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ज़िंदगी का गणित

>> Wednesday, July 14, 2010


Life quotes



ज़िन्दगी ,

गणित के 

सवालों की  तरह 

कहीं जोड़  है 

तो कहीं घटाना ,

कभी गुणा है 

तो कभी भाग ,

और जब 

आ जाती है 

भिन्न  की परिस्थिति 

तो  होता है सामना 

कठिनाइयों का ,

न जाने 

कितनी तरह के 

कोष्ठों  में बंटीं 

ज़िन्दगी 

उलझ - उलझ 

जाती है ,

क्रमवार  हल 

न किया जाए 

तो हर बार 

मिलते हैं 

कुछ गलत आंकड़ें,

कोणों में बंटी 

ज़िंदगी 

कब कितने 

डिग्री का एंगल

बन जाती है 

पाईथागोरस  प्रमेय 

की तरह .


लोग 

यूँ ही तो 

नहीं कहते 

कि  गणित 

कठिन होता है  |

pythagoras theorem



64 comments:

शहरोज़ 7/14/2010 6:17 PM  

achchi kavitaa aap ne sahi kaha yahi to jivan ka sach hai

महेन्द्र मिश्र 7/14/2010 6:22 PM  

रोचक और सुन्दर रचना .....आभार

वन्दना 7/14/2010 6:32 PM  

ज़िन्दगी का गणित समझना ही तो सबसे मुश्किल है और इसका कही कोई उत्तर भी नही मिलता……………।बेहद सुन्दर प्रस्तुति।

shikha varshney 7/14/2010 6:40 PM  

दी मेरा गणित अच्चा हुआ करता था स्कूल में ..पर आज इस जीवन गणित ने सब भुला दिया ....अल्टीमेट कविता है दी ..सुपर्ब ..

रश्मि प्रभा... 7/14/2010 6:57 PM  

लोग

यूँ ही तो

नहीं कहते

कि गणित

कठिन होता है |
.... गर कठिन न हो तो भावनाओं का तालमेल न हो. अब देखिये न दिनोंदिन आपकी कलम की धार पैनी हो रही है और भावनाओं के तरकश से शब्दों के बाण निकल रहे हैं

ashish 7/14/2010 7:03 PM  

जीवन के उलझनों को दर्शाती कविता. जीवन दर्शन समझती कविता.

on lighter note -----कृपया नीचे दिया सूत्र का प्रयोग किया जाये.

का को पहले काटिए , ता पीछे दो भाग. गुना करो , धन जोड़ के , ऋण को दो घटाय

rashmi ravija 7/14/2010 7:05 PM  

क्या बात है..सही है,क्रमवार हल ना करें...तो आंकड़े गलत मिलते हैं.....सुन्दर कविता

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 7/14/2010 7:17 PM  

लगता है आप विज्ञान-गणित की ही अध्यापिका रही हैं!
--
तभी तो इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है!

सम्वेदना के स्वर 7/14/2010 7:24 PM  

ज़िंदगी के गणित को बहुत सुलझे हुए भावों के साथ समझाती यह कविता, बहुत सरल बना देती है एक ऐसे विषय को जिसे हमेशा कठिन माना जाता है. बस आवश्यकता है बुने हुए स्वेटर के एक खुले सिरे के पकड में आने की, हाथ आया तो कठिन से कठिन गणित उधड़ता चला जाता है...बेहद ख़ूबसूरत, संगीता दी!!

संजय भास्कर 7/14/2010 7:56 PM  

सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

kshama 7/14/2010 7:57 PM  

Bahut kam log samajhte honge is ganit ko! Rachana padhte hue mahsoos zaroor hua ki,sach taalmel bithana kitna kathin hai..bahut khoob likha hai aapne!

Bhavesh (भावेश ) 7/14/2010 8:09 PM  

वाकई, आपने एक लाजवाब कविता के माध्यम से जिंदगी कि गणित को दर्शाया है.

sanu shukla 7/14/2010 8:12 PM  

कब कितने

डिग्री का एंगल

बन जाती है

पाईथागोरस प्रमेय

की तरह .

शायद गणित भी इसीलिए कठिन हुआ होगा.....सुन्दर रचना !!

M VERMA 7/14/2010 8:25 PM  

लोग
यूँ ही तो
नहीं कहते
कि गणित
कठिन होता है
पर जब समझ मे आ जाये तो इससे सरल कोई विषय नहीं है
यह प्रयोग भा गया
बहुत सुन्दर

मनोज कुमार 7/14/2010 8:58 PM  

जीवन की गणित को समर्पित इस कविता को पढकर यह समझ आया कि विकट समस्‍याओं का आसान हल ढूँढ निकालना सबसे मुश्किल काम है।

मनोज कुमार 7/14/2010 9:01 PM  

एक बार फिर आया हूं कुछ कहने। बचपन में जब हमें गणित पढाया जाता था तो गणित के समीकरण हल करने के लिए एक सूत्र दिया जाता था जिस बोडमास (BODMAS) कहते थे। हम इसका सरलीकरण कर बदमाश कहा करते थे। आपकी कविता पढकर लगा कि जीवन का गणित सच में बड़ा बदमाश है।

roohshine 7/14/2010 9:06 PM  

दीदी,
क्या कहूँ..मुस्कराहट आ गयी पढ़ के....गणित मेरे लिए कभी कठिन नहीं रहा .. सिलसिलेवार अगर कोष्ठों को सही तर्क के साथ खोला जाए तो कभी गलत आंकडें नहीं मिलेंगे ..ज़रूरत है बस ज्ञान चक्षु खुले रखने की ..और जिंदगी का गणित भी उसी जागरूकता पर आधारित है ..रचना बहुत बढ़िया लिखी है आपने...मेरे विषय पर है..आनंद आया पढ़ कर

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 7/14/2010 9:09 PM  

जिंदगी का समस्या बदमास होता है सुने थे, लेकिन BODMAS होता है, ई त आज आपहीं से जाने हैं...वइसे हमरे गुरु जी, के पी सक्सेना जी, कहते थे कि ज्यामिति पढने से अच्छा, त जिल्दसाजी का काम है, हर कोण पर कटते या काटते रहने से, एक जगह जिल्द के साथ जुड़े रहना भला है... आपका कबिता फिर से लाजवाब!!!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 7/14/2010 9:11 PM  

मनोज जी भी एही बात लिखे हैं...लेकिन हम गनित में कमजोर हैं त का हुआ, उनका नकल नहीं मारे हैं...अपना मन से लिखे हैं...

प्रवीण पाण्डेय 7/14/2010 9:34 PM  

लोगों को गणित से इतनी घबराहट क्यों?

Avinash Chandra 7/14/2010 9:45 PM  

गणित मेरे लिए कभी कठिन नहीं रहा. मैं दो-तीन उम्र भी अंकों और ज्यामिति के बीच उलझा रह सकता हूँ ख़ुशी-ख़ुशी.....
इस बार भी आपका समझाया गणित खूब समझ में आया.
दिलखुश रचना :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/14/2010 10:02 PM  

सभी पाठकों का आभार ...

@ शास्त्री जी ,
आपने सही कहा, गणित मेरा प्रिय विषय रहा है...और बच्चों को पढाया भी है...आभार

@@ आशीष ,
:) :)
बहुत बढ़िया फार्मूला बताया ...पर यह केवल गणित पर ही लागू होता है...ज़िंदगी पर नहीं...उसमें अपनी समझ से बदलाव करने पड़ जाते हैं ....शुक्रिया


@@ वर्मा जी ,
सच है कि एक बार गणित समझ आ जाये तो बहुत सरल है...और सबसे प्यारा विषय भी....काश ज़िंदगी के भी गणित को ऐसे ही हम समझ पाते ....आभार .


@@ मनोज जी ,
आपने बिलकुल सही पहचाना ..ज़िंदगी का गणित बदमाश ही है...हम भी यही फार्मूला अपनाते थे गणित के सवाल हल करने में .. :):)....आभार

@@ मुदिता,
मुझे मालूम था कि तुम्हारे विषय को छुआ है तो दर्शन मिलेंगे.. :):)
पर यह तो तुम भी मानती हो कि ज़िंदगी के गणित को हल करने के लिए फार्मूला काम तभी करता है जब मन से अज्ञान का पर्दा हटा हो..तभी शायद सिलसिलेवार कोष्ठ खोले जा सकें...क्यों कि इस गणित में यह निश्चय नहीं होता कि पहले जोड़ना है या घटाना .प्यार और शुभकामनाओं के साथ ....दीदी

@@चला बिहारी ब्लॉगर बनने,
नाम से परिचित नहीं हूँ, बस इसी बात कि खुशी है कि आप कविता में निहित भाव को बखूबी समझ लिए हैं...आभार

प्रवीण जी ,
गणित से कुछ लोगों को सच में घबराहट होती है....मुझे नहीं होती थी...पर ज़िंदगी का गणित ज़रूर कठिन लगता है...आभार .

@@ अविनाश ,
गणित में तुम २-३ उम्र तक उलझे रह सकते हो...तब तो ज़िंदगी के गणित में भी पार पा जाओगे....शुभकामनायें

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/14/2010 10:12 PM  

शिखा,

स्कूल में तो मेरा गणित भी बहुत अच्छा था...पूरे मार्क्स आते थे...पर अब तो बस फार्मूले याद हैं ..और ज़िंदगी में सारे फार्मूले उलट पलट हो गए हैं....तभी तो समझ नहीं आते...पर फिर भी गलत आंकड़ों के बाद भी हल निकालने के लिए प्रयासरत तो रहते ही हैं....

सराहना के लिए ... :):)

प्यार सहित
दी

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 7/14/2010 10:57 PM  

संगीता जी, हमरा परिचय त साफ साफ लिखा है हमरा ब्लॉग पर...आपका नजर नहीं पड़ा ई हमरा बदकिस्मती है!!

अनामिका की सदाये...... 7/14/2010 11:53 PM  

गणित के बेस पर अगर जिंदगी के प्रश्न सुलझ सकते तो कितना अच्छा होता ? हालाँकि हमारे बुजुर्गों ने जिंदगी की कठिनाइयों के कुछ फार्मूले दिए हैं हमें...फिर भी क्रम वार कोष्ठको को खोलते सुलझाते फिर भी कहीं ना कहीं गड बड हो ही जाती है ...बस वही बात आती है की ज्ञान चक्षु खोलने का पूरा ज्ञान नहीं होता....हमारे वैसे हाल होते हैं की अभिमन्यु की तरह चक्र में घुस तो जाते हैं ..निकलने का रास्ते का ज्ञान नहीं होता.

बहुत सुंदर रचना जीवन के जमा घटा पर.
बधाई.

संगीता पुरी 7/15/2010 12:24 AM  

बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति ..

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी 7/15/2010 12:44 AM  

मेरे द्वारा अब तक पढ़ी गयी आपकी सबसे अच्छी कविता कहूंगा | कहने का अंदाज मोहक हो | 'जिन्दगी का गणित' एक आम मुहावरा है , इसे जैसे आपने विस्तार दे दिया है | भिन्न पर जाकर उलझ जाते हैं | ० वाले भाग में अनुभूतियों का अनंत आने लगता है तब तो स्थिति सम्हाले नहीं सम्हलती !

सुन्दर कविता ! आभार !

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 7/15/2010 1:12 AM  

hehehehehe...bahut bahut kathin raha hai ganit mere liye...hehe..chahe padhai ka ho ..ghazal ki meter ka ho ya zindagi ka...bahut achhi nazm hai mumma..

Shayar Ashok 7/15/2010 1:28 AM  

बहुत खूबसूरती से लिखा है आपने ,
जिंदगी की उतार-चढ़ाव को ||
पढकर आनंद आ गया ||

http://shayarashok.blogspot.com/

दीपक 'मशाल' 7/15/2010 6:28 AM  

गणित, जीवन और कविता.. बड़ा अच्छा तालमेल बिठाया..

राजकुमार सोनी 7/15/2010 6:31 AM  

गणित को हल करते समय उपयोग में आने वाले शब्दों का इस्तेमाल करते हुए आपने एक शानदार रचना लिख डाली.
मैं तो उस गणित में भी कमजोर था और इस गणित( जीवन को समझने के गणित) में भी कमजोर हूं.
आपकी रचना ने एक बाऱ फिर मेरे सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

Apanatva 7/15/2010 7:08 AM  

ganit jindgee ka aap kee samajh par nirbhar hai,,,,,,,,kanhee janha ghatana hota hai vanha asal me jodnaa hota hai......paristhitiyo par darmadaar rahata hai formula follow nahee kar sakte aap...........jab aap uljhano ko apne anubhavo ke formulo se suljhate hai to marks duniya de naa de man kee shanti jaroor mil jatee hai jo ki sukh kee neend bhee latee hai...........
puraskaar ke roop me..........
aabhar....

अजय कुमार 7/15/2010 7:31 AM  

गणित का फार्मूला होता है ,जीवन फार्मूले पर नहीं चलता बस इतना ही फर्क है ।
बहुत ही सुंदर और सहज आकलन है आपका ,आभार ।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 7/15/2010 7:47 AM  

बेहतरीन ! क्या कहूं ... बेहद खुबसूरत रचना है ...

विनोद कुमार पांडेय 7/15/2010 8:08 AM  

बिल्कुल सही कहा संगीता जी हमारी जिंदगी कुछ ऐसे ही ..पूरी जिंदगी गणित में उलझी हुई है..बढ़िया कविता...धन्यवाद

anupama's sukrity ! 7/15/2010 8:08 AM  

सही लिखा आपने -
स्सर्थक पोस्ट के लिए बधाई

sajid 7/15/2010 11:36 AM  

सुन्दर रचना आभार !

सत्यप्रकाश पाण्डेय 7/15/2010 12:48 PM  

इस गणित से तो सभी दूर मागते नज़र आते हैं, इस गणित को हल करने की आपसे जो प्रेरणा मिली है उसके लिए शुक्रिया।

अरुणेश मिश्र 7/15/2010 3:26 PM  

अच्छा सामंजस्य स्थापित किया गणित के साथ ।
प्रशंसनीय ।

अरुणेश मिश्र 7/15/2010 3:27 PM  

अच्छा सामंजस्य स्थापित किया गणित के साथ ।
प्रशंसनीय ।

अरुणेश मिश्र 7/15/2010 3:28 PM  

अच्छा सामंजस्य स्थापित किया गणित के साथ ।
प्रशंसनीय ।

अरुणेश मिश्र 7/15/2010 3:29 PM  

अच्छा सामंजस्य स्थापित किया गणित के साथ ।
प्रशंसनीय ।

डा. अरुणा कपूर. 7/15/2010 4:21 PM  

गणित और जीवन की तुलना!... वाह, ....वाकई कल्पना की अदभूत उडान!... बधाई,संगीता जी!

सत्यप्रकाश पाण्डेय 7/15/2010 4:40 PM  

सादर नमस्कार संगीता जी,
http://akelakalam.blogspot.com/ पर भी आपकी अनमोल प्रतिक्रिया चाहता हूँ

दिगम्बर नासवा 7/15/2010 5:22 PM  

लोग
यूँ ही तो
नहीं कहते
कि गणित
कठिन होता है

सच है ... जीवन का गणित इतना आसाब और सीधा नही होता ... हमेशा दो और दो चार नही होते जीवन में ... अच्छी रचना है ..

Archana 7/15/2010 5:27 PM  

गणित हमेंशा कठिन लगा...............और जिंदगी भी अब तक कोष्ठकों मे ही उलझी हुई है ...............शायद कोई हल निकले ...प्रयास जारी है ...............हल करने का.......

गिरिजा कुलश्रेष्ठ 7/16/2010 1:27 AM  

संगीता जी ,जिन्दगी और गणित का यह रूपक एकदम सटीक और नया है ।

Deepak Shukla 7/16/2010 7:01 AM  

Hi di..

Sahi tumhara kahna bahna..
Jeevan ganit sareekh hai..
Par usko bhi kathin lag ye..
Jisne ganit bhi seekha hai..

Visham jatil jeevan hai sabka..
Hal karna na hai aasaan..
Utna hi suljhega khudse..
Jisko bhi jitna hai gyaan..

Sundar bhav..

Deepak..

निर्मला कपिला 7/16/2010 8:40 AM  

जावन का गणित ही सब से कठिन विषय है। धन्यवाद।

मनोज कुमार 7/16/2010 2:19 PM  

17.07.10 की चिट्ठा चर्चा में शामिल करने के लिए इसका लिंक लिया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

sandhyagupta 7/16/2010 4:55 PM  

Sahitya,Ganit aur Darshan ka sundar mel.shubkamnayen.

हरकीरत ' हीर' 7/17/2010 6:04 AM  

लोग
यूँ ही तो
नहीं कहते
कि गणित
कठिन होता है

जी संगीता जी इस गणित में तो हम हमेशा फेल ही होते रहे .......!!

Shilpi 7/17/2010 10:12 AM  

गणित कठिन है, यह कथन सत्य है परन्तु इतना भी नहीं कि इस गुत्थम गुत्थी का हल हम निकाल न पाएं, वैसे भी मानव इश्वर की वो सर्वोतम कृति है जिसे उसने अपने अनुरूप ही बनाया है, मगर हमारी सोच ही है जो उस सच से हम आज तक अनभिज्ञ हैं और उसका तनिक भी अंश प्रयोग नहीं करना चाहते, अन्यथा यह जीवन कोई समस्या नहीं समाधान बन जाये!

Virendra Singh Chauhan 7/17/2010 7:35 PM  

Main aur kya kahun ...jab Itne bade-bade viddhanon ne sab kuch kah diya.

Lekin itna zaroor likhungaa ki ye kavita bahut achhi lagi. kaaafi kuchh seekhne ko mila.

Iske liye aapko dhanaybaad.

hem pandey 7/18/2010 12:55 PM  

जीवन के गणित ( फलसफे) की इतनी सुन्दर प्रस्तुति के लिए साधुवाद.

Akshita (Pakhi) 7/19/2010 3:13 PM  

मुझे भी गणित कठिन लगती है...
___________________
'पाखी की दुनिया' में समीर अंकल के 'प्यारे-प्यारे पंछी' चूं-चूं कर रहे हैं...

प्रतिभा सक्सेना 7/20/2010 3:45 AM  

मान गई संगीता जी, आपको !
कितना अच्छा होता गणित के ये फ़ार्मूले ज़िन्दगी भी पर लागू होते-यहाँ तो एक से एक के जुड़ाव का नतीजा ही पता नहीं कितना हो जाय!अंकन करनेवाले ने अगर अंक स्पष्ट लिख दिए होते तो बननेवाले समीकरण गड़बड़ाते नहीं.
ज़िन्दगी की तुलना में गणित बहुत सरल है कोशिश करके समझी तो जा सकती है .
बहुत गहरी कविता !बधाई !!

बाल-दुनिया 7/20/2010 2:06 PM  

खूबसूरत रचना ..बधाई .

********************
'बाल-दुनिया' हेतु बच्चों से जुडी रचनाएँ, चित्र और बच्चों के बारे में जानकारियां आमंत्रित हैं. आप इसे hindi.literature@yahoo.com पर भेज सकते हैं.

बाल-दुनिया 7/20/2010 2:08 PM  

खूबसूरत रचना ..बधाई .
********************
'बाल-दुनिया' हेतु बच्चों से जुडी रचनाएँ, चित्र और बच्चों के बारे में जानकारियां आमंत्रित हैं. आप इसे hindi.literature@yahoo.com पर भेज सकते हैं.

वीना 7/20/2010 3:35 PM  

जीवन का गणित भी ऐसा ही है। बहुत सुंदर रचना

वीना 7/20/2010 3:37 PM  

जीवन की केलकुलेशन जहां गड़बड़ाती है...वहीं परिणाम और समीकरण बदल जाते हैं

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