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कृष्ण की व्यथा

>> Thursday, January 5, 2012





नहीं कहा था मैंने 
कि 
गढ़ दो तुम 
मुझे मूर्तियों में 
नहीं चाहता था मैं 
पत्थर होना 
अलौकिक रहूँ 
यह भी नहीं रही 
चाहना मेरी ,


पर मानव 
तुम कितने 
छद्मवेशी हो 
एक ओर तो 
कर देते हो 
मंदिर में स्थापित 
और फिर 
लगाते हो आरोप 
और उठाते हो प्रश्न 
कि 
क्या सच ही 
"कृष्ण" भगवान था ? 

तुम राधा संग 
मेरे प्रेम को 
तोलते हो तराजू पर 
भूल जाते हो कि मैं 
स्थापित कर रहा था 
उस अलौकिक प्रेम को 
जो तन से नहीं 
मन से किया जाता है ,

महारास भी रचाया था 
यह जताने के लिए 
कि मन की आज़ादी ही 
कर सकती है 
आत्मविभोर 
पर तुमने तो 
कर दिया खड़ा मुझे 
कटघरे में  रसिया कह .

पांचाली मेरी सखा 
जिससे मैं 
मन की कहता था
उसके मन की 
गुनता था , 
नहीं खोल पाए 
तुम्हारे चक्षु 
और आज भी तुम 
पड़े हो  इस फेर में 
कि क्या विपरीत लिंगी 
हो सकते हैं 
सच्चे मित्र ?

मैंने तो जिया जीवन 
मात्र साधारण मानव का 
सारी ज़िंदगी 
दुखों के बोझ तले
व्यतीत हुआ हर पल 
श्राप को धारण कर 
कर लिया 
मृत्यु का वरण ,

लेकिन तुम 
आज भी मुझे 
पत्थर में गढते हो 
और अपने सुख की
कामना करते हो . 
अपने स्वार्थ हेतु 
मेरा बलिदान मत लो 
मैं कृष्ण हूँ 
मुझे कृष्ण ही 
रहने दो ..

103 comments:

अनुपमा त्रिपाठी... 1/05/2012 7:26 AM  

महारास भी रचाया था
यह जताने के लिए
कि मन की आज़ादी ही
कर सकती है
आत्मविभोर ....


मन को तन से ऊपर रखती हुई ...गहन और बहुत सार्थक ...सुंदर अभिव्यक्ति ......!!

प्रवीण पाण्डेय 1/05/2012 8:15 AM  

व्यक्तित्व की गति की अर्चना हो..

ऋता शेखर 'मधु' 1/05/2012 8:19 AM  

तुम राधा संग
मेरे प्रेम को
तोलते हो तराजू पर
भूल जाते हो कि मैं
स्थापित कर रहा था
उस अलौकिक प्रेम को
जो तन से नहीं
मन से किया जाता है ,

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

वाणी गीत 1/05/2012 8:49 AM  

समस्त कुंठाओं का विसर्जन करते हुए अलौकिक प्रेम के साथ मित्र , पुत्र , राजा , भाई सभी के रुप में कृष्ण ने समाज के सामने रिश्तों के आदर्श प्रस्तुत किये ...
लोंग बस अपनी सुविधा से उसके रसिया छवि पर ही अटके रहे या मूर्तियों में गढ़ते रहे !
भावपूर्ण रचना !

रविकर 1/05/2012 9:26 AM  

शुक्रवार भी आइये, रविकर चर्चाकार |

सुन्दर प्रस्तुति पाइए, बार-बार आभार ||

charchamanch.blogspot.com

अनुपमा पाठक 1/05/2012 9:31 AM  

प्रभु की व्यथा/आत्मकथ्य आपकी लेखनी से पढ़कर मन अभिभूत है!

सादर प्रणाम, संगीता जी!!!

ज्ञानचंद मर्मज्ञ 1/05/2012 9:56 AM  

सचमुच आज इसी नज़रिए को बदलने की आवश्यकता है !
प्रस्तुति मन को छू गई !

संतोष त्रिवेदी 1/05/2012 9:57 AM  

इंसान को भगवान भी पहचानने लगा है ,
अच्छा हुआ कि अपने बनाए को जाना है !

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 1/05/2012 9:57 AM  

दृग हों ज्यों मीरा का मन
या सूर से पायें नयन
तब कहीं जाकर दिखेंगे
तुमको स्वयम् में ही किसन.

रचना की जितनी तारीफ की जाय कम है.अद्भुत कल्पना ने कृष्ण-दर्शन का मार्ग प्रशस्त किया है,
वाह !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 1/05/2012 10:05 AM  

सुन्दर और सटीक

नया ब्लॉग 'बेसुरम' http://besurm.blogspot.com आपक स्वागत के लिए उत्सुक है

रश्मि प्रभा... 1/05/2012 10:19 AM  

महारास भी रचाया था
यह जताने के लिए
कि मन की आज़ादी ही
कर सकती है
आत्मविभोर
पर तुमने तो
कर दिया खड़ा मुझे
कटघरे में रसिया कह ...इन्सान तुमने ईश्वर को भी तौल ही दिया

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 1/05/2012 10:19 AM  

संगीता दी,
कृष्ण को समझने में तो सबने भूल की है... जो हाथ में बांसुरी को धारण करता है, वही कुरुक्षेत्र में अर्जुन को शस्त्र उठाने की शिक्षा देता है, जो गोपियों के वस्त्र हरण कर उनके साथ ठिठोली करता है, वही पांचाली के वस्त्र हरण के समय उसकी लाज बचाता है... जो गोपियों के संग रास रचाता है वही गीता का ज्ञान देता है.. जीवन के दुखों से पलायन कर जो सन्यासी बने हैं, उन्हें आनंद के अतिरेक से संन्यास का ज्ञान प्रदान करता है... जो सूर को शिशु से आगे नहीं दिखता, वही मीरा को 'दूसरो न कोइ' के रूप में नज़र आता है!!
बहुत अच्छी कविता दी! कृष्ण को सही अर्थों में परिभाषित करती!

मनोज कुमार 1/05/2012 10:34 AM  

यदि व्यक्ति का ईश्वतर पर विश्वास नहीं है, या वह मानता है कि कोई कृपा करने वाला नहीं है तो उसके ऊपर ईश्वर कैसे कृपा करेंगें। जब कृपा ही नहीं होगी तो दुख रूप संसार में उसे सुख शांति नहीं प्राप्त/ होगा, क्यों कि जो उन्हें जानता है उसे ही शांति मिलती है अन्य को नहीं।

मुदिता 1/05/2012 10:42 AM  

दीदी ,

मैंने तो जिया जीवन
मात्र साधारण मानव का
सारी ज़िंदगी
दुखों के बोझ तले
व्यतीत हुआ हर पल
श्राप को धारण कर
कर लिया
मृत्यु का वरण ,

बिकुल सही.... साधारण मानव में ही तो छिपे हैं कृष्ण... किन्तु मानव ..सिर्फ भुना रहा है उनको भगवान बना कर अपने स्वार्थपूर्ण क्षुद्र कृत्यों को प्रतिपादित करने के लिए ....सुन्दर सोच..सुन्दर भाव... काश कृष्ण की पीड़ा समझ पाए साधारण मानव ..

सदा 1/05/2012 11:00 AM  

मैं कृष्ण हूँ
मुझे कृष्ण ही
रहने दो ..
नि:शब्‍द करती यह अभिव्‍यक्ति ...गहनता लिए सटीक लेखन के.. आभार ।

यादें....ashok saluja . 1/05/2012 11:35 AM  

भगवान भी ...आज के इंसान से पनाह मांग रहा है ...... गहरे भाव लिए रचना ...

ashish 1/05/2012 11:39 AM  

कृष्ण को सच्चे अर्थो में परिभाषित करती सशक्त रचना .

Sadhana Vaid 1/05/2012 12:10 PM  

कृष्ण के मन की वेदना को सटीक अभिव्यक्ति दी है आपने संगीता जी ! कृष्ण ही एक ऐसे देवता रहे हैं जिनसे मनुष्य ने अपेक्षा भी बहुत की है तो उनकी रासप्रियता के लिये उनकी आलोचना भी बहुत की है, उनके बाल लीलाओं पर बलि-बलि न्यौछावर हुए हैं तो कौरव पांडवों के बीच हुए धर्मयुद्ध में दिव्य ज्ञान के लिये भी उनकी ही मुखापेक्षा की है ! इन्हीं से सब कुछ चाहा है और इन्हें ही हमेशा कटघरे में खड़ा भी किया है ! इस अद्भुत कृति के लिये आप बधाई की पात्र हैं संगीता जी ! शुभकामनायें !

Amrita Tanmay 1/05/2012 12:25 PM  

बेहद खूबसूरती से आपने कृष्ण-दर्शन कराया है ..

Anita 1/05/2012 12:37 PM  

सच है मानव या तो भगवान को सिंहासन पर बैठा देता है या उस पर ही सवाल खड़ा कर देता है...

Swati Vallabha Raj 1/05/2012 12:48 PM  

जीवन में कृष्ण के रंग आत्म-सात कर ले तो फिर कहना ही क्या? बहुत सुन्दर रचना और मानव स्वभाव को उद्गारित करती हुई |

Suman 1/05/2012 1:04 PM  

भले ही गीता पर हजारो टिकायें लिखी गई है फिर भी,
कृष्ण मनुष्य की समझ के बाहर है ! बहु आयामी व्यक्तित्व का नाम
कृष्ण है ! अगर इस व्यक्तित्व के बारे जरा सा भी कुछ जानना समझना हो
तो उनपर लिखी हुई ओशो की गीता-दर्शन आठ खण्डों में उपलब्ध है !
और एक पुस्तक है ---कृष्ण और हँसता हुआ धर्म"
कृष्ण ओशो के द्वारा इन प्रवचनों में फिर से सद्यस्नात इस धरतीपर
अवतरित हुये है !

इसमें कोई संदेह नहीं रचना सुंदर है !

वन्दना 1/05/2012 1:13 PM  

बेह्द उम्दा और गहन अभिव्यक्ति…………कृष्ण की व्यथा का शानदार चित्रण्।

सतीश सक्सेना 1/05/2012 1:37 PM  

हम किसी की व्यथा को समझने का प्रयत्न ही नहीं करते...भगवान भी हार गए इंसान से :-)

shikha varshney 1/05/2012 2:07 PM  

क्या लिख दिया दी :) पल पल अचंभित करती हो अपनी रचनात्मक योग्यता से.
कभी कृष्ण की तरफ से किसी ने ऐसा सोचा न होगा.
पर मानव
तुम कितने
छद्मवेशी हो
वाकई ..दीखता कुछ और है, होता कुछ और ही है.पल पल गिरगिट की तरह रंग बदलता मानव.बेचारे भगवान की भी कहाँ चलनी थी .

अनामिका की सदायें ...... 1/05/2012 2:46 PM  

kuchh to log kahenge...logon ka kaam hai kahna....bas yahi soch aati hai insaan ki tark-vitark pravarti ko dekh kar.

bahut acchhi prastuti.

Monika Jain "मिष्ठी" 1/05/2012 3:00 PM  

तुम राधा संग
मेरे प्रेम को
तोलते हो तराजू पर
भूल जाते हो कि मैं
स्थापित कर रहा था
उस अलौकिक प्रेम को
जो तन से नहीं
मन से किया जाता है
bahut sundar rachna...aabhar

कुश्वंश 1/05/2012 3:21 PM  

कृष्ण को सही अर्थों में देखने की कोशिस. कृष्ण तो भगवान् थे और प्रभु मूरत जो जैसे देखना चाहे दिखती है उसे. चाहो तो भगवान् नहीं तो पत्थर. एक बार फिर उत्क्रिस्ट साहित्य के लिए बधाई संगीता जी

kshama 1/05/2012 4:07 PM  

Kya gazab kee rachana hai!

dheerendra 1/05/2012 4:58 PM  

कृष्ण जी व्यथा जायज है,
गहन अभिव्यक्ति की बहुत सुंदर रचना,..

नई रचना --काव्यान्जलि--जिन्दगीं--

Mamta Bajpai 1/05/2012 5:07 PM  

थोड़े शब्दों मे ही आपने पूरा कृष्ण चरित्र .....और मन की कसक कह डाली ...पर ये मनुष्य तो उसी की माया है ..इसका स्वभाव ही है अपनी सुविधा के अनुरूप बात का अर्थ निकालना है ...बहुत ही अतभुत रचना बधाई

रजनीश तिवारी 1/05/2012 8:36 PM  

बहुत अच्छी और सार्थक रचना ...

इस्मत ज़ैदी 1/05/2012 9:14 PM  

एक ओर तो
कर देते हो
मंदिर में स्थापित
और फिर
लगाते हो आरोप
और उठाते हो प्रश्न
कि
क्या सच ही
"कृष्ण" भगवान था ?

क्या लिखती हैं आप !!!
कृष्ण की व्यथा को तो हम समझ ही नहीं पाते वो तो भगवान हैं अत: उन का दुख हमें दुख ही नहीं लगता
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !!

Naveen Mani Tripathi 1/05/2012 9:40 PM  

नहीं खोल पाए
तुम्हारे चक्षु
और आज भी तुम
पड़े हो इस फेर में
कि क्या विपरीत लिंगी
हो सकते हैं
सच्चे मित्र ?

bahut hi sundartam dhang se ap ne krshn ke bare me faile mithak ki vyakhaya ki hai ....manav aur eshawar .... ki vichar dharon ke roop ka darshn karaya hai ... bhaut bahut abhar ke sath hi badhai .

sangita 1/05/2012 11:14 PM  

सादर वन्दे , कृष्ण की व्यथा का सही चित्रण किया है आपने , हमने अपने स्वार्थ वश कृष्ण को मानव \ईश्वर बना लिया है |

Soma Mukherjee 1/05/2012 11:55 PM  

वाह बहुत सुन्दर रचना संगीता जी..
अपने छलावो से रखो दूर
अपने शब्दों में मत उलझाओ
मैं कृष्ण हूँ मुझे कृष्ण ही रहने दो...

दिलीप 1/06/2012 2:49 AM  

yahi vyatha hai aaj ke samaaj ki..ishwar ko bhi na chhoda....pehle usne insaan bnaye..fir insaano ne bhagwaan...

रेखा श्रीवास्तव 1/06/2012 8:47 AM  

कृष्ण के रूप, स्वरूप और कृत्य को अगर मानव् समझ ले तो फिर इस जग का स्वरूप कुछ और ही हो जाए. गीता सिर्फ धर्मग्रंथों के ढेर में रखी जाती है उसके उवाच के मर्म को कितने ने समझा है.? कह दो कृष्ण से मानव महान है तभी तो वह राम से लेकर कृष्ण, शिव और बुद्ध सभी पर प्रश्न चिह्न उठाता रहता है.

NISHA MAHARANA 1/06/2012 8:50 AM  

पड़े हो इस फेर में
कि क्या विपरीत लिंगी
हो सकते हैं
सच्चे मित्र ?bahut achchi panktiyan sangeeta jee.thanks.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 1/06/2012 9:17 AM  

पर मानव
तुम कितने
छद्मवेशी हो
एक ओर तो
कर देते हो
मंदिर में स्थापित
और फिर
लगाते हो आरोप
और उठाते हो प्रश्न
कि
क्या सच ही
"कृष्ण" भगवान था ?
बहुत खूब , काश कि इंसान स्वभाव से ही ऐसा दोगला नहीं होता !

प्रतिभा सक्सेना 1/06/2012 10:44 AM  

सुन्दर प्रस्तुति !

Vijai Mathur 1/06/2012 10:48 AM  

योगीराज श्री कृष्ण की व्यथा के माध्यम से संदेश काफी अच्छा दिया है आपने तो, किन्तु बुद्धिजीवी समझे तो?

'राधा' कृष्ण की मामी का नाम था तो उनके लिए माँतृ-तुल्य थीं । 'कुरान'की तर्ज पर विदेशी शासकों द्वारा गढ़वाए पुराण मे राधा-कृष्ण 'रास'की चर्चा करके श्री कृष्ण का घोर अपमान किया गया है।

आजादी के बाद भी अपने सांस्कृतिक इतिहास मे सुधार न करना गुलाम मानसिकता का ही द्योतक है।

vidya 1/06/2012 11:55 AM  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...
सगीता दी आपने सच्ची, कान्हा की सशक्त वकालत की है..वो भी अभिभूत होंगे इसे पढ़ कर..
सादर.

veerubhai 1/06/2012 2:33 PM  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति भाव की अनुभाव की राग की विराग की .

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 1/06/2012 2:35 PM  

yah Prasang yaad ata hai aapki rachna ko padh kar...Facebook me kai jagah par maine logo ko likhte dekha hai... Bhagwaan kare to Leela aur ham kare to character dheela.... kaisee tauheen hai ye prabhu kee...shayad ye un logo kaa agyaan hai jinhone prabhu kee leela aur unke jeewan ke Darshan ko nahi jaana ...aapne yah kavita likh kar sacchi baat sabke sammukkh rakhi... aapka aabhaar

रेखा 1/06/2012 6:43 PM  

गहरी और अर्थपूर्ण प्रस्तुति ..

Urmi 1/06/2012 7:01 PM  

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ भावपूर्ण रचना! दिल को छू गई!

उपेन्द्र नाथ 1/06/2012 8:44 PM  

krishna ki vyatha ko aapne bahut hi sunder dhang se prastut kiya hai... badiya post.

मन के - मनके 1/06/2012 10:20 PM  

मैं कृष्ण हूं,मुझे कृष्ण ही रहने दो.भगवान भी मानवीय दोषारोपण से नही बच पातें हैं.प्रेम की अनुभूति सार्वभौम हैं,जहां सीमाएं निरर्थक हैं,जिन्होंने सीमाएं बांधी वे इस अमृत को चख भी ना सके.सार्थक प्रस्तुति.

अनुपमा त्रिपाठी... 1/06/2012 11:43 PM  

आपकी किसी पोस्ट की चर्चा नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 7/1/2012 को होगी । कृपया पधारें और अपने अनमोल विचार ज़रूर दें। आभार.

dheerendra 1/07/2012 9:10 AM  

गहन सार्थक सुंदर रचना......
--जिन्दगीं--

Kunwar Kusumesh 1/07/2012 9:11 AM  

जय श्री कृष्ण .
सुन्दर प्रस्तुति .
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 1/07/2012 10:47 AM  

अपने स्वार्थ हेतु
मेरा बलिदान मत लो
मैं कृष्ण हूँ
मुझे कृष्ण ही
रहने दो ..

बिलकुल सही बात कही आंटी।

सादर

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 1/07/2012 2:55 PM  

अभूतपूर्व रचना आदरणीय संगीता दी....
सचमुच... अद्भुत.
सादर.

Onkar 1/07/2012 8:49 PM  

bahut sundar rachna

dheerendra 1/08/2012 12:25 AM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति,मन की भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति ......
WELCOME to--जिन्दगीं--

sushila 1/08/2012 11:11 AM  

"पांचाली मेरी सखा
जिससे मैं
मन की कहता था
उसके मन की
गुनता था ,
नहीं खोल पाए
तुम्हारे चक्षु
और आज भी तुम
पड़े हो इस फेर में
कि क्या विपरीत लिंगी
हो सकते हैं
सच्चे मित्र ?"

विपरीत लिंगी मित्रता संशय से परे कहाँ है संगीता जी ! राधा-कृष्ण का जाप सभी करते हैं किन्तु कितने व्यक्ति इस प्रकार की मित्रता को स्वीकार कर सकते हैं पूरी पावनता के साथ!
अपने साथ कॄष्ण कॊ लिये हम भी आपके द्वारा उठाये प्र्श्नों के उत्तर ढूँढ ही तो रहे हैं !
सुंदर अभिव्यक्ति ! बधाई

mahendra verma 1/08/2012 12:30 PM  

मैं कृष्ण हूं
मुझे कृष्ण ही
रहने दो !

बहुत ही सुंदर भाव।

Kailash Sharma 1/08/2012 2:37 PM  

अपने स्वार्थ हेतु
मेरा बलिदान मत लो
मैं कृष्ण हूँ
मुझे कृष्ण ही
रहने दो ..

....बहुत सटीक और गहन अभिव्यक्ति ...निशब्द कर दिया..आभार

निवेदिता 1/08/2012 10:10 PM  

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति .....

मो. कमरूद्दीन शेख 1/08/2012 11:54 PM  

Manav ke Antarman ke dwandwa ki safal abhivyakti. Bahut2 badhai.

M VERMA 1/09/2012 9:50 AM  

नवीन दृष्टिकोण की यह अंतर्कथा
सत्य और सार्थक है यह व्यथा

prerna argal 1/09/2012 10:31 AM  

नए साल की हार्दिक सुभकामनायें /
आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (२५) में शामिल की गई है /आप मंच पर पधारिये और अपने सन्देश देकर हमारा उत्साह बढाइये /आपका स्नेह और आशीर्वाद इस मंच को हमेशा मिलता रहे यही कामना है /आभार /लिंक है /
http://hbfint.blogspot.com/2012/01/25-sufi-culture.html

कुमार राधारमण 1/09/2012 11:11 AM  

तमाम विवादों के कारण ही,युवा कृष्ण की प्रतिमा बिरले ही दिखती है। कृष्ण जहां भी हैं,बाल रूप में ही पूज्य हैं। बड़े होने पर ..... महाभारत.... और.........और भी न जाने क्या-क्या.....आप जानती ही हैं।

sushma 'आहुति' 1/09/2012 1:37 PM  

बहुत ही सार्थक लगी कृष्ण की व्यथा.......

काजल कुमार Kajal Kumar 1/09/2012 2:18 PM  

त्रासदी यही है कि अमूर्त को समझाने के लिए मूर्त रूप रखने के कुछ पल बाद ही सच भूल कर हम मूर्त पर प्रश्न उठाने को हो निकलते हैं...

Mridula Harshvardhan 1/09/2012 2:56 PM  

saarthak prashn uthati rachna

bahut sunder

abhaar

naaz

anju(anu) choudhary 1/09/2012 5:44 PM  

निशब्द के दिया आपकी कविता और आपकी सोच ने

सच में ...आज भी लोग विपरीत दोस्ती का मजाक ही बनाते हैं ...उंगलियां उठाई जाती है ऐसी दोस्ती पर

दीदी आपकी लेखनी को नमन

ASHOK BIRLA 1/09/2012 6:30 PM  

अलौकिक प्रेम को
जो तन से नहीं
मन से किया जाता है ,

सुंदर अभिव्यक्ति...भावपूर्ण रचना !

Rachana 1/09/2012 7:50 PM  

kamal kamal kamal ...............
bahut sunder bhav
badhai
rachana

Urmi 1/09/2012 11:31 PM  

बेहद ख़ूबसूरत एवं उम्दा अभिव्यक्ति ! बधाई !

Anju 1/10/2012 2:42 PM  

बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति .......सही भी .....
वो रास हो या चीर हरण या मित्रता की बात .....नही समझा कभी कोई ये बात .....

Vikram Singh 1/11/2012 2:18 AM  

तुम राधा संग
मेरे प्रेम को
तोलते हो तराजू पर
भूल जाते हो कि मैं
स्थापित कर रहा था
उस अलौकिक प्रेम को
जो तन से नहीं
मन से किया जाता है ,
गहन,सार्थक व भावपूर्ण रचना

vikram7: हाय, टिप्पणी व्यथा बन गई ....

RITU 1/11/2012 9:26 AM  

कृष्ण.. कृष्ण ..नाम में ही झंकार है ..
सकारात्मकता की ..
उनके भाव ,उनकी कृतियों को समझ पाना ..मनुष्य बुद्धि के परे है ..
बहुत सुन्दर लिखा है आपने ..
kalamdaan.blogspot.com

dheerendra 1/11/2012 12:53 PM  

बहुत सुंदर प्रस्तुति,गहन सार्थक बेहतरीन रचना
welcome to new post --काव्यान्जलि--यह कदंम का पेड़--

girish pankaj 1/11/2012 6:20 PM  

आपकी इस कविता ने हिला कर रख दिया, कृष्ण के विमर्श को समकालीनता की परिधि में भी देख रहा था. सार्थक कविता के लिए बढ़ाई. आपने मेरी कविता को भी सराहा था, मगर आपकी टिप्पणी कहाँ चली गयी, तह समझ नहीं आया, ऐसा पहली बार हुआ है. शायद तकनीकी कारन से ऐसा हुआ होगा. आपकी हर टिप्पणी उत्साह बढ़ाती है. उसे संजो कर रखने का मन होता है.

प्रेम सरोवर 1/11/2012 9:23 PM  

आपकी प्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट "लेखनी को थाम सकी इसलिए लेखन ने मुझे थामा": पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद। .

vidya 1/12/2012 8:34 AM  

सुप्रभात संगीता दी...
वाकई आपके कमेन्ट spam में जा रहे है...मगर जब ये बात पता है तो हम सबसे पहले स्पाम ही चेक करते हैं...सो काहे की चिंता :-)
सादर.

Maheshwari kaneri 1/12/2012 6:15 PM  

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...भावपूर्ण रचना !आभार

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri 1/13/2012 4:24 AM  

तुम राधा संग
मेरे प्रेम को
तोलते हो तराजू पर
भूल जाते हो कि मैं
स्थापित कर रहा था
उस अलौकिक प्रेम को
जो तन से नहीं
मन से किया जाता है ,
अलौकिक प्रेम को स्थापित करती आध्यात्मिक चिंतन का सशक्त हस्ताक्षर है आपकी रचना ..
सादर अभिनन्दन

amrendra "amar" 1/13/2012 9:58 AM  

बहुत ही सुन्दर और सार्थक कविता

prritiy---------sneh 1/13/2012 7:04 PM  

bahut hi sunder bhaav liye hue rachna, padhna manbhaya.
lohri avum makarsankranti ki shubhkamnayen.

अनुपमा त्रिपाठी... 1/14/2012 3:32 AM  

शनिवार 14-1-12 को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

रचना दीक्षित 1/15/2012 2:05 PM  

लेकिन तुम
आज भी मुझे
पत्थर में गढते हो
और अपने सुख की
कामना करते हो .
अपने स्वार्थ हेतु
मेरा बलिदान मत लो
मैं कृष्ण हूँ
मुझे कृष्ण ही
रहने दो ..

सुंदर सार्थक प्रस्तुति. अद्भुत कल्पना शक्ति है आपमें. बधाई.

दर्शन लाल बवेजा 1/15/2012 7:59 PM  

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

रचना दीक्षित 1/15/2012 8:48 PM  

मैं कृष्ण हूँ
मुझे कृष्ण ही
रहने दो
गहरे भाव लिए बहुत सार्थक सुंदर अभिव्यक्ति

प्रेम सरोवर 1/17/2012 8:37 PM  

बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट " हो जाते हैं क्यूं आद्र नयन पर ": पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद। .

Indira2412 1/18/2012 2:54 PM  

बहुत सुंदर रचना है,मन को छू गयी. साधुवाद.

Akhilesh 1/18/2012 6:49 PM  

बहुत खूबसूरती से बहुत बड़ी बात कह गयी आप...... बहुत अच्छी रचना

veerubhai 1/18/2012 10:05 PM  

सुन्दर मनोहर .बारहा पढने लायक पोस्ट .एक युगीन सचाई समेटे -विपरीत लिंगी नहीं हो सकते क्या मीत ,हाँ सिर्फ मीत ...

dheerendra 1/19/2012 1:59 AM  

बहुत सुंदर प्रस्तुति,गहरे भाव की बेहतरीन पोस्ट
welcome to new post...वाह रे मंहगाई

कौशल किशोर 1/20/2012 12:05 AM  

अच्छी रचना ....बिलकुल सही कहा आज कल अपनी कमियों को दबाने के लिए भागन को भी तार तार कर देता है....
बधाई ...
मेरी नयी कविता तो नहीं उस जैसी पंक्तियाँ "जोश "पढने के लिए मेरे ब्लॉग पे आयें...
http://dilkikashmakash.blogspot.com/

डा. अरुणा कपूर. 1/20/2012 3:06 PM  

तुम राधा संग
मेरे प्रेम को
तोलते हो तराजू पर

...अति सुन्दर...पढ़ कर मन बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर हो गया!...आभार!

अनुपमा त्रिपाठी... 1/21/2012 12:48 AM  

आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 21/1/2012 को। कृपया पधारें और अपने अनमोल विचार ज़रूर दें।

vandana 1/21/2012 6:41 AM  

bahut sahi prashn uthaya hai aapne
तुम राधा संग
मेरे प्रेम को
तोलते हो तराजू पर
भूल जाते हो कि मैं
स्थापित कर रहा था
उस अलौकिक प्रेम को
जो तन से नहीं
मन से किया जाता है ,

मलकीत सिंह जीत 1/21/2012 10:33 AM  

बहुत अच्छी कविता मन को छू गई !
लेकिन तुम
आज भी मुझे
पत्थर में गढते हो
और अपने सुख की
कामना करते हो .
अपने स्वार्थ हेतु
मेरा बलिदान मत लो
मैं कृष्ण हूँ
मुझे कृष्ण ही
रहने दो ..

दिगम्बर नासवा 1/21/2012 5:27 PM  

bahut hi prabhaavi ... gahra arth samete ...

Anand Dwivedi 2/03/2012 5:19 PM  

तुम राधा संग
मेरे प्रेम को
तोलते हो तराजू पर
भूल जाते हो कि मैं
स्थापित कर रहा था
उस अलौकिक प्रेम को
जो तन से नहीं
मन से किया जाता है ,...
.....
महारास भी रचाया था
यह जताने के लिए
कि मन की आज़ादी ही
कर सकती है
आत्मविभोर ....

वाह दीदी वाह !!

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