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खिड़कियाँ

>> Wednesday, September 4, 2013



ये खुलती और  बंद
होती खिड़कियाँ 
उन पर टंगी 
दो आँखें 
फैलाती हैं 
कितना प्रवाद 
कुछ तर्क 
कुछ कुतर्क 
कर देती हैं 
पास के घरों का 
चीरहरण 
ये खुलती और बंद 
होती खिड़कियाँ , 

नहीं खोलते हम 
मन की खिड़कियाँ 
सारी कुंठाओं से ग्रस्त 
रहते हैं मन ही मन त्रस्त
नहीं करते परिमार्जन 
चलते रहते हैं 
पुरानी लीक पर 
परम्पराओं के नाम 
संस्कारों के नाम 
और धकेल देते हैं 
स्वयं को बंद 
खिड़कियों के पीछे .


59 comments:

अनुपमा पाठक 9/04/2013 11:30 AM  

मन की खिड़कियाँ खुलें तो नवप्रभात हो!

अभिषेक कुमार झा अभी 9/04/2013 11:39 AM  

वाह आदरणीय ''गीत'' जी,
कमाल के शब्द संजोये हैं, और क्या उम्दा सोच है।
''मन के खिड़की, खोल प्यारे
मन के खिड़की, तू खोल,
ये जीवन अनमोल है प्यारे,
ये जीवन अनमोल।…….

Surendra Singh bhamboo 9/04/2013 11:42 AM  

बहुत ही अच्छी कविता हैं
http://www.sbhamboo.blogspot.in/

expression 9/04/2013 11:50 AM  

नेह की हवा चले तो टूटें सांकलें....खुलें खिड़कियाँ....

सुन्दर अभिव्यक्ति...

सादर
अनु

रविकर 9/04/2013 11:56 AM  

सुन्दर प्रस्तुति-
आभार आदरेया-

पर यहाँ तो-

मन की खिड़की पर जमी, दर्द-गर्द की पर्त |
अभिलाषाएं थोपती, अजब गजब सी शर्त ||

संगीता स्वरुप ( गीत ) 9/04/2013 12:05 PM  

रविकर जी ,

जब खुलेंगी खिड़कियाँ तो
गर्द भी झड़ जाएगी
अभिलाषाएं फूल बन
शायद महक जाएंगी ।

रविकर 9/04/2013 12:08 PM  

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

राजेंद्र कुमार 9/04/2013 12:12 PM  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (05-09-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 107" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

Anita 9/04/2013 12:15 PM  

मन की खिड़की खुले तो ताज़ा हवा लाए भीतर
बासीपन खो जाये और हँसे फूल सा खिलकर...सुंदर भाव !

Suman 9/04/2013 12:41 PM  

बहुत सुन्दर रचना है, शब्द और भाव का संयोजन सुन्दर लगा !

sadhana vaid 9/04/2013 12:42 PM  

जिस दिन मन की खिड़की खोल इंसान प्रेम और सौहार्द्र की ताज़ी हवा को अंदर आने देगा उसी दिन वह सारी कुंठाओं और कुतर्कों से मुक्ति पा लेगा और उसके जीवन में नयी सुबह आ शुभारंभ हो जाएगा ! सुंदर सार्थक सोच के साथ बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति ! बधाई संगीता जी !

ताऊ रामपुरिया 9/04/2013 1:02 PM  

बहुत ही सुंदर और सार्थक रचना.

रामराम.

कुशवंश 9/04/2013 1:03 PM  

अगर न खुले तो दिलों के दरवाजों सी बंद होती है खिड़कियाँ , खूबसूरत रचनाश हमेशा की तरह

रश्मि प्रभा... 9/04/2013 1:28 PM  

मन की खिड़कियाँ खुलते बहुत कुछ स्पष्ट और खुला खुला सा हो जाता है

Aziz Jaunpuri 9/04/2013 1:47 PM  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

दिगम्बर नासवा 9/04/2013 2:21 PM  

सच कहा है ... मन की खिड़कियों पे काले परदे डाले रहते हैं हम ... ओर घर की खिड़कियों से प्रगतिशील दिखाने की कोशिश करते हैं ...
सवेरा तो मन के खुएलने से आता है ...
बहुत ही भावमय .. गहरी अभिव्यक्ति ...

Amrita Tanmay 9/04/2013 2:34 PM  

अनुभूत सत्य.. सुन्दर कहा है..

Ashok Saluja 9/04/2013 2:40 PM  

मन के बंद दरवाज़े .खोलती आपकी ये दिल को दस्तक देती खिड़कियाँ ....
स्नेह !

Kailash Sharma 9/04/2013 2:48 PM  

मन की खिड़की खोल आने दें ठंडी हवा के झोंके..बहुत सुन्दर...

shikha varshney 9/04/2013 3:00 PM  

हम डरते हैं तूफां के अंदर आने से
इसलिए बंद रखते हैं मन की खिड़कियाँ
नहीं समझते इतना भी कि इस तरह तो
रोक देते हैं ताज़ा हवा के आगमन को.
बहुत ही भावपूर्ण रचना है दी!

Bharat Bhushan 9/04/2013 4:20 PM  

बहुत खूब कहा है. मन की - बाहर की खिड़कियाँ...

Anju (Anu) Chaudhary 9/04/2013 5:26 PM  

बंद खिड़कियाँ खुलनी भी जरुरी है ना

Saras 9/04/2013 6:42 PM  

वाकई दूसरों की जिंदगियों में झाँकने का जहाँ सबब बनती हैं यह खिड़कियाँ ...वहीँ अपना अंतर, महफूज़ रखने का एक ज़रिया भी ....बहुत सुन्दर संगीताजी

मनोज कुमार 9/04/2013 8:21 PM  

बहुत सही है।

abhi 9/04/2013 9:09 PM  

बहुत सुन्दर...सच में मन की खिड़कियाँ खुलेंगी तभी तो नया प्रकाश होगा :)

Virendra Kumar Sharma 9/04/2013 9:09 PM  

कर देती हैं
पास के घरों का
चीरहरण
ये खुलती और बंद
होती खिड़कियाँ ,

तमोगुणों से लदी हुई ये ,

देती कितनी झिडकियां।

सुन्दर व्यंग्य साधु खिडकियों पर।

सतीश सक्सेना 9/04/2013 9:19 PM  

ओह ..
मंगल कामनाएं आपको !

गिरिजा कुलश्रेष्ठ 9/04/2013 10:39 PM  

सुन्दर संगीता जी ।

vibha rani Shrivastava 9/05/2013 5:54 AM  

कर देती हैं
पास के घरों का
चीरहरण
ये खुलती और बंद
होती खिड़कियाँ
बेमिसाल अभिव्यक्ति

vandana 9/05/2013 6:03 AM  

सच कहा आपने कि मन की खिड़कियाँ खोलने की आवश्यकता है

yashoda agrawal 9/05/2013 6:09 AM  

अत्यन्त हर्ष के साथ सूचित कर रही हूँ कि
आपकी इस बेहतरीन रचना की चर्चा शुक्रवार 06-09-2013 के .....सुबह सुबह तुम जागती हो: चर्चा मंच 1361 ....शुक्रवारीय अंक.... पर भी होगी!
सादर...!

प्रवीण पाण्डेय 9/05/2013 8:15 AM  

शीतल मंद बयार उमड़ती, खुलें बन्द वातायन मन के।

वाणी गीत 9/05/2013 10:41 AM  

सही है , समय के साथ परम्पराओं में बदलाव वांछित है और स्वाभाविक भी !
कहते भी है मन की खिड़कियाँ ना खोल पाने वाले बंद दरवाजे ही पाते हैं !

Swati Vallabha Raj 9/05/2013 11:14 AM  

मन की खिड़कियाँ जिस दिन खुल जाये,सारी समस्याएँ हल हो जाएंगी। … बहुत सुन्दर रचना

Maheshwari kaneri 9/05/2013 11:55 AM  

बहुत सुन्दर ..संगीता जी..शिक्षक दिवस पर शुभकामनाऎं

मदन मोहन सक्सेना 9/05/2013 12:54 PM  

वाह . बहुत उम्दा,शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामना
कभी यहाँ भी पधारें

ajay yadav 9/05/2013 4:55 PM  

सुंदर काव्य रचना ...खिड़कियां ताज़ी महकती खुशबु भी लाती हैं |
नई पोस्ट -
“शीश दिये जों गुरू मिले ,तो भी कम ही जान !”

रश्मि शर्मा 9/05/2013 9:38 PM  

ये खुलती और बंद
होती खिड़कियाँ ..बहुत खूब लि‍खा..

निहार रंजन 9/06/2013 6:15 AM  

बिलकुल सच. आज के भौतिकवादी युग में तो समय और कम हो गया है लोगों के पास.

प्रतिभा सक्सेना 9/06/2013 10:54 AM  

खिड़कियाँ खुली हवा पाने के लिए होती हैं दूसरे घरों में झाँकने और प्रवाद रचने का निमित्त बन जायें तो
प्रदूषण बढ़ेगा ही - कहाँ स्वस्थ रह पायेगा मन !

Ramakant Singh 9/06/2013 7:26 PM  

अंतर्मन के आर पार निःशब्द करती

Onkar 9/07/2013 9:01 PM  

सुन्दर प्रस्तुति

manukavya 9/09/2013 12:39 AM  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

आशा जोगळेकर 9/10/2013 3:32 AM  

मन की खिडकियाँ खुलें तो कमरे की खिडकियां खोल कर तांक झांक करने की नौबत ही न आये। सुंदर प्रस्तुति।

सतीश सक्सेना 9/10/2013 9:44 AM  

वाकई ..
यथार्थ अभिव्यक्ति ..

Virendra Kumar Sharma 9/11/2013 8:39 AM  


पुन :शुक्रिया उत्प्रेरक टिप्पणियों लाने।

सदा 9/11/2013 12:46 PM  

ये खुलती और बंद
होती खिड़कियाँ
वाह ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" 9/12/2013 5:12 PM  

आदरणीया संगीता जी ..कमरे की खिडकियों के माध्यम से बहुत बड़ा अध्यात्मिक दर्शन कराया आपने ..अत्यंत जरूरी है यदि जीवन को सुखी बनाना है तो अंतःकरण की खिड़कियाँ खोलना ही होगा ..एक लम्बे अरसे से मेरे ब्लॉग पर आपकी उपस्थि प्रतीक्षित है ..आपका सतत मार्गदर्शन मुझे प्राप्त होता रहा है भविष्य में भी ऐसी ही कामना है

Anupama Tripathi 9/13/2013 11:10 AM  

man ki khule khidakiyan aur aaye pranvayu ....
yahi aavashyak hai ....

अरुण चन्द्र रॉय 9/13/2013 3:41 PM  

भावों का सुन्दर चित्र

mahendra verma 9/16/2013 8:40 AM  

कुछ परम्पराएं खिड़़कियों में भी ताला लगा देती हैं।

बहुत ही अच्छी रचना।

Dr. sandhya tiwari 9/16/2013 12:49 PM  

bahut sundar rachna ........ham sabhi kahi na kahi isse prabhavit hai

नादिर खान 10/14/2013 7:28 PM  

नहीं खोलते हम
मन की खिड़कियाँ
सारी कुंठाओं से ग्रस्त
रहते हैं मन ही मन त्रस्त
नहीं करते परिमार्जन
चलते रहते हैं
पुरानी लीक पर
परम्पराओं के नाम
संस्कारों के नाम
और धकेल देते हैं
स्वयं को बंद
खिड़कियों के पीछे ...................

सच कहा संगीता जी, हम कितना ही तरक्की कर लें पर मन की ऑंखें बंद ही रखते है इसीलिए सही और गलत का निर्णय नहीं ले पाते ...
रचना के लिए बधायी

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी 10/27/2013 8:30 PM  

वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

madhu singh 11/03/2013 7:53 AM  

खूबशूरत भाव और शब्द संयोजन और विन्यास

निर्मला कपिला 8/25/2014 9:41 AM  

बहुत सुन्दर रचना 1 नहीं खोलते तभी तो इन मे दीमक [कुविचारों की] लग जाती है1

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