copyright. Powered by Blogger.

काफी है ......

>> Saturday, August 4, 2012


तम हो घनेरा 
और जाना हो 
मंज़िल तक 
तो जुगनू  का 
एक दिया ही 
काफी है 
मंज़िल पाने को 
तपिश हो मन की 
और चाहते हो ठंडक 
तो अश्क  का 
एक कतरा ही 
काफी है 
अदना सा झोंका ही 
भर देता है 
प्राणवायु 
जीवित रहने के लिए 
एक सांस ही 
काफी है , 
भले ही हो 
अस्फुट सा स्वर 
पर है वो 
प्रेमसिक्त 
मन में सिंचित 
कटुता को 
धो डालने के लिए 
काफी है , 
मुँदी हुई पलकें 
आभास देती हों 
निष्प्राण देह का 
उसमें स्पंदन के लिए 
गहन मौन ही 
काफी है ...




91 comments:

devendra gautam 8/04/2012 8:22 AM  

जीवित रहने के लिए
एक सांस ही
काफी है ,

थोड़े शब्दों में बहुत ही बड़ी बात कह दी आपने....लेकिन इंसान समझ नहीं पाता...बहुत अच्छी लगी यह नज़्म

veerubhai 8/04/2012 8:25 AM  

अदना सा झोंका ही
भर देता है
प्राणवायु
जीवित रहने के लिए
एक सांस ही
काफी है ,
समझो के तब ,जब होवोगे वाकिफ गहन अनुभूतियों के प्रगल्भ संसार से ...बढ़िया प्रस्तुति है .तदानुभूति हमें भी हुई लिखी ,आपने है .

Ramakant Singh 8/04/2012 8:27 AM  

मुँदी हुई पलकें
आभास देती हों
निष्प्राण देह का
उसमें स्पंदन के लिए
गहन मौन ही
काफी है ...

किस लाइन को प्रथम श्रेणी में रखा जाये मन के भावों को छू गई कहने के लिए ..जीवन के करीब ह्रदय स्पर्शी

Suman 8/04/2012 8:56 AM  

तम हो घनेरा
और जाना हो
मंज़िल तक
तो जुगनू का
एक दिया ही
काफी है
सच कहा है एक छोटी किरण सूरज के स्त्रोत तक
पहुँचाने में सक्षम है ! सुंदर रचना ...

Deepak Shukla 8/04/2012 9:06 AM  

Sangita Di...

Sadar Pranam!..

Ek saans hi kafi, tan main..
Pranvayu ko laane ko..
Ek aas hi kafi, man main...
Asha-deep jalane ko..

Bahut shundar bhavabhivyakti...

Deepak Shukla...

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 8/04/2012 9:09 AM  

भले ही हो
अस्फुट सा स्वर
पर है वो प्रेमसिक्त
मन में सिंचित
कटुता को
धो डालने के लिए
काफी है....

बहुत ही सुन्दर रचना है दी....
सादर.

सतीश सक्सेना 8/04/2012 9:14 AM  

सच है यह ...
शुभकामनायें आपको !

रश्मि प्रभा... 8/04/2012 9:29 AM  

अँधेरे में एक जुगनू की पलक झपकती रौशनी काफी है ...एक तिनका , एक बूंद पानी .... जीवन खुद को आयाम दे लेता है

सदा 8/04/2012 10:39 AM  

तम हो घनेरा
और जाना हो
मंज़िल तक
तो जुगनू का
एक दिया ही
काफी है
बिल्‍कुल सही कहा आपने ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

प्रतिभा सक्सेना 8/04/2012 10:47 AM  

एक बूँद, एक श्वास ,एक आंच काफ़ी है !

वन्दना 8/04/2012 10:47 AM  

मुँदी हुई पलकें
आभास देती हों
निष्प्राण देह का
उसमें स्पंदन के लिए
गहन मौन ही
काफी है ...

सुन्दर भाव समन्वय

निर्मला कपिला 8/04/2012 10:52 AM  

मंजिल तक एक जुगनू की रोशनी प्रेरणा देती है। सुन्दर रचना।

Dr. sandhya tiwari 8/04/2012 11:10 AM  

भले ही हो
अस्फुट सा स्वर
पर है वो प्रेमसिक्त
मन में सिंचित
कटुता को
धो डालने के लिए

बहुत सुन्दर रचना ...........

मनोज कुमार 8/04/2012 11:14 AM  

इस कविता का उदास स्वर अच्छा लगा... कभी-कभी उदासी भी कितनी अच्छी लगती है।
एक शे’र अर्ज़ है ..

• लोग हाथ की लकीरें यूं पढा करते हैं,
इनका हर हर्फ़ इन्होंने ही लिखा हो जैसे।

कुश्वंश 8/04/2012 11:42 AM  

अदना सा झोंका ही
भर देता है
प्राणवायु
जीवित रहने के लिए
एक सांस ही
काफी है ,

बहुत सुन्दर, ह्रदयस्पर्शी रचना.

Sadhana Vaid 8/04/2012 11:46 AM  

मुँदी हुई पलकें
आभास देती हों
निष्प्राण देह का
उसमें स्पंदन के लिए
गहन मौन ही
काफी है ...

बहुत ही सुन्दर संगीता जी ! कितनी बड़ी बात कह दी आपने अपनी रचना के माध्यम से ! बहुत ही प्रेरक एवं सार्थक पोस्ट ! साभार !

Bharat Bhushan 8/04/2012 11:51 AM  

बहुत गहन-गंभीर भावों से सजी कविता.

dheerendra 8/04/2012 12:14 PM  

मुँदी हुई पलकें
आभास देती हों
निष्प्राण देह का
उसमें स्पंदन के लिए
गहन मौन ही काफी है ...

गहन भाव लिए सुंदर अभिव्यक्ति,,,,
RECENT POST काव्यान्जलि ...: रक्षा का बंधन,,,,

manukavya 8/04/2012 12:24 PM  

जुगनू का
एक दिया ही
काफी है

जीवित रहने के लिए
एक सांस ही
काफी है ,

वाह !!! बहुत ही सुंदर एवं सारगर्भित रचना....
सादर
मंजु

expression 8/04/2012 12:41 PM  

बहुत सुन्दर रचना ...
सच्ची दी.........कितनी आसानी से इतने नाज़ुक एहसासों को लिख डाला आपने...
बहुत प्यारी पोस्ट.
सादर
अनु

ashish 8/04/2012 1:14 PM  

भावनाओ के ज्वार में शब्दों का बह जाना . ऐसी ही कवित निकलती है ह्रदय से. बहुत सुँदर .

Dr. Madhuri Lata Pandey (इला) 8/04/2012 1:23 PM  

मुँदी हुई पलकें
आभास देती हों
निष्प्राण देह का
उसमें स्पंदन के लिए
गहन मौन ही
काफी है

sach hai..maun ki mukharataa svayamsiddha hai..

Maheshwari kaneri 8/04/2012 1:29 PM  

जीवित रहने के लिए एक सांस ही काफी है , वाह: संगीता जी गागर में सागर..सारगर्भित अभिव्यक्ति..

दिगम्बर नासवा 8/04/2012 2:10 PM  

सच है ... जीवित रहने को एक सांस ही बाकि है ... छोटी छोटी जरूरते होती हैं राहत पाने के लिए ... अपनी अपनी समझ की बात है ... सुन्दर रचना ...

अनामिका की सदायें ...... 8/04/2012 2:12 PM  

भले ही हो
अस्फुट सा स्वर
पर है वो
प्रेमसिक्त
मन में सिंचित
कटुता को
धो डालने के लिए
काफी है ,

jiski chahat/jarurat ho vo maatr boond,jhonka, maun ya asfutit swar me jaise bhi mil jaye to kafi hai. lekin jahan samwad ki jarurat ho vahan maun vyapt ho to sthiti dorooh ho jati hai.

sunder abhivyakti.

रेखा श्रीवास्तव 8/04/2012 3:07 PM  

तम हो घनेरा
और जाना हो
मंज़िल तक
तो जुगनू का
एक दिया ही
काफी है
मंज़िल पाने को .

निराश मन में आशा का संचार करती हुई पंक्तियाँ मंजिल तक पहुँचाने के लिए प्रेरणा बन जायेंगी.

परमजीत सिहँ बाली 8/04/2012 3:14 PM  

बहुत सुन्दर रचना ....

Onkar 8/04/2012 3:22 PM  

वाह, बहुत खूब

Anju (Anu) Chaudhary 8/04/2012 3:35 PM  

इस जीवन के सार को कहती हैं हुई लेखनी

Anita 8/04/2012 3:48 PM  

बहुत सुंदर अहसास जगाती..आशा के दीप जलाती कविता...एक नजर ही काफ़ी है दिल के सारे दर्द हरने के लिये..

प्रवीण पाण्डेय 8/04/2012 4:32 PM  

समझने की सक्षमता हो तो एक शब्द ही पर्याप्त है..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 8/04/2012 4:48 PM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (05-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 8/04/2012 4:48 PM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (05-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

राजेश उत्‍साही 8/04/2012 5:49 PM  

कई बार संतोष बहुत उपयोगी होता है।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 8/04/2012 7:01 PM  

आपका अनुभव इस कविता में झलकता है और यही हम छोटों के लिए मार्गदर्शन है.. गहरे भावों से सजी एक मोटिवेशनल कविता!!
बहुत अच्छे दीदी!!

शिवनाथ कुमार 8/04/2012 7:08 PM  

मुँदी हुई पलकें
आभास देती हों
निष्प्राण देह का
उसमें स्पंदन के लिए
गहन मौन ही
काफी है ...

कितने सुंदर भाव भरे हैं आपने इस रचना में
बार बार पढ़ा, काफी अच्छा लगा .
सादर !

काजल कुमार Kajal Kumar 8/04/2012 8:51 PM  

मंज़िल तक
तो जुगनू का
एक दिया ही
काफी है
मंज़िल पाने को

बहुत सुंदर

kshama 8/04/2012 10:04 PM  

aapke khayalaat bhee kaafee pragalbh hai!

Reena Maurya 8/04/2012 11:40 PM  

सुन्दर भाव लिए बेहतरीन अभिव्यक्ति...
:-)

संध्या शर्मा 8/05/2012 12:06 AM  

जीवित रहने के लिए
एक सांस ही
काफी है ,
सुन्दर गहन भाव... आभार आपका

veerubhai 8/05/2012 7:50 AM  

भले ही हो
अस्फुट सा स्वर
पर है वो
प्रेमसिक्त
मन में सिंचित
कटुता को
धो डालने के लिए
काफी है ,हाँ सकारात्मक सोच बहा देती है प्रेम की गंगा ,मिटा देती है मनका कलुष ....
ram ram bhai
रविवार, 5 अगस्त 2012
आपके श्वसन सम्बन्धी स्वास्थ्य का भी समाधान है काइरोप्रेक्टिक (चिकित्सा व्यवस्था )में
आपके श्वसन सम्बन्धी स्वास्थ्य का भी समाधान है काइरोप्रेक्टिक (चिकित्सा व्यवस्था )में
कृपया यहाँ पधारें -http://veerubhai1947.blogspot.de/

डॉ॰ मोनिका शर्मा 8/05/2012 8:51 AM  

उत्कृष्ट भाव संयोजन लिए गहन अभिव्यक्ति....

India Darpan 8/05/2012 10:01 AM  

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।

रचना दीक्षित 8/05/2012 10:27 AM  

सच कहा एक छोटी पहल ही काफी है...

अनुभूतियों और भावनाओं का सुंदर समवेश इस खूबसूरत प्रस्तुति में.

Sanju 8/05/2012 1:15 PM  

Very nice post.....
Aabhar!
Mere blog pr padhare.

Sanju 8/05/2012 1:18 PM  

Very nice post.....
Aabhar!
Mere blog pr padhare.

Dr Varsha Singh 8/05/2012 1:43 PM  

NICE ONE....

HAPPY FRIENDSHIP DAY....!!!!!!!

जितेन्द्र माथुर 8/05/2012 1:52 PM  

बिल्कुल ठीक कहा आपने। इस बात को सदा याद रखने की कोशिश करूंगा।

साभार,

जितेन्द्र माथुर

जितेन्द्र माथुर 8/05/2012 1:52 PM  

बिल्कुल ठीक कहा आपने। इस बात को सदा याद रखने की कोशिश करूंगा।

साभार,

जितेन्द्र माथुर

ऋता शेखर मधु 8/05/2012 4:47 PM  

तम हो घनेरा
और जाना हो
मंज़िल तक
तो जुगनू का
एक दिया ही
काफी है

डूबने वाले को तिनके का एक सहारा ही काफी है...
गहन सार्थक रचना !!

India Darpan 8/05/2012 6:10 PM  

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई

इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।

India Darpan 8/05/2012 6:10 PM  

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई

इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।

India Darpan 8/05/2012 6:11 PM  

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई

इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।

अनुपमा पाठक 8/05/2012 9:33 PM  

सुन्दर भाव!
बीज रूप में समाहित सत्य!

Rakesh Kumar 8/05/2012 10:19 PM  

अस्फुट सा स्वर
पर है वो
प्रेमसिक्त
मन में सिंचित
कटुता को
धो डालने के लिए
काफी है ,

सुन्दर और प्रेरक.
गहन अर्थ समेटे हुए
है आपकी प्रस्तुति.

आभार,संगीता जी.

आशा जोगळेकर 8/06/2012 4:09 AM  

सच एक जुगनू ही काफी है अगर मंजिल की तलाश शिद्दत से की जाये । बहुत सुंदर कविता ।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 8/06/2012 3:01 PM  

बहुत बढ़िया आंटी


सादर

वाणी गीत 8/06/2012 5:25 PM  

कभी -कभी मौन में जो बात होती है , कह देने से नहीं होती !
जीने के लिए एक सांस काफी है ...या साँस का आना जाना ही जीवन है !

देवेन्द्र पाण्डेय 8/06/2012 7:10 PM  

स्पंदन के लिए गहन मौन ही काफी है।..वाह!
..अच्छी लगी यह कविता।

Shanti Garg 8/07/2012 2:10 PM  

बहुत ही बेहतरीन और प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग

जीवन विचार
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Kunwar Kusumesh 8/08/2012 7:33 AM  

ह्रदयस्पर्शी रचना.

डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन' 8/08/2012 6:07 PM  

सूक्ष्म एहसासों की प्रतिष्ठा...

Dr.NISHA MAHARANA 8/09/2012 9:20 AM  

bahut hi gahri abhiwayakti ...

Mahi S 8/10/2012 12:46 AM  

बहुत सुन्दर...

निवेदिता श्रीवास्तव 8/11/2012 4:54 PM  

खूबसूरत प्रस्तुति .......

कविता रावत 8/11/2012 7:31 PM  

अँधेरे में दूर का चिराग भी बहुत बड़ा सहारा होता है ..
बहुत सुन्दर रचना ..

Sriprakash Dimri 8/11/2012 9:31 PM  

तम हो घनेरा
और जाना हो
मंज़िल तक
तो जुगनू का
एक दिया ही
काफी है
आशाओं के जुगनुओं से जगमगाती बेहद सुन्दर रचना ...

Amrita Tanmay 8/12/2012 10:20 AM  

काफी है आपका दिया हौसला .फिर तो मंजिल क़दमों के नीचे ही है .बहुत सुन्दर लगी .

Rajesh Kumari 8/12/2012 8:43 PM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति सकारात्मक सोच लिए हुए बधाई आपको संगीता जी

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी 8/13/2012 10:35 PM  

सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

abhi 8/14/2012 9:03 AM  

जैसा की सलिल चचा ने कहा -
आपका अनुभव इस कविता में झलकता है और यही हम छोटों के लिए मार्गदर्शन है.. गहरे भावों से सजी एक मोटिवेशनल कविता!!
:) :)

Karuna Saxena 8/14/2012 5:54 PM  

मुँदी हुई पलकें
आभास देती हों
निष्प्राण देह का
उसमें स्पंदन के लिए
गहन मौन ही
काफी है...
अत्यंत भावपूर्ण , सुन्दर कविता...
आप बहुत सुन्दर लिखती हैं...

mahendra verma 8/14/2012 8:49 PM  

मुँदी हुई पलकें
आभास देती हों
निष्प्राण देह का
उसमें स्पंदन के लिए
गहन मौन ही
काफी है ...

प्रभावशाली रचना।
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं !

Naveen Mani Tripathi 8/15/2012 5:46 PM  

प्रेमसिक्त
मन में सिंचित
कटुता को
धो डालने के लिए
काफी है ,
prabhavshali rachana ke liye sadar abhar .

sushila 8/15/2012 7:08 PM  

"भले ही हो
अस्फुट सा स्वर
पर है वो
प्रेमसिक्त
मन में सिंचित
कटुता को
धो डालने के लिए
काफी है , "
लाजवाब रचना है संगीता जी। कितने कोमल और गहन भाव और कितना मोहक शब्द-संयोजन ! वाह !

sushila 8/15/2012 7:08 PM  

"भले ही हो
अस्फुट सा स्वर
पर है वो
प्रेमसिक्त
मन में सिंचित
कटुता को
धो डालने के लिए
काफी है , "
लाजवाब रचना है संगीता जी। कितने कोमल और गहन भाव और कितना मोहक शब्द-संयोजन ! वाह !

Onkar 8/15/2012 8:50 PM  

सुन्दर रचना

वृजेश सिंह 8/15/2012 10:12 PM  

नमस्कार संगीता जी, सबसे पहले स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामना। बहुत दिनों बाद आपकी रचना पढ़ी। आपकी टिप्पणियों से हमेशा रूबरू होने का मौका मिलता है। बाकी ब्लॉग पर रचनाओं को पढ़ते हुए। आपके विवेचन की सहजता और सतर्कता काबिल-ए-गौर है।

सूक्ष्म चीजों के गूढ़ महत्व को रेखांकित करती रचना। जो बड़ी-बड़ी चीजों के प्रति मोह के जादुई तिलिस्म को ध्वस्त करती है। कविता जीवन के हर पल में संजीदा होने का भाववोध भी जाग्रत करती है। हर पल आती-जाती सांसो की सूक्ष्मता की उपमा बहुत सुंदर लगी। सुंदर रचना के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।

mridula pradhan 8/17/2012 11:39 AM  

jab likhti hain achcha hi likhti hain......

प्रेम सरोवर 8/17/2012 9:09 PM  

प्रसंशनीय..। मेरी कामना है कि आप अहर्निश सृजनरत रहें । राही मासूम रजा की एक सुंदर कविता पढ़ने के लिए आपका मेरे पोस्ट पर आमंत्रण है ।

Anonymous,  8/18/2012 6:24 AM  

खरगोश का संगीत राग
रागेश्री पर आधारित है जो कि
खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में
कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम
इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें अंत
में पंचम का प्रयोग भी किया है,
जिससे इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.
..

हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.
.. वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से मिलती
है...
Also visit my blog post खरगोश

हरकीरत ' हीर' 8/18/2012 4:24 PM  

सभी ने बहुत कुछ कह दिया ...
हमारी तो बस हाजिरी कबूल करें ....!!

shikha varshney 8/20/2012 9:47 AM  

कितना कम काफी है न जीवन जीने के लिए...मन में प्राण वायू सी भरती कविता..

Dr (Miss) Sharad Singh 8/21/2012 1:54 AM  

बहुत मर्मस्पर्शी रचना..

डा. श्याम गुप्त 8/21/2012 3:25 PM  

उंदर भाव व कविता ..


रफत आलम 8/21/2012 5:02 PM  

तपिश हो मन की
और चाहते हो ठंडक
तो अश्क का
एक कतरा ही
काफी है ....क्या ही सुंदर बात लिखी है .शुक्रिया

Kumar Radharaman 8/23/2012 3:12 PM  

बहुत अच्छी कविता है।

Anonymous,  8/27/2012 3:57 PM  

खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में कोमल निशाद और बाकी
स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित
है, पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी किया है, जिससे इसमें राग बागेश्री भी
झलकता है...

हमारी फिल्म का संगीत
वेद नायेर ने दिया है.
.. वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से
मिलती है...
Here is my site - संगीत

Naveen Mani Tripathi 9/08/2012 8:24 PM  

तपिश हो मन की
और चाहते हो ठंडक
तो अश्क का
एक कतरा ही
काफी है ...
wah kya bat likhi hai apne ....badhai

संजय भास्‍कर 6/09/2014 11:18 AM  

कटुता को
धो डालने के लिए
काफी है....

बहुत ही सुन्दर रचना है

Post a Comment

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है...

आपकी टिप्पणियां नयी उर्जा प्रदान करती हैं...

आभार ...

हमारी वाणी

www.hamarivani.com

About This Blog

आगंतुक


ip address

  © Blogger template Snowy Winter by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP