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ठंडी औरत

>> Wednesday, April 3, 2013




प्रेम में पगी
हिरनी सी आँखें ,
ठिठक जाती हैं 
देख कर ,
उसकी आँखों में 
एक हिंसक पशु , 
वासना की देहरी पर ,
दम तोड़ देती है 
उसकी चाहत  ,
आभास होते ही 
हकीकत का,
जुटाती है 
भर पूर  शक्ति ,
लेकिन काली 
बनते बनते भी ,
रह जाती है ,
मात्र एक 
ठंडी औरत । 





70 comments:

vandana gupta 4/03/2013 5:00 PM  

बहुत गहरी बात कह दी।

संध्या शर्मा 4/03/2013 5:13 PM  

काश थोड़ी हिम्मत और जुटा पाती... गहन भाव ...आभार

Aruna Kapoor 4/03/2013 5:31 PM  

...kam shabdon mein aapne bahut kuchh kah dala sangeeta ji!..man mein kaI tarah ki bhavnaen umad rahi hai!...aabhaar!

yashoda agrawal 4/03/2013 6:04 PM  

दीदी
अंतस की बात
बाकी है कहना अभी
पर.....
सादर

महेन्द्र श्रीवास्तव 4/03/2013 6:14 PM  

अच्छी रचना
बहुत सुंदर

yashoda agrawal 4/03/2013 6:18 PM  

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 06/04/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

ashish 4/03/2013 6:33 PM  

बहुत सुन्दर .

Brijesh Singh 4/03/2013 6:34 PM  

बहुत सही और गहरी बात कही आपने। बहुत सुन्दर रचना।

shikha varshney 4/03/2013 6:47 PM  

शायद पूरी शक्ति नहीं जुटाई उसने. जिस दिन ठान लेगी काली बनना उस दिन बनकर ही रहेगी.
गज़ब की कविता है दी !! कमाल ..

कविता रावत 4/03/2013 7:02 PM  

एक औरत के अन्दर जाने कितने दर्द छुपे रहते हैं ..
बहुत बढ़िया रचना..

expression 4/03/2013 7:37 PM  

प्रेम की ऊष्मा जो नहीं थी....

गहन भाव...
सादर
अनु

रश्मि प्रभा... 4/03/2013 7:53 PM  

इस ठंडी औरत की मनोदशा आग सी होती है .... जब विस्फोट हो

रजनीश तिवारी 4/03/2013 9:08 PM  

बहुत सुंदर ..भावपूर्ण रचना ...

प्रतिभा सक्सेना 4/03/2013 9:54 PM  

राख में दबी चिन्गारियाँ हवा लगते ही वातावरण में छा जाती हैं!

सतीश सक्सेना 4/03/2013 10:24 PM  

कामयाब अभिव्यक्ति....

Sadhana Vaid 4/03/2013 11:28 PM  

बस यही तो विडम्बना है कि निर्णय अनिर्णय के दोराहे पर खड़ी रह कर ही एक आम स्त्री अपना जीवन गुज़ार देती है ! जब मन को मजबूत बना कर निर्णय लेने की ज़रूरत होती है उसका आत्मविश्वास हिल जाता है ! बहुत संवेदनशील रचना है संगीता जी ! बधाई स्वीकार करें !

devendra gautam 4/03/2013 11:33 PM  

एक शेर अर्ज किया है....

सख्त था बाहर की दुनिया का सफर
घर की चौखट लांघना आसान था.

बाहर की सख्त दुनिया में अपना वजूद बनाने के लिये औरत को चंडी बनना होगा. वैसे आपकी कविता ज़मीनी हक़ीकत बयान कर रही है.

डॉ. मोनिका शर्मा 4/03/2013 11:57 PM  

बहुत कुछ है जो रोकता है वो रूप धरने से.... गहन अभिव्यक्ति

वाणी गीत 4/04/2013 6:29 AM  

स्त्री चलती है दोधारी तलवार पर , पुरुष सोचता है , वह वाही है क्या !!

Suman 4/04/2013 6:56 AM  

सही कहा है ...सार्थक रचना !

Anupama Tripathi 4/04/2013 7:52 AM  

ज्वाला आवश्यक है जीवन में ....ज्योति जैसी जो तम से लड़ सके .....अन्यथा बर्फ सी ठंडक से संवेदनाएं मर ही जाती हैं ...
गहन अभिव्यक्ति .....दी ...!!

रविकर 4/04/2013 9:42 AM  

बहुत बढ़िया-
शुभकामनायें स्वीकारें-

Anita 4/04/2013 10:02 AM  

बेबसी की अजीब दास्तान...मार्मिक कविता..

सदा 4/04/2013 10:14 AM  

आपकी सोच और लेखनी को सादर नमन ...
सादर

Ashok Saluja 4/04/2013 10:55 AM  

इस बेबसी को ही तोड़ना होगा ....
शुभकामनायें!

Rajendra Kumar 4/04/2013 1:03 PM  

गहन भाव लिए बहुत ही सशक्त रचना,आभार आदरेया.

Sonal Rastogi 4/04/2013 1:03 PM  

pida ko khoobsurat shabd diye hai

मनोज कुमार 4/04/2013 3:14 PM  

akrosh ka yah bhi ek roop hai...

दिगम्बर नासवा 4/04/2013 3:15 PM  

नारी मन की परतों को खोला है आपने ... मार्मिक अभिव्यक्ति ... सभी कुछ खामोश रह कर ही सहती है नारी ...

Saras 4/04/2013 4:30 PM  

प्यार में डूबी औरत का यही हश्र होता है

Vikesh Badola 4/04/2013 5:02 PM  

भावातिरेक से पूर्ण कविता।

राजेश उत्‍साही 4/04/2013 5:17 PM  

लेकिन उसका यह ठंडापन ही उसे एक दिन काली बनने के लिए विवश कर देता है...

कुशवंश 4/04/2013 5:18 PM  

मार्मिक अभिव्यक्ति

डॉ. जेन्नी शबनम 4/04/2013 6:07 PM  

हर औरत अंततः बन ही जाती है अशक्त ठंडी औरत, भले हौसला रहा हो कभी बनाने का काली दुर्गा. भावप्रवाण रचना, बधाई.

Ramakant Singh 4/04/2013 8:06 PM  

आभास होते ही
हकीकत का,
जुटाती है
भर पूर शक्ति ,
लेकिन काली
बनते बनते भी ,
रह जाती है ,
मात्र एक
ठंडी औरत ।

एक त्रासदी की जीती बेबस औरत

Maheshwari kaneri 4/04/2013 8:14 PM  

गहन भाव लिए बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

शोभना चौरे 4/04/2013 8:41 PM  

एक चिंगारी दबी हुई है ।
बहुत बढ़िया ।

Dr. sandhya tiwari 4/04/2013 8:48 PM  

नारी मन की गहरी बात कही आपने। बहुत सुन्दर रचना।

Amrita Tanmay 4/05/2013 9:49 AM  


हाँ! एक ठंडा सच..

shashi purwar 4/05/2013 11:26 AM  

behad sarthak post ..........samaj ka kala dhuaa sab jagah bikhra hua hai ...... badhai sundar rachna ke liye

Rajesh Kumari 4/05/2013 10:27 PM  

किन्तु आज की नारी की आँखों के शोले अब ठन्डे नहीं होंगे बदलाव आ रहा है संगीता जी मन में बहुत से सवाल खड़े करती है ये रचना गहन अनुभूति हार्दिक बधाई आपको

Aditya Tikku 4/06/2013 1:04 PM  

shabdo ka sahi priyog va sahi matra mai - aap se sikhna chauga

प्रवीण पाण्डेय 4/06/2013 3:39 PM  

मन की बातें अधिकार और हिंसा से कहाँ समझी जा सकती हैं।

काजल कुमार Kajal Kumar 4/06/2013 4:33 PM  

प्रेम की शायद अपनी सीमाएं हैं

Onkar 4/06/2013 5:03 PM  

एक औरत की टीस

Mamta Bajpai 4/06/2013 8:52 PM  

बात सीधी मन तक पहुची ...शब्दों में ढाल दिया आपने दर्द को ...बहुत ही उम्दा लिखा है जितनी तारीफ करूँ कम है

जयकृष्ण राय तुषार 4/06/2013 8:57 PM  


प्रेम में पगी
हिरनी सी आँखें ,
ठिठक जाती हैं
देख कर ,
उसकी आँखों में
एक हिंसक पशु ,
बहुत ही उम्दा कविता |आभार आपका |

Kalipad "Prasad" 4/06/2013 9:49 PM  

बाहर से बुझी राख पर अन्दर से धधकती आग ...जब भभक उठती .......काली बन जाती है
LATEST POST सुहाने सपने
my post कोल्हू के बैल

रचना दीक्षित 4/07/2013 12:23 PM  

बहुत ही गंभीर भाव इतनी आसानी से. आपका जवाब नहीं संगीता दी.

VIJAY SHINDE 4/09/2013 7:16 PM  

विचारों में औरतों के लिए निराशा हो सकती है पर केवल ऊपरी तौर पर। कवि का मूल मतलब है कि औरतों के आत्मा को झंझोडा जाए। कविता के शद्बों में स्वरूप जी आप इस उद्देश्य को छूने में सफल हो गई है।
drvtshinde.biogspot.com

Kailash Sharma 4/09/2013 7:56 PM  

बहुत गहन और सटीक अभियक्ति...

रेखा श्रीवास्तव 4/10/2013 4:48 PM  

नारी मन की गहन अनुभूति को शब्दों में ढाल कर बहुत कुछ कह दिया है. आभार !

Madhuresh 4/11/2013 4:55 AM  

सटीक चित्रांकन मनोभावों का। पॉवर-पैक्ड रचना।
सादर
मधुरेश

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" 4/11/2013 2:59 PM  

सम्बेद्नाओं को जगाने वाली समर्थ रचना ...बहुत दिनों बाद आज ब्लॉग के लिए समय मिला..सार प्रणाम के साथ

VIJAY KUMAR VERMA 4/11/2013 6:56 PM  

बहुत ही उम्दा कविता

jyoti khare 4/11/2013 8:49 PM  

नवसंवत्सर की शुभकामनायें
आपको आपके परिवार को हिन्दू नववर्ष
की मंगल कामनायें

Virendra Kumar Sharma 4/12/2013 10:47 AM  

निर्दोष पुष्प के रौंदे जाने का निर्दोष सजीव शब्द चित्र .

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 4/13/2013 9:47 AM  

छटपटाहट के शब्दों को हिंसा कहाँ समझ पाती है. सटीक रचना.

तुषार राज रस्तोगी 4/14/2013 4:43 PM  

लाजवाब ! सुन्दर पोस्ट लिखी आपने | पढ़ने पर आनंद की अनुभूति हुई | आभार |

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page

Tanuj arora 4/14/2013 8:03 PM  

bahut sahi likha aapne "kaali bante bante bhi reh jaatihai ek thandi aurat"

Tanuj arora 4/14/2013 8:03 PM  

bahut sahi likha aapne "kaali bante bante bhi reh jaatihai ek thandi aurat"

Anil Dayama 'Ekla' 4/16/2013 6:56 AM  

अंतिम के एक एक शब्द मन में टीश पहुंचाते हैं।

(आप मेरे ब्लॉग तक आये इसका बहुत बहुत आभार।)

Anonymous,  4/16/2013 10:09 PM  

लेकिन काली
बनते बनते भी ,
रह जाती है ,
मात्र एक
ठंडी औरत ..


यही तो विडंबना है .... सशक्त रचना ....
manju
www.manukavya.wordpress.com

Anju (Anu) Chaudhary 4/26/2013 4:48 PM  

गहन अर्थ लिए हुए लेखनी

prritiy----sneh 6/02/2013 7:35 PM  

rishte ko bachane ke aas sab kuchh sehne par majbur kar deti hai yahan tak atmsamman ki chita bhi...

bahut hi achhi rachna

shubhkamnayen

JAI HIND 10/30/2013 1:57 PM  

nari ke man ki vyatha aapne ek kavita ke madhyam se bade hi marmik dhang se kha dali.......jai-Hind

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