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किसे अर्पण करूँ ?

>> Monday, October 17, 2011




भाव सुमन लिए हुए 
नैवेद्य  दीप सजे हुए 
प्रेम की पुष्पांजलि  को 
मैं किसे अर्पण करूँ ?

ज़िंदगी की राह में 
शूल भी हैं , फ़ूल भी 
किस किस का त्याग करूँ 
और किसे वरण करूँ ?

आज जिस जगह हूँ 
यादों का  समंदर है 
किस लहर को छोडूँ मैं 
और किसको नमन करूँ ?

आसक्ति से प्रारम्भ हो 
विरक्ति प्रारब्ध हो गयी 
किस छल - बल से भला 
मैं मोह का दमन करूँ ? 

नाते - रिश्ते सब मेरे 
दिल के बहुत करीब हैं 
किस किसको सहेजूँ 
और किसका तर्पण करूँ ?

भाव सुमन लिए हुए 
नैवेद्य  दीप सजे हुए 
प्रेम की पुष्पांजलि  को 
मैं किसे अर्पण करूँ ?


83 comments:

प्रवीण पाण्डेय 10/17/2011 8:34 AM  

प्रश्न यही रह रह उठता है..

रचना दीक्षित 10/17/2011 8:38 AM  

भाव सुमन लिए हुए
नैवेद्य दीप सजे हुए
प्रेम की पुष्पांजलि को
मैं किसे अर्पण करूँ ?

समर्पण का सुंदर भाव कविता में दर्शित हो रहा है. आभार सुंदर रचना के लिये.

वाणी गीत 10/17/2011 8:44 AM  

नाते - रिश्ते सब मेरे दिल के बहुत करीब हैं किस किसको सहेजूँ और किसका तर्पण करूँ ?
भाव सुमन लिए हुए नैवेद्य दीप सजे हुए प्रेम की पुष्पांजलि को मैं किसे अर्पण करूँ ?

सभी को याद रखें और उन्हें अपनी राह चुनने दे , क्या इससे बेहतर कुछ हो सकता है!

Sadhana Vaid 10/17/2011 8:57 AM  

आसक्ति से प्रारम्भ हो
विरक्ति प्रारब्ध हो गयी
किस छल - बल से भला
मैं मोह का दमन करूँ ?

बहुत ही खूबसूरत कविता है संगीता जी आज शब्द नहीं मिल रहे हैं मुझे इसकी प्रशंसा के लिये ! बहुत ही सुन्दर ! बधाई !

रश्मि प्रभा... 10/17/2011 8:58 AM  

नाते - रिश्ते सब मेरे
दिल के बहुत करीब हैं
किस किसको सहेजूँ
और किसका तर्पण करूँ ?... हमेशा से उठता रहा है ये प्रश्न , जो दिल की सुनते हैं - वे ताउम्र यही गुनते हैं

संजय भास्कर 10/17/2011 9:05 AM  

आदरणीय संगीता जी
नमस्कार !
...प्रशंसनीय रचना।
.....शब्दों को चुन-चुन कर तराशा है आपने

संजय भास्कर 10/17/2011 9:06 AM  

आपकी कविता पढ़कर मन अभिभूत हो गया

प्रतिभा सक्सेना 10/17/2011 9:11 AM  

राग से वैराग्य तक का सफ़र है ज़िन्दगी - सचमुच !

रविकर 10/17/2011 9:26 AM  

किस छल - बल से भला
मैं मोह का दमन करूँ ?

बहुत खूब ||
बधाई ||

Navin C. Chaturvedi 10/17/2011 9:29 AM  

आ. संगीता दीदी, बहुत ही सुंदर काव्यात्मक प्रस्तुति है यह। बधाई स्वीकार करें। इस प्रस्तुति विशेष के संदर्भ में आप से कुछ मंतव्य करना है। मेरे पास आप का ई मेल पता नहीं है। क्या आप मुझे एक टेस्ट मेल भेजना पसंद करेंगी? मेरा ई मेल पता navincchaturvedi@gmail.com

mahendra verma 10/17/2011 9:38 AM  

ज़िंदगी की राह में
शूल भी हैं , फ़ूल भी
किस किस का त्याग करूँ
और किसे वरण करूँ ?

जीवन अंतर्द्वंद्वों का दूसरा नाम है।
भावमयी रचना।

sushma 'आहुति' 10/17/2011 9:39 AM  

भाव सुमन लिए हुए
नैवेद्य दीप सजे हुए
प्रेम की पुष्पांजलि को
मैं किसे अर्पण करूँ ?खुबसूरत.अभिवयक्ति........

संतोष त्रिवेदी 10/17/2011 10:18 AM  

बहुत मुश्किल है इतना सब जान-समझ लेना !

सागर 10/17/2011 10:29 AM  

ज़िंदगी की राह में
शूल भी हैं , फ़ूल भी
किस किस का त्याग करूँ
और किसे वरण करूँ ? behtreen....

ajit gupta 10/17/2011 10:58 AM  

पता नहीं यह पोस्‍ट कैसे मेरे चंगुल से छूट गयी? अब मैं यह कह देती हूं कि गूगल रीडर में अपने भी हैं और पराए भी, कुछ अच्‍छे भी और कुछ सस्‍ते भी तो किसको छोडूं और किसका वरण करूं?
जिन्‍दगी में कटु यादे ही आपका जीवनभर साथ देती हैं।

वन्दना 10/17/2011 11:17 AM  

नाते - रिश्ते सब मेरे
दिल के बहुत करीब हैं
किस किसको सहेजूँ
और किसका तर्पण करूँ ?

बहुत ही सुन्दर भावो को संजोया है…………एक मोड पर आकर यही प्रश्न उठता है………मोह के जाल मे फ़ंसा मानव और उसकी विकलता को खूब सहेजा है।

सदा 10/17/2011 12:02 PM  

बहुत ही खूबसूरत से अ‍हसास लिये यह बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Amit 10/17/2011 12:08 PM  

आसक्ति से प्रारम्भ हो
विरक्ति प्रारब्ध हो गयी
किस छल - बल से भला
मैं मोह का दमन करूँ
UTTAM-BHAVPURN

कुमार राधारमण 10/17/2011 12:23 PM  

ऊंची-नीची लहरों को खेते हुए,विशिष्ट स्थिति में ही मन प्रेममय बना रहता है। ऐसे प्रेम का होना ही बहुत है।

mridula pradhan 10/17/2011 12:48 PM  

har pangti khoobsurat hai......

इस्मत ज़ैदी 10/17/2011 1:41 PM  

नाते - रिश्ते सब मेरे
दिल के बहुत करीब हैं
किस किसको सहेजूँ
और किसका तर्पण करूँ ?

sab sahej leejiye sangeeta ji kisi bhi rishte ka tarpan kyon kiya jaae :)

Anita 10/17/2011 2:55 PM  

बहुत सुंदर भावपूर्ण हृदय से निकले उदगार... कुछ छोड़ना नहीं बस एक उसको जोड़ना है...जिसका यह खेल है.. शुभकामनायें!

shikha varshney 10/17/2011 3:03 PM  

भाव फूल अनेक लिए
शब्द प्रवाह में सीए हुए,
माला है अद्भुत गूंथी हुई
और तुझे मैं क्या कहूँ ?

अनुपमा पाठक 10/17/2011 3:12 PM  

अंतर्द्वंद से निकली बेहद सुन्दर रचना!

मनोज कुमार 10/17/2011 3:15 PM  

इस कविता के भाव, लय और अर्थ काफ़ी पसंद आए। बिल्कुल नए अंदाज़ में आपने एक भावपूरित रचना लिखी है।

निवेदिता 10/17/2011 3:24 PM  

खूबसूरत से अ‍हसास .......

सतीश सक्सेना 10/17/2011 3:38 PM  

भाव सुमन लिए हुए
नैवेद्य दीप सजे हुए
प्रेम की पुष्पांजलि को
मैं किसे अर्पण करूँ ?

सुंदर रचना ...
शुभकामनायें !

Maheshwari kaneri 10/17/2011 4:58 PM  

भाव सुमन लिए हुए
नैवेद्य दीप सजे हुए
प्रेम की पुष्पांजलि को
मैं किसे अर्पण करूँ ? ..समर्पण का सुंदर भाव ..बहुत ही खूबसूरत रचना..आभार संगीता जी..

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद 10/17/2011 5:15 PM  

जीवन के दोराहे पर ऐसे कई प्रश्न मिलते हैं जिनके उत्तर हमें मुश्किल से मिलते हैं॥

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 10/17/2011 5:28 PM  

गीत बन यह द्वन्द आया....

वाह दी... बहुत सुन्दर गीत रचा....
सादर बधाई....

वन्दना अवस्थी दुबे 10/17/2011 5:29 PM  

नाते - रिश्ते सब मेरे
दिल के बहुत करीब हैं
किस किसको सहेजूँ
और किसका तर्पण करूँ ?
क्या बात है संगीता जी. मन की दुविधा को कितनी खूबसूरती से उकेरा है आपने.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 10/17/2011 6:38 PM  

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच की जी रही है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

kshama 10/17/2011 8:36 PM  

Harek shabd,harek pankti kamaal kee hai!

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 10/17/2011 8:39 PM  

पूरी की पूरी रचना अद्वितीय ....
शब्द-शिल्प , भाव और प्रस्तुति मनमोहक

Suman 10/17/2011 9:32 PM  

भाव सुमन लिये हुए
नैवेद्य दीप सजे हुए
प्रेम की पुष्पांजली को
मै किसे अर्पण करूँ ?
बहुत सुंदर भाव .....

डॉ॰ मोनिका शर्मा 10/17/2011 11:31 PM  

भाव सुमन लिए हुए
नैवेद्य दीप सजे हुए
प्रेम की पुष्पांजलि को
मैं किसे अर्पण करूँ ?

गहरे भाव लिए है यह प्रश्न .....

मेरा साहित्य 10/18/2011 3:40 AM  

नाते - रिश्ते सब मेरे
दिल के बहुत करीब हैं
किस किसको सहेजूँ
और किसका तर्पण करूँ ?
samarpan ki sunder kavita
rachana

Babli 10/18/2011 10:07 AM  

आसक्ति से प्रारम्भ हो
विरक्ति प्रारब्ध हो गयी
किस छल - बल से भला
मैं मोह का दमन करूँ ?
वाह! बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! ख़ूबसूरत प्रस्तुती!

सदा 10/18/2011 12:05 PM  

कल 19/10/2011 को आपकी कोई एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

NISHA MAHARANA 10/18/2011 12:25 PM  

भाव सुमन लिए हुए
नैवेद्य दीप सजे हुए
प्रेम की पुष्पांजलि को
मैं किसे अर्पण करूँ ?
bhut hi achi abhivyakti.

जयकृष्ण राय तुषार 10/18/2011 4:25 PM  

बहुत सुन्दर गीत |आपका बहुत -बहुत आभार

जयकृष्ण राय तुषार 10/18/2011 4:25 PM  

बहुत सुन्दर गीत |आपका बहुत -बहुत आभार

Bhushan 10/18/2011 10:04 PM  

कोमल चित्त में सब कुछ समा जाता है. वहाँ स्थान की कमी नहीं. बहुत सुंदर कविता.

डॉ.सोनरूपा विशाल 10/18/2011 11:15 PM  

हमेशा कि तरह ........प्रशंसनीय रचना !

bhaiyyu 10/19/2011 10:06 AM  

बहुत अच्छी लगी ये कविता !

दिगम्बर नासवा 10/19/2011 2:17 PM  

ज़िंदगी की राह में
शूल भी हैं , फ़ूल भी
किस किस का त्याग करूँ
और किसे वरण करूँ ?...

बहुत खूब ... ये काम आसान नहीं ... दोनों को ही गले लगाना पढता है समय अनुसार ... भावमयी रचना ...

ashish 10/19/2011 4:05 PM  

देर से आया लेकिन मोती पाया .हमेशा की तरह अद्भुत .

नूतन .. 10/19/2011 4:16 PM  

बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

Surendra shukla" Bhramar"5 10/19/2011 5:22 PM  

आदरणीया संगीता जी प्यारी रचना मूल भाव अति कोमल ..सच में विभ्रम हो जाता है और बहुत ध्यान से चुनना होता है की किसे चुना जाए ..
लेकिन फूल तो फूल ही है ..शूल शायद ही जरुरत पड़ जाए
आभार
भ्रमर५

ज़िंदगी की राह में
शूल भी हैं , फ़ूल भी
किस किस का त्याग करूँ
और किसे वरण करूँ ?

अनामिका की सदायें ...... 10/19/2011 7:32 PM  

आसक्ति से प्रारम्भ हो
विरक्ति प्रारब्ध हो गयी
किस छल - बल से भला
मैं मोह का दमन करूँ ?

bahut sunder aur man ke manthan ko saty ki dhara par pakhaarti bhav pravaah me bahti rachna.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 10/19/2011 7:46 PM  

संगीता दी,
एक दुविधा, किन्कर्तव्यविमूढ की स्थिति और उसी द्वंद्व में छिपा उत्तर!!
बहुत सुन्दर रचना!!

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri 10/19/2011 8:28 PM  

नाते - रिश्ते सब मेरे
दिल के बहुत करीब हैं
किस किसको सहेजूँ
और किसका तर्पण करूँ ??
स्नेह के भाव लिये सुन्दर रचना ...सभी को साथ लिये बिन आसक्ति के ..आभार एवं शुभ कामनायें !!!

Kunwar Kusumesh 10/20/2011 2:04 PM  

तमाम सवालात का हल ढूंढती प्रभावशाली कविता.

JHAROKHA 10/20/2011 11:01 PM  

di
ab aapka swasthy kaisa hai .asha karti hun ki aap purntaya swasth hongi.
di,har baar main sochti rah jaati hun ki aapki post par kya comments dun.aapki lekhni ke aage mere shabd bahut hi tukchh prateet hote hain.par dil ki gahraiyon se aapki lekhni ko naman karti hun.
kya likhun bas nishabd hun-------
sadar naman
poonam

Babli 10/21/2011 7:16 AM  

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

ASHA BISHT 10/21/2011 11:28 AM  

yahi kashmkash har insaan ko duvidha me dalti hai....
sundar aur sampurn kavya....
aap ne meri post par comment kar mujhe protsahit kiya hai apka shirday dhanyavaad...

manukavya 10/21/2011 1:11 PM  

ज़िंदगी की राह में
शूल भी हैं , फ़ूल भी
किस किस का त्याग करूँ
और किसे वरण करूँ ?

एक शाश्वत प्रश्न जिसके उत्तर की तलाश सभी को रहती है... लेकिन अनुत्तरित ही रहता है जादातर ... दार्शनिकता का भाव लिए हुये एक प्रभावशाली रचना

Amrita Tanmay 10/21/2011 5:26 PM  

भावपूर्ण,अति सुन्दर रचना के लिये आभार

Rakesh Kumar 10/21/2011 9:07 PM  

भाव सुमन लिए हुए
नैवेद्य दीप सजे हुए
प्रेम की पुष्पांजलि को
मैं किसे अर्पण करूँ ?

बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आपकी.
भावों की अनुपम प्रस्तुति मन मोहती है.

मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार 10/21/2011 11:27 PM  





आदरणीया दीदी संगीता जी
सादर प्रणाम !

बहुत सुंदर गीत लिखा है-
भाव सुमन लिए हुए
नैवेद्य दीप सजे हुए
प्रेम की पुष्पांजलि को
मैं किसे अर्पण करूं ?

ज़िंदगी की राह में
शूल भी हैं , फ़ूल भी
किस किस का त्याग करूं
और किसे वरण करूं ?


अनुत्तरित प्रश्नों की यह शृंखला मन की अकुलाहट बढ़ाने का कार्य ही कर रही है …
भावनाओं को शब्द देने के लिए आभार !

दीपावली की बधाई और शुभकामनाओं सहित
-राजेन्द्र स्वर्णकार

mark rai 10/22/2011 9:16 PM  

बहुत सुंदर प्रस्तुति ....

Rakesh Kumar 10/23/2011 11:08 AM  

सुनीता जी की नई पुरानी हलचल से एक बार फिर यहाँ पर.मेरे ब्लॉग पर आपके आने का बहुत बहुत आभार.

'नाम जप' के बारे में आपके अमूल्य विचार व अनुभव जानकर अति अनुग्रहित हूँगा मैं,संगीता जी.

veerubhai 10/23/2011 1:55 PM  

नाते - रिश्ते सब मेरे
दिल के बहुत करीब हैं
किस किसको सहेजूँ
और किसका तर्पण करूँ ?
सुन्दर भाव पूर्ण प्रस्तुति .

Onkar 10/23/2011 7:10 PM  

badi pyari kavita

NISHA MAHARANA 10/24/2011 9:05 AM  

दीये की लौ की भाँति
करें हर मुसीबत का सामना
खुश रहकर खुशी बिखेरें
यही है मेरी शुभकामना।

Babli 10/24/2011 9:58 AM  

आपको एवं आपके परिवार के सभी सदस्य को दिवाली की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें !

ऋता शेखर 'मधु' 10/24/2011 12:37 PM  

हर पंक्ति बहुत सुन्दर भाव समेटे है...दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ|

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) 10/24/2011 2:20 PM  

नाते - रिश्ते सब मेरे
दिल के बहुत करीब हैं
किस किसको सहेजूँ
और किसका तर्पण करूँ ?

बहुत ही भावपूर्ण रचना.इन्हीं सवालों में जीवन उलझ जाता है.

Suman 10/24/2011 4:06 PM  

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !

NEELKAMAL VAISHNAW 10/24/2011 7:46 PM  

आपको धनतेरस और दीपावली की हार्दिक दिल से शुभकामनाएं
MADHUR VAANI
MITRA-MADHUR
BINDAAS_BAATEN

Arvind Mishra 10/24/2011 9:30 PM  

अर्चना में क्यूं निरत हूँ ?
अप्रतिम भाव !

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) 10/24/2011 10:28 PM  

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें.
बेटी बचाओ अभियान (गीत – 2)

महफूज़ अली 10/25/2011 8:00 AM  

आपको दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनायें....

अमित शर्मा 10/25/2011 12:37 PM  

पञ्च दिवसीय दीपोत्सव पर आप को हार्दिक शुभकामनाएं ! ईश्वर आपको और आपके कुटुंब को संपन्न व स्वस्थ रखें !
***************************************************

"आइये प्रदुषण मुक्त दिवाली मनाएं, पटाखे ना चलायें"

babanpandey 10/25/2011 12:47 PM  

दीपों के पर्व की बधाई

Amrita Tanmay 10/25/2011 6:47 PM  

** दीप ऐसे जले कि तम के संग मन को भी प्रकाशित करे ***शुभ दीपावली **

कुश्वंश 10/25/2011 8:19 PM  

बेहतरीन काव्य के लिए हार्दिक बधाई.कुछ दिनों से आपका ब्लॉग नहीं खुल पा रहा था आज पढने को मिला . पढ़कर वही सुखानुभूति हुयी. रौशनी के पर्व पर आपको एवं परिवार को हार्दिक शुभकामनाये -कुश्वंश

Udan Tashtari 10/26/2011 5:56 AM  

दीप हम ऐसे जलायें
दिल में हम एक अलख जगायें..
आतंकवाद जड़ से मिटायें
भ्रष्टाचार को दूर भगायें
जन जन की खुशियाँ लौटायें
हम एक नव हिन्दुस्तान बनायें
आओ, अब की ऐसी दीवाली मनायें
पर्व पर यही हैं मेरी मंगलकामनायें....

-समीर लाल 'समीर'
http://udantashtari.blogspot.com

Human 10/26/2011 11:26 AM  

बहुत अच्छा भावान्वेषण,उत्कृष्ट रचना
दीपावली की मंगल शुभकामनाएँ आपको और आपके परिवार को

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