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नहीं आता ( ग़ज़ल )

>> Thursday, September 9, 2021



गुनगुनाती हूँ दिल में ,लेकिन गाना नहीं आता
तभी तो  सुर में तेरे सुर मिलाना नहीं आता ।

अफ़सुर्दा होती हूँ यूँ ही बेबात मैं जब भी 
किसी को भी मेरा मन बहलाना नहीं आता ।

बेचैनियाँ इतनी घेरे हैं हर इक लम्हा
दिल को मेरे क्यूँ करार पाना नहीं  आता ।

बेरौनक सी अपनी ज़िन्दगी पर मुझे 
अब जैसे कभी प्यार लुटाना नहीं आता ।

डूबी रहती हूँ बेतरतीब ख़यालों में रात भर
आँखों में कोई ख़्वाब सुहाना नहीं आता ।

बदनीयत हो गयी सारी दुनिया ही जैसे
किसी को भी एहसास निभाना नहीं आता । 

डूब जाते है लोग साहिर के कलामों में 
इमरोज़ सा अमृता को चाहना नहीं आता ।

अंधेरों में ज़िन्दगी के भटकते हैं दरबदर
 क्यूँ आस का दिया " गीत " जलाना नहीं आता ।








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परलोक में एक गोष्ठी ।

>> Saturday, August 14, 2021



 यूँ ही ख्वाबों में 


एक दिन टहलते- टहलाते 


जा पहुँचे परलोक 


खुद  ही  बहलते -  बहलाते ।



सामने था स्वर्ग का द्वार 


दिख रहा था बहुत कुछ 


आर  पार । 



न जाने कितनों की आत्माएँ 


इधर उधर डोल रहीं थीं ,


आपस में न जाने 


क्या क्या बोल रहीं थीं ।



दूर से कुछ समझ नहीं आ रहा था 


मन पास से सुनना चाह रहा था । 


तो सबकी आँखों से बचते बचाते 


पहुँच गयी उनके बीच चुपके से जा के ।



आज तो वहाँ भारत के 


स्वतंत्रता सेनानियों की 


गोष्ठी चल रही थी 


कुछ आत्माएँ मायूस थीं 


तो कुछ जोश में 


कुछ शांत थीं 


तो कुछ विक्षोभ में ।



एक  ने उत्साहित होते हुए 


नारा लगाया इंकलाब ज़िंदाबाद 


आज  75 वाँ स्वतंत्रता दिवस है 


दूसरी आवाज़ आयी कि 


फिर भी  सब  कितने विवश हैं ? 



क्या हमने ऐसे देश की 


कभी करी थी कल्पना 


जहाँ हर जगह हो , भ्र्ष्टाचार , 


बेरोजगारी और भुखमरी की  भरमार  ? 



देश के नेताओं ने ऐसा 


भारत गढ़ा है कि 


देश प्रेम क्या होता है ? 


ये आज के बच्चों ने 


कहीं नहीं पढ़ा है । 



माना कि हुआ है देश का 


बहुत विकास 


लेकिन उससे कम 


जितनीं थी हमको आस । 



इतने में सरदार पटेल  की आत्मा ने 


अम्वेडकर  की आत्मा से पूछा 


भाई संविधान में ये आरक्षण का 


क्या चक्कर चलाया था ? 


बेचारी सकपका कर बोली कि 


मैंने तो बेहतरी के लिए ही 


कानून बनाया था । 


मुझे क्या पता था कि 


देश के नेता इतने नीचे गिर जायेंगे 


कि इसी को अपना वोट बैंक बनाएँगे । 



ऐसे ही न जाने किन किन बातों से 


सारी आत्माएँ हैरान थीं 


देश की हालत देख 


सब परेशान थीं । 



सुभाष चन्द्र बोस 


जैसे सिर धुन रहे थे 


भगत सिंह मौन बैठे 


न जाने क्या गुन रहे थे । 


सुखदेव , राजगुरु की 


आँखें नम थीं 


हर स्वतंत्रता सेनानी की 


आत्माएँ गमगीन थीं । 



उनको देख मेरा मन उदास था 


अचानक जो नींद खुली तो सोचा 


ओह , ये तो बस एक ख्वाब था । 







 





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अंतिम छोर

>> Thursday, August 5, 2021


ज़िन्दगी की सड़क पर 
दौड़ते जाते हैं 
अक्सर ही अन्धाधुन्ध,
बिना सोचे या कि 
बिना समझे ही 
कि हम किसे पाने की
होड़ लिए 
अप्राप्य को प्राप्त 
करने की चाहत में ,
छोड़ते जा रहे हैं 
बहुत कुछ 
जो हमें प्राप्त था । 
गिरते हैं 
संभलते हैं 
फिर लगा लेते है दौड़ 
उसको पाने की 
ख्वाहिश लिए 
जो सर्वदा हो 
अवांछनीय ।
आखिर क्या होता है 
लक्ष्य हमारा 
जिसके संधान में 
भटकते हैं यूँ 
दर -  बदर  ।
ज़िन्दगी की ये सड़क भी 
अनंत लगती है 
चलते चलते 
जैसे छूट रहा हो 
सब कुछ ,
और 
मन जैसे 
चाहता है कि 
कैसे भी 
पहुँच जाएँ 
इस सड़क के 
अंतिम छोर पर । 











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नृत्यांगना ---

>> Tuesday, July 13, 2021

 


जीवन के संगीत पर 


थिरकती रहतीं हैं  स्त्रियाँ 


नही होती ज़रूरत 


किसी साज़ की 


या कि किसी सुर ताल की ,


मन और सोच की 


जुगलबंदी 


नचाती रहती है उसे 


अपनी थाप पर । 


कभी हो जाती है राधा 


चिर प्रतीक्षित 


प्रेम की प्रतीक्षा में 


तो कभी मीरा बन 


जुड़ती है भक्ति भाव से । 


और कभी बन द्रोपदी 


समेटती है 


अनेक रिश्तों को 


निष्पक्ष रह कर । 


कभी बन चण्डी 


करती है नाश 


उन आसुरी शक्तियों का 


जो ज़ेहन में बसी होती है उसके , 


हर पल एक लय 


एक गति , 


एक गीत , एक स्वर 


चलता रहता 


मन ही मन उसके , 


अपने  क्रिया कलापों में रमी 


इन्हीं सुरों पर जैसे 


नृत्य करती रहती है ,


ये नृत्य भंगिमाएँ 


नहीं दिखती किसी को 


अचानक बाधा आने पर 


झुंझला ही तो जाती है वो ,


फिर संयम रख 


पकड़ लेती है सुर ताल 


यूँ ही जीवन 


चलता रहता हर हाल ।






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मौसम मन का

>> Thursday, July 1, 2021

 

प्रकृति तो बदलती है 
निश्चित समय पर 
अपने मौसम , 
होते हैं निश्चित 
दिन - महीने ।
लेकिन इंसान के-
मन का मौसम 
कब बदल जाये 
पता ही नहीं चलता ।
चेहरा ही बता देता है कि 
मौसम कुछ बदला सा है ।
जब चढ़ता है ताप 
भावनाओं का तो  
चेहरे की  लुनाई 
झुलस ही तो जाती है 
मन के समंदर से 
उड़ कर वाष्प 
आंखों के आसमाँ में 
छा जाती है 
और जब हो जाते हैं 
बादल  गहन  तो 
सावन आ ही जाता है ।
ऐसे में गर 
अपनत्त्व भरा हाथ बढ़ कर 
भर लेता है अपनी अँजुरी 
तो जैसे 
चहुँ ओर पुष्प खिल जाते हैं 
और चेहरे पर 
बसन्त खिल जाता है ,
अन्यथा तो 
लगता है ऐसा कि 
ठिठुरती  रात में 
कोई अनाथ सोया है 
फुटपाथ पर ।
ठंड जैसे व्यवहार से  बेचैन 
करवटें बदलते 
खिंच जाती हैं 
लकीरें झुंझलाहट की ।
और चेहरा बता देता है कि 
मौसम  सर्दी का है । 
यूँ चेहरे पर छाया मौसम 
आईना होता है मन का 
जितना भी चाहो छुपाना 
ये सब बयाँ कर देता है । 
और एक बात -
मन का मौसम 
ज्यादा देर तक 
नहीं रहता एक सा 
बदलता रहता है 
पल पल , छिन छिन 
इसीलिए 
चेहरे के भाव भी 
नहीं होते सरल कि 
पढ़ लिए जाएँ गिन गिन । 






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