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बसंत नहीं आता

>> Monday, February 18, 2013





मेरे इस शहर में 
बसंत नहीं आता , 
न गमकती 
बयार चलती है 
और न ही 
महकते फूल 
खिलते हैं 


कंकरीट  के उद्यानों से
छनती हुई 
विषैली हवा 
घोट  देती है दम
हर शख्स  का । 
मेरे इस शहर में
बसंत नहीं आता ...


एक खौफ है जो 
घेरे रहता है मन को 
कब  , कहाँ कोई भेड़िया 
दबोच लेगा 
अपने शिकार को 
और वह तोड़ देता है दम 
निरीह भेड़ सा बना 
मेरे इस शहर में 
बसंत नहीं आता । 


अट्टालिकाओं से 
निकले कचरे में
फटेहाल  बच्चे 
बीनते हुये कुछ 
 शमन करते हैं 
अपनी भूख का 
और यह दृश्य 
निकाल देता  है दम
हमारी संवेदनाओं का 
मेरे इस शहर में 
बसंत नहीं आता ।



गाँव की गंध छोड़ 
जो आ बसे शहरों में
दिहाड़ी के चक्र में 
घूमती है ज़िंदगी 
सपने जो लाया था साथ अपने 
निकल जाता है उनका दम
रह जाती है तो 
बस एक  हताशा 
मेरे इस शहर में 
बसंत नहीं आता ।

92 comments:

Anupama Tripathi 2/18/2013 3:46 PM  

व्यथा व्यक्त करती ....मार्मिक अभिव्यक्ति ....कुछ कह नहीं पा रही हूँ ....बस एक अजीब से मौन ने घेर लिया है ...!!
प्रेरित कर रही है आपकी रचना उन लोगों के लिए कुछ करने की जो वाकई बसंत से दूर हैं ....!!

Anita 2/18/2013 3:48 PM  

महानगरीय जीवन की कटुताओं को व्यक्त करती एक सशक्त मार्मिक कविता..वसंत लेकिन फिर भी कहीं न कहीं अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही देता है.

रश्मि प्रभा... 2/18/2013 3:49 PM  

फूल खिल भी जाएँ तो क्या है, वह बसंत नहीं होता
वह तो खुली हवा में लहराता है .....

कितने सारे दर्द हैं पतझड़ से
बसंत लौट गया रस्ते से

Shalini Rastogi 2/18/2013 3:50 PM  

जिंदगी कि तल्ख़ सच्चाइयों से रु-ब-रु कराती बेहद प्रभावपूर्ण रचना !

Vikesh Badola 2/18/2013 4:04 PM  

शहर कंक्रीट, बसंत अनुपस्थित

जीव-जगत है ये या समय-शापित

mukti 2/18/2013 4:06 PM  

आपने जैसे मेरे ही दिल की बात कह दी हो. मैं छोटे हरे-भरे शहरों में पली-बढ़ी हूँ. जबसे दिल्ली आयी हूँ, मौसमों का पता सिर्फ हवाओं के तापमान से चलता है. न चिड़ियों की आवाज़ से, न फूलों से, न पेड़ों से.
और अक्सर ये भी सोचती हूँ कि दिहाड़ी मजदूरों के लिए मौसम का क्या मतलब है? उसे तो रोज़ काम पर निकलना ही होता है. उसे नहीं लगता कि 'मौसम आज कितना अच्छा है, चलो काम से छुट्टी लेकर घूम आयें'

सदा 2/18/2013 4:08 PM  

मेरे इस शहर में
बसंत नहीं आता ।
बिल्‍कुल सच कहा ... आपने

Rajendra Kumar 2/18/2013 4:16 PM  

आपकी लेखनम सत्यता झलकती है,महानगरीय जीवन की व्यथा की मार्मिक प्रस्तुति.

yashoda agrawal 2/18/2013 4:38 PM  

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 20/02/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

ताऊ रामपुरिया 2/18/2013 4:58 PM  

सही कहा आपने, इस महानगरीय जिंदगी में कहां से बसंत आयेगा? यहां तो बसंत महसूस करने की नही पढने की चीज हो गई है.

रामराम.

shikha varshney 2/18/2013 5:03 PM  

वाकई आपके उस शहर में अब चलने से भी डर लगता है.जाहिर है ऋतुएं भी घबराती ही होंगी.
एकदम सटीक चित्र खींचा है दी! व्यथा ने सार्थक शब्द लिए हैं.

Aditi Poonam 2/18/2013 5:07 PM  

बसंत की यही व्यथा है
कंक्रीट के जंगल फैले
आये बसंत फिर कैसे
आधुनिक जीवन की सच्चाई
बयान करती रचना............

Anita (अनिता) 2/18/2013 5:11 PM  

कटु सत्य! बड़े शहरों में प्रकृति व इंसानियत के घुटते हुए दम का मार्मिक दृश्य....
~सादर!!!

रविकर 2/18/2013 5:20 PM  

उफ़--

मार्मिक

सटीक कथ्य-

झकझोरती रचना -

Suman 2/18/2013 5:27 PM  

सच कहा है शहर में कहाँ होता है बसंत का आगमन ?
अब तो सब कुछ शब्दों में सिमट कर रह गया है कई बार बसंत के गीतों पर कविताओं पर टिपण्णी करने में भी शर्म महसूस होती है !आपकी रचनाएँ हमेशा सत्य के आस पास होती है इस नाते यह रचना भी सटीक लगी !

आनंद कुमार द्विवेदी 2/18/2013 5:31 PM  

ओह दीदी ... सच में बड़ी शिद्दत से इस पीड़ा को महसूस करता हूँ ...कहाँ से आये बसंत ... पृकृति से कितना दूर हो गए हैं !

संध्या शर्मा 2/18/2013 6:08 PM  

बिलकुल सही कहा है आपने शहरों में बसंत कभी नहीं आता, इसका तो सिर्फ पतझर से नाता है...मार्मिक अभिव्यक्ति... आभार

काजल कुमार Kajal Kumar 2/18/2013 7:58 PM  

वाकई अब बसंत नहीं आता :(

Yashwant Mathur 2/18/2013 7:58 PM  

अट्टालिकाओं से
निकले कचरे में
फटेहाल बच्चे
बीनते हुये कुछ
शमन करते हैं
अपनी भूख का
और यह दृश्य
निकाल देता है दम
हमारी संवेदनाओं का
मेरे इस शहर में
बसंत नहीं आता ।

बिलकुल सच लिखा है आंटी !

सादर

Ramakant Singh 2/18/2013 8:53 PM  

गाँव की गंध छोड़
जो आ बसे शहरों में
दिहाड़ी के चक्र में
घूमती है ज़िंदगी
सपने जो लाया था साथ अपने
निकल जाता है उनका दम
रह जाती है तो
बस एक हताशा
मेरे इस शहर में
बसंत नहीं आता ।

आम आदमी की व्यथा कथा को व्यक्त करती मन को आंदोलित करती रचना अद्भुत भावों का सम्प्रेषण

कुश्वंश 2/18/2013 9:43 PM  

परिवेश को सजीव करती रचना .वास्तव में बसंत क्यों नहीं आता ... वास्तविक लगा बधाई

सतीश सक्सेना 2/18/2013 10:12 PM  

वाकई शहर में वसंत नहीं आता ...
बहुत खूब !

डॉ. जेन्नी शबनम 2/18/2013 10:50 PM  

शहर की आवोहवा ऐसी है कि सच में शहर में कब वसंत आता पता भी न चलता. बहुत सुन्दर रचना, बधाई.

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 2/18/2013 10:51 PM  

बसंत का बस अंत हो गया........

डॉ. मोनिका शर्मा 2/18/2013 11:16 PM  

आज के परिवेश का मार्मिक रेखांकन..... बसंत तो रूठेगा ही....

बेईमान शायर 2/18/2013 11:28 PM  

Satya se sakshatkaar karati atyant prabhawshaaai rachna.

expression 2/18/2013 11:30 PM  

शहर का वसंत घबराया हुआ है.....सोच रहा है कहीं गाँव से भी आबोदाना न उठ जाए...

बहुत बढ़िया भाव ...

सादर
अनु

प्रतिभा सक्सेना 2/18/2013 11:31 PM  

संगीता जी,दुखती रग पर हाथ रख दिया आपने.और सबसे अजीब बात यह है कि शहरों से तो निष्कासित है ही ,गाँवों का वसंत भी सिमटा-सकुचा रहता है खुल कर हँस नहीं पाता!

devendra gautam 2/19/2013 12:38 AM  

प्रकृति से दूर कृत्रिम माहौल में वसंत आये भी तो कैसे....वर्तमान महानगरीय जीवन का बहुत ही सजीव चित्रण किया है आपने....बधाई !

Udan Tashtari 2/19/2013 8:03 AM  

जबरदस्त.....क्या बात है!!

DINESH PAREEK 2/19/2013 10:14 AM  

मार्मिक रचना आपकी उम्दा प्रस्तुती
मेरी नई रचना
प्रेमविरह
एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

निहार रंजन 2/19/2013 10:26 AM  

बहुत जोरदारअभिव्यक्ति है. सचमुच बहुत दुःख है.

Sadhana Vaid 2/19/2013 10:31 AM  

समाज में व्याप्त वैषम्य को बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति दी है संगीता जी ! आज जैसे हालात हैं सचमुच वसंत भी खिलने पर शर्मिन्दा ही होगा ! !

Saras 2/19/2013 11:24 AM  

ज़िन्दगी की त्रासदियों से नज़र हटे तो वसंत पर पड़े ...वाकई ...ऐसे में वसंत कैसे आ सकता है ....!

प्रवीण पाण्डेय 2/19/2013 1:38 PM  

इस विकास में क्या कर बैठे,
अपना सुख स्वाहा कर बैठे।

दिगम्बर नासवा 2/19/2013 2:03 PM  

दर्द को लिखा है उनके जीवन का जहाँ बसंत दस्तक नहीं देता ... महानगरीय जीवन की यंत्रणा भोगता सच .... वास्तविक चित्रण है रचना में सजीव ...

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 2/19/2013 2:04 PM  

बहुत सुंदर सशक्त सजीव करती लाजबाब अभिव्यक्ति

Recent Post दिन हौले-हौले ढलता है,

गिरधारी खंकरियाल 2/19/2013 4:40 PM  

यह शहर भी शापित,जीवन भी शापित।

vandana gupta 2/19/2013 5:08 PM  

कटु यथार्थ को व्यक्त करती सार्थक अभिव्यक्ति।

Pratibha Verma 2/19/2013 10:42 PM  

बहुत उम्दा प्रस्तुति ...

दिनेश पारीक 2/20/2013 9:51 AM  

http://dineshpareek19.blogspot.in/2013/02/blog-post_19.html

दिनेश पारीक 2/20/2013 9:53 AM  

वहा वहा क्या बात है क्या लिखा है आपने


मेरी नई रचना

प्रेमविरह

एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

Dr (Miss) Sharad Singh 2/20/2013 11:40 AM  

हमारी संवेदनाओं का
मेरे इस शहर में
बसंत नहीं आता ।

यथार्थपरक रचना....

Dr. sandhya tiwari 2/20/2013 12:43 PM  

कटु यथार्थ......... शहर की आवोहवा में
बसंत आये भी तो कैसे..........

mridula pradhan 2/20/2013 2:06 PM  

badi dukhad paristhti hai......sachchayee ko liye hue.....

Aditi Poonam 2/20/2013 3:49 PM  

अव्यक्त व्यथा जो बसंत
ने अभिव्यक्त कर दी है




रेखा श्रीवास्तव 2/20/2013 4:19 PM  

यथार्थ को बयां करती हुई बसंती रचना ने हमें आइना दिखा दिया क्योंकि हम भी तो उसके शिकार है।

कविता रावत 2/20/2013 5:41 PM  

सच शहर में बसंत कहने भर को रह गया है ..... जब मन में ख़ुशी हो उमंग तरंग हो तभी तक बसंत है।।
बहुत बढ़िया सार्थक चिंतन से भरी यथार्थ रचना ...आभार

रचना दीक्षित 2/20/2013 7:47 PM  

महानगरीय विकास का सजीव चित्रण है यह कविता.

Akhil 2/20/2013 7:58 PM  

शहरी जीवन का मार्मिक चित्रण ...आपका लेखन सदैव प्रेरणा देता है ..

मनोज कुमार 2/20/2013 9:00 PM  

कंक्रीट का जंगल हो गया है शहर यह, यहां बसंत क्या खाक आयेगा?

शिवनाथ कुमार 2/20/2013 9:26 PM  

बसंत तो ख़ुशी का पर्याय है
पर आज के दौड़ में इस ख़ुशी को ग्रहण लगा है

बहुत ही अच्छा लगा पढ़कर
सादर !

दीर्घतमा 2/21/2013 8:51 AM  

bikhare motiyo ko chunkar ikattha kiya , bahut sundar.

आशा जोगळेकर 2/21/2013 12:40 PM  

साझी भावाभिव्यक्ति पर वसंत आयेगा हमें कोशिश जारी रखना चाहिये । हम यदि कूडा करकट सार्वजनिक स्थलों में,घर से बाहर कहीं भी ना फेकें । तो कूडा बीनने का काम ना रहेगा ।

RAHUL- DIL SE........ 2/21/2013 6:03 PM  

एकदम सटीक ..

Udan Tashtari 2/22/2013 8:14 AM  

सटीक रचनायें..

Amrita Tanmay 2/22/2013 8:41 AM  

संवेदनाओं को तार-तार करता हुआ बसंत..अत्यंत प्रभावी रचना..

Virendra Kumar Sharma 2/22/2013 12:49 PM  

मेरे इस शहर में कहर आता है ,स्वप्न देखे कोई .देखता आये कोई .अस्मत लुटाये ,जान से जाए कोई ,....शहर में न आये अब कोई ....मार्मिक प्रसंग छेड़ ती रचना ,शहर कितना निस्संग है संगदिल है फिर भी पलायन ज़ारी है शहर की ओर ....

Virendra Kumar Sharma 2/23/2013 3:58 PM  

शहरी जीवन के अनिश्चय और बे -दिली ,लेदे के खुद से ज़िंदा रहने की शर्त पूरी करवाता जीवन .बढ़िया चित्रण और बिम्ब हैं रचना में .

sushila 2/23/2013 7:39 PM  

shahar ka yathaarth chitran man ko gaanv ki or le jata hai
Umda abhivyakti!

sushila 2/23/2013 7:39 PM  

shahar ka yathaarth chitran man ko gaanv ki or le jata hai
Umda abhivyakti!

उड़ता पंछी 2/25/2013 5:11 PM  

वाकई शहर में वसंत नहीं आता ...
बहुत खूब !

Shikha Gupta 2/28/2013 9:58 PM  

सामाजिक सरोकार से विषय .....आधुनिक शहरी जीवन की त्रासदी .....दम तोडती संवेदनाएं ....वाह भी कहूँ तो कैसे !
मैं अपने ब्लॉग का पता छोड़ रही हूँ ....समय निकाल कर अवश्य देखें .....मुझे join करेगीं तो बेहद ख़ुशी होगी
मेरी यह रचना शायद आपको पसंद आये ...
क्या होता है सच

pankhuri goel 3/01/2013 1:13 PM  

bahut marmik rachna ...utni hi sundar prastuti ...mere blog par bhi aapka swagat hai .. aapke aashirvaad se bahut kuch seekhne ko milega

ek najar idhar bhi :-) Os ki boond: खट्टे सवाल मीठे जवाब ....

Sarika Mukesh 3/01/2013 8:50 PM  

महानगरीय जीवन के दर्द को दर्शाती बहुत अच्छी कविता...पर बसंत का अंत तो अब न केवल शहर बल्कि गाँव में भी हो चला है..अब सब कुछ बदल गया है दीदी...गाँव में भी शहर प्रवेश कर चुका है...
कितने सारे दर्द हैं पतझड़ से
बसंत लौट गया हर जगह से रस्ते से....

Onkar 3/02/2013 5:18 PM  

शहर की वास्तविकता का सुन्दर चित्रण

Shikha Gupta 3/04/2013 2:03 PM  

मेरा ब्लॉग अपनाने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया .....
कृपया मेरी अगली रचना पर भी एक नजर डालें
http://shikhagupta83.blogspot.in/2013/03/blog-post.html#comment-form

Udan Tashtari 3/07/2013 5:26 PM  

बहुत भावपूर्ण!!

Ramaajay Sharma 3/08/2013 7:50 PM  

बहुत सुंदर

रचना दीक्षित 3/10/2013 11:10 AM  

महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ.

mark rai 3/10/2013 7:45 PM  

सुंदर अभिव्यक्ति....

शोभना चौरे 3/21/2013 1:36 PM  

बहुत व्यथा समेट ली है संगीता जी ।

avanti singh 3/21/2013 5:10 PM  

बेहतरीन पोस्ट .....

Rajesh Kumari 3/21/2013 5:17 PM  

बहुत सुंदर, मार्मिक प्रस्तुति वाह! देर से पढने के लिए क्षमा होली की अग्रिम बधाईयां

राजेश उत्‍साही 3/22/2013 11:06 AM  

बसंत आता है तो पर इन सब विडम्‍बनाओं को देखकर दुखी होकर लौट जाता है....

Dr.NISHA MAHARANA 3/22/2013 4:00 PM  

marmik abhiwayakti sangeeta ee ....

कविता रावत 3/23/2013 11:20 AM  

बहुत मार्मिक प्रस्तुति

Naveen Mani Tripathi 3/25/2013 7:44 PM  

छनती हुई
विषैली हवा
घोट देती है दम
हर शख्स का ।
मेरे इस शहर में
बसंत नहीं आता ..

bahut sundar .....holi pr hardik badhai bhi sweekaren .

Rahul Paliwal 3/25/2013 11:23 PM  

What to do? We need to bring CHANGE now. 2014 should be the year of Change.

मेरा साहित्य 3/26/2013 4:01 AM  

सपने जो लाया था साथ अपने
निकल जाता है उनका दम
रह जाती है तो
बस एक हताशा
मेरे इस शहर में
बसंत नहीं आता ।

bahut sunder aur marmik prantu sach
rachana

Kailash Sharma 3/28/2013 7:26 PM  

महानगरों का दर्द चित्रित करती बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

Swapnil Jewels 3/29/2013 8:29 PM  

Awesome post ...thanks for sharing ..kudos !!!!

do visit :
http://swapnilsaundarya.blogspot.in/2013/03/a-cup-of-tea-with-divya.html

हरकीरत ' हीर' 3/30/2013 11:33 AM  

हूँ ...........देखना पड़ेगा आपका शहर ....:))

शरद 4/02/2013 12:39 AM  

गैर साहित्यिक हूँ...दिल से निकल रहा है कि... विषय के अंतस्थल में उतर कर उसके नि:शेष सत्य को निचोड़ डालने वाला अप्रियतम शब्द-लाघव..हृदयस्पर्शी व्यंजना...

surendrshuklabhramar5 4/03/2013 12:28 AM  

बढ़िया चित्रण हैं रचना में

Brijesh Singh 4/03/2013 6:38 PM  

शहर में तो बस पतझड़ और मलमास बसा है। बसंत कहां। बहुत सुन्दरता से आपने हकीकत को बेनकाब किया है। आपका बधाई।
आपका मार्गदर्शन चाहूंगा अपनी इस रचना पर
http://voice-brijesh.blogspot.in/2013/04/blog-post.html

Madhuresh 4/11/2013 4:57 AM  

स्थिति ऐसी हो गयी है कि अब वास्तव में किसी शहर में वसंत नहीं आता। बेहतरीन अभिव्यक्ति।
सादर
मधुरेश

Surendra Bansal 4/11/2013 8:20 PM  

http://surendra-bansal.blogspot.in/

Tanuj arora 4/15/2013 5:38 PM  

sheeshe ke khawaablye aate h sheher mein par hakikat ka ek pathhar kabhi in khawabon ko yun hi tod jata hai....

निर्झर'नीर 5/07/2013 2:20 PM  

बेहतरीन अभिव्यक्ति।

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