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कतरने ख़्वाबों की

>> Sunday, June 26, 2011


ख्वाब मेरे 
कपड़े की 
कतरनों के माफिक 
कटे फटे 
जब भी सहेजना चाहा 
कतरनों की तरह ही 
बिखर जाते हैं 
फिर भी 
मैं उन्हें सहेज 
रख लेती हूँ 
दिल के लिफ़ाफ़े में 
जब कोई चाहता है 
तो उनसे बना देता है 
कोई सुन्दर सा 
पैच वर्क 
और मैं 
उसी में खो जाती हूँ ,


जैसे ही 
पुराना पड़ता है 
पैचवर्क 
तो 
लगाने वाला 
खुद ही उखाड फेंकता है 
और मैं 
उन कतरनों की कतरनें 
देखती रह जाती हूँ ...

88 comments:

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' 6/26/2011 3:56 PM  

'ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं
फिर भी
मैं उन्हें सहेज
रख लेती हूँ'

ख्वाबों को भी सहेजना आवश्यक होता है कभी-कभी...अच्छा प्रयास...बहुत सुन्दर

रेखा श्रीवास्तव 6/26/2011 4:03 PM  

सच ही कहा है अपने , इन कतरनों कि तरह ही तो संजो कर रखे जाते हैं ख़्वाब.

वन्दना 6/26/2011 4:19 PM  

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (27-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

वन्दना 6/26/2011 4:20 PM  

उफ़ ………॥कतरनो की कतरनें……………कितना दिल दुखाती हैं ना…………सारा दर्द उतार दिया।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद 6/26/2011 4:29 PM  

कतरनों कि उतरन भी सहेज रखना एक कला ही तो है:)

kshama 6/26/2011 4:38 PM  

Khwabon kee katrane! Kitni anoothee kalpana hai!

शिखा कौशिक 6/26/2011 4:51 PM  

Sangeeta ji sach hi likha hai aapne .aabhar

रविकर 6/26/2011 4:54 PM  

बहुत दिनों से थी मुझे, बेसब्री-इन्तजार |

आज इधर आ ही गई, रचना मयी बहार |

रचनामयी बहार, अजी टिप्पणियां प्यारी |

करती रहीं सदैव, पोस्ट पर बारी-बारी|

अब रविकर है मस्त, करे कुछ ऐसा अद्भुत |

मिल जाएगा स्नेह, आभारी हूँ बहुत-बहुत ||

प्रतिभा सक्सेना 6/26/2011 4:56 PM  

कतरंने सहेज कर आप जिस रचनात्मकता से उन्हें नये रूप में टाँक देती हैं वह भी प्रशंसनीय है ,संगीता जी !

Dr (Miss) Sharad Singh 6/26/2011 5:08 PM  

ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं
फिर भी
मैं उन्हें सहेज
रख लेती हूँ
दिल के लिफ़ाफ़े में ...


आपकी लेखनी में जादू है आपकी कविताएं मन को छूने में कामयाब रहती हैं |
बधाई और शुभकामनाएं |

Maheshwari kaneri 6/26/2011 5:12 PM  

ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं
फिर भी
मैं उन्हें सहेज
रख लेती हूँ'...ख्वाबों को सहेजना ही पड़्ता है नहीं तो पूरी कैसे होंगी.....?संगीता जी !बहुत सुन्दर...

रविकर 6/26/2011 5:15 PM  

कतरन कतरन रह गई, उनका मन बहलाय |

इच्छुक को तो मिल गई, चिज्जी जोड़ लगाय

चिज्जी जोड़ लगाय, कलेजे की ये कतरन --

खुब आनंद उठाय, जीत लेते हो हर मन |

फिर रविकर अफ़सोस, भला करते केहि कारन |
फिर से कुछ बन जाय, जुड़ें फिरसे वो कतरन ||

है व्यर्थ |
ढूंढे न अर्थ ||

प्रेरित करती रचना

बहुत-बहुत बधाई ||

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 6/26/2011 5:21 PM  

बहुत ही बेहतरीन कविता है.

सादर

ashish 6/26/2011 5:27 PM  

ख्वाबों की कतरने इकठ्ठा करके बनायीं चादर , सच ही तो कहता हूँ आप कम शब्दों से ही भर देती हो गागर .

रचना दीक्षित 6/26/2011 5:35 PM  

कतरनों को तो सहेज ही लेना चाहिए ख्वाब नहीं तो उनकी कतरनें ही सही...... बहुत सुन्दर

प्रतुल वशिष्ठ 6/26/2011 5:39 PM  

ख़्वाबों को नये बिम्ब प्रदान करते भाव.
इतना तो जरूर है कि आपके ख्वाब रंगीन कतरनों से बने हैं.

Sadhana Vaid 6/26/2011 5:51 PM  

ख़्वाबों की कतरनें भी ख़्वाबों सी ही प्यारी होती हैं और हम उन्हें सहेजते ही रहते हैं आख़िरी सांस तक ! बहुत कमनीय अहसासों के साथ बहुत ही कोमल रचना ! बहुत सुन्दर !

दिगम्बर नासवा 6/26/2011 5:53 PM  

कमाल का लिखा है .. टूटे ख़्वाबों की कतरनों से सिलना किसी के जीवन को ... पैचवर्क की तरह ...

Dr Varsha Singh 6/26/2011 6:03 PM  

ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं ....


नई उपमाओं की सुन्दर कविता के लिए बधाई...

Mrs. Asha Joglekar 6/26/2011 6:10 PM  

इन्हीं कतरनों से जब आप खूबसूरत ऱजाई बना देती हैं तो इसकी गरमाहट कितनी सुखद होती है । सुंदर कविता ।

प्रवीण पाण्डेय 6/26/2011 6:30 PM  

ख्वाब हमारी निर्धनता ढक लेते हैं।

Er. सत्यम शिवम 6/26/2011 6:30 PM  

जैसे ही
पुराना पड़ता है
पैचवर्क
तो
लगाने वाला
खुद ही उखाड फेंकता है
और मैं
उन कतरनों की कतरनें
देखती रह जाती हूँ ...

वाह आंटी..कितनी सूक्ष्मता से आपने तह तक जाकर मनोदशा का सजीव चित्रण किया है..आपकी कवितायें बार बार पढ़ने को मन करता है...बहुत सुंदर।

सुशील बाकलीवाल 6/26/2011 6:32 PM  

सृजनात्मकता - कतरनों की । रोचक...

prerna argal 6/26/2011 6:41 PM  

kataranon ke madhyam se bahut gahrai liye hue bahut sunder aur saarthak rachanaa,badhaai sweekaren.

मनोज कुमार 6/26/2011 6:43 PM  

कतरनों से पैचवर्क करने में भी एक डिजाइन होता है और कई बर वह ओरिजिनल से भी अच्छा लगता है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 6/26/2011 7:12 PM  

कतरनों को सिल कर ही वस्त्र बनता है!
--
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) 6/26/2011 7:15 PM  

कतरनों की बनती-बिगडती तक़दीर को चाहे-अनचाहे आत्मसात करना ही जीवन का सच है.

अनामिका की सदायें ...... 6/26/2011 7:20 PM  

अगर कतरनो को जोड कर ही खवाब का रूप देना है तो ऐसा ही सही,,,सहेज कर रखते जाईये....शायद कभी ये ख्वाब पुरे हो जायें और आपकी मेहनत सफल हो जायें.

Kailash C Sharma 6/26/2011 7:30 PM  

ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं ...

बहुत ख़ूबसूरत विम्ब..ख़्वाबों की कतरनों को सहेजते ही तो ज़िंदगी गुज़र जाती है..बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी अहसास..बहुत सुन्दर..आभार

s n shukla 6/26/2011 7:35 PM  

bahut sundar rachana,jeewan ki asaliyat aur sach ke bahut kareeb,badhai- S.N.Shukla

sushma 'आहुति' 6/26/2011 7:38 PM  

bhut hi acchi shabd rachna...

सम्वेदना के स्वर 6/26/2011 8:20 PM  

संगीता दी!

इस कविता ने तो बचपन में पहुँचा दिया.. बचे हुए ऊन के गोलों से माँ स्वेटर बनाती थी और वो स्वेटर एक अलग ही ख़ूब्सूरती लिए होता था..
ऐसा ही होता है छोटे छोटे ख़्वाबों की कतरनों को सजाना और उनसे एक नया ख्वाब, एक नई ज़िन्दगी..
हाँ उस स्वेटर को दुबारा उधेड़ा नहीं करते थे.. ख़्वाबों के टुकड़े बटोरना, सँजोना और बिखेर देना फिर!! कमाल की कविता है दी!

- सलिल

S.M.HABIB 6/26/2011 8:27 PM  

अनुपम उपमा दी...नया प्रयोग...
सादर....

Er. सत्यम शिवम 6/26/2011 8:49 PM  

आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके पोस्ट की है हलचल...जानिये आपका कौन सा पुराना या नया पोस्ट कल होगा यहाँ...........
नयी-पुरानी हलचल

रश्मि प्रभा... 6/26/2011 8:58 PM  

main bhi bas dekh rahi hun khwaabon ki katranon ko

मनोज भारती 6/26/2011 9:09 PM  

अच्छे रूपकों से सजी एक सुंदर कविता ।

Roshi 6/26/2011 9:56 PM  

khuooab sach mein katrano ki mafik hi hote hai ....bilkul sach likha hai aapne

ब्लॉ.ललित शर्मा 6/26/2011 9:58 PM  

कतरा-कतरा मिल कर दरिया बनता है।

सुंदर भाव हैं कविता के

आभार

दर्शन कौर धनोए 6/26/2011 10:08 PM  

कतरने इक्कठा करके आपने एक खूबसुरत शाल बुन दिया ..संगीता दी ..वाह !!!

कुश्वंश 6/26/2011 10:23 PM  

'ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं
फिर भी
मैं उन्हें सहेज
रख लेती हूँ'

ये दिल है जो ख्वाबों को कोलाज़ बना लेता है और जी लेता है पलभर और बिना इंतज़ार बिखर भी जाता है कोलाज़ . संगीता जी बेहद ख़ूबसूरती से अलफ़ाज़ दिए है जीवन के सच्चाई को अभिवादन सहित बधाई

anshuja 6/26/2011 10:28 PM  

"और मैं
उन कतरनों की कतरनें
देखती रह जाती हूँ ..."
prashnsaneeya panktiyaan. utkrisht rachna.

Vaanbhatt 6/26/2011 10:37 PM  

कबाड़ का सदुपयोग...कतरनों का पैबंद...लेकिन कितने रंग-बिरंगे होते हैं...ख्वाब को सँवार लें...तो जिंदगी उतनी ही रंगीन है...

सतीश सक्सेना 6/26/2011 10:51 PM  

ख्वाब अक्सर पूरे नहीं होते ...सहेजे जा सकते हैं !
शुभकामनायें आपको !

Taru 6/26/2011 11:00 PM  

मम्मा,
बहुत अच्छा था ख्याल.......मगर नज़्म और भी स्याह होती तो मज़ा आ जाता...:)
बहरहाल..बधाई

प्रणाम !

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 6/26/2011 11:42 PM  

ख्वाबों को कतरन !!!! वाह , बिलकुल ही नई कल्पना है . जब पीडाओं को शब्द नहीं मिल पाते , तब उपमा ही एक मात्र सहारा बन जाती है , अभिव्यक्ति के करीब पहुँचाने का.

Suman 6/27/2011 6:28 AM  

जब भी सहेजना चाहा
कतरनोंकी तरह
ही बिखर जाते है ! सच कहा है
बहुत सुंदर रचना

वाणी गीत 6/27/2011 6:36 AM  

कारणों की तरह ही सिमटना और बिखरना ...
ख्वाब सहेजे भी और बिखेरे भी ...
मिलना बिछड़ना जीवन झरना ...दोनों ही एहसास एक साथ प्रतिबिंबित हो रहे हैं ...
सुन्दर प्रयोग ...
आभार !

अनुपमा त्रिपाठी... 6/27/2011 8:14 AM  

स्मृतियाँ ...जो बनातीं हैं ,बढ़तीं हैं ...सृजनात्मकता ...!!
सुंदर कविता.

Gopal Mishra 6/27/2011 9:29 AM  

आपकी कृति प्रशंशनीय है. अच्छी कल्पना .

Babli 6/27/2011 10:32 AM  

वाह संगीत जी! बहुत खूब लिखा है आपने! आपकी लाजवाब कविता को पढ़कर तारीफ़ के लिए अल्फाज़ कम पर गए! अद्भुत सुन्दर कल्पना!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

निवेदिता 6/27/2011 11:53 AM  

कतरनों की कतरने और वो भी ख़्वाबों की ....बहुत खूब .....सादर !

सदा 6/27/2011 12:01 PM  

ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं

गहन भावों का समावेश हर पंक्ति में ...।

Kunwar Kusumesh 6/27/2011 2:45 PM  

ख्वाबों की कतरनों में भी कविता की झलक, वाह.
कविता में है पोशीदा जीवन की महक, वाह.

Anita 6/27/2011 3:25 PM  

बहुत सुंदर और एकदम नयी उपमा दी है आपने आपने ख्वाबों को... जब पुराने, पुराने पड़ जाएँ तो नए ख्वाब सजा लें!

रोहित 6/27/2011 3:55 PM  

जैसे ही
पुराना पड़ता है
पैचवर्क
तो
लगाने वाला
खुद ही उखाड फेंकता है
और मैं
उन कतरनों की कतरनें
देखती रह जाती हूँ ...

JEEVAN KI HAKIKAT BHI KUCH AISI HI HAI...DIL KO CHHU GAYI RACHNA!

Surendra shukla" Bhramar"5 6/27/2011 6:36 PM  

संगीता जी अभिवादन सुन्दर रचना -बहुत खूब दर्द भर गया भावनाओं और सपनों के साथ लोगों का खिलवाड़ ....अब सब सपने सच हो जाएँ

शुक्ल भ्रमर ५

ख्वाब मेरे..
तो
लगाने वाला
खुद ही उखाड फेंकता है
और मैं
उन कतरनों की कतरनें
देखती रह जाती हूँ ...

udaya veer singh 6/27/2011 6:38 PM  

जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं ......
उपेक्षा में अपेक्षा की भावना मजबूत जिगरा ही कर सकता है ,सराहनीय सृजन .../

veerubhai 6/27/2011 7:04 PM  

अच्छी रचना !संगीता जी ये कतरनें ही खबर बनतीं हैं प्रूफ रीडिंग के बाद .

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" 6/27/2011 7:50 PM  

dhaara prawah se bahtee khubsoorat rachna......

वीना 6/27/2011 7:59 PM  

फिर भी इसी तरह जीवन चलता है इन्हीं कतरनों के सहारे...
बहुत सुंदर...

डॉ॰ मोनिका शर्मा 6/27/2011 10:56 PM  

'ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं
फिर भी
मैं उन्हें सहेज
रख लेती हूँ'

कितनी गहरी बात लिए पंक्तियाँ..... सच यूँ सहेजना होता है ख्वाबों को आम जीवन में.....

shikha varshney 6/28/2011 5:27 AM  

हम्म ..दुबारा आती हूँ .

Rajeev Bharol 6/28/2011 6:09 AM  

बहुत ही प्यारा लिखा है संगीता जी.

Mayank Bhardwaj 6/28/2011 7:22 AM  

बहुत ही बेहतरीन कविता है.

संगीता जी आप उस कोड में अपने ब्लॉग का लिंक चेक करे उसमे आपके ब्लॉग का लिंक http://geet7553.blogspot.com/ होना चाहिए अगर तब भी नहीं खुलता तो आप मुझे मेल करे मेरी मेल आईडी है mayankaircel@gmail.com

सागर शर्मा 6/28/2011 9:37 AM  

ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं
फिर भी
मैं उन्हें सहेज
रख लेती हूँ
दिल के लिफ़ाफ़े में ...

कतरनों की तरह ज़िन्दगी के फलसफो को बताती अद्भुत रचना
वाकई मैं जादू है आपकी रचनाओं मैं
धन्यवाद

Arunesh c dave 6/28/2011 10:15 AM  

बहुत ही सुंदरता से बात कही है आपने

निर्मला कपिला 6/28/2011 10:59 AM  

कतरनों की कतरने---- ये अधिक पीडा देती हैं। मार्मिक अभिव्यक्ति।

निर्मला कपिला 6/28/2011 10:59 AM  

कतरनों की कतरने---- ये अधिक पीडा देती हैं। मार्मिक अभिव्यक्ति।

Anand Dwivedi 6/28/2011 4:03 PM  

didi bachha bahut din baad aaya hai paon chhu raha hun.
जब कोई चाहता है
तो उनसे बना देता है
कोई सुन्दर सा
पैच वर्क
और मैं
उसी में खो जाती हूँ ,
..
didiaapke likhe par koi tippadi nahi aapko pata hai jeewan ka nichod.

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri 6/28/2011 10:02 PM  

बहुत ही सुन्दर भाव पूर्ण प्रस्तुति ..संजो कर रखने की जिजीविषा ..अपार शुभ कामनाएं....

girish pankaj 6/28/2011 11:02 PM  

chhoti magar sashakt kavitaa, vicharon ki saraniyaan sath-sath chalati hai isame.

Udan Tashtari 6/29/2011 1:51 AM  

सशक्त उम्दा रचना....

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri 6/29/2011 6:54 AM  

बहुत ही सुन्दर है आपकी कोमल भावनाओं का संसार....कोटि कोटि शुभकामनाएं एवं अभिनन्दन...

saanjh 6/29/2011 10:21 AM  

dadiiiiiiiii...............

aap kabhi puraani nahin hoti na....forever young....!!! main muddat baad aayi....par aap utni hi dilkash mili.....luvv uuuuu


PS please ye mat kehna ke main bhool gayi....bas aana nahin hua...kaii kaaran the :(

Navin C. Chaturvedi 6/29/2011 4:29 PM  

शब्दों की कारीगरी कोई आप से सीखे

अनुपमा पाठक 6/29/2011 7:13 PM  

सहेजने का क्रम चलता रहे!
सुन्दर!

S.N SHUKLA 6/29/2011 11:35 PM  

ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
जब भी सहेजना चाहा
कतरनों की तरह ही
बिखर जाते हैं

bahut sundar prastuti.

Madhu chaurasia, journalist 6/30/2011 6:01 AM  

बहुत खूबसूरत ख्वाब हैं....कतरनों में ही सही....

Madhu chaurasia, journalist 6/30/2011 6:01 AM  

बहुत खूबसूरत ख्वाब हैं....कतरनों में ही सही....

अनुपमा त्रिपाठी... 7/01/2011 11:59 AM  

आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है कल ..शनिवार(२-०७-११)को नयी-पुराणी हलचल पर ..!!आयें और ..अपने विचारों से अवगत कराएं ...!!

Amrita Tanmay 7/02/2011 5:32 PM  

न्यारी है.. कतरनें..ख़्वाब..सहेजना..बहुत ही खूबसूरत

शोभना चौरे 7/02/2011 11:54 PM  

ख्वाब और कतरने बहुत सुन्दर बिम्ब |

कुमार राधारमण 7/03/2011 11:43 PM  

हश्र कुछ भी हो,आस ही संबल है।

manukavya 7/12/2011 11:00 AM  

ख्वाब मेरे
कपड़े की
कतरनों के माफिक
कटे फटे
ख़्वाब कतरनों से ही तो होते हैं... यहाँ वहाँ से जोड़ कर चाहो तो ख़ूबसूरत पैचवर्क बनालो... नहीं तो कतरनें तो कतरनें ही रहती हैं ...

shephali 7/14/2011 10:57 PM  

मैं उन्हें सहेज
रख लेती हूँ
दिल के लिफ़ाफ़े में



didi apko parikalpna pe dekha bahut baar bt padha aaj

bahut sundar likha hai :)

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