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चक्रव्यूह

>> Monday, March 2, 2009


सागर के किनारे
गीली रेत पर बैठ
अक्सर मैंने सोचा है
कि-
शांत समुद्र की लहरें
उच्छ्वास लेती हुई
आती हैं और जाती हैं ।
कभी - कभी उन्माद में
मेरा तन - मन भिगो जाती हैं ।

पर जब उठता है उद्वेग
तब ज्वार - भाटे का रूप ले
चक्रव्यूह सा रचा जाती हैं
फिर लहरों का चक्रव्यूह
तूफ़ान लिए आता है
शांत होने से पहले
न जाने कितनी
आहुति ले जाता है ।

इंसान के मन में
सोच की लहरें भी
ऐसा ही
चक्रव्यूह बनाती हैं
ये तूफानी लहरें
न जाने कितने ख़्वाबों की
आहुति ले जाती हैं ।

चक्रव्यूह -
लहर का हो या हो मन का
धीरे - धीरे भेद लिया जाता है
और चक्रव्यूह भेदते ही
धीरे -धीरे हो जाता है शांत
मन भी और समुद्र भी .

5 comments:

masoomshayer 3/02/2009 9:22 PM  

akhree band bahut achha hai pooree kavita ka roop ubhar deta hai waah

रश्मि प्रभा... 3/03/2009 11:29 AM  

इंसान के मन में सोच की लहरें चक्रव्यूह बनाती हैं......कितनी गहरी,कितनी कठिन स्थिति .....अद्भुत शब्दों से व्यक्त किया है,बहुत बढिया

निर्झर'नीर 3/03/2009 1:48 PM  

kitna gahraai mein utar jati ho aap bhavo ko shabd dene ke liye..

emotions never die.
marmik abhivyakti

taanya 3/04/2009 5:12 PM  

Sangeeta ji pranaam..

शांत समुद्र की लहरें
उच्छ्वास लेती हुई
आती हैं और जाती हैं ।
कभी - कभी उन्माद में
मेरा तन - मन भिगो जाती हैं ।
ji sangeeta ji jab b koi nayi cheez ya anubhav hamare aas-paas aata hai..ati ramneeye lagta hai, manmohak lagta hai aur tan-man ko sheetalta b deta hai..koi do raye nahi..

पर जब उठता है उद्वेग
तब ज्वार - भाटे का रूप ले
चक्रव्यूह सा रचा जाती हैं
फिर लहरों का चक्रव्यूह
तूफ़ान लिए आता है
शांत होने से पहले
न जाने कितनी
आहुति ले जाता है ।

bilkul aapki baato se 100% sehmat hu..jab vo nazdikiya, vo anubhav,vo nayi cheeze hamare bheeter tak ghus jati hai..unmaad machati hai aur fir jwar-bhate ka roop le hi leti hai..anyetha kaha jata hai ki yadi kisi nazdiki ko pure man se sweekar na kiya jaye to uska poorn-rupain aanand nahi le sakte..aur fir janm hota hai chakrevyuuh ka...jo tufan liye aata hai aur ne jane kitni aahutiya le kar jata hai..!! ati uttam taal-mail zindgi ki socho ka lehro k chakervyuh se..

चक्रव्यूह -
लहर का हो या हो मन का
धीरे - धीरे भेद लिया जाता है
और चक्रव्यूह भेदते ही
धीरे -धीरे हो जाता है शांत
मन भी और समुद्र भी .

ye baat bahut hi buddhimata ko aur aapki suljhi hui soch ki taraf ingati karti hai ki 'dhire-dhire bhed liya jata hai ......aur dhire dhire ho jata hai shaant man bhi aur samuder bhi..!!

kehne ko to bahut aasaan hai sangeeta ji chakrvyuuh ka bheden lekin use bhaidne me kitne pryas, kitni aahutiya, kitne kasht sehne padte hai ye to bhaidne wala hi bata sakta hai, jaan sakta hai..

ati uttam rachna...tahe dil se badhayi grehen kare...

Meena sharma 3/22/2021 6:28 PM  

इंसान के मन में
सोच की लहरें भी
ऐसा ही
चक्रव्यूह बनाती हैं
ये तूफानी लहरें
न जाने कितने ख़्वाबों की
आहुति ले जाती हैं ।
दीदी, कितनी गहरी बात। बिना किसी शब्दजाल के, बिना किसी क्लिष्ट भाषा के कितनी सरलता से कह दी है आपने!

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