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उदासी की धुंध

>> Tuesday, January 11, 2011



छिटकी थी चाँदनी
मेरे आँगन में,
और चमका था
एक सितारा
मेरे आसमान पर,
चौंधिया दिया था
उसने अपनी चमक से,
आतुर था जैसे
आगोश में मेरे
आने को .
दिया था सहारा
मैंने अपनी हथेली से,
और रख लिया था
अपनी तर्जनी पर उसे,
लेकिन
चंचल था बहुत वो
गज़ब का,
छुड़ा कर अंगुली मेरी
गुम हो गया
ना जाने कहाँ ?
चमक भी छुपा ली है
उसने अपनी,
चाँद को भी अब
वो दिखता नहीं है,
मेरी आँखों में भी
भर गया है धुआँ सा,
अब वो किसी को भी
नज़र आता नहीं है ....
चाँदनी भी आँगन की
सिमट गयी है,
चादर एक उदासी की
बिछ गयी है,
कोशिश कर रही हूँ
पार देखने की
कोशिश है इस
चादर को झटकने की ...

70 comments:

दीप्ति शर्मा 1/11/2011 3:55 PM  

कोशिश कर रही हूँ
पार देखने की
bahut sunder rachna...

mere blog par
"main"

ashish 1/11/2011 4:04 PM  

विषाद के क्षण में मन की अभिव्यक्ति .. तारा कही छुपा है बादलों के पीछे और वो जरुर दिखेगा . इश्वर की बिछायी उदासी की चादर . जल्दी ही खुशियों से भर जाए ऐसी दुआ होगी . कविता में छुपे भावो से मन में उदासी छा गयी .

फ़िरदौस ख़ान 1/11/2011 4:04 PM  

छिटकी थी चाँदनी
मेरे आँगन में,
और चमका था
एक सितारा
मेरे आसमान पर,
चौंधिया दिया था
उसने अपनी चमक से,
आतुर था जैसे
आगोश में मेरे
आने को .


बेहतरीन रचना है...

shikha varshney 1/11/2011 4:06 PM  

फिर चमकेगा सितारा,आएगा हथेली पर फिर
छटेगा धुंआ और छिटकेगी चांदनी जरुर फिर
हौसला रखो हर रात की सुबह होती है....
बहुत मर्मस्पर्शी रचना दि !

रश्मि प्रभा... 1/11/2011 4:08 PM  

चाँदनी भी आँगन की
सिमट गयी है,
चादर एक उदासी की
बिछ गयी है,
कोशिश कर रही हूँ
पार देखने की
कोशिश है इस
चादर को झटकने की ...
koshishen nakamyaab nahi hoti , tabhi to udaasi ke gahwar se ehsaason kee chaandni chhitki hai

sada 1/11/2011 4:23 PM  

चंचल था बहुत वो
गज़ब का,
छुड़ा कर अंगुली मेरी
गुम हो गया
ना जाने कहाँ ?

बहुत ही सुन्‍दर भावमय करते शब्‍द ।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 1/11/2011 5:21 PM  

उदास मन रचयित सुन्दर भाव पूर्ण रचना !

वाणी गीत 1/11/2011 5:24 PM  

चंचल था बहुत कहाँ गम हो गया अंगुली छुड़ा कर ...
कोहरे की धुंध में गम हो शायद ...
कोहरा छंटते ही फिर नजर आये ...

रचना की उदासी और कैसे मिटायें ...!

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 1/11/2011 5:39 PM  

chaadar ko jhatkna bahut zaroori aur koshish humesha kaamyab hoti hai mumma...

luv u

संजय कुमार चौरसिया 1/11/2011 5:57 PM  

पार देखने की
कोशिश है इस
चादर को झटकने की ...

sundar rachna

रोहित 1/11/2011 7:13 PM  

BEHAD SUNDAR......

ROHIT

सुज्ञ 1/11/2011 7:20 PM  

प्रभावशाली रचना!!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 1/11/2011 7:52 PM  

मेरी आँखों में भी
भर गया है धुआँ सा,
अब वो किसी को भी
नज़र आता नहीं है ....
चाँदनी भी आँगन की
सिमट गयी है,
चादर एक उदासी की
बिछ गयी है...
बहुत उम्दा रचना है...बधाई.

"अभियान भारतीय" 1/11/2011 8:53 PM  

वाह बेहतरीन रचना....
बधाई स्वीकार करें..!!

मनोज कुमार 1/11/2011 9:13 PM  

करुणा और वेदना की अभिव्यक्ति ...!

kshama 1/11/2011 9:14 PM  

लेकिन
चंचल था बहुत वो
गज़ब का,
छुड़ा कर अंगुली मेरी
गुम हो गया
ना जाने कहाँ ?
Kya gazab likhtee hain aap!

nilesh mathur 1/11/2011 9:26 PM  

बहुत बार पढ़ा और ये निष्कर्ष निकाला कि बहुत बड़ी गलती है आप की!

प्रवीण पाण्डेय 1/11/2011 9:47 PM  

उदासी की चादर झटक कर उठ जाईये, जगत विशाल है।

मुदिता 1/11/2011 9:57 PM  

दीदी,
हर चादर झटक जाती है हर धुंध छंट जाती है.. सितारा नहीं सूरज चमकता है... चांदनी कि चमक भी खिलखिला उठती है... :) :)

कोशिशें कामयाब होती हैं....सितारों से झोली भर जायेगी...इसी चादर को भर देंगे सितारे अपनी चमक से..और उदासी कहीं नज़र भी नहीं आएगी....

सुन्दर अभिव्यक्ति मनोभावों की...

उपेन्द्र ' उपेन ' 1/11/2011 10:15 PM  

बेहद भावपूर्ण रचना ...... सुंदर प्रस्तुति.

Sunil Kumar 1/11/2011 10:36 PM  

चंचल था बहुत वो
गज़ब का,
छुड़ा कर अंगुली मेरी
गुम हो गया
ना जाने कहाँ ?
सुन्दर अभिव्यक्ति!

अनामिका की सदायें ...... 1/11/2011 10:37 PM  

koshish us paar dekhne ki jari rakhiye is baar koi dhruv tara jaroor dikhayi dega.

sunder bimbo se man ke bhaavo ko saja kar prabhaavshaali rachna ka srijan kiya hai.

प्रतिभा सक्सेना 1/11/2011 11:35 PM  

यह भ्रम थोड़ी देर का है ,सितारा वहीं है. धुंध छँटेगी,निर्मल आकाश में सितारा फिर चमकेगा .

Rajesh Kumar 'Nachiketa' 1/12/2011 2:57 AM  

चांदनी के भूत और वर्तमान को बताती अच्छी कविता.
अज्ञेय साहब की "कतकी पूनो" की याद हो आयी. स्कूल में नवीं या दसवीं में पढी थी कभी.
मजेदार.
चंचल चंद्रिका की चंद किरणों से बुनी चादर के पार देखना, खुशनसीबो को ही नसीब होता है....

संजय भास्कर 1/12/2011 8:40 AM  

बहुत ही सुन्‍दर भावमय करते शब्‍द ।
.........खूबसूरत तारीफ़ के लिए शब्द कम पड़ गए..

Kunwar Kusumesh 1/12/2011 9:14 AM  

कई दिनों बाद आपने पोस्ट बदली .संभवतः व्यस्त रही होंगी.आपकी एक सुन्दर-सी कविता पुनः पढ़ने को मिली.मन वाह वाह कर उठा. बधाई.

ज्ञानचंद मर्मज्ञ 1/12/2011 9:34 AM  

धुन्ध के पीछे गहन भावों की चांदनी भी है जो शब्दों के झरोखों से उतर कर पूरी कविता में समां गयी है !
कविता की बुनावट बेहद प्रभावशाली है !
साभार ,
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

सुशील बाकलीवाल 1/12/2011 10:00 AM  

क्या ये उदासी की चादर है ?
बेहद भावपूर्ण प्रस्तुति...

Mithilesh dubey 1/12/2011 11:18 AM  

बेहतरीन रचना है.

Anita 1/12/2011 1:54 PM  

उस सितारे को तो हम सभी खोज रहे हैं, वह है ही ऐसा छलिया झलक दिखा कर छुप जाना उसकी आदत है पर उसे खोजना भी कितना मधुर है !

ehsas 1/12/2011 3:15 PM  

हर उदासी के बाद एक खुशी का उजाला होता है। सुन्दर एवं भावना से ओत प्रोत रचना। आभार।
इस बार मेरे ब्लाग पर प्यार।

Razi Shahab 1/12/2011 4:36 PM  

बेहतरीन रचना

Sunil Kumar 1/12/2011 4:46 PM  

उदास मन की सुन्दर भाव पूर्ण बहुत उम्दा रचना ,बधाई...

Udan Tashtari 1/12/2011 7:32 PM  

बहुत सुन्दर!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" 1/12/2011 7:35 PM  

संगीता स्वरूप जी!
आपने तो गागर में सागर समा दिया आज की रचना में!
उम्दा शब्दों का चयन किया है आपने!

JHAROKHA 1/12/2011 8:06 PM  

sangeeta di
apni is kavita ke dwara man me chhipi vytha kahin -kahin jhalkti hai .
bahut hi gahan anubhuti ke sathmarm-sparshi rachna.
bahut hi sashkt
behatreen abhivykti
sadar abhinandan
poonam

महेन्द्र मिश्र 1/12/2011 9:14 PM  

सुन्दर रचना प्रस्तुति....आभार

shekhar suman 1/13/2011 12:45 AM  

बहुत दिनों बाद आपकी रचना पढने को मिली..
बहुत ही बेहतरीन.....
नए साल की शुभकामनाएं...


बुढ़ापा.. ..

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 1/13/2011 9:12 AM  

दुःख भरी रचना ..
उदासी की धुंध जल्दी मिट जायेगी
फिर नहायेगा चाँद चांदनी से..
फिर रात को भी होगी चांदनी
और दिन को उजाला जीवन का खुशियों का ..

सुन्दर रचना आपकी ..आपको शुभकामना ( खुशिया की बरसात हो )

saanjh 1/13/2011 9:59 AM  

awww.....shoo shweet :) bohot acchi nazm hai dadi...first half bohot hi pyaara pyaara sa hai, aur aakhir mein to....bohot hi sundar nazm hai :)

वन्दना 1/13/2011 10:43 AM  

आज इतनी उदासी और इतना दर्द कैसे? क्या हो गया?

manukavya 1/13/2011 12:06 PM  

छुड़ा कर अंगुली मेरी
गुम हो गया
ना जाने कहाँ ..
वो सितारा अगर अपना है तो जरूर वापस आयेगा अपनी चमक बिखेरने... अगर नहीं आया तो अपना था ही नहीं, बस एक छलावा था
मंजु

Sadhana Vaid 1/13/2011 3:18 PM  

जो तारा उँगली छुड़ा कर चला गया उसका मोह कर उदास मत होइए ! कदाचित उसका गंतव्य कहीं और नियत होगा ! ईश्वर ने आपके आँगन को उससे भी कहीं अधिक तेजस्वी तारे से आलोकित करने की योजना बनायी होगी ! उसके सफलीभूत होने की प्रतीक्षा कीजिये ! बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी रचना !

रचना दीक्षित 1/13/2011 3:33 PM  

पार देखने की
कोशिश है इस
चादर को झटकने की ...
बेहद मार्मिक और दिल से निकली बातें सितारे की अनुपस्थिति में भी उसे अगर याद करें तो आँखों में चमक और रोशनी आ ही जाती है

Dr Varsha Singh 1/13/2011 3:38 PM  

संगीता स्वरुप जी, छुड़ा कर अंगुली मेरी गुम हो गया
ना जाने कहाँ ..बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

Kailash C Sharma 1/13/2011 3:42 PM  

बहुत मार्मिक और भावपूर्ण प्रस्तुति..आभार

महफूज़ अली 1/13/2011 8:40 PM  

आप कैसी हैं? मैं आपकी सारी छूटी हुई पोस्ट्स इत्मीनान से पढ़ कर दोबारा आता हूँ... Call you tomorrow sure....

Avinash Chandra 1/13/2011 10:57 PM  

लेकिन
चंचल था बहुत वो
गज़ब का,
छुड़ा कर अंगुली मेरी
गुम हो गया
ना जाने कहाँ ?

इतने दिन बाद, ऐसा!!

कोशिश है इस
चादर को झटकने की ...

मुझे ये अंत बहुत पसंद आया.

डॉ॰ मोनिका शर्मा 1/13/2011 11:57 PM  

भावपूर्ण......बेहतरीन रचना .....

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 1/14/2011 12:57 AM  

संगीता दी!
कोहरा कुछ दिखाता,कुछ छिपाता है... वैसे ही उदासी भी कुछ दिखाती है और बहुत कुछ छिपाती है.. दोनों भ्रम पैदा करते हैं.. तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छिपा रहे हो.. बहुत सुंदर कविता!

चैतन्य शर्मा 1/14/2011 5:44 AM  

सक्रांति ...लोहड़ी और पोंगल....हमारे प्यारे-प्यारे त्योंहारों की शुभकामनायें......सादर

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι 1/14/2011 7:53 AM  

कोशिश कर रही हूं पार देखने की'
बहुत मासूम दर्द भरी अभिव्यक्ति के लिये मुबारकबाद।

सतीश सक्सेना 1/14/2011 8:01 AM  


अगर यह दर्दनाक अभिव्यक्ति व्यक्तिगत है तो वाकई बहुत कष्ट दायक है .....

इस समाज में अच्छे भावुक लोगों को शायद अधिक तकलीफ उठानी पड़ती है ! अपने आपको और विस्तार दें ....यही कामना है !

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 1/14/2011 8:48 AM  

अच्छी पोस्ट है.. सुन्दर कविता .. आज चर्चामंच पर आपकी पोस्ट है...आपका धन्यवाद ...मकर संक्रांति पर हार्दिक बधाई

http://charchamanch.uchcharan.com/2011/01/blog-post_14.html

Kunwar Kusumesh 1/14/2011 9:57 AM  

लोहड़ी और मकर संक्रांति की शुभकामनायें

जयकृष्ण राय तुषार 1/14/2011 10:05 AM  

adrniya sangetaji sadar pranam bahut sundar kavita.bahut bahut badhai

सुज्ञ 1/14/2011 2:59 PM  

लोहड़ी,पोंगल और मकर सक्रांति : उत्तरायण की ढेर सारी शुभकामनाएँ।

कविता रावत 1/14/2011 4:22 PM  

लेकिन
चंचल था बहुत वो
गज़ब का,
छुड़ा कर अंगुली मेरी
गुम हो गया
ना जाने कहाँ ?

मनोभावों की सुन्दर अभिव्यक्ति
लोहड़ी,पोंगल और मकर सक्रांति,उत्तरायण की ढेर सारी शुभकामनाएँ।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 1/14/2011 6:13 PM  

आदरणीया संगीताजी ,

यही तो है कविता !

किन-किन पंक्तियों को रेखांकित करूँ ?

आपकी लेखनी सौ वर्षों तक हिंदी साहित्य को समृद्ध करती रहे ....ईश्वर से प्रार्थी हूँ |

mahendra verma 1/14/2011 6:30 PM  

कोशिश कर रही हूँ
पार देखने की
कोशिश है इस
चादर को झटकने की

इस भावनामयी रचना ने मन को गहराई तक प्रभावित किया है।
एक अच्छी कविता प्रस्तुत करने के लिए बधाई।

Dr (Miss) Sharad Singh 1/14/2011 9:58 PM  

अब वो किसी को भी
नज़र आता नहीं है ....
चाँदनी भी आँगन की
सिमट गयी है,
चादर एक उदासी की
बिछ गयी है, ...........
सुंदर भावाभिव्यक्ति!
लोहड़ी, पोंगल एवं मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!

रेखा श्रीवास्तव 1/15/2011 5:17 PM  

उदासी की चादर मत ओढें , खोजे उसी में अर्थ जो खुशियों का प्रतीक हो, अंतर में कोई नई आशा नई दिशा जरूर मिलेगी.

Anjana (Gudia) 1/15/2011 7:11 PM  

दिया था सहारा
मैंने अपनी हथेली से,
और रख लिया था
अपनी तर्जनी पर उसे,
लेकिन
चंचल था बहुत वो
गज़ब का,
छुड़ा कर अंगुली मेरी
गुम हो गया
ना जाने कहाँ ?

bahut dukh hota hai jab koi kho jaae is tarah... sunder rachna

Suman 1/17/2011 12:10 PM  

bahut sunder rachna......sorry jara der ho gai aneme....

हरकीरत ' हीर' 1/17/2011 12:49 PM  

दिया था सहारा
मैंने अपनी हथेली से,
और रख लिया था
अपनी तर्जनी पर उसे,..

कोई कहाँ समझ पाता है औरत के इस ममत्व को ....
जानती हूँ आपकी व्यस्तता ....
चर्चा मंच का काम भी आसान नहीं ....

aman agarwal "marwari" 1/18/2011 2:10 PM  

बहुत गहरे भाव !
ऐसी सुन्दर रचना पढवाने के लिए शुक्रिया .
आपकी लेखन कला को इस नाचीज बालक का प्रणाम.
- अमन अग्रवाल "मारवाड़ी"

amanagarwalmarwari.blogspot.com

marwarikavya.blogspot.com

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" 1/19/2011 8:17 PM  

chaadar jhatak hi jayegi.........bahut sunder!!!!!!!1

धीरेन्द्र सिंह 1/28/2011 4:08 PM  

उदासी की धुंध...उदास कर गई।

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