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पुस्तक समीक्षा ... " अँधेरे का मध्य बिंदु " लेखिका - वंदना गुप्ता

>> Wednesday, February 17, 2016

   

" अँधेरे  का  मध्य  बिंदु " वंदना गुप्ता  का प्रथम उपन्यास  है । मूल रूप से उनकी  पहचान  कवयित्री के रूप में  रही और फिर उन्होंने  अपनी क्षमता का लोहा अन्य विधाओं में भी मनवाया । अनेक  कहानियां  लिखीं और  पुस्तकों की  समीक्षा  भी करी । लेकिन  इतने  कम  समय में उनका एक उपन्यास  आ  जाना निश्चय  ही उनकी क्षमता को दर्शाता  है ।  कवयित्री  के  रूप  में भी  इन्होंने  अनेक  कवितायेँ ऐसे विषय  पर लिखीं  हैं जिन पर  कलम चलाने  का साहस विरले ही  करते  हैं । और  अब  उपन्यासकार  के रूप में भी एक  ऐसे  विषय को  लिया है जिसे आमतौर पर  समाज  सहज स्वीकार  नहीं  करता । यूँ तो लिव इन रिलेशनशिप  आज  अनजाना  विषय  नहीं  है  लेकिन  फिर भी  इसे सहज स्वीकार  नहीं किया  जाता । जहाँ तक  आम लोगों की  सोच  है  ऐसे रिश्तों  को अधिक  महत्त्व  नहीं दिया जाता जहाँ कोई प्रतिबद्धता  न हो । लेकिन  आज  की पीढ़ी  विवाह  के  बंधनों  में जकड़  कर  अपनी स्वतंत्रता को खोना  नहीं  चाहती ।  
        वंदना  ने  इसी विषय  को मूल में रख  उपन्यास की रूपरेखा बुनी  है । इनके  नायक और  नायिका  अपने लिव इन  रिलेशनशिप के रिश्ते  में  अधिक  प्रतिबद्ध  दिखाई  देते हैं । प्रेम  विश्वास  और स्पेस  ये तीन चीज़ें ऐसी हैं जो  अंत तक  नायक  नायिका को आपस में जोड़े  रखती हैं ।  यदि यही तीनो बातें किसी वैवाहिक जोड़े की ज़िन्दगी में हों तो उनकी ज़िन्दगी भी सुकून से भरपूर  हो । विवाह  के  पश्चात  स्त्री और  पुरुष  दोनों की ही  एक दूसरे  से अपेक्षाएं इतनी बलवती  हो जाती  हैं  कि वो एक दूसरे  पर अपना  अधिकार  जमाने  लगते  हैं । धीरे धीरे इस रिश्ते में कटुता  आ जाती है । वंदना  के  नायक  नायिका  जानते हैं कि उनका  रिश्ता  बहुत  नाज़ुक  है इस लिए वो एक दूसरे से अपेक्षाओं  के बजाये एक दूसरे के प्रति  समर्पित  रहते हैं । इस  उपन्यास  को  पढ़ कर  एक  बात तो स्पष्ट  है कि इस  तरह के रिश्तों  में आपस में अधिक वचनबद्धता  की आवश्यकता है । 
           लेखिका  ने इस  उपन्यास में  जहाँ  लिव इन रिलेशन  के रिश्ते को खूबसूरती से एक ख़ुशगवार  रिश्ता  बुना  है  वहीँ  इस तरह के रिश्तों  के भीषण दुष्परिणामों  से  भी अवगत  कराया है । दीप्ती के पिता के साथ होने वाले संवाद ऐसे रिश्तों के दुष्परिणामों  पर रोशनी डालते हैं ।  स्त्री विमर्श  को  भी  नायिका  शीना के  संवाद  द्वारा  लेखिका ने  स्पष्ट किया है  कि मात्र पुरुष विरोधी सोच  नहीं होनी चाहिए । सही और गलत का निर्णय सोच  समझ  कर लिया  जाना  चाहिए । 
            छोटे  छोटे  गाँव  में आज  भी  चिकित्सा  की  उचित सुविधाएँ  नहीं  हैं इस  पर भी लेखिका की  कलम चली है जिसके परिणामस्वरूप  नायिका शीना  एच आई वी की शिकार  हो  जाती  है ।ऐसे  कठिन दौर से गुज़रते  हुए भी नायक रवि  अपने रिश्ते को  बखूबी निभाता  है ।आपस में न तो कोई अनुबंध था और न ही कोई सामाजिक दबाव फिर भी दोनों एक दूसरे के प्रति पूर्णरूपेण एक दूसरे के प्रति समर्पित थे |पूरे  उपन्यास में नायक  नायिका  का रिश्ता एक दूसरे  पर बोझ  प्रतीत नहीं होता । यही इस उपन्यास के कथानक की सफलता है ।
          एक आलोचक  की दृष्टि से देखा  जाए तो कहीं कहीं लेखिका  ने  घटनाओं को समेटने में थोड़ी शीघ्रता दिखाई है । और एक प्रकरण जहाँ रवि ( नायक )  अपने लिव इन रिलेशनशिप के रिश्ते के लिए अपने  माता पिता से बात करने अनूपशहर  जाता  है । घर पहुंचने के लिए गली में प्रवेश भी कर लेता है और कुछ  जान पहचान वालों से दुआ  सलाम  भी हो जाती  है । यहाँ तक कि सुमन चाची की बेटी  रवि भैया आ  गए यह कह कर घर की ओर दौड़ भी जाती  है ,उसके बाद  गंगा  नदी पर रवि का  पहुँचना  और अपने अशांत मन को शांत करने में समय बिताना मेरी दृष्टि से उचित नहीं था ।क्योंकि एक तो वो माता पिता को बिना सूचना दिए आया था और उसके आने की खबर यदि किसी अन्य  व्यक्ति से उनको मिल जाती तो वो उसके देर से घर पहुँचाने से अत्यधिक चिंतित हो  उठते ।  यही प्रकरण यदि शहर पहुँचने  से पहले आता तो मेरी दृष्टि से शायद ज्यादा उचित होता । संध्या की भूमिका का भी कुछ ज्यादा  औचित्य  नहीं  लगा फिर भी शायद लेखिका नायक के चरित्र  की दृढ़ता  को पाठक  तक  पहुंचाना  चाहती थीं । जिसमें वो सफल भी रहीं ।
      कुल मिला  कर ये उपन्यास आज की युवा पीढ़ी  के लिए ही  नहीं वरन  हर  दम्पति के लिए प्रेरणास्रोत  है । आपस के रिश्तों  का किस तरह से निर्वाह किया जाना  चाहिए और किस तरह एक दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना ही किसी रिश्ते को मजबूती प्रदान  करती  है ये बात लेखिका ने बड़ी कुशलता से समझायी है । भाषा  बहुत सहज सरल और  ग्राह्य  है । सबसे  बड़ी बात कि  कहीं भी  कथानक की रोचकता  गायब नहीं होती और  न ही कहीं उबाऊ उपदेश प्रतीत  होते हैं । 
इस उपन्यास के लिए  जो उनका पहला प्रयास है लेखिका निश्चय  ही  बधाई की पात्र  हैं। पुस्तक का आवरण  और  कलेवर आकर्षक है . 

इसके लिए  प्रकाशक बधाई के पात्र हैं . 
         लेखिका  को मेरी  शुभकामनाये। आने  वाले  समय में उनके और उपन्यासों  का इंतज़ार  रहेगा |




पुस्तक  का नाम -   अँधेरे  का  मध्य  बिंदु 

लेखिका --- वंदना गुप्ता 

प्रकाशक --एपीएन  पब्लिकेशन 
संपर्क --9310672443
apnlanggraph@gmail.com

ISBN No ---978-93-85296-25-3








12 comments:

गिरधारी खंकरियाल 2/17/2016 10:23 AM  

समीक्षा अच्छी हो तो पुस्तक के भी अच्छे होने के संकेत हैं। समीक्षक एवं लेखिका को शुभकामनाये।

Kavita Rawat 2/17/2016 12:26 PM  

" वंदना गुप्ता जी के प्रथम उपन्यास "अँधेरे का मध्य बिंदु " से परिचय के साथ सार्थक समीक्षा प्रस्तुति हेतु आभार!
वंदना जी को हार्दिक बधाई!

Dilbag Virk 2/17/2016 7:47 PM  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 18-02-2016 को वैकल्पिक चर्चा मंच पर दिया जाएगा
धन्यवाद

जितेन्द्र माथुर 2/18/2016 8:50 AM  

बहुत अच्छी एवं वस्तुपरक समीक्षा है संगीता जी । आशा है, पुस्तक भी बहुत ही अच्छी होगी । अनेक शुभकामनाएं वंदना जी को तथा हार्दिक आभार आपका ।

जितेन्द्र माथुर

Satish Saxena 2/18/2016 10:03 AM  

आपके द्वारा किये गए कार्य , आपको विशिष्ट बनाते हैं ! हार्दिक मंगलकामनाएं आपकी कलम को

Digamber Naswa 2/18/2016 2:10 PM  

मूल विषय को मध्य में रखते हुए उपन्यास के प्रति रोचकता को बरकरार रखते हुए समीक्षा लिखी ही ...
बहुत सुन्दर समीक्षा ...

mahendra verma 2/23/2016 9:32 PM  

निष्पक्ष और सटीक समीक्षा ।
वंदना जी और आपको बधाई ।

Kavita Rawat 5/07/2016 3:01 PM  

आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं !

रश्मि प्रभा... 9/19/2016 3:55 PM  

http://bulletinofblog.blogspot.in/2016/09/1.html

Parul Kanani 9/24/2016 5:17 PM  

sanggeta ji aakhir aap hai kahan

सदा 10/17/2016 9:43 PM  

bahut hi badhiya smiksha ....

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