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नृत्यांगना ---

>> Tuesday, July 13, 2021

 


जीवन के संगीत पर 


थिरकती रहतीं हैं  स्त्रियाँ 


नही होती ज़रूरत 


किसी साज़ की 


या कि किसी सुर ताल की ,


मन और सोच की 


जुगलबंदी 


नचाती रहती है उसे 


अपनी थाप पर । 


कभी हो जाती है राधा 


चिर प्रतीक्षित 


प्रेम की प्रतीक्षा में 


तो कभी मीरा बन 


जुड़ती है भक्ति भाव से । 


और कभी बन द्रोपदी 


समेटती है 


अनेक रिश्तों को 


निष्पक्ष रह कर । 


कभी बन चण्डी 


करती है नाश 


उन आसुरी शक्तियों का 


जो ज़ेहन में बसी होती है उसके , 


हर पल एक लय 


एक गति , 


एक गीत , एक स्वर 


चलता रहता 


मन ही मन उसके , 


अपने  क्रिया कलापों में रमी 


इन्हीं सुरों पर जैसे 


नृत्य करती रहती है ,


ये नृत्य भंगिमाएँ 


नहीं दिखती किसी को 


अचानक बाधा आने पर 


झुंझला ही तो जाती है वो ,


फिर संयम रख 


पकड़ लेती है सुर ताल 


यूँ ही जीवन 


चलता रहता हर हाल ।






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मौसम मन का

>> Thursday, July 1, 2021

 

प्रकृति तो बदलती है 
निश्चित समय पर 
अपने मौसम , 
होते हैं निश्चित 
दिन - महीने ।
लेकिन इंसान के-
मन का मौसम 
कब बदल जाये 
पता ही नहीं चलता ।
चेहरा ही बता देता है कि 
मौसम कुछ बदला सा है ।
जब चढ़ता है ताप 
भावनाओं का तो  
चेहरे की  लुनाई 
झुलस ही तो जाती है 
मन के समंदर से 
उड़ कर वाष्प 
आंखों के आसमाँ में 
छा जाती है 
और जब हो जाते हैं 
बादल  गहन  तो 
सावन आ ही जाता है ।
ऐसे में गर 
अपनत्त्व भरा हाथ बढ़ कर 
भर लेता है अपनी अँजुरी 
तो जैसे 
चहुँ ओर पुष्प खिल जाते हैं 
और चेहरे पर 
बसन्त खिल जाता है ,
अन्यथा तो 
लगता है ऐसा कि 
ठिठुरती  रात में 
कोई अनाथ सोया है 
फुटपाथ पर ।
ठंड जैसे व्यवहार से  बेचैन 
करवटें बदलते 
खिंच जाती हैं 
लकीरें झुंझलाहट की ।
और चेहरा बता देता है कि 
मौसम  सर्दी का है । 
यूँ चेहरे पर छाया मौसम 
आईना होता है मन का 
जितना भी चाहो छुपाना 
ये सब बयाँ कर देता है । 
और एक बात -
मन का मौसम 
ज्यादा देर तक 
नहीं रहता एक सा 
बदलता रहता है 
पल पल , छिन छिन 
इसीलिए 
चेहरे के भाव भी 
नहीं होते सरल कि 
पढ़ लिए जाएँ गिन गिन । 






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