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आज़ादी के 75 वर्ष

>> Sunday, August 14, 2022

 


आज़ादी के  पिचहत्तर  वर्ष 

दिखता चेहरे पर सबके हर्ष 
नाम दिया  अमृत  महोत्सव 
मना रहे हम  राष्ट्र उत्सव ।

एक उत्साह है ,एक जुनून है 
घर घर पहुँचे तिरंगा अपना 
हर घर में बस खुशहाली हो 
बस इतना ही तो है एक सपना ।

देश की समृद्धि के लिए 
कुछ तो तुम भी त्याग करो 
खून बहाया वीरों ने अपना 
उनको भी तो याद करो । 

आज़ादी के  दीवानों ने 
जान की बाज़ी लगाई थी 
युवा चेतना ने जैसे 
ली एक अंगड़ाई थी ।

आज उन्हीं वीरों को तुम 
आतंकी तक  कह देते हो 
ऐसा सुन कर भला कैसे 
तुम ठंडे ठंडे रह लेते हो ?  

आज महोत्सव की पूर्व सांझ पर 
बस इतना ही तो कहना है ,
अधिकार निहित कर्तव्यों में 
बस उस पर ही तो चलना है ।

*************************

आज उन्हीं वीरों को तुम 
आतंकी तक कह देते हो .....
इस बात की पुष्टि के लिए श्री हरिओम पंवार जी को सुनिए ----









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पुस्तक समीक्षा -- " खिलते प्रसून " ( भारती दास )

>> Thursday, July 7, 2022

 


सुश्री   भारती दास  ने  अपना  काव्य - संग्रह " खिलते प्रसून "  भेंट स्वरूप मुझे भेजा है ।  हालाँकि इनके रचना संसार से मैं अधिक परिचित नहीं थी  लेकिन इस पुस्तक को पढ़ते हुए  मैंने जाना  कि  कवयित्री  भारती दास  का सृजन  अधिकांश रूप से    प्रकृति , परमेश्वर , उत्सवों  और  ऋतुओं  पर किया गया  है  ।


इनकी रचनाओं में प्रकृति  चित्रण मुख्य रूप से उभर कर आता है ।इनकी कविताएँ पढ़ते हुए प्रतीत होता है कि इन्होंने विषय के साथ पूरा न्याय किया है  ।  मन के भावों को गढ़ने में सौंदर्य की  कहीं कोई कमी नहीं दिखती  । 

इनके पूरे संग्रह में प्रेम , इश्क़ , या विरह  जैसे विषय पर  रचनाएँ न के बराबर  हैं । इस काव्य - संग्रह में कुल 50 कविताओं का समावेश है ।
इस संग्रह की पहली कविता  में कुछ प्रेम का होना मुखरित हो रहा है । लगता है नायक के आने से  नायिका के मन के भाव कहने का प्रयास किया है - ..... था सूना मन का आँगन / उपहार प्यार का भर लाये /  चिर बसंत फिर घर आये ।

ऐसे ही श्रृंगार रस  ,करुण रस वीभत्स रस  से भरी हैं इनकी सभी वो कविताएँ जो  ऋतुओं से संबंधित हैं । कुछ उदाहरण देखिये ---
ग्रीष्म ऋतु ---
ज्योति प्रलय साकार खड़ा है / जलता पशु बेजान पड़ा है / दीन विकल रोदन ध्वनि गाये /  कहो जेठ तुम कब आये ।
शरद ऋतु --
बीत गयी पावस की रातें / सजल सघन जल की बरसातें /  दृश्य मनोरम  मुग्ध नयन हैं / शरद सुंदरी अभिनंदन है । 
बसंत ऋतु ---
विभा बसंत की छाई भू पर / कण कण में मद प्यार भरा है /  आलिंगन में भरने को आतुर /  गगन भी बाहें पसार खड़ा है ।
वर्षा ऋतु में बाढ़ का वीभत्स रूप भी दिखाया गया है ----
आतप वेदना दृश्य डरावना / वीभत्स भयानक भू का कोना / बहती है कातर सी नयना / कहर बाढ़ ने  छीना हँसना । 
कुछ रचनाओं में  ईश्वर को इंगित करते हुए धन्यवाद प्रेषित किया गया है ---
मैं कृतज्ञ हूँ हे परमेश्वर / धन्यवाद करती हूँ ईश्वर / अंधकार पथ में बिखरे थे / छंद आनंद के खिलेंगे फिर से ।
 दीपावली ,हिंदी दिवस आदि विषय पर भी कविताएँ  इस संग्रह में शामिल हैं ।
नारी के विषय में जो इनके विचार है वो " मैं धीर सुता मैं नारी हूँ  " में  प्रकट होते हैं ।
मैं धीर सुता मैं  नारी हूँ / सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं /  हर रूपों में जूझती रहती / राग विविध झंकार हूँ मैं ।

कुछ विचारोत्तेजक रचनाएँ है तो कुछ अपने देश के भूभागों का चित्रण किया है जैसे हिमालय , कश्मीर आदि स्थल ।
" काल के जाल" कविता में   समय को भी दार्शनिक रूप से समझाने का प्रयास  किया  है ।
कुल मिला कर सभी रचनाएँ  भाव प्रधान होने के साथ साथ सशक्त भी हैं ।

पुस्तक का कागज़ और छपाई उत्तम है , इसका आवरण पृष्ठ भी आकर्षक है । जिसके लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं । कहीं कहीं वर्तनी की अशुद्धि दिखती है, जिसे संपादित किया जा सकता था । अधिकांश रूप से अनुनासिका ( चंद्र बिंदु ) के स्थान पर अनुस्वार ( बिंदु ) का प्रयोग हुआ है । ऐसे ही  कहीं कहीं  शब्दों के लिंग में भेद नहीं कर पायीं हैं जैसे ....पृष्ठ 52 पर बस्ती डूबते .... बस्ती स्त्रीलिंग शब्द है  लेकिन यहाँ पुल्लिंग के रूप में लिखा गया है।

कवयित्री ने जो अपना परिचय दिया है उसके वाक्य विन्यास  में  भी  सुधार की आवश्यकता है ।
"  खिलते  प्रसून " कवयित्री का प्रथम काव्य संग्रह है ,जो  अधिकांश रूप से हर कसौटी पर खरा उतरता है । यह एक संग्रह योग्य पुस्तक है ।इसके लिए कवयित्री बधाई की पात्र हैं । इनकी लेखन यात्रा अनवरत जारी रहे ,इसके लिए शुभकामनाएँ देती हूँ । 

विशेष --  आलोचना को सकारात्मक लें जिससे  आगामी पुस्तकों में ये कमियाँ दृष्टिगोचर नहीं होंगी । 



पुस्तक का नाम ---- काव्य प्रसून 

प्रकाशक   ---- सहित्यपिडिया पब्लिशिंग / नोएडा /201301
 
मूल्य   ----  179₹

ISBN  ----- 978 - 93 - 91470 - 04 - 3 


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हु - तू - तू .......

>> Thursday, May 26, 2022

 


हु तू तू -  हु तू तू 

करते हुए

खेलते रहते हम 

ज़िन्दगी के मैदान में 

 हर वक़्त कबड्डी । 

हाँलांकि  , 

कबड्डी के खेल में 

होती हैं दो टीम 

और हर टीम में 

खिलाड़ी की संख्या 

होती है बराबर ।

लेकिन 

ज़िन्दगी के मैदान में 

होती तो हैं दो ही टीम ,

लेकिन 

तुम्हारीअपनी टीम में 

होता है एक खिलाड़ी 

और  वो 

तुम स्वयं हो । 

दूसरी टीम में 

वो सब जो 

जुड़े होते हैं 

किसी भी रूप में 

तुम्हारी  ज़िन्दगी से ,
 
खुद को 

बचाये रखने की 

ज़द्दोज़हद 

अक्सर बुलवाती रहती है 

कबड्डी , कबड्डी , कबड्डी । 

क्यों कि 

ज़िन्दगी की हु तू तू में 

तुमको जिंदा करने के लिए 

कोई साथी नहीं है । 

लड़नी है 

खुद ही खुद के लिए 

सारी लड़ाइयाँ । 

और इस खेल में 

हार की 

कोई गुंजाइश  नहीं ।





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स्वयं का आकलन

>> Monday, May 9, 2022



 7 मई  2022, अपने जन्मदिन पर स्वयं का आकलन 




मैं समन्दर 
सब कुछ मेरे अंदर । 
मन की लहरें 
आती हैं और 
जग के साहिल से 
टकराती हैं 
भिगो कर साहिल को 
थोड़ा नम कर जाती हैं । 
मैं समंदर 
सब कुछ मेरे अंदर । 
कोई लहर 
उदासी की तो,
कोई  प्रफुल्लता  लिए 
आती है 
किनारे से टकरा कर 
उच्छवास लिए 
मुझमें ही 
मिल जाती है 
मैं समन्दर 
सब कुछ मेरे अंदर ।
मन मेरा 
एक कुशल 
गोताखोर की तरह 
लगाता रहता है 
मुझमें ही गोता 
ढूँढने को 
कुछ सीपियाँ 
कि मिल जाएँ 
कुछ नायब मोती 
हाथ आती भी हैं 
कुछ सीपियाँ 
लेकिन फिसल जाती हैं 
और फिर मन 
लगा लेता है गोता ।
मैं समंदर 
सब कुछ मेरे अंदर । 
मेरी लहरों में 
सब कुछ समाता है , 
जो जैसा देता है 
वैसा ही वापस पाता है 
 मैं समंदर 
सब कुछ मेरे अंदर । 



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नवगीत ...... उड़ जाऊँगी ....

>> Sunday, April 3, 2022

 


तुम गाओ प्रेम - गीत
विरह गीत मैं गाऊँगी 
गाते  गाते ही एक दिन 
चिड़िया बन उड़ जाऊँगी। 

ढूँढोगे जब तुम मुझको 
हाथ नहीं मैं  आऊँगी 
दाना भी डालोगे तो मैं 
इधर उधर हो जाऊँगी ,
तुम गाओ प्रेम गीत 
विरह गीत मैं गाऊँगी ।

दर पर आकर तेरे मैं 
सात सुरों  में गाऊँगी 
झांकोगे जब खिड़की से 
पत्तों  में छिप  जाऊँगी ,
तुम गाओ प्रेम गीत 
विरह गीत मैं गाऊँगी ।

थक हार कर जब कभी 
हताश हो कर बैठोगे
धीरे धीरे दबे कदमों से 
पास तुम्हारे आऊँगी ,
तुम गाओ प्रेम गीत 
विरह गीत मैं गाऊँगी ।

पास देख कर शायद तुम 
खुश हो जाओ क्षण भर को
पाना चाहोगे गर मुझको 
दूर आकाश उड़ जाऊँगी ,
तुम गाओ प्रेम - गीत 
विरह गीत मैं गाऊँगी ।।




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खलिश मन की .........

>> Thursday, February 24, 2022

 


मन की पीड़ा 
घनीभूत हो 
आँखों से 
बह जाती है 
खारे पानी से फिर
मन की धरती 
बंजर हो जाती है ।

उगता नहीं 
एक भी बूटा 
फिर, 
स्नेहसिक्त भावों से 
भावनाओं की 
दूब भी बस 
यूँ ही 
मुरझा  जाती है ।

खुशियों की चाहत में 
कितने दर्पण  टूटे 
सोचों के ,
अनचाहे ही 
मन धरती पर 
किरचें भी 
चुभ जाती हैं ।

अपना समझ 
जिसको भी 
तुम हमराज 
बनाते हो
उसकी ही 
ख्वाहिश अक्सर
मन की खलिश 
बन जाती है ।











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शुभ हो बसंत ...

>> Saturday, February 5, 2022




 पीत  वसन 


उल्लसित मन 


बसंत आया ।



खिली फ़िज़ा 


महकी बगिया 


बसंत आया ।



सांकल खोलो 


मन के द्वार की 


बसंत आया ।



मदन का रंग 


सरसों संग 


बसंत आया ।



फूलों की गंध 


मदमस्त रंग 


बसंत आया ।



बौराये भँवरे 


उड़ी तितलियाँ 


कि बसंत आया ।



उम्र के हर पड़ाव पर 


हम तुम संग - संग 


कि बसंत आया ।



बसंत पंचमी 


हम दोनों की 


शुभ हो कि 


बसंत आया ।






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