंगा
प्रतीक्षा तेरी! चिर प्रतीक्षा.


तुझे सिद्धार्थ बनकर जीना है
दायित्व मातु-पिता का ढोना है.
तुझको फिर बुद्ध बना करके
धरा के यश को फैलाऊंगा .


तुम नहीं केवल यशोधरा
तुम तो इस धरा की यश हो.
ढूंढो तुम निर्वाण जगत में
मैं पथ -निर्वाण जगत को दूंगा .


हम और तुम नहीं हैं दो
यह अंतर केवल जगत बीच .
'निर्वाण जगत' में भेद नहीं
अनंत ये सारा शून्य बीच .


अनंत और शून्य दो अति वाद हैं
इन अतिवादों से हमें बचना है.
अपनाना है हमको मध्य मार्ग
माध्यम का आदर्श बताना है.


एक बार हूँ चाहता फिर बतलाना
अविश्वास नहीं तुम मुझपर लाना.
जब तक जगत में दुःख होगा
यह बुद्ध नहीं फिर मुक्त होगा.

anu 8/02/2011 7:17 PM  

संगीता दी....आपकी कविता पढ़ के मुझे मेरी लेखनी तुछ ...लग रही है ......बहुत गहरे भाव लिए आपकी ये रचना
अपने संस्कारो और ज़िम्मेवारियों से भागने का नाम जीवन नहीं है ...जीवन वही जिस का डट के मुकाबला किया जाये ..........आभार

Mayuri 8/09/2011 8:55 PM  
This comment has been removed by the author.
Mayuri 8/10/2011 10:51 AM  

संगीता जी ..
बहुत बहुत शुक्रिया आपने मेरे अभिव्यक्ति को मोल दिया. कई बार जो कहना होता है वो शब्दों में कहना बहुत मुश्किल होता है लेकिन मुझे ख़ुशी है कि आपने मेरे शब्दों में मेरे भाव पढ़ लिए.
मेरा ज्ञान भी अधुरा ही है इस मामले में. जो मेरी समझ है उसे बेख़ौफ़ बता दिया :-)
शुक्रिया

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