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रिसता मन

>> Thursday, May 31, 2012



उपालम्भों से 
आती है 
हर रिश्ते में 
खटास 
शिकवे 
नहीं रख पाते 
मन में 
मिठास 
टूट जाए 
जब 
एक बार 
विश्वास 
कैसे करे 
कोई फिर 
प्रेम की 
आस ? 
होता है 
हर बात से 
मन पर 
वज्राघात 
तो वाणी भी 
हो जाती है 
कर्कश 
और हर 
बात से 
होता है जैसे 
कुठाराघात .

प्रेम में 
विश्वास का होना 
ज़रुरी है 
विश्वास न हो तो 
बातों को 
छिपा लेना ही 
मजबूरी है .



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गुमनाम .........

>> Friday, December 24, 2010


बैठी थीं दो स्त्रियां 
कानन कुञ्ज में 
गुमसुम सी 
नि:मग्न हुई 
अचानक एक 
बोल उठी ,
मांडवी ! ज़रा कहो तो ,
तुम  आपबीती .
निर्विकार भाव से 
बोली मांडवी कि 
क्या कहूँ और 
कौन सुनेगा हमें 
कौन पहचानता है 
बोलो न श्रुतिकीर्ति? 
हाँ  सच है - 
हम सीता  की भगिनियाँ
भरत, शत्रुघ्न की भार्या 
कहाँ- कहीं बोलो कभी 
हमारा नाम आया ? 
सीता का त्याग और 
भातृ - प्रेम लक्ष्मण का 
बस यही सबको 
नज़र आया .
उर्मिला का 
विरह वर्णन भी 
साकेत में वर्णित है 
इसी लिए 
उसका भी नाम
थोड़ा चर्चित है ..
हमारे नामों को 
कौन पहचानता है ?

श्रुतिकीर्ति की बात सुन 
मांडवी अपनी सोच में 
गुम हो गयी 
जिया था जो जीवन 
बस उसकी यादों में 
खो गयी ..
जब आये थे भरत 
ननिहाल से तो 
उनका विलाप याद आया 
राम को वापस लाने का 
मिलाप याद आया .
लौटे थे भाई की 
पादुकाएं ले कर 
और त्याग दिया था 
राजमहल को 
एक कुटी बना कर .
सीता को वनवास में भी 
पति संग सुख मिला था 
मुझे तो राजमहल में रह 
वनवास मिला था ..
जो अन्याय हुआ मेरे साथ 
क्या वो 
जग जाहिर भी हुआ है?
मुझे तो लगता है कि
हमारा नाम 
अपनी पहचान भी 
खो गया है..
यह कहते सुनते  वो 
स्त्री छायाएं  न जाने 
कहाँ गुम हो गयीं 
और मेरे सामने एक 
प्रश्नचिंह  छोड़ गयीं ..
क्या सच ही 
इनका त्याग 
कोई त्याग नहीं था 
या फिर रामायण में 
इनका कोई महत्त्व नहीं था ???    

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संधि - विच्छेद

>> Tuesday, October 5, 2010



कुछ  सम्बन्ध 

बन जाते हैं 

यकायक 

और कुछ को 

पड़ता है बनाना 

या यूँ कहें कि 

बना दिए जाते हैं 

जो सम्बन्ध 

उनको पड़ता है 

निबाहना ,


और इस 

निबाहने की 

प्रक्रिया में 

कहाँ हो पाती है 

संबंधों में संधि  ?


सिर के ऊपर की 

एक छत 

सम्बन्ध के विच्छेद को 

दृष्टिगत नहीं होने देती .

एक साथ रह कर भी 

एक दूसरे से 

निबाहते हुए 

कभी एक होने नहीं देती .

भावनाएं मर जाती हैं 

प्रेम पनपता ही नहीं 

फिर भी लोग 

कहते है कि

सम्बन्ध - विच्छेद 

हुआ ही नहीं ..


और इसी तरह 

ढोते  चले जाते हैं 

भार ज़िन्दगी का 

शायद संधि होती है तब 

जब विच्छेद होता है 

आत्मा और शरीर का .....





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सपने में बापू

>> Saturday, October 2, 2010

Mahatma Gandhi
मुझे आज बापू 

सपने में दिख रहे थे 

उनकी आँखों से 

आँसू टपक रहे थे । 

मैने पूछा - बापू 

क्यों रो रहे हो ? 

हैरत से देख मेरी ओर बोले 

क्या तुम सब सो रहे हो ? 

वहाँ मेरी विरासत 

नीलाम हो रही है 

और यहाँ की सरकार 

लंबी तान कर सो रही है । 

हांलांकि मैने शराब बंदी पर 

आंदोलन चलाया 

पर आज उसी का व्यापारी 

काम आया । 

उसने ही भारतीयों  को शर्मसार 

होने से बचाया 

विजय देश की विजय 

बन कर आया 

इस पर भी सरकार ने 

अपना ठप्पा लगाया । 

जब माल्या टीपू सुल्तान की 

तलवार लाया था 

तब सरकार ने 

उस पर टैक्स लगाया था 

आज लाई हुई 

मेरी चीज़ों पर भी टैक्स 

लगाया जाएगा 

मेरी अदना सी संम्पत्ति को 

बढ़ा - चढ़ा कर बताया जाएगा । 

आज मैं ज़ार - ज़ार रोता हूँ 

जब कभी भी अख़बार पढ़ता हूँ। 

पूरे अख़बार में हिंसा, आतंकवाद ,

सड़क दुर्घटनाएँऔर 

बलात्कार की खबरें ही आती हैं 

कभी -कभी ऐसी भी खबर आती है 

कि जिससे मेरी रूह 

काँप जाती है 

अस्पताल में बिल भरने की खातिर 

एक माँ अपना बच्चा बेच देती है 

और सरकार के कान पर 

जूँ भी नही रेंगती है । 

आज सोचता हूँ कि, 

काश गोडसे ने मुझे नही 

मेरी आत्मा को मारा होता
 
तो उसने आज मुझे 

इस दुख से उबारा होता । 

उनका प्रलाप सुन 

मेरी नींद खुल गयी 

और मैं मन में न जाने 

कितने प्रश्न लिए रह गयी..





यह रचना पिछले वर्ष तब लिखी थी जब गाँधी जी कि चीज़ें नीलाम हुई थीं ...

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पायदान सीढ़ी का

>> Saturday, September 18, 2010








मैं ,

एक सन्यासी 

आसक्ति और विरक्ति 

से दूर 

मात्र एक  दृष्टा 

साधक की प्रतीक्षा में 

आता है नया साधक 

हर बार 

अपना पांव रख 

बढ़ जाता है 

अपनी मंजिल की ओर 

और बन जाता है 

एक पुख्ता सर्जक 

कदम दर कदम 

आगे बढ़ते  हुए 

बुलंदियों को छूता हुआ ..


मैं सिर उठा कर वहाँ तक 

देख नहीं सकता 

क्यों कि  नहीं है 

मेरी औकात 

इतना ऊँचा  देखने की

और वो सर्जक भी 

नहीं देख पाता 

झुक कर नीचे 

शायद उसे 

खौफ होता हो 

नीचे गिर जाने का 


सफलता की  सीढ़ी को 

फलांघता  हुआ वह

भूल जाता है कि

मैं  उस सीढ़ी  का 

पहला पायदान हूँ ....


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हमारी वाणी

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