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सागर मंथन

>> Monday, April 30, 2012



कटूक्तियाँ ,
मन के भँवर में
घूमती रहती हैं 
गोल गोल 
संवेदनाएं 
तोड़ देती हैं दम
अपने अस्तित्व को 
उसमें घोल ,

भावनाएं 
साहिल पर 
पड़ी रेत सी 
वक़्त के पैरों तले 
कुचल  दी जाती हैं
जो अपने 
क्षत- विक्षत हाल पर 
पछताती हैं ,

तभी ज़िंदगी के 
समंदर से 
कोई तेज़ लहर 
आती है 
जो उनको 
अपने प्रवाह संग 
बहा ले जाती है ,
फिर होती है
कोई नयी शुरुआत 
सुनहरी सी भावनाओं का 
चढ़ता है ताप 
चाँद भी आसमां में 
जैसे मुस्काता   है 
आँखों का सैलाब भी 
ठहर  सा जाता है 
बस यूं ही 
समंदर की लहरें 
आती - जाती हैं 
ज़िंदगी को जीना है 
यही समझाती हैं , 

मैं भी जी रही हूँ 
कर के ये चिंतन 
रोज़ ही करती हूँ 
मैं सागर मंथन । 

73 comments:

प्रवीण पाण्डेय 4/30/2012 8:21 AM  

सागर के थपेड़े या सागर मंथन।

रश्मि प्रभा... 4/30/2012 8:55 AM  

मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन
रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन । ,,, और अनुकूल लहरों का इंतज़ार , क्योंकि जिंदगी को बढ़ना है

संध्या शर्मा 4/30/2012 9:13 AM  

जी हाँ, जीवन सागर मंथन ही तो है, जो रोज-रोज, पल-पल होता है...
गहन भाव... आभार

प्रतिभा सक्सेना 4/30/2012 9:17 AM  

'मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन '
- चिंतन के हिलकोरे ही नवनीत संचय का हेतु बनते हैं ,छूछी वस्तुयें भी व्यर्थ कहाँ !

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 4/30/2012 9:35 AM  

बस यूं ही
समंदर की लहरें
आती - जाती हैं
ज़िंदगी को जीना है
यही समझाती हैं ,

बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति

सहज साहित्य 4/30/2012 9:40 AM  

बहुत भावपूर्ण कविता है ।

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) 4/30/2012 9:59 AM  

रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन ।

बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ... सुंदर भाव अभिव्यक्ति...

ashish 4/30/2012 10:11 AM  

जिन्दगी में उतार चढ़ाव को लहरों के माध्यम से ख़ूबसूरती से चिन्हित किया है . सुन्दर रचना .

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 4/30/2012 10:13 AM  

वाह !!!!!!! भावनाओं की ऊँचाइयों पर जिंदगी का यथार्थ चित्रित करती हुई उत्कृष्ट रचना. इसे पढ़कर एक कविता ने जन्म ले लिया, आपको सादर समर्पित है:-
भावनायें रेत सी बिखरी , कुचलती जा रहीं
हैं विवश संवेदनायें, हाय ! छलती जा रहीं
हैं भँवर कटु उक्तियों के,तेज लहरें उठ रहीं
जिंदगी-सागर,सुनामी नित मचलती जा रहीं.

आज मंथन कर ही लें,संकल्प-गिरि एक लाइये
और चिंतन-नाग से विष को विलग कर जाइये
आत्म-बल शंकर बने जो विष को धारे कंठ में
देव-गण सत्कर्म हैं , अमृत-कलश ले आइये.

Maheshwari kaneri 4/30/2012 10:48 AM  

मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन
रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन ।.....बहुत सुन्दर भाव..सुन्दर अभिव्यक्ति

vandan gupta 4/30/2012 11:18 AM  

मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन
रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन ्………………रोज सागर मंथन करना आसान नही होता …………मगर जीवन उसके बिना भी चलाना आसान नही ……एक सुन्दर और गहन भावाव्यक्ति

Amrita Tanmay 4/30/2012 11:30 AM  

और सागर मंथन से अमृत भी निकलता है ..
जैसे आपकी अमृतमयी रचना..

ANULATA RAJ NAIR 4/30/2012 11:40 AM  

मुझे तो लगा आप अमृत पान कर चुकीं हैं दी..........
वरना ऐसा सुंदर कैसे लिखतीं????
:-)

सादर

मनोज कुमार 4/30/2012 11:51 AM  

मंथन जब-जब मन उदधि में चलता है,
हर बार वहां से अमृत ही निकलता है।

सदा 4/30/2012 11:59 AM  

रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन ।
गहन भाव लिए अनुपम अभिव्‍यक्ति ...

अनुपमा पाठक 4/30/2012 1:25 PM  

सागर मंथन से अमृत तुल्य जीवन जीने की संजीवनी मिलती रहे!
सुन्दर रचना!
सादर!

Dr (Miss) Sharad Singh 4/30/2012 1:50 PM  

बस यूं ही
समंदर की लहरें
आती - जाती हैं
ज़िंदगी को जीना है
यही समझाती हैं ,

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति....

shikha varshney 4/30/2012 2:19 PM  

सागर मंथन भी जरुरी है.तभी निकलेगा अमृत शब्दों का और होगा हमारा मन तृप्त.
बहुत सुन्दर.

रेखा श्रीवास्तव 4/30/2012 2:22 PM  

रोज मंथन करके ही तो इतना अमृत पान कर चुकी हें कि विष और अमृत दोनों को सहज ही पचा कर एक प्रभावशाली रचना लिख डालती हें.

दर्शन कौर धनोय 4/30/2012 2:55 PM  

मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन
रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन ।
क्या बात हैं दीदी ...आपका सागर मंथन तो लाजवाब हैं ..बहुत गहरा बहुत संवेदन शील ...

Anita 4/30/2012 3:28 PM  

मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन
रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन ।
और इसी मंथन का नाम है जीवन...जो बीत गया वह बीत गया जिंदगी हर पल नयी है...सुंदर बोध देती कविता !

Suman 4/30/2012 3:36 PM  

sundar rachna vakai ......

Pallavi saxena 4/30/2012 4:46 PM  

समंदर की लहरें आती - जाती हैं ज़िंदगी को जीना है यही समझाती हैं ,बहुत खूब गहन भाव अभिव्यक्ति
समय मिले कभी तो आयेगा मेरी भी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

Anju (Anu) Chaudhary 4/30/2012 4:57 PM  

सागर मंथन या जिंदगी का मंथन ...यूँ ही चलेगा हर बार .....बार बार ....

Sadhana Vaid 4/30/2012 5:10 PM  

सागर की लहरों के साथ जीवन के उतार चढ़ाव की लय और गति को बाँध लेने की महारत आपमें ही है संगीता जी ! प्रकृति की हर गतिविधि में आप गहन जीवन दर्शन का संकेत ढूँढ लेती हैं और इतनी खूबसूरत रचनाएं रच डालती हैं ! आपकी लेखनी को नमन एवं ढेर सारी शुभकामनायें !

रविकर 4/30/2012 5:15 PM  

शोभा चर्चा-मंच की, बढ़ा रहे हैं आप |
प्रस्तुति अपनी देखिये, करे संग आलाप ||
मंगलवारीय चर्चामंच ||

charchamanch.blogspot.com

udaya veer singh 4/30/2012 6:39 PM  

गहन भाव लिए अनुपम अभिव्‍यक्ति ...

Asha Joglekar 4/30/2012 6:52 PM  

रोज ही करती हूँ सागर मंथन । बहुत सुंदर ।
ऐसी ही है जिंदगी ।

mridula pradhan 4/30/2012 7:51 PM  

मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन
रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन । haan.....bilkul.

डॉ. मोनिका शर्मा 4/30/2012 8:17 PM  

बेहद सुंदर ...आपकी रचनाओं की गहरी अभिव्यक्ति और जीवन दर्शन अद्भुत होता है.....

अनामिका की सदायें ...... 4/30/2012 8:24 PM  

aate me namak ki tarah hamari zindgi me kaam karti hain ye katooktiyan...ye na ho to sunheri bhaawnaao ka taap kaise mahsoos hoga..sab ka apna apna mehatv hai. yahi zindgi hai....yu hi zindgi ko jeena hai.

sunder, gehan prastuti.

रचना दीक्षित 4/30/2012 10:01 PM  

आँखों का सैलाब भी
ठहर सा जाता है
बस यूं ही
समंदर की लहरें
आती - जाती हैं
ज़िंदगी को जीना है
यही समझाती हैं ,

इस मंथन से ही अमृत निकलने की संभावना भी रहती है.

अशोक सलूजा 4/30/2012 11:23 PM  

भावनाओं का समंदर यू ही बहता रहे
जीवन का मज़ा यू ही आता रहे ....
शुभकामनाएँ!

वाणी गीत 5/01/2012 6:39 AM  

सागर मंथन ना हो तो विष और अमृत अलग कैसे होंगे ...
गहन भाव !

Anupama Tripathi 5/01/2012 7:48 AM  

जीवन कि प्रक्रिया समझाती खूबसूरत अभिव्यक्ति ......इसी में सब छुपा छुपा सा है .....बस हम में ढूँढने की क्षमता होनी चाहिए ....
गहन भाव ....
शुभकामनायें ....

सुनीता शानू 5/01/2012 3:20 PM  

विचारों का ऎसा मंथन बस आप ही कर सकती हैं।
आज तो हम भी शामिल हो गये हैं:)
बेहतरीन पोस्ट।
सादर

सदा 5/01/2012 3:25 PM  

कल 02/05/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


...'' स्‍मृति की एक बूंद मेरे काँधे पे '' ...

virendra sharma 5/01/2012 3:27 PM  

भावनाएं
साहिल पर
पड़ी रेत सी
वक़्त के पैरों तले
कुचल दी जाती हैं
जो अपने
क्षत- विक्षत हाल पर
पछताती हैं ,
बढ़िया रचना सकारात्मक को लपकती .हमें समुन्दर मयस्सर है लेकिन न लहरें आलोड़ित करतीं हैं मन न प्रोमिग्रेड ,ये कैसा शहरीकरण है सब कुछ न संवेदनाएं बचीं न कुछ और ,मन कहाँ पाए ठौर ?

कृपया यहाँ भी पधारें -
डिमैन्शा : राष्ट्रीय परिदृश्य ,एक विहंगावलोकन

http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/
सोमवार, 30 अप्रैल 2012

जल्दी तैयार हो सकती मोटापे और एनेरेक्सिया के इलाज़ में सहायक दवा

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" 5/01/2012 4:21 PM  

कटूक्तियाँ ,
मन के भँवर में
घूमती रहती हैं
गोल गोल
संवेदनाएं
तोड़ देती हैं दम
अपने अस्तित्व को
उसमें घोल ....lekin sagar kee lahron se seekhkar hame unahe bachana hee hai..satat nirantar prayas se..bahtu he acchi kriti..sadar pranam ke sath

रंजना 5/01/2012 4:25 PM  

वाह....प्रभावपूर्ण ...बहुत ही sundar...

भंवर से बहार निकल ही जीवन का मार्ग मिल सकता है...

सार्थक चिंतन किया है आपने ...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 5/01/2012 5:00 PM  

अद्भुत है यह सागर मंथन.. कभी विश मिलता है अक्भी अमृत!!
बहुत ही सुन्दर कविता दी!!

Reena Pant 5/01/2012 5:04 PM  

जीवन की वास्तविकता का सुंदर वर्णन

sushmaa kumarri 5/01/2012 8:29 PM  

बहुत ही गहरे भावो की अभिवयक्ति......

Vaanbhatt 5/01/2012 11:18 PM  

सागर मंथन से बहुत रत्न निकले थे...वैसे ही चिंतन से ज्ञानामृत...निकलता है...

Anju 5/02/2012 12:43 AM  

फिर होती है
कोई नयी शुरुआत
सुनहरी सी भावनाओं का
चढ़ता है ताप
चाँद भी आसमां में
जैसे मुस्काता है
आँखों का सैलाब भी
ठहर सा जाता है
बहुत उम्दा ....मंथन ...

ऋता शेखर 'मधु' 5/02/2012 7:44 AM  

सागर मंथन से कई रत्न मिले...
मन मंथन से ज्ञानवर्धक विचार मिलेंगे...
इसे शेयर करने के लिए आभार!

Surendra shukla" Bhramar"5 5/02/2012 9:23 PM  

फिर होती है
कोई नयी शुरुआत
सुनहरी सी भावनाओं का
चढ़ता है ताप
चाँद भी आसमां में
जैसे मुस्काता है
आँखों का सैलाब भी
ठहर सा जाता है ..
सुन्दर ...मंथन यों ही होता रहे और जिन्दगी अपने खूबसूरत रंग लिए हमें ले के लहरों के थपेड़े उतार चढाव दिखाती चले ...भ्रमर ५

Kailash Sharma 5/03/2012 3:42 PM  

समंदर की लहरें
आती - जाती हैं
ज़िंदगी को जीना है
यही समझाती हैं ,

....गहन जीवन दर्शाती बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...आभार

कुमार राधारमण 5/03/2012 5:17 PM  

ओशो सिद्धार्थ कहते हैं-
लहरों को बनने,मिटने दो
जीवन सरिता को बहने दो

मेरा मन पंछी सा 5/04/2012 10:46 PM  

सागर मंथन से बहुत कुछ अच्छा भी निकालता है
जैसे आपकी यह बेहतरीन रचना....
बहुत ही बढ़िया और गहन भाव व्यक्त करती सुन्दर रचना....

दिगम्बर नासवा 5/05/2012 12:54 PM  

यही तो जीवन है ... रोज ही मंथन होता है ... आशाएं जागती हैं ... भावनाएं खेलती हैं फिर टूट जाती हैं ...

Ravikant yadav justice league 5/05/2012 1:34 PM  

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आए

Ravikant yadav justice league 5/05/2012 1:34 PM  

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आए

India Darpan 5/05/2012 3:18 PM  

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से शुभकामनाएँ।

sushila 5/06/2012 11:59 AM  

"मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन
रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन ।"....
वाह ! अति सुंदर

sushila 5/06/2012 12:00 PM  

"मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन
रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन ।"....
वाह ! अति सुंदर

sushila 5/06/2012 12:02 PM  

"मैं भी जी रही हूँ
कर के ये चिंतन
रोज़ ही करती हूँ
मैं सागर मंथन ।"....
वाह ! अति सुंदर

समयचक्र 5/06/2012 2:53 PM  

"यूं ही समंदर की लहरें आती - जाती हैं ज़िंदगी को जीना है यही समझाती हैं ..."

बहुत सुन्दर रचना अभिव्यक्ति .... आभार

महेन्‍द्र वर्मा 5/06/2012 8:09 PM  

बस यूं ही
समंदर की लहरें
आती - जाती हैं
ज़िंदगी को जीना है
यही समझाती हैं ,

सही है, जिंदगी सागर मंथन ही है जिससे कभी जहर भी निकलता है और कभी अमृत।

Dr. sandhya tiwari 5/06/2012 9:39 PM  

jivan rupi sagar me roj hi hote rahte sagar manthan -------sahi kaha aapne

अंजना 5/07/2012 10:03 AM  

बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति..

मुकेश पाण्डेय चन्दन 5/07/2012 10:14 AM  

संगीता जी को जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनाये
७ मई २०१२

संध्या शर्मा 5/07/2012 10:21 AM  

संगीता जी जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

समयचक्र 5/10/2012 11:16 AM  

भावनाएं
साहिल पर
पड़ी रेत सी
वक़्त के पैरों तले
कुचल दी जाती हैं
जो अपने
क्षत- विक्षत हाल पर
पछताती हैं....

bahut sundar ... abhar

Raj Silswal 5/14/2012 2:22 PM  

संवेदनाएं
तोड़ देती हैं दम
अपने अस्तित्व को
उसमें घोल...waah!

www.navincchaturvedi.blogspot.com 5/15/2012 8:50 AM  

वाह उम्दा चिंतन युक्त मंथन

Ayodhya Prasad 5/16/2012 6:46 PM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...सागर मंथन

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 5/17/2012 5:49 PM  

रोज ही सागर का मंथन....

सुन्दर रचना दी...
सादर.

Kate 1/08/2013 6:36 PM  

सागर मंथन या जिंदगी का मंथन ...यूँ ही चलेगा हर बार .....बार बार ....

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