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सितारों वाली चादर

>> Sunday, January 30, 2011



चीर कर 
खामोशी की चादर,
मन का सन्नाटा ,
आ खड़ा होता  है 
मेरे सामने ,
शब्द ,
जो बिखरे पड़े थे 
हो जाते हैं 
एकत्र 
और मच जाता है 
कोलाहल .
इस शोर में भी  
ख़ामोशी जैसे 
चादर में लिपटी हुई 
अपने वजूद को 
बनाये रखना चाहती है 
भले ही चादर 
क्यों न हो गयी हो 
क्षत - विक्षत
मेरे ख्यालों  का 
जुलाहा  
फिर से उसका 
एक धागा पकड़ 
बुन देता  है 
एक नयी चादर ,
ऐ मेरे जुलाहे 
चादर बुननी हैं तो 
बुन ,
पर बुनाई में 
कहीं तो 
खुशी के सितारे भी 
जड़ दे ...
देखने वालों के लिए 
ऐसे भ्रम का होना 
ज़रूरी है .




80 comments:

मनोज कुमार 1/30/2011 11:46 AM  

आपकी यह कविता जीवन के विरल दुख की तस्‍वीर है, इसमें समाई पीड़ा आम जन की दुख-तकलीफ है।
कविता जीवन के अनेक संदर्भों को उजागर करने का सयास रूपक है, जीवन के खाली कैनवास पर विरल चित्रांकन। स्त्री जीवन के सामान्य उपकरणों चादर, धागा, बुनाई, कढाई, सलमा-सितार्र आदि के द्वारा आपने जीवन के बड़े अर्थों को सम्प्रेषित करने की सच्ची कोशिश की है।

Sagar mal sharma 1/30/2011 12:00 PM  

आपकी कवितायेँ अवं संग्रह पढ़ कर अच्छा लगा ऐसे रचनाओं के लिए धन्यवाद
कृपया मुझे भी मार्गदर्शन देवे ,आपने बहुमूल्य वक़्त से कुछ छ्ण मेरे ब्लॉग का अवलोकन कर मराग्दर्शन देवे
आपका आभार रहेगा .........

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 1/30/2011 12:06 PM  

अरे मम्मा कमाल कर दिया आपने ...लाज़वाब रचना है ...एक दम शानदार... गुलज़ार साब की एक नज़्म है .."मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे" मैं वैसी नज़्म लिखना चाहता पर नहीं लिख पाया सोचता था इससे अलग क्या लिखूं...पर आपने तो जादू कर दिया ... :) लव यू

यशवन्त माथुर 1/30/2011 12:18 PM  

"...देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है ."

बहुत ही सुन्दर भावों को अपने में समेटे शानदार कविता.

सादर
------
बापू! फिर से आ जाओ

Taru 1/30/2011 12:58 PM  

इस शोर में भी
ख़ामोशी जैसे
चादर में लिपटी हुई
अपने वजूद को
बनाये रखना चाहती है

...वाह! मम्मा...
...ख़ामोशी के पैरहन में मन का अंतर्द्वंद chhupa ke rakhna chaah rahin hain hmmmmmm......:)

देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है .

..ना! मम्मा,बिलकुल bhi सहमत नहीं.......हमेशा देखने वालों की चिंता क्यूँ करना.........भ्रम के बजाये कड़वी सच्चाई में जीना ही बेहतर है.....

मेरे ख्यालों का
जुलाहा
फिर से उसका
एक धागा पकड़
बुन देता है

...ये मन के जुलाहे ऐसा क्यूँ करते हैं मम्मा....?? खैर....अपने मन के द्वन्द से बाहर आ जाना ही बेहतर है.......:)

जी...एक बात कहूँगी......समापन आपने अपने लिए किया होता तो अच्छा लगता......समापन में 'भ्रम' आ गया wo bhi teesre ke liye...तो मन में थोड़ा रोष है..:(

एक बात और....:( ....नज़्म का आगाज़ अच्छा लगा..मगर अंजाम थोड़ा सा कमज़ोर लगा मुझे...

चीर कर ''......ki''
खामोशी की चादर,
मन का सन्नाटा ,
आ खड़ा होता है

''......ki ''.....यहाँ कुछ आना चाहिए था...लब...आँखें...या कुछ और....आप देख लीजियेगा...और ये सुझाव नहीं है ...

मम्मा.....मेरे मन को यहाँ कुछ खटका था.....कि किसकी खामोशी चीर कर मन का सन्नाटा आगे आ रहा है..... बस इतना सा खालीपन लगा था...सो बता दिया..:):)

चलिए,
स्नेह के साथ प्रणाम !!

mridula pradhan 1/30/2011 1:00 PM  

kitna theek likhi hain aap.
पर बुनाई में
कहीं तो
खुशी के सितारे भी
जड़ दे ...
देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है .
wah.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 1/30/2011 1:07 PM  

दुःखों की चादर पर खुशी का धोखा टाँकने का अनुरोध!!कितनी मुस्कुराहटों के पीछे छिपे दर्द की हक़ीक़त बयान की है आपने संगीता दी! सुपर्ब!!

mahendra verma 1/30/2011 1:28 PM  

मेरे ख्यालों का
जुलाहा
फिर से उसका
एक धागा पकड़
बुन देता है
एक नयी चादर

जुलाहे और चादर का बिम्ब अच्छा लगा।
बहुत ही प्रभावशाली कविता।

दीप्ति शर्मा 1/30/2011 1:30 PM  

चीर कर
खामोशी की चादर,
मन का सन्नाटा ,
आ खड़ा होता है
मेरे सामने ,
शब्द
khamosi mai kahe gye sabd
or mun ka sanata

Kailash C Sharma 1/30/2011 1:42 PM  

पर बुनाई में
कहीं तो
खुशी के सितारे भी
जड़ दे ...
देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है ...

बहुत मर्मस्पर्शी...जीवन के व्यथा की बहुत सार्थक प्रस्तुति..बहुत सुन्दर

Sadhana Vaid 1/30/2011 1:54 PM  

बहुत मर्मस्पर्शी रचना है संगीता जी ! नारी जीवन का यही निचोड़ है कि अपने दुःख दर्द को छिपा कर उसने औरों को सदैव स्वयं के सुखी होने के भ्रम से ही प्रफुल्लित करने की चेष्टा की है ! सलमे सितारों जड़ी ओढ़नी की चमक में लिपटे मन के अवसाद को छिपाने की यह कोशिश बेहद पसंद आई ! मेरी बधाई एवं शुभकामनायें स्वीकार करें !

राज भाटिय़ा 1/30/2011 3:03 PM  

एक अति उम्दा रचना. धन्यवाद

संजय भास्कर 1/30/2011 3:11 PM  

एक नयी चादर ,
ऐ मेरे जुलाहे
चादर बुननी हैं तो
बुन ,
पर बुनाई में
कहीं तो
खुशी के सितारे भी
जड़ दे ...
देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है .

...बहुत ही सुन्दर सार्थक सन्देश छुपा है इन पाँक्तिओं मे। बधाई सुन्दर रचना के लिये।

दिगम्बर नासवा 1/30/2011 3:17 PM  

पीड़ा के अनेक रंगों को उतारा है इस कविता में ... द्वंद को शब्द दे दिए हैं ...

प्रवीण पाण्डेय 1/30/2011 3:29 PM  

मेरी चादर में भी खुशी के सितारे जड़ दे।

ललित शर्मा 1/30/2011 3:33 PM  

बस वो जुलाहा ही सितारे जोड़ सकता है,
जिसने जग के उलझे तागे सुलझाए हैं ।

अर्थपूर्ण कविता के लिए आभार

सुज्ञ 1/30/2011 4:32 PM  

अन्तर के सन्नाटे की चादर पर उम्मीदो के सितारों का टंकन!!

ला-जवाब है दीदी यह काव्य!! प्रेरणा देता है।

सम्वेदना के स्वर 1/30/2011 4:46 PM  

हमेशा की तरह अनोखे भाव और अनूठे बिम्ब लिये,जीवन की बारीकियाँ समझाती यह नज़्म!!

Minakshi Pant 1/30/2011 4:48 PM  

इस रचना मै दर्द की उपस्थिति को बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत कर पाई हैं आप और एक कवित्री के लिए एसा करना कोई बड़ी बात नहीं बहुत खूबसूरती से हर दर्द का वर्णन बहुत बहुत बधाई !

Kajal Kumar 1/30/2011 5:08 PM  

सुंदर आशावादी विचारवान रचना. धन्यवाद.

Anjana (Gudia) 1/30/2011 5:29 PM  

bhram ke liye to aapki pyari si muskan hi kaafi hai... bahut sunder rachna!

kshama 1/30/2011 6:16 PM  

देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है .
Aah!

shikha varshney 1/30/2011 6:33 PM  

यही तो समस्या है कि जो होता है, दीखता नहीं ..देखने वाले को भ्रम होना जरुरी है ....शायद ...
बहुत सुन्दर लिखा है दि!

Ravi Shankar 1/30/2011 7:22 PM  

बहुत उम्दा कविता,दी। पीड़ा को छुपाने के लिये खुशी के सितारे टाँकने की गुजारिश, बहुत कुछ कहती है।

Er. सत्यम शिवम 1/30/2011 7:24 PM  

एक साथ कई भावों को संजोये बहुत ही सुंदर रचना...........लेखनी की उत्कृष्टता को बयान करती बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति..........

Arvind Mishra 1/30/2011 8:30 PM  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

रश्मि प्रभा... 1/30/2011 8:53 PM  

idhar lagatar vyast thi to bas yahi kahna hai.... bahut hi achhi rachna

हरकीरत ' हीर' 1/30/2011 9:25 PM  

वाह ....
ये आंसू गम का न था जो रुला गया
कोई तिनका था जो आँख में चला गया ....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" 1/30/2011 9:32 PM  

बहुत यत्न से आपने विचारों का ताना-बाना बुना है!
सुन्दर रचना!

डॉ॰ मोनिका शर्मा 1/30/2011 9:32 PM  

बहुत सुंदर ..... ऐसा भ्रम कितना ज़रूरी है जीने के लिए.... सार्थक भाव

कुश्वंश 1/30/2011 10:16 PM  

जीवन के अर्थों को सम्प्रेषित करने की सच्ची कोशिश की है।....
सुंदर भावाभिव्यक्ति..

डॉ टी एस दराल 1/30/2011 10:17 PM  

बहुत सुन्दर ।
ये दुनिया ही एक भ्रम जाल है ।

वन्दना 1/30/2011 10:29 PM  

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (31/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

S.M.HABIB 1/30/2011 11:02 PM  

वाह दी... सच कहा आपने...

"ज़माने के लिए दामन में खुशियों के सितारे हैं
तन्हा दिल की दौलत यारों, दुःख हैं और शरारे हैं." (हबीब)
सादर....

प्रतिभा सक्सेना 1/31/2011 3:44 AM  

वाह,
मन को उद्वेलित कर गई कविता .संगीताजी ,चादर का फीकापन दूर करने के लिए सितारे बुनने का आग्रह उस कंट्रास्ट को और गहरा कर जाता है -प्रभाव घनीभूत हो उठा है .बधाई आप को !

Rajesh Kumar 'Nachiketa' 1/31/2011 5:26 AM  

मन के ख्यालों का जुलाहा.... बढ़िया उपमा...
और हाँ, बड़ा ही कारीगर लगता है ये जुलाहा....

udaya veer singh 1/31/2011 8:33 AM  

priya,maidam ,

pranam ,

kavya shilp ke sidhahast hanthon ne
punh sunar kavy ka nirman kiya hai .
sufi darshan nazar aaya . bahut achha laga .
kavya sanklan ke liye tahe dil se badhayi .
gustakhi manf-mithai to banti hai maim.
sanklan ki ek prati mere liye bhi.

रश्मि प्रभा... 1/31/2011 8:55 AM  

ऐ मेरे जुलाहे
चादर बुननी हैं तो
बुन ,
पर बुनाई में
कहीं तो
खुशी के सितारे भी
जड़ दे ...
देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है .
....
ek sitaaron se bhara chaadar main aapke kandhe per rakhti hun - aapke samman me

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 1/31/2011 9:32 AM  

अरे संगीता जी ये क्या ..आपने अपने मन के जुलाहे को ये क्या कह डाला .. खुशी के सितारों का भ्रम ... बेहद सुन्दर लिखा है आपने... क्या बात है ..

saanjh 1/31/2011 9:55 AM  

देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है ."

wah dadi....kya baat keh di...tooooo good...luvvv u

sada 1/31/2011 10:26 AM  

देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है .

कभी-कभी हम भी इस भ्रम के साथ हो लेते हैं ..इस बेहतरीन रचना के लिये बधाई ।

Anita 1/31/2011 11:05 AM  

लेकिन भ्रम तो टूट ही जायेगा और लाएगा एक और सन्नाटा तो क्यों न भ्रमों से बाहर निकलें....

manukavya 1/31/2011 11:41 AM  

भले ही चादर /क्यों न हो गयी हो / क्षत - विक्षत
ख्यालों का / जुलाहा / फिर से उसका / एक धागा पकड़ / बुन देता है / एक नयी चादर

"ख्यालों का जुलाहा" बेहद सुन्दर कल्पना... क्षत-विक्षत चादर का फिर से एक धागा पकड़ कर नयी चादर बुनना आपने आप में बहुत सकारात्मक सोच है...संगीता जी मुझे तो इसका सकारात्मक पहलू ही बहुत भाया. और रही ख़ुशी के भ्रम की बात तो उसकी क्या जरुरत है :-) हर दुःख के बाद सुख का आना तो निश्चित ही है ये तो नियति का चक्र है... और आयेगा भी...

मंजु

निर्मला कपिला 1/31/2011 11:55 AM  

इस शोर में भी
ख़ामोशी जैसे
चादर में लिपटी हुई
अपने वजूद को
बनाये रखना चाहती है
हाँ वज़ूद को बनाये रखने के लिये कुछ तो भ्रम रखना ही चाहिये। बधाई इस रचना के लिये।

Akshita (Pakhi) 1/31/2011 1:02 PM  

बहुत सुन्दर कविता ...बधाई.

Akshita (Pakhi) 1/31/2011 1:02 PM  

बहुत सुन्दर कविता ...बधाई.

संतोष कुमार 1/31/2011 1:27 PM  

अरे वाह क्या खूब कहा है बहुत ही सुंदर कविता !
और बहुत ही गहरे भाव !
मज़ा आ गया पढ़ कर !!

उपेन्द्र ' उपेन ' 1/31/2011 3:02 PM  

संगीता जी , बहुत ही भाव पूर्ण और सुंदर कविता .. बेहतरीन प्रस्तुति.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 1/31/2011 4:48 PM  

...dekhne walon ke liye
aise bhram ka
hona jaroori hai.
bahut hi bhavpoorn sundar rachna.

कविता रावत 1/31/2011 5:44 PM  

इस शोर में भी
ख़ामोशी जैसे
चादर में लिपटी हुई
अपने वजूद को
बनाये रखना चाहती है
...बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति.. ...बधाई

santosh pandey 1/31/2011 6:24 PM  

भावमय प्रस्तुति.

ashish 1/31/2011 8:20 PM  

इश्वर करे चादर का जर्रा जर्रा खुशियों के धागे से बुना हो . कविता की बुनावट मन पर गहरा प्रभाव छोड़ गयी

धीरेन्द्र सिंह 1/31/2011 9:18 PM  

मेरे ख्यालों का
जुलाहा
फिर से उसका
एक धागा पकड़
बुन देता है
एक नयी चादर ,

बेहद खूबसूरत.

वन्दना अवस्थी दुबे 1/31/2011 11:24 PM  

ऐ मेरे जुलाहे
चादर बुननी हैं तो
बुन ,
पर बुनाई में
कहीं तो
खुशी के सितारे भी
जड़ दे ...
देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है .
बहुत सुन्दर.

ZEAL 2/01/2011 2:01 PM  

स्वयं कों हर हाल में खुश रखना ही चाहिए , उससे भी बढ़कर , दूसरों कों खुश दिखना चाहिए।

Sunil Kumar 2/01/2011 5:03 PM  

ऐ मेरे जुलाहे
चादर बुननी हैं तो
बुन ,
पर बुनाई में
कहीं तो
खुशी के सितारे भी
जड़ दे ...
बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति.. ...बधाई

रंजना 2/01/2011 5:20 PM  

मनोभावों को कितनी सार्थकता से अभिव्यक्ति दे देती हैं आप....बस चमत्कृत रह जाती हूँ देखकर ...

नमन आपको !!!

रंजना.

daanish 2/01/2011 10:59 PM  

भ्रम
एक सवाल बन कर
जेहन-ओ-दिल में उतर गया है
बहुत ही प्रभावशाली कृति ...

Dr Varsha Singh 2/01/2011 11:54 PM  

और मच जाता है
कोलाहल .
इस शोर में भी
ख़ामोशी जैसे
चादर में लिपटी हुई
अपने वजूद को
बनाये रखना चाहती है .....
सच्चाई को वयां करती हुई अत्यंत सुन्दर रचना , बधाई.

nivedita 2/02/2011 6:46 AM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..
ख्यालों के जुलाहे को शुभकामनायें...

manaskhatri 2/02/2011 2:32 PM  

"जो बिखरे पड़े थे
हो जाते हैं
एकत्र
और मच जाता है
कोलाहल ."
Shandaar panktiyan..shubhkamnayein...

Dr (Miss) Sharad Singh 2/02/2011 4:50 PM  

ऐ मेरे जुलाहे
चादर बुननी हैं तो
बुन ,
पर बुनाई में
कहीं तो
खुशी के सितारे भी
जड़ दे ...

अत्यंत दार्शनिक, सुन्दर और भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई।

: केवल राम : 2/03/2011 11:43 AM  

चीर कर
खामोशी की चादर,
मन का सन्नाटा ,
आ खड़ा होता है
मेरे सामने ,



एक दम दार्शनिक अंदाज में व्यक्त किये गए भाव ...पूरी कविता एक बिम्ब के इर्द गिर्द घुमती हुई सार्थक अर्थ संप्रेषित करती है ...आपका शुक्रिया

Rajiv 2/03/2011 4:02 PM  

"ऐ मेरे जुलाहे
चादर बुननी हैं तो
बुन ,
पर बुनाई में
कहीं तो
खुशी के सितारे भी
जड़ दे ...
देखने वालों के लिए
ऐसे भ्रम का होना
ज़रूरी है"
आदरणीय संगीता जी वाकई गहन अनुभूति से उपजी रचना है.अनायास ही इसने ग़ालिब की याद दिला दी जिन्होनें कुछ ऐसा ही कहा था लेकिन दूसरे ढंग से." .....................खुदा आसमान पर बैठा है,दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है." बेहद सुंदर भव लिए आगे बढ़ती रचना.

Sawai SIingh Rajpurohit 2/03/2011 8:53 PM  

आदरणीय संगीता जी सुंदर कविता

Sawai SIingh Rajpurohit 2/03/2011 8:54 PM  

मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है

"गौ माता की करूँ पुकार सुनिए और कम से ....." देखियेगा और अपने अनुपम विचारों से

हमारा मार्गदर्शन करें.

आप भी सादर आमंत्रित हैं,
आपका अपना सवाई

POOJA... 2/03/2011 10:21 PM  

वाह...
मुझे गुलज़ार साहब की एक नज़्म याद आ गयी... "मुक्झ्को भी तरकीब शिखा दे यार जुलाहे"
बहुत सुन्दर रचना है... लाजवाब...

Kunwar Kusumesh 2/04/2011 9:10 AM  

बहुत प्यारी रचना है.

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 2/04/2011 9:31 AM  

संगीता जी आपकी यह सुन्दर पोस्ट और "जिम्मेदारी" राजभाषा से मैंने चर्चामंच पर रखी है..आज ... आप वहाँ आ कर अपने विचारों से अनुग्रहित करें ... धन्यवाद ... आज शास्त्री जी का जन्मदिन भी है...


http://charchamanch.uchcharan.com/2011/02/blog-post.html

ehsas 2/04/2011 11:55 AM  

पर बुनाई में
कहीं तो
खुशी के सितारे भी
जड़ दे ...

वाह। बहुत खुब।

Navin C. Chaturvedi 2/04/2011 12:22 PM  

आदरणीया संगीता स्वरूप जी एक बार फिर से आप को नमन करने का अवसर प्रदान किया आपने| बहुत बहुत आभार:-

भले ही चादर
क्यों न हो गयी हो
क्षत - विक्षत
मेरे ख्यालों का
जुलाहा
फिर से उसका
एक धागा पकड़
बुन देता है
एक नयी चादर

Amrita Tanmay 2/05/2011 11:10 AM  

बेहतरीन .... लाजवाब . इस खुबसूरत रचना के लिए क्या कहूँ ......?आपको बधाई ....

अनामिका की सदायें ...... 2/05/2011 6:43 PM  

vo kahte hain na jab icchhaye ummeedon ka aasmaan dekhne ki tamanna rakhengi to jaroor kuchh na kuchh umeed puri hogi..so ummeed to puri hogi hi. yahi umeed hai yahi dua hai.sunder aashawadi rachna par badhayi.

लक्ष्‍मीकांत त्रिपाठी 3/17/2011 10:36 PM  

aapke BETOO ko lad-pyar aur namaste! aap bahumukhee pratibha ki dhanee hain, apmen apar sambhavnayen hain. aas jagaye rakhiye! laxmi Kant.

वन्दना 6/13/2011 12:48 PM  

ये मन रूपी जुलाहा बहुत निर्मम होता है …………बेहद संवेदनशील रचना।

Maheshwari kaneri 6/13/2011 5:04 PM  

बहुत सुन्दर ।
ये दुनिया ही एक भ्रम जाल है ।

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