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बूंद बूंद रिसती ज़िंदगी

>> Wednesday, July 11, 2012





ज़िंदगी की उलझने 
जब बन जाती हैं सवाल 
तो उत्तर की प्रतीक्षा में
अल्फ़ाज़ों में  ढला करती हैं 
उतर आती हैं अक्सर 
मन के कागज पर 
जो अश्कों  की स्याही से 
रचा करती हैं 
पढ़ने वाले  भी बस 
पढ़ते हैं शब्दों को 
उनको भी पड़ी लकीरें 
नहीं दिखती हैं 
लकीरों की भाषा भी 
समझना आसान नहीं 
वो तो बस 
आड़ी तिरछी ही 
दिखा करती हैं 
मन होता है तिक्त 
अपनेपन से 
हो जाता है  रिक्त 
मित्र भी करते हैं  कटाक्ष 
थक हार कर 
बंद कर लिए जाते हैं  गवाक्ष 
घुट कर रह जाती हैं  जैसे सांसें 
और ---
बूंद बूंद रिसती है ज़िंदगी 



63 comments:

सदा 7/11/2012 4:06 PM  

बंद कर लिए जाते हैं गवाक्ष
घुट कर रह जाती हैं जैसे सांसें
और ---
बूंद बूंद रिसती है ज़िंदगी
गहन भाव लिए ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ...आभार

संध्या शर्मा 7/11/2012 4:20 PM  

ऐसा ही होता है ज़िंदगी के सवाल पर उत्तर की प्रतीक्षा में बूंद बूंद रिसती है ज़िंदगी... गहन भाव...आभार

Anupama Tripathi 7/11/2012 4:29 PM  

पढ़ने वाले भी बस
पढ़ते हैं शब्दों को
उनको भी पड़ी लकीरें
नहीं दिखती हैं

सम्वेदंशील मन की छुपी हुइ गहरी वेदना झलक रही है इस रचना मे .......

बहुत सुंदर रचना ...!!

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) 7/11/2012 4:45 PM  

बहुत गहरे भाव के साथ... सुंदर रचना..

वन्दना 7/11/2012 4:52 PM  

बंद कर लिए जाते हैं गवाक्ष
घुट कर रह जाती हैं जैसे सांसें
और ---
बूंद बूंद रिसती है ज़िंदगी


कितनी गहरी वेदना छुपी है …………ये रचना नही ज़िन्दगी की हकीकत है।

रविकर फैजाबादी 7/11/2012 5:04 PM  

प्रश्नों के हल न मिलें, उलझन बढती जाय

मार्मिक चित्रण || |

shikha varshney 7/11/2012 5:13 PM  

एक वेदना एक निराशा झलक रही है रचना में.यूँ भाव हमेशा की तरह बहुत ही गहरे हैं और कहीं मन पर एक टीस सी छोड़ जाते हैं.फिर भी कहूँगी कि बूँद बूँद जिंदगी को रिसने नहीं देना चाहिए ..बल्कि १०० ग्राम जिंदगी है संभाल कर खर्च करनी चाहिए :)

Suman 7/11/2012 5:30 PM  

बहुत सुंदर रचना ....

Vibha Rani Shrivastava 7/11/2012 5:38 PM  

ज़िंदगी की उलझने
जब बन जाती हैं सवाल
तो उत्तर की प्रतीक्षा में
अल्फ़ाज़ों में ढला करती हैं
लकीरों की भाषा भी
समझना आसान नहीं
सही चित्रण ! सच्चाई बयान करती रचना !

expression 7/11/2012 7:17 PM  

खोल देने चाहिए सारे खिड़की और दरवाज़े..........
ज़िन्दगी उडनी चाहिए एक पतंग के मानिंद......
:-)
सादर
अनु

Sadhana Vaid 7/11/2012 7:18 PM  

बूँद बूँद रिसती ज़िंदगी मन के घट को कब रीता कर जाती है पता ही नहीं चलता और शेष साँसें एकदम से शुष्क और नीरस होकर जीवन को रेगिस्तान बना जाती हैं ! बहुत दर्द भरी रचना ! कुछ आपबीती सी लगी ! आभार आपका !

यादें....ashok saluja . 7/11/2012 7:31 PM  

दिल की घुटन ...अल्फ़ाज़ों के रूप में !!!
शुभकामनाएँ!

प्रवीण पाण्डेय 7/11/2012 7:42 PM  

बन्द कपाट खोल दे रे मनवा, जीवन लहर बनाने दे..

रश्मि प्रभा... 7/11/2012 7:51 PM  

बूंद बूंद रिसती ज़िन्दगी
सवालों के भुलभुलैये में
अपनी पहचान से रिसने लगती है

udaya veer singh 7/11/2012 7:53 PM  

गहन भाव लिए ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ...आभार

Reena Maurya 7/11/2012 7:56 PM  

बंद कर लिए जाते हैं गवाक्ष
घुट कर रह जाती हैं जैसे सांसें
और
बूंद बूंद रिसती है ज़िंदगी
गहन अर्थ लिए बहुत ही बेहतरीन रचना...
:-)

अनामिका की सदायें ...... 7/11/2012 8:10 PM  

hamara bachpan beetne k baad kabhi lautTa nahi lekin un dino ke vapis laut aane ki sada chaaht rahti hai...aisi hi ye zindgi hai iske har din ko agar u hi ham boond-boond gehre santaap se risne denge to baad me hame iska pachhtava hoga ki kash ham in dino ko khushiyon me badal pate....aur aap mane n mane 90% ye badlaav apne haath me hota hai...to ab sochiye aap kya chaahti hain....kyu n apni zindgi ki picture aisi banayi jaye jise bar bar dekhne ka dil kare...aakhir director/nirdeshak/lekhak/actor sab aap hi to hain....bataiye fir kyu nahi badal sakte ?

so keep it up. :-)

संतोष त्रिवेदी 7/11/2012 8:31 PM  

बहुत अच्छे भाव,सार्थक रचना !

sushma 'आहुति' 7/11/2012 8:33 PM  

बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

ashish 7/11/2012 8:45 PM  

ज़माने का दर्द समेट लाई है पंक्तियों में .. रिसती जिंदगी के छिद्रों को बंद करने का आह्वान भी चहिये .

मनोज कुमार 7/11/2012 9:16 PM  

ये ज़िन्दगी की हक़ीक़त है। इससे रू-ब-रू होकर इससे सामना और मुठभेड़ करना पड़ता है। किसी रचनाकार ने कहा है --

है अगर विश्वास तो मंजिल मिलेगी
शर्त ये है बिन रुके चलना पड़ेगा
जिस जगह भी हो अंधेरों की हुक़ूमत
उस जगह पर दीप सा जलना पड़ेगा।

प्रतिभा सक्सेना 7/11/2012 9:18 PM  

निराशा होती है सब ओर से लेकिन
' थक हार कर
बंद कर लिए जाते हैं गवाक्ष
घुट कर रह जाती हैं जैसे सांसें
---'
सारे दरवाज़े बंद कर लेना कोई समाधान नहीं .खुली हवा के लिये कुछ खिड़कियाँ खुली रखना साँस लेने के लिये बहुत ज़रूरी है. .

रचना दीक्षित 7/11/2012 9:25 PM  

लकीरों की भाषा भी
समझना आसान नहीं
वो तो बस
आड़ी तिरछी ही
दिखा करती हैं

संवेदनशील और सही प्रश्न और उन्हें विभिन्न स्तरों पर समझने की कोशिश है यह कविता.

रजनीश तिवारी 7/11/2012 9:57 PM  

लकीरों की भाषा भी समझना आसान नहीं...बहुत सुंदर रचना

सतीश सक्सेना 7/11/2012 10:36 PM  

किसी कवि की रचना देखूं !
दर्द उभरता , दिखता है !
प्यार, नेह दुर्लभ से लगते ,
क्लेश हर जगह मिलता है !
क्या शिक्षा विद्वानों को दूं,टिप्पणियों में,रोते गीत!
निज रचनाएं,दर्पण मन का,दर्द समझते मेरे गीत!

mridula pradhan 7/11/2012 10:57 PM  

har line achchi lagi.....

dheerendra 7/11/2012 11:24 PM  

संवेदनशील और गहन भावो की बहुत सुंदर प्रस्तुति,,,,

RECENT POST...: राजनीति,तेरे रूप अनेक,...

डॉ॰ मोनिका शर्मा 7/12/2012 5:36 AM  

गहन भाव...... जीवन के सत्य से जोड़ती रचना

vandana 7/12/2012 6:35 AM  

गहन अनुभूति ..

वाणी गीत 7/12/2012 8:43 AM  

पढने वाले भी पढ़ते हैं सिर्फ शब्दों को
और उनके मनचाहे अर्थ निकल
अभिव्यक्तियों का गला दबाने को बेचैन
करते हैं अपने ढंग से व्याख्या !
संवेदनाओं का स्तर जिसका जैसा , वही पढता है लकीरों को अपने मन जैसा ..पढने वालों की एक हकीकत यह भी है !

इस्मत ज़ैदी 7/12/2012 11:57 AM  

पढ़ने वाले भी बस
पढ़ते हैं शब्दों को
उनको भी पड़ी लकीरें
नहीं दिखती हैं
लकीरों की भाषा भी
समझना आसान नहीं

बहुत सुंदर !

Anita 7/12/2012 12:55 PM  

ज़िंदगी की उलझने
जब बन जाती हैं सवाल
तो उत्तर की प्रतीक्षा में
अल्फ़ाज़ों में ढला करती हैं

उलझनों को सवाल बनने से पहले ही सुलझा लिया तो ...?

ऋता शेखर मधु 7/12/2012 1:31 PM  

अल्फ़ाज़ बयान करते हैं किन्तु आड़ी तिरछी रेखाएँ दर्द और उलझनों की दास्ताँ बन जाती है...कभी कभी समझ से परे हो जाती हैं|

Komal 7/12/2012 2:10 PM  

very very nice post!!!!!!!

दिगम्बर नासवा 7/12/2012 3:07 PM  

सच है जिंदगी के दर्द कों कोई नहीं पढता ... सतही शब्द पढ़ के सब चले जाते हैं ... जीवन रीत जाता है ...

Anju (Anu) Chaudhary 7/12/2012 5:34 PM  

ये जिंदगी ऐसी ही हैं

शिवनाथ कुमार 7/12/2012 8:33 PM  

थक हार कर
बंद कर लिए जाते हैं गवाक्ष
घुट कर रह जाती हैं जैसे सांसें
और ---
बूंद बूंद रिसती है ज़िंदगी

गहन भाव लिए सुंदर सी कविता !!

Pallavi saxena 7/12/2012 9:23 PM  

बूंद-बूंद रिसती ज़िंदगी ...लजवाब पंक्तियां उत्कृष्ट गहन भाव अभिव्यक्ति।

Ramakant Singh 7/12/2012 10:06 PM  

ज़िंदगी की उलझने
जब बन जाती हैं सवाल
तो उत्तर की प्रतीक्षा में
अल्फ़ाज़ों में ढला करती हैं

beautiful lines

Kumar Radharaman 7/13/2012 12:04 AM  

कुछ होगा कसूर अपना भी
वरना,जिंदगी ऐसी तो न थी

Dr (Miss) Sharad Singh 7/13/2012 2:20 PM  

मन को छू लेने वाली रचना....

Kailash Sharma 7/13/2012 2:48 PM  

थक हार कर
बंद कर लिए जाते हैं गवाक्ष
घुट कर रह जाती हैं जैसे सांसें
और ---
बूंद बूंद रिसती है ज़िंदगी

...बहुत मार्मिक...अपनी ही ज़िंदगी को बूंद बूंद रिसते देखना कितना मुश्किल होता है...गहन अभिव्यक्ति ....

रेखा श्रीवास्तव 7/13/2012 3:51 PM  

जीवन में यूँ ही कुछ अनुत्तरित प्रश्न रह जाते हें , जिनके उत्तर ढूढ़ते ढूढ़ते थक जाते हैं और हम उन्हीं में फंसे रह जाते हैं.
बहुत सुंदर एवं गहन भाव लिए रचना.

mahendra verma 7/14/2012 12:03 PM  

अधिकतर पढ़ने वाले केवल शब्दों को पढ़ते हैं, उनके बीच छिपी अदृश्य लकीरों और खाली जगह को पढ़ने वाले कम ही होते हैं।

प्रभावी कविता।

Bharat Bhushan 7/14/2012 12:32 PM  

जीवन की एकत्रित उलझने अपना मार्ग बना कर समक्ष आ ही जाती हैं. बहुत सुंदर कविता.

क्रिएटिव मंच-Creative Manch 7/14/2012 1:43 PM  

बंद कर लिए जाते हैं गवाक्ष
घुट कर रह जाती हैं जैसे सांसें
और ---
बूंद बूंद रिसती है ज़िंदगी


गहराई लिए हुए बहुत सुन्दर कविता
आभार

Onkar 7/14/2012 1:49 PM  

सुन्दर रचना

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 7/14/2012 8:35 PM  

बहुत कुछ कह जाती हुई सुन्दर रचना दी....
सादर.

ora cle 7/14/2012 10:05 PM  

http://joypurhatt.blogspot.com/2012/06/joypurhat-district.html

ora cle 7/14/2012 10:05 PM  

http://dhakaa.blogspot.com/

Mahi S 7/15/2012 12:43 AM  

खूबसूरत अभिव्यक्ति

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" 7/15/2012 11:44 PM  

gambhee vbha liye bahut hee utkrist rachna..sadar badhayee aaur sadar amantran ke sath

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" 7/15/2012 11:45 PM  

gambhee vbha liye bahut hee utkrist rachna..sadar badhayee aaur sadar amantran ke sath

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" 7/15/2012 11:46 PM  

gambhee vbha liye bahut hee utkrist rachna..sadar badhayee aaur sadar amantran ke sath

Pandit Lalit Mohan Kagdiyal 7/16/2012 12:25 PM  

आपकी कविता के सन्दर्भ में किसी शायर की पंक्तियाँ याद आ गयी
"शब्द को पकड़ें अगर तो अर्थ प्रायः छूट जाता है,
संधि कम ,विग्रह अधिक हैं जिंदगी के व्याकरण में

Amrita Tanmay 7/17/2012 6:06 PM  

धुंधलाई आँखे भी देख ही लेती है रिसती जिन्दगी को..आह ...

manukavya 7/20/2012 10:23 AM  

पढ़ने वाले भी बस
पढ़ते हैं शब्दों को...

sahi kaha sangeeta ji... sirf shabd hi to dikhai dete hain sabko... shabdon ke peechen ka itihas kahan dikh pata hai...
sada ki tarah sundar rachna !
sadar
manju

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" 7/26/2012 7:28 PM  

मन के कागज पर
जो अश्कों की स्याही से
रचा करती हैं
पढ़ने वाले भी बस
पढ़ते हैं शब्दों को
उनको भी पड़ी लकीरें
नहीं दिखती हैं
लकीरों की भाषा भी
समझना आसान नहीं

fir bhi samjhne wale samjh leti hain......behtareen rachna!

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 7/31/2012 8:54 AM  

प्रश्नोत्तर के पाट में पिसती रही
कुछ लकीरें अनमनी खिंचती रही
कौन प्याले में इकट्ठा कर सका ?
बूँद बन, ये जिंदगी रिसती रही.

गहन सम्वेदना..............

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