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इंतज़ार

>> Friday, October 31, 2008

न जाने कितनी बार
मेरे हिस्से ज़हर आया है
जब -जब भी ज़िन्दगी ने
मंथन किया
मैंने विष ही पाया है।
इतना गरल पा कर भी
मन मेरा शिव नही बन पाया
क्यों कि ये ज़हर
मेरे कंठ में नही रुक पाया है।
उगल दिया मैंने सब
बिना ज़मीं देखे हुए
बंजर हो गई वो धरती
जहाँ प्रेम की पौध
उगा करती थी
जल गए वो दरख्त
जिनकी टहनी मिला करती थी
सूख गए वो अरमान
जो इन पेडों पर रहा करते थे
मर गए वो एहसास
जो इन पर
झूले झूला करते थे ।
आज बस रह गया है तो
एक राख का अम्बार है
इसे उड़ने के लिए हवा के
हल्के से झोंके का इंतज़ार है.

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मजबूरी

>> Monday, October 20, 2008

ज़िन्दगी के हर दौर में हम



ज़िन्दगी का अर्थ ढूढते रहे



औ ज़िन्दगी का सफर



यूँ ही पूरा हो गया ।



जो मिला इस सफर में



वो भी तो कुछ कम न था



कुछ गम थे , कुछ शक



कुछ तल्खियाँ औ तन्हाईयाँ

और जो प्यार मिला तो

वो भी अधूरा रह गया ।

ख्वाब में गर मैंने

मंजिल पाने की चाहत की

इस चाहत के दरमियाँ ही

ख्वाब खंडित हो गया ।

और अब न ख्वाब है

न चाहतें , न ही मंजिल

न अधूरा प्यार ही

शायद इसी लिए अब

यह ज़िन्दगी जीना आसान हो गया ।

गर इसी को जीना कहते हैं

तो हम भी जी रहे हैं

पल- पल मर - मर कर हम

यूँ ही साँस ले रहे हैं

और हर साँस के साथ

विष का धुंआ उगल रहे हैं

क्यों की -

ज़हर उतारने के लिए

ज़हर का होना ज़रूरी है

ऐसे ही -

ख़ुद को विषाक्त बना लेना

मेरी मजबूरी है.

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तृष्णाएँ

>> Saturday, October 18, 2008

ज़िन्दगी एक धोखा है
फिर भी लोग विश्वास करते हैं
कि हम जीते हैं
और न जाने
कब तक जीते रहेंगे
इस जीने की उम्मीद पर ही
तृष्णाएँ जन्म लेती हैं
और हावी हो जाती हैं
मनुष्य की ज़िन्दगी पर ,
उन तृष्णाओं की तृप्ति में ही
मनुष्य लगा देता है सारा जीवन ,
पर क्या सही अर्थों में
उसे तृप्ति मिलती है ?
निरंतर प्रयासों के बाद भी
मानव तृषित रहता है
और फिर -
स्वयं को धोखा देता है
यह विश्वास करके कि
वह प्रसन्न है , संपन्न है
उसमे अपनी इच्छाओं को
पूरा कराने का दम है ,
उसके लिए मात्र
एक ज़िन्दगी कम है।


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झंझावात

>> Wednesday, October 15, 2008

दूर तक नज़र
ढूढ़ती है कि
कोई नेह का बादल
अपना छोटा सा टुकड़ा
कहीं छोड़ गया हो
और वो बरस कर
मुझे भिगो दे .

पर-
मंद समीर भी
उड़ा ले जाता है
हर टुकड़े को
अपने साथ .

और आ जाता है
मेरी ज़िंदगी में
कुछ ऐसा झंझावात
कि भीगने को
तरसते मन को
जैसे रेतीली हवाओं ने
घेर लिया हो
चारों ओर से .

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विरासत

>> Saturday, October 4, 2008

ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
मुझे मात मिली
तुम एक और मात दे दोगे
तो कोई बात नही ।
दिल का सागर भरा है
गम की लहरों से
तुम एक और लहर मिला दोगे
तो कोई बात नही।
धूल का गुबार ही
मेरी किस्मत में लिखा है
खुशियों के पीछे तुम भी
उसमें एक ज़र्रा मिला दोगे
तो कोई बात नही।
प्यासा दिल पानी की चाह में
न जाने कहाँ कहाँ भटक गया
तुम भी पानी दे कर छीन लोगे
तो कोई बात नही ।
हालत के हाथों मैं अक्सर
हो जाती हूँ मजबूर
तुम और मजबूर बना दोगे
तो कोई बात नही .
मेरी ज़िन्दगी की किरणों में
कहीं कोई चमक बाकी थी
तुम उसको भी छीन लोगे
तो कोई बात नही ।
इस उजाड़ , वीरान सी ज़िन्दगी से
क्या शिकवा ?
तुम नेह का बादल हटा दोगे
तो कोई बात नही।
बस बात है तो केवल इतनी कि
गर हो मेरी ज़िन्दगी में
कोई चाहत , तम्मनाएं औ खुशी
वो सब तुझे मेरी विरासत में मिलें
ज़िन्दगी की इस कठोर धरती पर
तेरे लिए खुशी का हर फूल खिले .

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हमारी वाणी

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