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झील सी होती हैं स्त्रियाँ

>> Tuesday, October 23, 2012

वाणी गीत    की दो रचनाएँ पढ़ीं थीं झीलें हैं कि गाती मुसकुराती स्त्रियाँ   और झील होना भी एक त्रासदी है ... और यह झील मन को बहुत भायी ....... झील का ही उपमान ले कर एक रचना यहाँ भी पढ़िये ....


झील सी 
होती हैं स्त्रियाँ 
लबालब  भरी हुई 
संवेदनाओं से 
चारों ओर के किनारों से 
बंधक सी बनी हुई 
सिहरन तो होती है 
भावनाओं की लहरों में
जब मंद समीर 
करता है स्पर्श 
पर नहीं आता कोई 
ज्वार - भाटा
हर तूफान को 
समां  लेती हैं 
अपनी ही गहराई में 
झील सी होती हैं स्त्रियाँ  

किनारे तोड़  
बहना नहीं जानतीं 
स्थिर सी गति से 
उतरती जाती हैं 
अपने आप में
ऊपर से शांत 
अंदर से उदद्वेलित 
झील सी होती हैं स्त्रियाँ । 

झील का विस्तार 
नहीं दिखा पाता 
गहराई उसकी 
इसीलिए 
नहीं उतर पाता 
हर कोई इसमें 
कुशल तैराक ही 
तैर सकता है 
गहन , शांत , 
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ । 






91 comments:

यादें....ashok saluja . 10/23/2012 4:43 PM  

बहुत ही खूबसूरत .....
निशब्द !
मुबारक हो !

ऋता शेखर मधु 10/23/2012 4:54 PM  

वाह !!झील सी शांत गंभीर स्त्रियाँ...बेहद खूबसूरत रचना!!

सदा 10/23/2012 5:00 PM  

झील का विस्तार
नहीं दिखा पाता
गहराई उसकी
इसीलिए
नहीं उतर पाता
हर कोई इसमें
कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।
वाह ... बहुत ही बढिया ... इस उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति के लिये आभार

expression 10/23/2012 5:10 PM  

झील सी गहरी स्त्रियाँ.....
मीठे जल वाली स्त्रियाँ........

सुन्दर रचना...
सादर
अनु

Manu Tyagi 10/23/2012 5:12 PM  

स्त्री की झील से तुलना सोचने पर मजबूर करती है ।

रविकर 10/23/2012 5:25 PM  

शुभकामनायें-
दीदी ||
भली तुलना -

झेलें लाखों ज्वार पर, सम्मुख मुखड़ा शांत |
भांटा मद्धिम गति लिए, अंतर करता क्लांत |
अंतर करता क्लांत, यही पहचान झील की |
पाले पोसे जीव, भिन्नता हलकी फुलकी |
लगते मेले रोज, किनारें कितने खेलें |
स्वार्थ सिद्ध कर जाएँ, मलिन मन नारी झेलें ||

रविकर 10/23/2012 5:29 PM  

लगते मेले रोज, किनारे कृष्णा खेले |
स्वार्थ सिद्ध कर जाए, मलिन-मन राधा झेले ||

रविकर 10/23/2012 5:29 PM  

लगते मेले रोज, किनारे कृष्णा खेले |
स्वार्थ सिद्ध कर जाए, मलिन-मन राधा झेले ||

रविकर 10/23/2012 5:35 PM  

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

shikha varshney 10/23/2012 5:36 PM  

पूरी स्त्री समेट ली झील के बहाने..कुछ नहीं बाकी बचा कहने को.
बेहद खूबसूरत और गहन.

Suman 10/23/2012 5:36 PM  

वाणी गीत, की रचनाएँ मैंने भी पढ़ी है झीलें हैं कि गाती मुसकुराती स्त्रियाँ और झील होना भी एक त्रासदी है ..
बहुत सुन्दर रचनाएँ है ...

आप की इस रचना में खास यह पंक्तियाँ बहुत पसंद आई है ..
नहीं उतर पाता
हर कोई इसमें
कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।

बहुत सुन्दर रचना ....

रश्मि प्रभा... 10/23/2012 5:37 PM  

शुरू में बंधे किनारे अच्छे लगते हैं .... पर नदी बन सागर तक जाने की चाह लिए झील बनी स्त्रियाँ मूक हो जाती हैं

Rohitas ghorela 10/23/2012 6:17 PM  

हर तूफान को
समां लेती हैं
अपनी ही गहराई में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ

कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।

पढ़ कर मुंह से वाह वाह ही निकलता हैं
सच में बेहद सार्थक रचना है।
बहुत अच्छी लगी

Suman 10/23/2012 6:40 PM  

वाणी गीत की रचनाएँ मैंने भी पढ़ी है झीलें हैं कि गाती मुसकुराती स्त्रियाँ और झील होना भी एक त्रासदी है ..
बहुत सुन्दर रचनाएँ है ...

आप की इस रचना में खास यह पंक्तियाँ बहुत पसंद आई है ..
नहीं उतर पाता
हर कोई इसमें
कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 10/23/2012 7:27 PM  

एक प्रतीक में आपने पूरा नारी चरित्र सामने रख दिया.. नवरात्री के अंतिम दिवस पर यह रचना दिल को छूती है और बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है!!

Ramakant Singh 10/23/2012 7:52 PM  

झील का विस्तार
नहीं दिखा पाता
गहराई उसकी
इसीलिए
नहीं उतर पाता
हर कोई इसमें
कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।


निःशब्द करती लाइन . पुरे रिश्तों और स्त्री नहीं नारी का दर्पण .

ashish 10/23/2012 8:07 PM  

स्त्रीत्व के उद्दात गुणों की झील के माध्यम से स्पष्ट व्याख्या . सुन्दर

अनामिका की सदायें ...... 10/23/2012 8:37 PM  

जब मंद समीर
करता है स्पर्श
पर नहीं आता कोई
ज्वार - भाटा
हर तूफान को
समां लेती हैं
अपनी ही गहराई में

अपने आस पास बहुत सी स्त्रियों को नजदीक से जाना है और महसूस किया है यही कि कई बार जो छोटी छोटी बातों पर ही विचलित होती दिखाई देती हैं वही बड़े से बड़े तूफानों को अपने भीतर दबाये रहती हैं।

किनारे तोड़
बहना नहीं जानतीं
स्थिर सी गति से
उतरती जाती हैं

अधिकतर ऐसी ही होती हैं।

झील का विस्तार
नहीं दिखा पाता
गहराई उसकी
इसीलिए
नहीं उतर पाता
हर कोई इसमें
कुशल तैराक ही
तैर सकता है

शत-प्रतिशत सहमत। आमतौर पर हम बडबोली महिला को देख ऐसा अनुमान लगा लेते हैं कि उसका व्यक्तित्व, आचार-व्यवहार ठहराव लिए नहीं होगा---लेकिन ऐसा नहीं होता---करीब से उन्हें जाना जाए तो वो भी अभूत गहराई लिए होती हैं जिसे वो अपने बाहरी व्यवहार से आवर्णित किये रहती हैं और सच है की कोई कुशल तैरक ही जान सकता है उसके गाम्भीर्य को।

बहुत पसंद आई आपकी रचना और रचना में प्रयुक्त उपमाएं भी।

ब्लॉग बुलेटिन 10/23/2012 9:12 PM  

कलकत्ता की दुर्गा पूजा - ब्लॉग बुलेटिन पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को दुर्गा पूजा की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें ! आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Reena Maurya 10/23/2012 9:17 PM  

इस बिम्ब के माध्यम से स्त्री मनोभावों
को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया है....
अति सुन्दर रचना...
:-)

प्रवीण पाण्डेय 10/23/2012 9:25 PM  

बहुधा स्थिर और बहुत गहरी । सुन्दर कविता ।

Maheshwari kaneri 10/23/2012 9:29 PM  

एकदम सटीक तुलना..बहुत सुन्दर सी प्यारी रचना ..

ब्लॉ.ललित शर्मा 10/23/2012 10:40 PM  

विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई

प्रतिभा सक्सेना 10/23/2012 10:58 PM  


- बहुत ही खूबसूरत कविता .
यही तो मुश्किल है कि -
किनारे तोड़
बहना नहीं जानतीं
स्थिर सी गति से
उतरती जाती हैं
अपने आप में
ऊपर से शांत
अंदर से उदद्वेलित
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।


-
और तभी सब-कुछ चुपचाप झेल जाती हैं स्त्रियाँ !

monali 10/23/2012 11:21 PM  

Remarkable comparison :)

mukti 10/23/2012 11:41 PM  

बहुत प्यारी कविता है.

Dr.NISHA MAHARANA 10/24/2012 12:04 AM  

हर कोई इसमें
कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में.....waki men jheel si hi hoti hai striyaan ...bahut acchi rachna sangeeta jee...

मनोज कुमार 10/24/2012 2:41 AM  

झील शांत, सुंदर और गंभीर दिखती हैं, जिसमें एक हलकी हलचल भी अनेक लहर उत्पन्न कर देती है।
एक बेहतरीन रचना के लिए बधाई।

डॉ. मोनिका शर्मा 10/24/2012 6:10 AM  

सच ही है स्त्री मन की गहराई भी हर कोई कहाँ समझ पाता है झील की तरह...... बेहतरीन रचना

yashoda agrawal 10/24/2012 6:17 AM  

झील,निर्झर
शान्त,अविचल
धीर,गम्भीर
निश्छल,निर्विकार
मनोयोग से
अपने कर्तव्यों को पूर्ण करती है
ज़रा सी कंकड़ी तो फेक कर देखो
सैलाब आ जाएगा.....
खूबसूरत रचना दीदी
लिखने को मन में जो आया सो लिख दी

Sadhana Vaid 10/24/2012 9:09 AM  

कमाल कर दिया संगीता जी ! नारी को इससे सटीक अन्य किसी रूपक से परिभाषित नहीं किया जा सकता ! हर पंक्ति मन को उद्वेलित सा करती हुई ! अनुपम, अद्भुत, अन्यतम !

सूर्यकान्त गुप्ता 10/24/2012 10:11 AM  

बहुत ही मार्मिक रचना ...

आदि शक्ति की पूजा अर्चना

का पर्व नवरात्रि पर बहुत

ही सुन्दर उपहार ...

विजयादशमी के पावन पर्व पर

बधाई सहित .........

mahendra verma 10/24/2012 11:37 AM  

नारी झील सी होती हैं...सुंदर उपमा।
मर्मस्पर्शी कविता।
विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

Vibha Rani Shrivastava 10/24/2012 12:02 PM  

किनारे तोड़
बहना नहीं जानतीं
स्थिर सी गति से
उतरती जाती हैं
अपने आप में
ऊपर से शांत
अंदर से उदद्वेलित
झील सी होती हैं स्त्रियाँ
बहुत खूब दी !
कभी-कभी ज्वालामुखी हो जाती हैं स्त्रियाँ !!

महेन्द्र श्रीवास्तव 10/24/2012 1:02 PM  

विजयदशमी की बहुत बहुत शुभकामनाएं

बढिया, बहुत सुंदर
क्या बात

Amit Srivastava 10/24/2012 2:02 PM  

विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

udaya veer singh 10/24/2012 2:13 PM  

विजय दशमी की शुभ कामनाएं , सुन्दर सृजन को बधाईयाँ जी l

रेखा श्रीवास्तव 10/24/2012 2:24 PM  

हर तूफान को
समां लेती हैं
अपनी ही गहराई में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ !

अगर स्त्री को उसके सही रूप देखा जाय तो वह वाकई ऐसी होती है और उसके इसा गुण से ही हजारों हजारों घर चलते रहते हैं

"Nira" 10/24/2012 2:29 PM  

sangeeta ji bahut sundar jheel aor stree ka varnan kiya hai ..
asha hai aap muje bhuli nahi hongi
nira

वन्दना 10/24/2012 3:53 PM  

कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।

स्त्री के अन्तस्थ को उकेरती सुन्दर रचना

सुधाकल्प 10/24/2012 4:27 PM  

विजय दशमी आपको शुभ हो ।

बहुत ही सुन्दर शब्द विन्यास -
झील सी होती हैं स्त्रियाँ --।

Dheerendra singh Bhadauriya 10/24/2012 10:03 PM  

इसीलिए
नहीं उतर पाता
हर कोई इसमें
कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।
वाह ... बहुत बेहतरीन उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति,,,

विजयादशमी की हादिक शुभकामनाये,,,
RECENT POST...: विजयादशमी,,,

vandana 10/25/2012 7:33 AM  

वाह बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

वाणी गीत 10/25/2012 7:37 AM  

नहीं उतर पाता
हर कोई इसमें
कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी स्त्रियों को समझ पाना मुश्किल होता है , क्योंकि उस गहराई को हर कोई समझ नहीं सकता !
अच्छा लगा झील का एक नवीन आयाम भी !

Virendra Kumar Sharma 10/25/2012 8:23 AM  

उद्वेलित होता है मन इस रचना को पढ़के :

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 10/25/2012 8:55 AM  

बहुत बढ़िया आंटी !


सादर

Mukesh Kumar Sinha 10/25/2012 10:05 AM  

athah samvednaon se bhari hui striyan kitni pyari hoti hain...:)
bahut khubsurat di:)

सतीश सक्सेना 10/25/2012 10:09 AM  

वाकई झील सी होती हैं, अनंत गहराई लिए शांत ...
बधाई आपको इस सुंदर प्रस्तुति के लिए !

राजेश उत्‍साही 10/25/2012 3:51 PM  

अद्भुत होती हैं आपकी उपमाएं। अद्भुत कविता है। झील की तरह ही गहरी । अंतिम पंक्तियां बहुत मारक हैं।

Kuldeep Sing 10/25/2012 4:06 PM  

सुंदर भाव... कभी आना... HTTP://WWW.KULDEEPKIKAVITA.BLOGSPOT.COM

kshama 10/25/2012 7:13 PM  

Bahut sundar upama dee hai....waise kayee qism kee hotee hain streeyan...kabhee kabhee bahut ochhee bhee!

Anju (Anu) Chaudhary 10/25/2012 9:31 PM  

बेहद खूबसूरत रचना


झील की गहराई को तो नापा जा सकता है ...पर एक स्त्री की गहराई और उसकी भावनाओं को कोई नहीं नाप सकता

mridula pradhan 10/25/2012 10:46 PM  

ऊपर से शांत
अंदर से उदद्वेलित
झील सी होती हैं स्त्रियाँ । wah....kya likhi hain.....

Neelima sharrma 10/26/2012 10:24 AM  

झील सी
होती हैं स्त्रियाँ
लबालब भरी हुई
संवेदनाओं से
चारों ओर के किनारों से
बंधक सी बनी हुई
.
.
.
बहुत सुंदर

नादिर खान 10/26/2012 12:30 PM  

पर नहीं आता कोई
ज्वार - भाटा
हर तूफान को
समां लेती हैं
अपनी ही गहराई में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ

झील सी गहराई है कविता में |

kase kahun?by kavita verma 10/26/2012 5:01 PM  

stri ko discribe karne ke liye bahut sundar bimb ka prayog kiya hai aapne..sundar rachna..

डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन' 10/26/2012 5:20 PM  

बहुत सुन्दर उपमा दी है आपने स्त्रियों की झील से...

बेहद सटीक... :)

कुश्वंश 10/26/2012 6:14 PM  

झील सी
होती हैं स्त्रियाँ
लबालब भरी हुई
संवेदनाओं से

बहुत सुन्दर

Kailash Sharma 10/26/2012 8:21 PM  

झील का विस्तार
नहीं दिखा पाता
गहराई उसकी

...लाज़वाब! बहुत सटीक और अद्भुत अभिव्यक्ति...

Virendra Kumar Sharma 10/26/2012 10:55 PM  

अब रोज़ मरती है एक झील हिन्दुस्तान में .पड़ोस के मकान में ,मुसद्दी की दुकान के पीछे वाले घर में .झील की पीड़ा और भाव जगत के ठहराव को कौन

जाने है यहाँ .झील एक उत्कृष्ट रचना है .रागात्मकता को

विचलित करती है .

गिरधारी खंकरियाल 10/26/2012 11:39 PM  

इस झील की गहराई को देवता भी नहीं नाप सके थे, तो पुरूष तैराकों के बस की बात कहां।

गिरधारी खंकरियाल 10/26/2012 11:39 PM  

इस झील की गहराई को देवता भी नहीं नाप सके थे, तो पुरूष तैराकों के बस की बात कहां।

गिरधारी खंकरियाल 10/26/2012 11:39 PM  

इस झील की गहराई को देवता भी नहीं नाप सके थे, तो पुरूष तैराकों के बस की बात कहां।

Naveen Mani Tripathi 10/27/2012 9:17 AM  

इसीलिए
नहीं उतर पाता
हर कोई इसमें
कुशल तैराक ही
तैर सकता है
गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।
Nari mn ki adbhud vyakhya .....sadar abhar

Onkar 10/27/2012 3:11 PM  

बहुत सुन्दर कविता

उड़ता पंछी 10/27/2012 8:07 PM  

पर नहीं आता कोई
ज्वार - भाटा
हर तूफान को
समां लेती हैं
अपनी ही गहराई में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ

post
चार दिन ज़िन्दगी के .......
बस यूँ ही चलते जाना है !!

काजल कुमार Kajal Kumar 10/27/2012 8:27 PM  

आपकी कवि‍ता पढ़ कर आराधना चतुर्वेदी ’मुक्ति’ की उस कवि‍ता की याद हो आई जि‍समें कुछ इसी प्रकार के भाव थे. अच्‍छी रचना पढ़वाने के लि‍ए आभार.

प्रेम सरोवर 10/27/2012 9:09 PM  

किनारे तोड़
बहना नहीं जानतीं
स्थिर सी गति से
उतरती जाती हैं
अपने आप में
ऊपर से शांत
अंदर से उदद्वेलित
झील सी होती हैं स्त्रियाँ।

आपकी यह कविता काफी अच्छी लगी। धन्यवाद।

रचना दीक्षित 10/28/2012 10:55 AM  

गहन , शांत ,
गंभीर झील में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ ।

बहुत ही खूबसूरत रचना.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 10/29/2012 9:27 AM  


कल 30/10/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Amrita Tanmay 10/29/2012 7:51 PM  

झील सी..जिस पर कोई भी प्रतिबिम्ब भी मोहक बनता है.. बहुत अच्छी लगी .

Virendra Kumar Sharma 10/30/2012 3:42 AM  

Still water runs deep .

हाँ झील सी होतीं हैं स्त्रियाँ ,ऊपर से शांत ,अन्दर से उद्वेलित

व्यथित मंथित .

उद्वेलित .

आपकी टिपण्णी के लिए शुक्रिया .

Kunwar Kusumesh 10/30/2012 8:05 AM  

कविता की कोमलता आपकी निर्मल मन की निर्मलता को प्रतिबिंबित करती है,संगीता जी।

Tulika Sharma 10/30/2012 2:43 PM  

सुन्दर और कोमल कविता

Rajesh Kumari 10/31/2012 9:51 AM  

किनारे तोड़
बहना नहीं जानतीं
स्थिर सी गति से
उतरती जाती हैं
अपने आप में
ऊपर से शांत
अंदर से उदद्वेलित
झील सी होती हैं स्त्रियाँ----किनारे तोड़ बह जाने के लिए भी ये समाज ही मजबूर करता है वर्ना सचमुच व्यवहार में प्रकृति में झील से ही होती हैं स्त्रियाँ बहुत पसंद आई आपकी ये रचना

Aryaman Chetas Pandey 11/02/2012 12:44 AM  

shiirshak hi apne aap mein sab kah gaya..achchhi lagi rachana..!! :)

Kumar Radharaman 11/02/2012 4:19 PM  

क्या दिया
क्या मिला!

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 11/03/2012 9:27 AM  

सहती आई है सदा , दुनियाँ भर की पीर
किंतु दिखाई दे रही , गहन शांत गम्भीर
गहन शांत गम्भीर,सभी को निर्मल करती
जो आये तट तीर , प्यार दे पीड़ा हरती
होता कोई काँध,टिका सिर मन की कहती
झील जगत की पीर, सदा आई है सहती |


अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 11/03/2012 9:29 AM  

सहती आई है सदा , दुनियाँ भर की पीर
किंतु दिखाई दे रही , गहन शांत गम्भीर
गहन शांत गम्भीर,सभी को निर्मल करती
जो आये तट तीर , प्यार दे पीड़ा हरती
होता कोई काँध,टिका सिर मन की कहती
झील जगत की पीर, सदा आई है सहती |


ajay yadav 11/03/2012 6:36 PM  

बहुत खूबसूरत

Nihar Ranjan 11/04/2012 3:00 AM  

बहुत खूबसूरत रचना. भाव की तरह ही गहरी और शांत. पढ़कर बहुत अच्छा लगा.

Tarang Sinha 11/04/2012 2:42 PM  

Beautiful poem...and true!:)

dinesh gautam 11/07/2012 4:14 AM  

नारी मन को सही सही व्याख्यायित करती रचना।

Anita 11/07/2012 12:59 PM  

बहुत बहुत सुंदर रचना!:-)
सच में ! झील के समान ही होती है एक स्त्री ! उसकी गहराई समझ पाना आसान नहीं है...! लोग उसमें कंकड़ फेंक कर उसके धैर्य, सहनशीलता को परखने की कोशिश ही करते रहते हैं... उसे जानने समझने के लिए उसके जैसी गहराई अपने भीतर रखना कोई आसान काम नहीं है !
~सादर !

आशा जोगळेकर 11/07/2012 11:55 PM  

बेहद खूबसूरत । स्त्र्ियां सचमुच झील सी ही होती हैं । िनको समजने के लिये भावनाओं को समझने वाला कुशल तैराक ही चाहिये ।

Manju Mishra 11/17/2012 2:36 AM  

नहीं आता कोई
ज्वार - भाटा
हर तूफान को
समां लेती हैं
अपनी ही गहराई में
झील सी होती हैं स्त्रियाँ

अत्यंत प्रभावशाली रचना है संगीता जी ... आपकी रचनाएँ सदैव हृदय को छूती हैं ..... झील सी स्त्रियाँ .... शीर्षक भी बहुत सुन्दर है।
सादर
मंजु

दिगम्बर नासवा 12/08/2012 2:24 PM  

स्त्री के मन को सार्थकता प्रदान की है इस रचना ने ... बहुत ही उत्कृष्ट रचना ...

मैं और मेरा परिवेश 12/13/2012 8:37 PM  

झील में नारी का अक्स देख लेना, इतनी सुंदर कल्पना, काश सबके पास कवि दृष्टि होती।

Dr. Sarika Mukesh 4/13/2013 5:12 PM  

स्त्री के अंतर्मन को उजागर करती सुन्दर रचना...बधाई!
सादर/सप्रेम,
सारिका मुकेश
http://sarikamukesh.blogspot.in/

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