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नृत्यांगना ---

>> Tuesday, July 13, 2021

 


जीवन के संगीत पर 


थिरकती रहतीं हैं  स्त्रियाँ 


नही होती ज़रूरत 


किसी साज़ की 


या कि किसी सुर ताल की ,


मन और सोच की 


जुगलबंदी 


नचाती रहती है उसे 


अपनी थाप पर । 


कभी हो जाती है राधा 


चिर प्रतीक्षित 


प्रेम की प्रतीक्षा में 


तो कभी मीरा बन 


जुड़ती है भक्ति भाव से । 


और कभी बन द्रोपदी 


समेटती है 


अनेक रिश्तों को 


निष्पक्ष रह कर । 


कभी बन चण्डी 


करती है नाश 


उन आसुरी शक्तियों का 


जो ज़ेहन में बसी होती है उसके , 


हर पल एक लय 


एक गति , 


एक गीत , एक स्वर 


चलता रहता 


मन ही मन उसके , 


अपने  क्रिया कलापों में रमी 


इन्हीं सुरों पर जैसे 


नृत्य करती रहती है ,


ये नृत्य भंगिमाएँ 


नहीं दिखती किसी को 


अचानक बाधा आने पर 


झुंझला ही तो जाती है वो ,


फिर संयम रख 


पकड़ लेती है सुर ताल 


यूँ ही जीवन 


चलता रहता हर हाल ।






45 comments:

Rohitas Ghorela 7/13/2021 9:38 AM  

बहुत ही उम्दा रचना।
हर चीज़ करके एक राह पर ही चलना स्त्री जीवन का या तो भाग है या भाग्य।
नया ब्लॉग पधारें पौधे लगायें धरा बचाएं

Saras 7/13/2021 10:27 AM  

वाआह क्या बात है। वह थिरकती है आने में के तारों से उपजे संगीय की लय पर..!

yashoda Agrawal 7/13/2021 11:50 AM  

बेहतरीन
नारी नर पर भारी
अचानक बाधा आने पर
झुंझला ही तो जाती है वो ,
फिर संयम रख
पकड़ लेती है सुर ताल
यूँ ही जीवन
चलता रहता हर हाल ।
सादर नमन..

अनीता सैनी 7/13/2021 12:39 PM  

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (१४-०७-२०२१) को
'फूल हो तो कोमल हूँ शूल हो तो प्रहार हूँ'(चर्चा अंक-४१२५)
पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर

Anupama Tripathi 7/13/2021 12:48 PM  

स्त्री की मनस्थिति को बखूबी उकेरा है !! सूंदर अभिव्यक्ति दी !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/13/2021 12:51 PM  

शुक्रिया अनिता जी

Sweta sinha 7/13/2021 3:33 PM  

बहुत सुंदर भावाव्यक्ति दी।
-----
आत्मा से भावों
को सरगम में गूँथकर ​
तपस्विनी की भाँति
आत्मसात करती हैं
जीवन का सौंदर्य
सुर-ताल में
झूमती नृत्यांगनाएँ
अद्भुत करीगर हो जाती
जो बनाती हैं
लौकिक-अलौकिक
के मध्य पुल।
----
प्रणाम दी
सादर

Sudha Devrani 7/13/2021 3:52 PM  

मन और सोच की
जुगलबंदी
नचाती रहती है उसे
अपनी थाप पर ।
वाह!!!
अपने क्रिया कलापों में रमी
इन्हीं सुरों पर जैसे
नृत्य करती रहती है ,
ये नृत्य भंगिमाएँ
नहीं दिखती किसी को
अपने ही क्रिया कलापों में रमी ये स्त्री आजीवन कठपुतली सी नाचती वह भी बिना सुर ताल के...बेटी पत्नी बहू भाभी माँ और भी कितने ही किरदार निभाती उलझनों को सुलझाते सुलझाते कभी झुंझलाती पर पुनः जीवन के सुर संग ताल मिलाती हर हाल में जीती है अपनी पारी....
बहुत ही लाजवाब सृजन।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/13/2021 3:56 PM  

* सरस जी ,
आज तो आप यहाँ आ कर हमारे मन के तार छेड़ गयी हैं 😄😄😄
सुंदर प्रतिक्रिया के लिए आभार ।

*** यशोदा ,
हार्दिक शुक्रिया

** अनुपमा ,
आभार ।

Jigyasa Singh 7/13/2021 4:00 PM  


अचानक बाधा आने पर
झुंझला ही तो जाती है वो ,
फिर संयम रख
पकड़ लेती है सुर ताल
यूँ ही जीवन
चलता रहता हर हाल ।
.. सच ही तो कहा है आपने..स्त्री सुख दुख या किसी भी पलड़े में झूले, कुछ भी हो, जीवन तो चलता ही रहता है। सुंदर मनोभावों की अभिव्यक्ति।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/13/2021 4:01 PM  

प्रिय श्वेता ,
तुमने तो आत्मा के भावों को ही इस सुर ताल में गूंथ दिया है । कल्पना को और पंख मिले । लौकिक अलौकिक सभी को जोड़ती स्त्रियाँ सच कमाल करती हैं ।
सस्नेह

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/13/2021 4:25 PM  

सुधा जी ,
आपने सारा स्त्री संसार रच डाला अपनी प्रतिक्रिया में । मेरे मन के भाव आप तक पहुँचे , आभार ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/13/2021 4:26 PM  

प्रिय जिज्ञासा ,
सच ही तो कहा है आपने..स्त्री सुख दुख या किसी भी पलड़े में झूले, कुछ भी हो, जीवन तो चलता ही रहता है।
और स्त्रियाँ नाचती रहतीं हैं चकरघिन्नी बनी 😄😄😄
प्रतिक्रिया के लिए आभार

वाणी गीत 7/13/2021 7:40 PM  

यूँ ही चलती जाती हैं स्त्रियाँ वर्ष भर वर्ष...
सत्य ही!

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/13/2021 8:18 PM  

वाणी जी ,
सत्य ही .... और वो भी बिना किसी प्लानिंग के 😄😄😄

Meena sharma 7/13/2021 9:17 PM  

स्त्री के अनेक रूपों को स्त्री ही जान सकती है। सचमुच, जिंदगी की ताल से ताल मिलाए रखने हेतु कितना संघर्ष करती है वह...
मानो नटिनी की तरह जीवन के तार पर संतुलन साधकर चलती रहती है तमाम उम्र....जरा सा ध्यान भटका कि सब खत्म!!!

उषा किरण 7/13/2021 9:24 PM  

हर पल एक लय
एक गति ,
एक गीत , एक स्वर
चलता रहता
मन ही मन उसके ,
अपने क्रिया कलापों में रमी
इन्हीं सुरों पर जैसे
नृत्य करती रहती है ….
कितने सुन्दर भाव….कई बार पढ़ गई👌👌

Vinbharti blog.spot.in 7/13/2021 9:35 PM  

समेटती है
अनेक रिश्तों को
निष्पक्ष रह कर ।
कभी बन चण्डी
करती है नाश
उन आसुरी शक्तियों का
बहुत खूब

Meena Bhardwaj 7/13/2021 10:43 PM  

मन और सोच की
जुगलबंदी
नचाती रहती है उसे
अपनी थाप पर ।
लाजवाब भावाभिव्यक्ति...,अत्यंत सुन्दर ।

रेणु 7/13/2021 11:02 PM  

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रिय दीदी!
जीवन के संगीत से ताल मिलाना कोई स्त्री से सीखे। संसार के समस्त दायित्वों का सत्तर फीसदी सहेजती नारी हर हाल में खुश, हर चाल में खुश। आत्म संगीत की लय में डूबी आत्म मुग्धा नारी , इसी धुन में उम्र गुजार देती है। भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाईयां और शुभकामनाएं 👌👌👌🙏🌷🌷🌷❤️

आलोक सिन्हा 7/14/2021 9:30 AM  

बहुत बहुत सुन्दर

नूपुरं noopuram 7/14/2021 11:40 AM  

स्त्री का चकरघिन्नी होना सार्थक हुआ आपकी कविता में !
नज़रिए की ही तो सारी बात है !
वैसे आजकल इसका भला सा नाम 'मल्टी टास्किंग' हो गया है !
अभिनन्दन इस सम्मानजनक वर्णन के लिए. नमस्ते.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/14/2021 12:03 PM  

* मीना जी ,
सचमुच, जिंदगी की ताल से ताल मिलाए रखने हेतु कितना संघर्ष करती है वह...
मानो नटिनी की तरह जीवन के तार पर संतुलन साधकर चलती रहती है तमाम उम्र ।
और इस संतुलन में संगीत भी होता है जो अक्सर सुनाई नहीं देता ।
सुंदर प्रतिक्रिया के लिए आभार ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/14/2021 12:19 PM  

उषा जी
रचना पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ।


* भारती जी ,
बहुत बहुत शुक्रिया

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/14/2021 12:25 PM  

* मीना भारद्वाज जी
तहेदिल से शुक्रिया ।

** प्रिय रेणु

संसार के समस्त दायित्वों का सत्तर फीसदी सहेजती नारी हर हाल में खुश, हर चाल में खुश। आत्म संगीत की लय में डूबी आत्म मुग्धा नारी , इसी धुन में उम्र गुजार देती है।
अब वो खुश हो या न हो पर सारी उम्र यूँ ही गुज़र तो देती है।
इतनी प्यारी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

** आदरणीय आलोक जी ,
आभार 🙏🙏🙏🙏

** नूपुरं ,
आपकी प्रतिक्रिया पढ़ते हुए चेहरे पर मुस्कान आ रही है ।
बहुत बहुत शुक्रिया ।

ज्योति-कलश 7/14/2021 2:28 PM  

स्त्री जीवन की विषमताओं का सुन्दर , सरस , सजीव वर्णन !

Anita 7/14/2021 3:21 PM  

स्त्री की इसी अपूर्व क्षमता ने उसे इस मुक़ाम पर ला दिया है जहां वह आज है, जीवन के सुर-ताल पर सहज ही थिरकती उसकी ऊर्जा समाज को दिशा भी दिखाती है

Amrita Tanmay 7/14/2021 5:16 PM  

निज थाप से नि:सृत नृत्य अद्वितीय लय में ... अति सुन्दर ।

Subodh Sinha 7/14/2021 6:01 PM  

"मन और सोच की
जुगलबंदी
नचाती रहती है उसे
अपनी थाप पर ।" - संगीता जी ! बहुत ही भावपूर्ण बिम्बों से भरी इन पंक्तियों के साथ किसी भी संवेदनशील महिला के कई रूपों के शब्द-चित्र को वेब-पटल पर चलचित्र की तरह बख़ूबी उकेरा है आपने ...

"मन में
पनपी
सोचों की
स्वर लहरी
और
यथार्थ की
थापों की
जुगलबन्दी पर
मन ही मन
नाचती,
ठुमके लगाती,
गुनगुनाती हैं
वह (औरतें) अक़्सर "
(अतिरिक्त पंक्तियों के लिए क्षमाप्रार्थी ☺ ).. बस यूँ ही ...

Anuradha chauhan 7/14/2021 6:58 PM  

हर पल एक लय
एक गति ,
एक गीत , एक स्वर
चलता रहता
मन ही मन उसके ,
अपने क्रिया कलापों में रमी
इन्हीं सुरों पर जैसे
नृत्य करती रहती है ,
ये नृत्य भंगिमाएँ
नहीं दिखती किसी को
अचानक बाधा आने पर
झुंझला ही तो जाती है वो ,
फिर संयम रख
पकड़ लेती है सुर ताल
यूँ ही जीवन
चलता रहता हर हाल । अद्भुत रचना आदरणीया।

दिगम्बर नासवा 7/15/2021 6:15 PM  

थिरकती हैं स्त्रियाँ जीवन की ताल पर और और सब कुछ चालायमान हो जाता है उस ताल के हिसाब से ... जिंदगी होती हैं स्त्रियाँ ... साँसें भी ...

अनीता सैनी 7/15/2021 6:31 PM  

बहुत ही सुंदर सृजन आदरणीया संगीता दी।
नारी तू नारायणी, तुझसे ही संसार बना।तेरे रूप अनेक यहां...के भाव को सार्थक करती सराहनीय अभिव्यक्ति।
सादर नमस्कार।

Jyoti khare 7/15/2021 10:40 PM  

स्त्री की मनोदशा का सजीव चित्रण
कमाल की रचना
बधाई

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/16/2021 11:27 AM  

* ज्योत्स्ना जी ,
**अनिता जी ,
*** अमृता जी
****सुबोध जी ,
***** अनुराधा जी ,
****** नासवा जी ,
******* अनिता सैनी जी
********ज्योति खरे जी
आप सबने इस रचना के लिए अपनी अपनी तरह से एक नई दृष्टि प्रदान की है । आप सबकी प्रतिक्रियाएँ हमेशा उत्साहित करती हैं ।
सबका तहेदिल से आभार ।

Onkar 7/16/2021 4:29 PM  

बहुत सुंदर

Jyoti Dehliwal 7/19/2021 9:00 AM  

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, संगिता दी।

MANOJ KAYAL 7/19/2021 5:07 PM  

जीवन के संगीत पर
थिरकती रहतीं हैं स्त्रियाँ
नही होती ज़रूरत
किसी साज़ की
या कि किसी सुर ताल की

बहुत सुन्दर रचना

Udan Tashtari 7/20/2021 1:31 AM  

सुंदर रचना

मन की वीणा 7/20/2021 7:40 PM  

वाह! संगीता जी कितना गहनता से आपने नारी मन को खोल कर रख दिया गजब शोध है ये सटीक सत्य।
शानदार सृजन।

Virendra Singh 7/22/2021 1:37 PM  

नारी की सत्यता का दर्शाती सुंदर सार्थक रचना। अद्भुत सर्जन। आपको ढेरों शुभकामनाएँ। सादर।

सदा 7/23/2021 11:20 AM  

संयम रख
पकड़ लेती है सुर ताल
यूँ ही जीवन
चलता रहता हर हाल।
वाह बेहद शानदार अभिव्यक्ति ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/23/2021 11:42 AM  

*ओंकार जी
**ज्योति जी
*** मनोज जी
**** समीर जी , अहा आपका आना आनंद दायक है , पुराने दिन याद दिला दिए । उड़ती हुई उड़नतश्तरी का सबको इंतज़ार रहता था ।

***** कुसुम जी ,
******प्रसन्नवदन जी ,
******* वीरेंद्र जी
******** सदा ,
आप सबका हृदय से धन्यवाद , आपकी टिप्पणियां हमेशा उत्साहित करती हैं ।यूँ ही हौसला बढ़ाते रहिएगा ।

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल 7/23/2021 12:36 PM  

महिलाओं के सहस्त्र रूपों को प्रगट करती बेहद सुन्दर रचना हमेशा की तरह सम्मोहित किये जाती है, साधुवाद सह आदरणीया।

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