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गुमनाम .........

>> Friday, December 24, 2010


बैठी थीं दो स्त्रियां 
कानन कुञ्ज में 
गुमसुम सी 
नि:मग्न हुई 
अचानक एक 
बोल उठी ,
मांडवी ! ज़रा कहो तो ,
तुम  आपबीती .
निर्विकार भाव से 
बोली मांडवी कि 
क्या कहूँ और 
कौन सुनेगा हमें 
कौन पहचानता है 
बोलो न श्रुतिकीर्ति? 
हाँ  सच है - 
हम सीता  की भगिनियाँ
भरत, शत्रुघ्न की भार्या 
कहाँ- कहीं बोलो कभी 
हमारा नाम आया ? 
सीता का त्याग और 
भातृ - प्रेम लक्ष्मण का 
बस यही सबको 
नज़र आया .
उर्मिला का 
विरह वर्णन भी 
साकेत में वर्णित है 
इसी लिए 
उसका भी नाम
थोड़ा चर्चित है ..
हमारे नामों को 
कौन पहचानता है ?

श्रुतिकीर्ति की बात सुन 
मांडवी अपनी सोच में 
गुम हो गयी 
जिया था जो जीवन 
बस उसकी यादों में 
खो गयी ..
जब आये थे भरत 
ननिहाल से तो 
उनका विलाप याद आया 
राम को वापस लाने का 
मिलाप याद आया .
लौटे थे भाई की 
पादुकाएं ले कर 
और त्याग दिया था 
राजमहल को 
एक कुटी बना कर .
सीता को वनवास में भी 
पति संग सुख मिला था 
मुझे तो राजमहल में रह 
वनवास मिला था ..
जो अन्याय हुआ मेरे साथ 
क्या वो 
जग जाहिर भी हुआ है?
मुझे तो लगता है कि
हमारा नाम 
अपनी पहचान भी 
खो गया है..
यह कहते सुनते  वो 
स्त्री छायाएं  न जाने 
कहाँ गुम हो गयीं 
और मेरे सामने एक 
प्रश्नचिंह  छोड़ गयीं ..
क्या सच ही 
इनका त्याग 
कोई त्याग नहीं था 
या फिर रामायण में 
इनका कोई महत्त्व नहीं था ???    

102 comments:

फ़िरदौस ख़ान,  12/24/2010 7:34 PM  

भावपूर्ण अभिव्यक्ति... मन को छू गई आपकी कविता...

महेन्‍द्र वर्मा,  12/24/2010 7:38 PM  

मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..

सम्वेदना की पराकाष्ठा को स्पर्श करती हुई एक श्रेष्ठ कविता।
मांडवी की व्यथा को शब्दों के माध्यम से साकार किया है आपने।...मांडवी का ‘वनवास‘ सीता के वनवास से कहीं अधिक पीड़ादायक है...

vandana gupta,  12/24/2010 7:45 PM  

ये तो हो ही नहीं सकता की रामायण में उनका महत्त्व ना हो ............रामायण में तो हर किरदार का अपना महत्त्व है बिना एक के दूजे का अस्तित्व ही नहीं है ............रामायण तो है ही त्याग की प्रतिमूर्ति ...........हर किरदार सिर्फ त्याग ही सिखाता है फिर इन दोनों का त्याग कैसे स्वीकार्य ना होगा............हाँ आपने इन दोनों किरदारों के साथ न्याय किया है इनकी व्यथा को सामने लाकर...........बेहद भावभीनी रचना.
इन दोनों के अलावा और सभी पात्रों का रामायण में कितना महत्त्व है यदि जानना हो तो आप तुलसीदास जी कृत विरह पदावली पढ़िए उसमे हर किरदार का उल्लेख है .कविता की दृष्टि से बेहद उम्दा प्रस्तुति है.

S.VIKRAM,  12/24/2010 7:54 PM  

सीता को वनवास में भी
पति संग सुख मिला था
मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..
जो अन्याय हुआ मेरे साथ
क्या वो
जग जाहिर भी हुआ है?
मुझे तो लगता है कि
हमारा नाम
अपनी पहचान भी
खो गया है..

बेहतरीन प्रस्तुतिसच मच इन दो त्याग मूर्तियों को तो हम भूल ही गए हैं...

shikha varshney,  12/24/2010 8:03 PM  

आज आपने मेरे दिल का ऐसा कौन छुआ है जो हमेशा से चित्कारना चाहता है पर शांत रह जाता है .
मांडवी और श्रुतिकृति की व्यथा और इनका त्याग आपने बेहतरीन तरीके से शब्दों में व्यक्त किया है.सच ही है कितना न्याय किया हमने उनके साथ.रामायण पूरी नहीं पढ़ी पर जितना भी जाना है बस नाम मात्र ही इनका वर्णन देखा है शायद भारी प्रतिशत तो लोगों का ऐसा होगा जिन्हें इनका नाम भी पता न हो.
एक और रत्न आपके कोष में इस कविता के माध्यम से आ गया है.

rashmi ravija,  12/24/2010 8:03 PM  

सीता को वनवास में भी
पति संग सुख मिला था
मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..
जो अन्याय हुआ मेरे साथ
क्या वो
जग जाहिर भी हुआ है?
बढ़िया प्रश्न....एक स्त्रीमन ही स्त्री के ह्रदय का दुख समझ सकता है
सुन्दर अभिव्यक्ति

स्वप्निल तिवारी,  12/24/2010 8:19 PM  

सिक्के का बिलकुल दूसरा ही पहलू है मम्मा ... एक दम दूसरा ... खूब अच्छी लगी यह नज़्म

मनोज कुमार,  12/24/2010 8:23 PM  

कमाल है जी!
मैंने तो यह नाम सब भी नहीं सुन रखा था। न सिर्फ़ ज्ञान की वृद्धि हुई बल्कि एक सुंदर भाव भीनी रचना पढने को मिली। आभार!

रश्मि प्रभा...,  12/24/2010 8:24 PM  

मैथिलीशरण गुप्त ने उर्मिला के त्याग को उठाया था , आज मांडवी और श्रुतिकीर्ति के एकाकी वनवास का चित्रण आपने किया और साहित्य को एक उत्कृष्ट मुकाम दिया है .... कलम और विचारों की जय

रश्मि प्रभा...,  12/24/2010 8:25 PM  

ise vatvriksh ke niche vicharniy sthaan den

Kailash Sharma,  12/24/2010 8:26 PM  

सीता को वनवास में भी
पति संग सुख मिला था
मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..

बहुत भावपूर्ण और मार्मिक प्रस्तुति..एक कटु सत्य से परिचय कराती ,एक नारी की अंतर्व्यथा का संवेदनशील चित्रण..आभार

ashish,  12/24/2010 8:26 PM  

मांडवी और श्रुतिकीर्ति के बारे में सचमुच बहुत कम लिखा गया है . नेपथ्य से आती उनकी पीड़ा का आपने बखूबी चित्रण किया है , मन आनंदित हो उठा .मांडवी और श्रुतिकीर्ति की इस व्यथा पर अपनी कलम चली . सुखद महसूस हुआ होगा मांडवी और श्रुतिकीर्ति को भी --- सच में .

प्रवीण पाण्डेय,  12/24/2010 8:33 PM  

इन दो और त्यागमयी अध्याय को अधिक महत्व नहीं मिल पाया।

kshama,  12/24/2010 8:50 PM  

Bahut sundar rachana hai.Dil dukhta hai jab Ramayan ke in do kirdaron ke bareme sochti hun. Aam log in do kirdaron se anjaan hain.

ZEAL,  12/24/2010 9:10 PM  

अत्यंत भावपूर्ण और श्रेष्ठ रचना !
आभार संगीता जी।

Anonymous,  12/24/2010 9:19 PM  

यह कहते सुनते वो
स्त्री छायाएं न जाने
कहाँ गुम हो गयीं
और मेरे सामने एक
प्रश्नचिंह छोड़ गयीं ..
क्या सच ही
इनका त्याग
कोई त्याग नहीं था
या फिर रामायण में
इनका कोई महत्त्व नहीं था ???
---
अरे वाह!
इतनी प्रेरक रचना पढ़कर तो हम बी धन्य हो गये!

शोभना चौरे,  12/24/2010 9:21 PM  

संगीता जी
मांडवी और श्रुतिकीर्ति की व्यथा को शब्द देकर अपने सोचने को मजबूर कर दिया |
बड़े पेड़ के तले छोटे छोटे पोधो को किस तरह उपेक्षित किया जाता है यह कितना सच है ?

DR.ASHOK KUMAR,  12/24/2010 9:29 PM  

मांडवी और श्रुर्तिकीर्ति का दुःख आपने आज दूर कर दिया है उन्हेँ अपने काव्य मेँ स्थान देकर । आभार दी!

Sushil Bakliwal,  12/24/2010 9:49 PM  

रामायण की इन गुमनाम नायिकाओं की उत्तम भावाभिव्यक्ति ।
जानकारीपरक रचना हेतु आभार...

राज भाटिय़ा,  12/24/2010 9:52 PM  

गुमनाम तो नही , हां रामायण मै इन की चरचा कम हुयी हे, लेकिन महत्व इस से कम नही होता, बहुत सुंदर शव्दो मे आप ने यह रचना रची, बहुत अच्छी लगी, धन्यवाद

Sadhana Vaid,  12/24/2010 10:04 PM  

राम कथा की इन दोनों विस्मृत किन्तु महत्वपूर्ण नायिकाओं की मनोव्यथा को शब्द देकर आपने उनके साथ भरपूर न्याय किया है ! कोई भी संवेदनशील हृदय उनकी इस उपेक्षा से निश्चित रूप से व्यथित हुआ होगा ! आपकी रचना ने मरहम का कार्य किया है ! इतनी सुन्दर रचना के लिये आपका जितना आभार व्यक्त किया जाए कम होगा ! मेरा अभिनन्दन स्वीकार करें !

अनामिका की सदायें ......,  12/24/2010 10:28 PM  

aaj tak mathili sharan gupt aur tulsidas ji ka likha saahity me itihaas ka kaam kar raha hai jisme maandvi aur shrutkeerti ko upeksha mili..lekin aaj ka aap ka likha jab kal itihas banega to kam se kam ye paatr upekshit shreni me to nahi aayenge. :)

sunder prastuti.

Kunwar Kusumesh,  12/24/2010 11:05 PM  

जो अन्याय हुआ मेरे साथ
क्या वो
जग जाहिर भी हुआ है?
मुझे तो लगता है कि
हमारा नाम
अपनी पहचान भी
खो गया है..

विचारणीय बात है .

सुज्ञ,  12/24/2010 11:06 PM  

स्त्री के ह्रदय की व्यथा!! सटीक अभिव्यक्ति!!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने,  12/24/2010 11:17 PM  

जब भी कोई हिट फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी जाती है, तो उसमें एक हीरो होता है, एकदम आदर्श.. आज्ञाकारी पुत्र, एकपत्नीव्रत पति, प्रजा का रक्षक.. एक विलन होता है, पराक्रमी मगर खल, किसी की भी स्त्री को उठा लेता है, भाई को बेदखल कर देता है... इनके साथ साथ चलते हैं कुछ सहनायक और सहनायिका, चरित्र अभिनेतागण.. कुछ चरित्र समीक्षक की लेखनी के कारण प्रसिद्द हो जाते हैं. किन्तु कई कलाकार जूनियर आर्टिस्ट होते हैं.. ये भीड़ का काम करते हैं... कितनों को तो इन किरदारों के नाम भी याद नहीं होते..
आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया की इन दोनों (मांडवी और श्रुतिकीर्ति) के बारे में कभी मैंने भी सोचा और लिखा था..
संगीता दी! वास्तव में बेहद संवेदनशील रचना!!

Anupama Tripathi,  12/24/2010 11:27 PM  

सुंदर कविता -
मन को छू गयी

इस्मत ज़ैदी,  12/24/2010 11:36 PM  

बहुत उम्दा कविता है ’साकेत’ याद आ गई
मांडवी और श्रुतिकीर्ति का त्याग भी कुछ कम नहीं था
नारी हृदय के दुख का बहुत अच्छा चित्रण है

mridula pradhan,  12/24/2010 11:53 PM  

bahut sahi aur badi baat uthayee hain aap.un dono ka dukh hamesha drvit karta raha hai isiliye aapki kavita man ko choo gaye .

प्रतिभा सक्सेना,  12/25/2010 12:43 AM  

रचना मन को छूती है .होता यह है कि किसी रचना में नायक-नायिका(उन्हीं की कथा होती है )पर जितना ध्यान केन्द्रित होता है औरों पर नहीं हो सकता ,न उनके लिए अधिक अवकाश (चित्रण में भी)कथा के संतुलन के लिए भी .हाँ जब गौण चरित्रों को गलत प्रस्तुत किया जाता है तब उनके साथ अन्याय होता है.इन चरित्रों पर अलग से लेखनी उठाई जा सकती है .सबसे गूढ़ व्यथा मांडवी की है .
लेकिन राम-सीता के आलोक-पुंज में ये दब कर रह जाते हैं

Er. सत्यम शिवम,  12/25/2010 1:15 AM  

Bahut sundar rachana.......aaj pehli baar vaise patro ka jikr hua hai jise koi nhi janta tha...anutha,allolik.....

nilesh mathur,  12/25/2010 1:24 AM  

बहुत सुन्दर और अनोखी प्रस्तुति, बेहतरीन!

VARUN GAGNEJA,  12/25/2010 11:42 AM  

संगीता जी, किसी ने सही कहा है..........की एक स्त्री का दर्द एक स्त्री ही समझ सकती है....रामायण अगर हिन्दू समाज में एक जीवन दर्शन शास्त्र है तो इसके साथ कई अनुतरित प्रश्न भी जुड़े हैं......अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें.........

उपेन्द्र नाथ,  12/25/2010 12:01 PM  

sangita ji , bahoot hi achchha varnan kiya hai aapne inke dard pida ka............. sach inpar to kisi kavi ki lekhni bhi nahiin chali.......sunde marmik prastuti.

वीरेंद्र सिंह,  12/25/2010 12:33 PM  

अगर मैने ये कविता न पढ़ी होती तो इतनी महत्वपूर्ण बात को मिस कर गया होता। मैने कभी ये नहीं सोचा था कि एक पहलू ये भी है। यक़ीन मानिए मेरे हिसाब से आपकी कविता उत्कृष्ट श्रेणी में आती है। आपके लिए भी आपकी ये कविता बहुत ख़ास रहेगी। ऐसा मेरा मानना है।

आपने जो चित्र लगाया है वो भी उम्दा और सटीक है।


आपको क्रिसमस और नये वर्ष की ढेरों शुभकामनाएँ और मंगलकामनाएँ।

Aruna Kapoor,  12/25/2010 1:16 PM  

.... मांडवी और श्रुतिकीर्ति की व्यथा अपनी जगह पर सही है!...सुंदर शब्द चित्रण....बधाई संगीता जी!

Anita,  12/25/2010 2:35 PM  

मांडवी और श्रुतकीर्ति को आपने जिस प्यार और आदर के साथ याद किया है वह काबिलेतारीफ है, कविता ने एक सुखद अहसास कराया, आभार!

Urmi,  12/25/2010 4:40 PM  

आपको एवं आपके परिवार को क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनायें !

आचार्य ललित मुनि,  12/25/2010 5:20 PM  

बहुत कुछ अंधेरे कोनो में छिपा रह जाता है,जो प्रकाश में आता है वही दिखाई देता है।

सु्न्दर चिंतन

आभार

Dorothy,  12/25/2010 9:02 PM  

क्रिसमस की शांति उल्लास और मेलप्रेम के
आशीषमय उजास से
आलोकित हो जीवन की हर दिशा
क्रिसमस के आनंद से सुवासित हो
जीवन का हर पथ.

आपको सपरिवार क्रिसमस की ढेरों शुभ कामनाएं

सादर
डोरोथी

शिक्षामित्र,  12/25/2010 10:54 PM  

महाकाव्यों में नायक-नायिका से इतर पात्र सहायक मात्र होते हैं। फिर भी,चंद साहित्यकारों ने उन्हें गरिमा प्रदान करने की कोशिश की है। रश्मिरथी,ऊर्वशी आदि ऐसी ही कृतियां हैं। आपने भी एक सराहनीय प्रयास किया है।

वाणी गीत,  12/26/2010 6:04 AM  

मांडवी और श्रुतिकीर्ति का त्याग भी सीता और उर्मिला से कम नहीं था ...दोनों स्त्रियों की मनोदशा को आपकी कविता ने बहुत अच्छी तरह समझाया...

Swarajya karun,  12/26/2010 10:50 AM  

अच्छी कविता . बेहतरीन प्रस्तुति.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib'),  12/26/2010 11:01 AM  

अत्यंत सुन्दर चित्रण दी. महाकाव्य की अनकही व्यथा को "स्वर" है आपकी यह रचना. आपको बधाई और नमन.

उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति का वनवास समाप्त हुआ तब माँ सीता का वनवास प्रारंभ हुआ और श्री राम भी राजमहल में वनवासी की तरह रहे, ऐसा वनवास जो ख़त्म ही नहीं हुआ.

तमाम संकटों में भी सत्य के प्रति पात्रों की जिजीविषा, सौहार्द्रपूर्ण रिश्ते और मिलन तथा विरह के अभूतपूर्व ताने बाने की साथ मर्यादित जीवन के अद्भुत सन्देश ही इस महाकाव्य को अमर बनाते हैं.

परमजीत सिहँ बाली,  12/26/2010 12:49 PM  

भावपूर्ण अभिव्यक्ति... मन को छू गई

Patali-The-Village,  12/26/2010 2:11 PM  

सम्वेदना की पराकाष्ठा को स्पर्श करती हुई एक श्रेष्ठ कविता। आभार|

Anonymous,  12/26/2010 3:29 PM  

सीता को वनवास में भी
पति संग सुख मिला था
मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..

सही कहा आपने, श्रुतकीर्ति और मांडवी का वनवास सीता के वनवास से कहीं ज्यादा कठिन था. अत्यन्त संवेदनशील रचना.

मंजु

monali,  12/26/2010 4:12 PM  

Bade ped ki chhaya me chhote paudho ko sahara bhale mil jaye, panapne ka avsar kabhi nahi mil sakta.. N my experience says dat biggest sacrifice go unknown n unnoticed.. unhe to wo bhi yaad nahi rakhte jinke lie tyaag kia ho :(

डॉ टी एस दराल,  12/26/2010 4:16 PM  

सही कहा । बहुत से लोगों का त्याग गुमनामी के अँधेरे में खो जाता है और उन्हें कोई याद नहीं करता । जैसे हमारे बहुत से शहीद, जिन्हें आज तक न्याय नहीं मिला ।

कविता रावत ,  12/26/2010 6:39 PM  

मांडवी और श्रुतिकीर्ति की व्यथा का आपने बहुत ही मार्मिक चित्रण क्या है. जो बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है कि किस तरह साधारण समझे जाने वालों का असीम त्याग को कितनी सरलता से भुला लिया जाता है! .. ... नारी ह्रदय में दबी वेदना को मुखरित कर प्रस्तुत करने के लिए बहुत बहुत आभार

अनुपमा पाठक,  12/26/2010 7:45 PM  

उनका त्याग...उनकी व्यथा...
क्यूँ अनचीन्हा रह गया!!!
संवेदनशील अभिव्यक्ति!

POOJA...,  12/26/2010 7:51 PM  

वाकई विषय विचारणीय है...
हर बात एक कटु सत्य की तरह उजागर कर दी आपने...
तारीफ करना, सूरज को दिया दिखने के सामान होगा...

Sushil Bakliwal,  12/27/2010 12:18 AM  

जिन्दगी क्या है ? मेरी इस पोस्ट पर जीवन के प्रति आपका नजरिया अच्छा लगा-
ज़िंदगी ,
दिन का
शोर है
जो ,
रात की
खामोशी में
डूब जाता है ..
आभार सहित...

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल,  12/27/2010 2:27 AM  

संगीता जी आपकी सभी रचनाएँ अनमोल हैं, टिपण्णी करने से डर लगता है, मैं एक साधारण सा व्यक्ति हूँ , फिर भी सभी रचनाओं में मुझे माधुर्य ही माधुर्य नज़र आता है, एक प्रवाह अनंत है जिन्हें शब्दों में बांधना मुश्किल है, नमन सह /

Apanatva,  12/27/2010 10:10 AM  

Mythology par based rachana bahut acchee lagee sath hee Lalit jee kee ye tippanee........

बहुत कुछ अंधेरे कोनो में छिपा रह जाता है,जो प्रकाश में आता है वही दिखाई देता है।

Rahul Kumar Singh,  12/27/2010 10:20 AM  

हाशिये के पात्र सामान्‍यतः उपेक्षित ही रह जाते हैं.

शारदा अरोरा,  12/27/2010 1:16 PM  

बहुत अच्छी रचना , प्रसिद्धि तो सितारों का खेल होती है ,वक्त चाहे तो ज़र्रे को खुदा कर दे , ये लेखक का कमाल है कि वो उन हिस्सों पर भी प्रकाश डालता है जो उजाले से वंचित रह जाते हैं , भगनी शायद भगिनी होता है , चेक कर लीजिये ...

सदा,  12/27/2010 2:58 PM  

मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..
बहुत ही सुन्‍दरता से आपने इस रचना को शब्‍द दिये हैं जो एक कालजयी सशक्‍त प्रस्‍तुति हुई ...आपकी लेखनी को नमन ...।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ,  12/27/2010 3:29 PM  

संगीता जी,
मांडवी और श्रुतिकीर्ति तो बस प्रतीक हैं !
हमेशा से यही होता आया है !
नई सोच के लिए साधुवाद !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

रूप,  12/27/2010 3:53 PM  

अत्युत्तम! आपने मार्मिक कविता लिखी है. मांडवी और श्रुतकिर्ती के अपरिचित होने का दर्द भला कौन समझ सकता है. आपकी कीर्ति को मेरा नमन.

निर्झर'नीर,  12/27/2010 4:44 PM  

नीव के पत्थर किसके देखे है ?

Anonymous,  12/27/2010 8:19 PM  

संगीता जी ! आप ने न सिर्फ सुंदर कविता लिखी है बल्कि एक प्रश्न भी छोड़ गयी हैं ,एक कडवा सच यह है हम स्त्रिया इतिहास नही लिखती हैं इसीलिए ये महिलाएं अनपहचानी रह गयी हैं ! आभारी हूँ इस कविता के लिए

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'',  12/27/2010 9:23 PM  

बहुत उम्दा रचना है.

Dr.J.P.Tiwari,  12/28/2010 2:36 PM  

नमस्कार!
नारी मन की कोमल भावनाओं को सशक्त स्वर केवल एक नारी, विदुषी नारी ही दे सकती है...यह केवल एक नारी मन की व्यथा कथा नहीं है भारतीय समाज में अपनी संवेदनाओं, अपना नान, अपना जीवन लुटाकर सर्वस्व होम कर देनेवाली नारी प्रश्न को मंदी और श्रुतिकीर्ति के माध्यम से उठाकर जो ऊर्जा संप्रेषित की है आपने मै चाहूँगा की उसका जवाब आये.....प्रायश्चित आये...सुधार आये और मजा तो तब आये जब जिमीदार पुरुष हो या नारीवर्ग...इसको एहसास करे और किसी त्यागी, समर्पित के साथ नाइंसाफी न होने दे. बहुत पहले आपने एक प्रश्न गांधारी पूछा था आज नारी मन पूछ रहा है..कविता और भव के साथ कथ्य का अंदाज बहुत ही प्र्रक और सार्थक रहा. आभार इतनी अच्छी विचारणीय रचना के लिए...

Dr.J.P.Tiwari,  12/28/2010 2:36 PM  

नमस्कार!
नारी मन की कोमल भावनाओं को सशक्त स्वर केवल एक नारी, विदुषी नारी ही दे सकती है...यह केवल एक नारी मन की व्यथा कथा नहीं है भारतीय समाज में अपनी संवेदनाओं, अपना नान, अपना जीवन लुटाकर सर्वस्व होम कर देनेवाली नारी प्रश्न को मंदी और श्रुतिकीर्ति के माध्यम से उठाकर जो ऊर्जा संप्रेषित की है आपने मै चाहूँगा की उसका जवाब आये.....प्रायश्चित आये...सुधार आये और मजा तो तब आये जब जिमीदार पुरुष हो या नारीवर्ग...इसको एहसास करे और किसी त्यागी, समर्पित के साथ नाइंसाफी न होने दे. बहुत पहले आपने एक प्रश्न गांधारी पूछा था आज नारी मन पूछ रहा है..कविता और भव के साथ कथ्य का अंदाज बहुत ही प्र्रक और सार्थक रहा. आभार इतनी अच्छी विचारणीय रचना के लिए...

रंजना,  12/28/2010 4:05 PM  

सत्य कहा आपने...इन पात्रों पर शायद ही किसीने अपनी कलम चलाई है...

वस्तुतः देखा जाय तो राम परिवार के सभी आदर्श पात्रों ने आदर्श की स्थापना अपने व्यक्तिगत सुखों की तिलांजलि देकर ही की थी..किसी के त्याग को कम और किसीके को अधिक कहना या किसी भी भांति तुलना करना बेकार ही है..सभी के सभी तो अपने अपने स्थान पर उतने ही ऊंचे हैं,वन्दनीय हैं...

रामायण के नायक चूँकि राम हैं,इसलिए सर्वाधिक प्रकाश उन्हीके चरित्र तथा जो उनके आस पास रहे उन पर डाला गया है,परन्तु इससे किसीका महत्त्व कम नहीं हो जाता...

रंजना,  12/28/2010 4:06 PM  

आपके संवेदनशीलता की मैं वंदना करती हूँ जो आपने इन्हें विवेच्य समझा..

मर्मस्पर्शी रचना के लिए आपका बहुत बहुत आभार...

पूनम श्रीवास्तव,  12/28/2010 7:19 PM  

sangeeta di
bahut hi sateek prastuti.
ramayan ke jin patro ki vyatha ka aapne itne khubsursat dhang se jikra kiya hai vah vastav me bahumuly hain .han!inke baare me vistrit dhang se kabhi nahi padha tha,par yah ekdam sach hai ki inke tyag ko kisi bhi prakar se ham kam nahi aank sakte.
maa sita to vanvas me bhi bhagvan shri ram ke saath rahi par mandvi avam shruti ka vichhoh unse bhi kahi jyda tha bhle hi maa site bahut si paristhitiyo se gujri ,par in dono ka kiya gaya tyag bhi hamesha se anukarniy raha hai.
jaisa ki aapne likha hai----
सीता को वनवास में भी
पति संग सुख मिला था
मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..
जो अन्याय हुआ मेरे साथ
क्या वो
जग जाहिर भी हुआ है?
मुझे तो लगता है कि
हमारा नाम
अपनी पहचान भी
खो गया है..
ek bahut hi bhavpurn avam sashakt .rachna.
aapko hardik naman
poonam

Avinash Chandra,  12/28/2010 11:33 PM  

कैसे ये पढने से रह गई... अगली बार मेरे कान जरुर खींचियेगा.
ऐसा लिखने के लिए वंदन है...
प्रणाम!

Khare A,  12/29/2010 12:40 PM  

grr8 grr8 writups sangeeta Di

just amazing , excellent

congarte

Dorothy,  12/29/2010 12:52 PM  

नारी मन की वेदना को बेहद संवेदनशीलशीलता से उकेरती दिल को छूने वाली खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

अजित गुप्ता का कोना,  12/29/2010 1:10 PM  

इन दोनों का ही महत्‍व था और रहेगा। यदि महत्‍व ना होता तो फिर इनका नाम भी उल्लिखित नहीं होता। किसी भी ग्रन्‍थ में केन्‍द्रीभूत पात्रों का ही चित्रण बहुलता से मिलता है। यह तो हजारों वर्ष पूर्व का इतिहास है, जो पता नहीं कितना लिखा गया और कितना नष्‍ट हो गया। लेकिन वर्तमान में तो हम देखते हैं कि राजनीति में केवल एक परिवार का ही महिमा मण्‍डन है। हाँ लेकिन आपने नये विषय पर अपने सधे हुए शब्‍दों से अच्‍छा चि‍त्रण किया है। आपकी यह रचना पता नहीं कैसे पढने से चूक गयी और इतनी देर बाद आपके ब्‍लाग पर आ पायी?

समय चक्र ,  12/29/2010 5:25 PM  

स्त्री छायाएं न जाने
कहाँ गुम हो गयीं
और मेरे सामने एक
प्रश्नचिंह छोड़ गयीं ..
क्या सच ही
इनका त्याग
कोई त्याग नहीं था
या फिर रामायण में
इनका कोई महत्त्व नहीं था ???

बहुत ही भावुक कर देने वाली रचना ...आभार

गौरव शर्मा "भारतीय",  12/29/2010 8:10 PM  

प्रणाम,
वाकई आज से पहले कभी इन दोनों किरदारों की ओर ध्यान नहीं गया था पर आपने आज इस पोस्ट के माध्यम से न केवल इन दोनों किरदारों के महत्व को समझाया वरन त्याग की असल भावना से परिचित भी करा दिया....
मन को छु लेने वाले इस बेहतरीन पोस्ट के लिए सदर आभार |

Arvind Mishra,  12/29/2010 10:54 PM  

लाजवाब प्रश्न!

संजय भास्‍कर ,  12/30/2010 7:16 AM  

आदरणीय संगीता जी
नमस्कार !
........आप ने न सिर्फ सुंदर कविता लिखी है

संजय भास्‍कर ,  12/30/2010 7:16 AM  

आपको और आपके परिवार को मेरी और से नव वर्ष की बहुत शुभकामनाये ......

Sunil Kumar,  12/30/2010 10:33 AM  

सम्वेद को स्पर्श करती हुई कविता।
बहुत ही भावुक कर देने वाली रचना ...आभार

Manjari,  12/30/2010 7:01 PM  

Aapki gumnam padhi, mann ko chu lia, yu laga jaise bheetar tak utar gayi ho koi baat! Mann ki udvelna ko jaise apne shabdon mai udel dia ho jyu ka tyu! Aur ye jadu to ap hi ker sakti hain!

Aur kya kahu!
Apke shabd swam hi mukhar hain! Bhav abhivyakti main!

Anonymous,  1/02/2011 7:25 AM  

Hello Mam,

Sach aap kitna khobsurat likhtin hain, aapki kavitayein to seedhe dil ko chooti hain.

दिगम्बर नासवा,  1/03/2011 3:26 PM  

मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..

इतिहास के अन्छुवे संवेदनशील प्रसंग को उठाया है अओने ..

M VERMA,  1/04/2011 8:23 AM  

इस दृष्टिकोण की रचनाएँ कम ही हैं. सुन्दर भाव और सम्वेदना पिरोया है आपने.

Taru,  1/26/2011 11:10 PM  

Mummmma.....

maine to pehli baar ye naam sune......shayad kabhi विचार ही नहीं किया..इनके अस्तित्व का...........
:(

दूसरी बात....बहुत रामायण नहीं पढ़ी....मगर रामानंद सागर और रामचरितमानस के कुछ अध्याय (बचपन में पढ़े थे..)....पढ़कर जो कुछ जानती हूँ......उससे ऐसा लगता है.....कि भरत और maa सीता के त्याग का ek uddeshya tha.......शायद यही वजह रही हो..

बहरहाल.......दोनों स्त्रियों का दुःख जानकार अच्छा नहीं लगा.....

बहुत इमानदारी से एक बात कहूँगी मम्मा.......कि आप इस कविता में और भी अच्छे तरीके से दोनों की टीस और पीड़ा चित्रित कर सकतीं थीं....

:)

प्रणाम !

aur der se nahin nahin....bahut der se aane ke liye kshamprarthi hoon....:(

बस्तर की अभिव्यक्ति जैसे कोई झरना,  1/30/2011 4:38 PM  

मांडवी और श्रुतिकीर्ति के दर्द और त्याग के किस्से राजमहल की कोठरियों में ही सिसकते रहे ...वहां से बाहर ही नहीं निकले कभी .....साहित्यकारों की कोई दृष्टि उधर क्यों नहीं गयी कभी .....यह आश्चर्य का विषय है......बेशक हमारे समाज नें पक्षपात किया है .......ग़नीमत है आजकल क्वीज़ में कभी चर्चा हो जाती है इन नामों की .....वरना नयी पीढी को इनके नाम खोजने में नानी याद जाती.
...गीत जी ! राज-प्रासाद में घुटती पीड़ा के प्रति आपकी संवेदना के स्वर को सादर प्रणाम. मांडवी की तो फिर भी कुछ चर्चा हो गयी है ...श्रुतिकीर्ति पर आप कुछ और लिखें तो कृपा होगी .

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com),  12/23/2011 11:02 PM  

दु:ख ही दु:ख है इस जहाँ में,
कम कहीं ज्यादा कहीं
त्याग कहते हैं कहीं पर
और मर्यादा कहीं......

सुख है मृगतृष्णा सरीखा
दु:ख दहकती रेत है
हम समझते हैं जिसे सुख
दु:ख का वह संकेत है.

जल रही मीरा कहीं पर
जल रही राधा कहीं.....

मन की वीणा,  1/22/2022 12:36 PM  

दो उपेक्षिता बहनों का वार्तालाप के माध्यम से जो काव्य सृजन किया है आपने संगीता जी वो प्रशंसा से परे है।
अछूता विषय और सारगर्भित उद्गार हृदय तक उतर गए।
सचमुच वार्तालाप संकेतिक रूप से वाल्मिकी,तुलसी और आने वाले सभी काव्यकारों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं ।
अप्रतिम रचना।

जिज्ञासा सिंह ,  1/22/2022 4:03 PM  

प्रश्नचिंह छोड़ गयीं ..
क्या सच ही
इनका त्याग
कोई त्याग नहीं था
या फिर रामायण में
इनका कोई महत्त्व नहीं था ???
..वाकई, जो दर्द इनका रहा होगा उस तक आपकी संवेदना जब आज तक पहुंच रही है, हम भी उस दर्द से अछूते नहीं है,तो फिर उस दर्द की छाया उस समय भी जरूर रही होगी, वाल्मीकि जी या तुलसीदास जी को भी उस दर्द की तपन जरूर चुभी होगी परंतु वो तो किसी और चरित्र का वर्णन करने में इतने रम गए कि मांडवी और श्रुतिकीर्ति जैसे चरित्रों की घोर अनदेखी की । यही तो पीड़ा है,। आपकी रचना ने आज की स्त्रियों के जाने अंजाने मर्म को भी छू लिया । आज भी स्त्रियों के साथ ऐसे अन्य होते हैं।
एक उत्कृष्ट रचना को साझा करने के लिए आपका आभार आदरणीय दीदी 👏💐

रेणु,  1/22/2022 4:07 PM  

जी दीदी, बहुत मार्मिक वार्तालाप है मांडवी और श्रुतिकीर्ति का। सच है मर्यादाओं के सघन बरगद तले सपनों के नन्हें पौधें जन्मते जरूर हैं पर पनपते नहीं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के बनवास को सदियों से जनमानस में बड़ी श्रद्धा और विश्वास से देखा जाता है पर यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो श्री राम जी के लिए सपत्नीक ये बनवास आनन्द और उल्लास से भरा वनगमन था। उस पर अनेक ऋषिमेधाओं के संसर्ग ने उनके जीवन के इस अध्याय को गौरवाविंत किया। यदि सीताहरण को छोड़ दिया जाए तो ये गमन उनके लिए बहुत रोमांचकारी रहा। पर जिन लोगों, विशेषकर सीता की तीनों बहनों, ने वनवास ना होते हुऐ भी घर में रहकर बनवास बीकी पीड़ा भोगी उसे इतिहास ने पूर्णतया विस्मृत कर दिया। बनवास उन महलों में रहने वाले दोनो भाइयों का भी था जिन्होंने बनवासी भाई के विरह और सम्मान में चौदह वर्ष तापस जीवन व्यतीत किया । इतिहास की दो ऊपर अपेक्षित नारी पात्रों की वेदना को शब्दों में खूब लिखा आपने। ढेरो शुभकामनाए और बधाई प्रिय दीदी 🙏🙏❤️🌷🌷

Bharti Das,  1/22/2022 4:15 PM  

बहुत सुंदर शब्द चित्र भावविभोर करने वाली

Shakuntla,  1/22/2022 6:22 PM  

सुंदर अभिव्यक्ति

Sudha Devrani,  1/23/2022 4:50 PM  

सीता को वनवास में भी
पति संग सुख मिला था
मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..
जो अन्याय हुआ मेरे साथ
क्या वो
जग जाहिर भी हुआ है?
मुझे तो लगता है कि
हमारा नाम
अपनी पहचान भी
खो गया है..
सचमुच माण्डवी और श्रुतिकीर्ति का नाम साहित्य और इतिहास में ना के बराबर ही है..ऐसा लगता है इनके भाव और विचारों का तो जैसे कोई मोल ही नहीं था ना इनके पतियों के लिए और ना ही इनके परिवार वालों के लिए।
दोनों बहनों की छायाओं का आपसी वार्तालाप एवं उसमें अपने विचार !!!
बहुत ही लाजवाब एवं अविस्मरणीय सृजन किया है आपने और साथ ही इन दोनों पात्रों के साथ अकाट्य न्याय...
बहुत ही लाजवाब उत्कृष्ट एवं अद्भुत सृजन हेतु बधाई एवं कोटिश नमन🙏🙏🙏🙏

yashoda Agrawal,  1/24/2022 10:48 AM  

आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 25 जनवरी 2022 को साझा की गयी है....
पाँच लिंकों का आनन्द पर
आप भी आइएगा....धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ),  1/24/2022 2:59 PM  

कुसुम जी
प्रिय जिज्ञासा
प्रिय रेणु ,
भारती जी ,
शकुंतला जी ,
सुधा जी ,
आप सब यहां आए और मेरे छोटे से प्रयास को सराहा इसके लिए मैं हृदय से आभारी हूँ ।
बहुत से ऐसे विषय चुने थे मैंने जो मैं चाहती हूँ कि आप तक पहुंचें । आप सब ही उच्च कोटि का लेखन करते हैं । छंदात्मक रचनाएँ लिखते हैं । मैं केवल भावों का सम्प्रेषण ही कर पाती हूँ । फिर भी आप लोग पढ़ कर जो प्रतिक्रिया देते हैं उससे मैं स्वयं को विशेष महसूस करने लगती हूँ । इस एहसास को देने के लिए बहुत शुक्रिया ।।

संगीता स्वरुप ( गीत ),  1/24/2022 3:00 PM  

प्रिय यशोदा आभार ।

Meena Bhardwaj,  1/25/2022 8:10 AM  

हृदयस्पर्श करती संवेदनशील कविता ।

कविता रावत ,  1/25/2022 8:48 AM  

सच जब बड़े-बड़े घंटे बज उठते हैं छोटी-छोटी घंटियों की आवाज उनमें दब कर रह जाती है, लेकिन घर के मंदिरों में उनके बिना पूजा अधूरी है, यह हमें नहीं भूलना चाहिए
बहुत अच्छी विचारणीय प्रस्तुति

Manisha Goswami,  1/25/2022 9:52 AM  

सीता को वनवास में भी
पति संग सुख मिला था
मुझे तो राजमहल में रह
वनवास मिला था ..
जो अन्याय हुआ मेरे साथ
क्या वो
जग जाहिर भी हुआ है?
विचारणीय व मार्मिक

Anuradha chauhan,  1/25/2022 3:53 PM  

भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

हरीश कुमार,  1/25/2022 6:37 PM  

भावपूर्ण पंक्तियाँ, बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

Harash Mahajan,  1/25/2022 9:20 PM  

मुक़द्दर अपना अपना ।
सुंदफ़ सृजन !! संगीता जी ।

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