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विषधर

>> Thursday, September 22, 2011




शहरी हवा 
कुछ इस तरह चली है 
कि इन्सां सारे 
सांप हो गए हैं ,
साँपों की भी होती हैं 
अलग अलग किस्में 
पर इंसान तो सब 
एक किस्म के हो गए हैं .
साँप देख लोंग 
संभल तो जाते हैं 
पर इंसानी साँप 
कभी दिखता भी नहीं है ..
जब चढ़ता है ज़हर 
और होता है असर 
तब चलता है पता कि
डस  लिया है किसी 
मानवी विषधर ने 
जितना विष है 
इंसान के मन में 
उसका शतांश  भी नहीं 
किसी भुजंग में 
स्वार्थ के वशीभूत हो 
ये सभ्य कहाने वाले 
पल रहे हैं विषधर 
शहर शहर में .

75 comments:

रविकर 9/22/2011 2:52 PM  

अगर आपकी उत्तम रचना, चर्चा में आ जाए |

शुक्रवार का मंच जीत ले, मानस पर छा जाए ||


तब भी क्या आनन्द बांटने, इधर नहीं आना है ?

छोटी ख़ुशी मनाने आ, जो शीघ्र बड़ी पाना है ||

चर्चा-मंच : 646

http://charchamanch.blogspot.com/

दिगम्बर नासवा 9/22/2011 2:52 PM  

सच कहा है ... इंसान तो सांप से भी १० कदम आगे मीकल गया है ... और इसका विष पड़ता ही जा रहा है ...

सदा 9/22/2011 3:09 PM  

यह मानवी विषधर ... शहर-शहर में बसे हुए हैं ..गहन भावों के साथ सार्थक व सटीक लेखन ।

अजय कुमार 9/22/2011 3:25 PM  

sach hai ,insaan swaart ke liye kuchh bhee kar rahaa hai

Sadhana Vaid 9/22/2011 3:27 PM  

एक सशक्त रचना संगीता जी ! सच में सांप को देख कर तो सतर्क हुआ जा सकता है लेकिन उन साँपों से कैसे बचा जाये जो इंसानी चेहरों का मुखौटा चढ़ाए डसने आते हैं और इतने विषैले होते हैं कि उनके काटे का कोई इलाज भी नहीं होता ! कितना मुश्किल है इन्हें पहचानना ! बहुत ही सार्थक एवं जीवंत रचना ! बधाई स्वीकार करें !

रश्मि प्रभा... 9/22/2011 3:31 PM  

सांप रो रहा है...इन्सान सा वो नहीं ! वह ज़हरीला है , तो लोग एहतियात बरतते ही हैं , पर इन्सान - वह तो पल पल रंग बदलता है

राजेश उत्‍साही 9/22/2011 3:31 PM  

आपकी कविता ने अज्ञेय की कविता याद दिला दी। जिसमें वे कहते हैं कि ये सांप तुम शहर कब गए थे, जहां से यह डसना सीखकर आए।

देवेन्द्र पाण्डेय 9/22/2011 3:36 PM  

आपकी कविता पढ़कर एक सांप नाराज हो गया....

बार-बार आदमी से हमारी तुलना कर के हमारा मजाक क्यों उड़ाया जाता है। क्या एक सांप कभी दूसरे सांप को काटता है..?

देवेन्द्र पाण्डेय 9/22/2011 3:36 PM  

आपकी कविता पढ़कर एक सांप नाराज हो गया....

बार-बार आदमी से हमारी तुलना कर के हमारा मजाक क्यों उड़ाया जाता है। क्या एक सांप कभी दूसरे सांप को काटता है..?

वन्दना 9/22/2011 3:41 PM  

इंसानी विषधर से बचना और पहचानना ही मुश्किल है ……………बहुत गहरी बात कहती एक सशक्त अभिव्यक्ति।

ashish 9/22/2011 3:46 PM  

ना जाने कितने अश्वसेन, कितने विश्रुत विषधर भुजंग
बढ़ा रहे शोभा कुटिल ह्रदय की, जैसे वो उनका हो निषंग
ताक में रहता है वो , कब छिड़े महाभारत जैसा कोई प्रसंग

मुझे ये पंक्तियाँ याद आई .

डॉ.सोनरूपा विशाल 9/22/2011 4:15 PM  

वर्तमान का यथार्थ है ये ,काश ये मिथ्या होता तो ये दुनिया ही खूबसूरत हों जाती सही अर्थों में ...

Patali-The-Village 9/22/2011 4:31 PM  

गहन भावों के साथ सार्थक व सटीक लेखन| धन्यवाद|

निर्झर'नीर 9/22/2011 4:45 PM  

नि:शब्द करती है आपकी हर रचना

shikha varshney 9/22/2011 5:05 PM  

दी ! वैसे आज की तस्वीर ही सब कुछ कह रही है :) कविता की जरुरत नहीं थी .
पर मिल गई तो अब उसकी तारीफ़ में शब्द नहीं मिल रहे हैं.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 9/22/2011 5:06 PM  

वाह दी... बहुत खूब....

अज्ञेय जी याद आ गए...
"सांप तुम सभ्य तो नहीं हुए होगे
शहर में बसना भी नहीं आया
फिर यह डसना कहाँ से सीखा
विष कहाँ से पाया?"

सशक्त रचा है आपने...
सादर....

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 9/22/2011 5:24 PM  

बिलकुल सही लिखा है |
अवधी के सिद्ध रचनाकार/कवि स्व० विश्वनाथ सिंह 'विकल' की पंक्तियाँ बरबस ही याद आ रही हैं ..........
'जिनिगियव पै कर बा , मौतियव पै कर बा |
न यहरै गुजर बा , न वहरै बसर बा |
इ नाहक मा बदनाम , विषधर बेचारे ,
मुला आदमी के न काटे जहर बा |'

महेन्द्र मिश्र 9/22/2011 5:40 PM  

पल रहे हैं विषधर
शहर शहर में...

बहुत सही सटीक अभिव्यक्ति...आभार

रचना दीक्षित 9/22/2011 5:50 PM  

संगीता दी बहुत ही गहरे भाव हैं पर कहीं सांप बुरा न मान जाये डरती हूँ

वाणी गीत 9/22/2011 5:52 PM  

पल रहे हैं विषधर शहर- शहर में ...
या यूँ कहें घर- घर में,
डसने में कोई समझौता या लिहाज़ नहीं करते ये इंसानी विषधर ! ना रिश्तों का , ना प्रेम का!
सत्य वचन!

Suman 9/22/2011 6:14 PM  

सच में आज की वास्तविकता यही है !
किन्तु सांप को माफ़ किया जा सकता है
क्योंकि यह उसकी प्रकृति है !

संगीता स्वरुप ( गीत ) 9/22/2011 6:31 PM  

सभी पाठकों का आभार ..

@@ राजेश जी ,

आपने सही कहा है ..यह रचना अज्ञेय जी की इन्हीं पंक्तियों पर ही आधारित है ..आभार

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 9/22/2011 6:35 PM  

यथार्थ को सटीकता से बयान करती है यह कविता।

सादर

Maheshwari kaneri 9/22/2011 7:11 PM  

गहन भावों के साथ सार्थक व सटीक बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

प्रवीण पाण्डेय 9/22/2011 7:19 PM  

मानव तो कुछ क्षेत्रों में महाविषधर को भी मात करता है।

सम्वेदना के स्वर 9/22/2011 7:56 PM  

कमाल का ओब्ज़र्वेशन है संगीता दी!
अब तो इतने साँप हो गए हैं हर तरफ कि पता लगाना मुश्किल हो गया है.. बस एक शुभ संकेत यही है कि यह समाज कुछ चन्दन से शीतल मनुष्यों से भी सुवासित हैं, जिनपर विष नहीं व्यापता!!
आभार दी!

अनामिका की सदायें ...... 9/22/2011 8:40 PM  

sach kaha aapne saamp ka man me vichar aate hi ek dar aa jata hai lekin insan to bahuroopiya hota hai jis se uski pehchaan bhi mushkil hai. aapki bejod soch ka ek namuna he ye rachna bhi.badhayi.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 9/22/2011 8:51 PM  

जितनी सुन्दर रचना!
उतना ही सटीक चित्र!

रंजना 9/22/2011 9:03 PM  

बहुत ही सही कहा....

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 9/22/2011 9:16 PM  

स्वार्थ के वशीभूत हो ,ये सभ्य कहाने वाले.....
आज की रचना सचमुच नि:शब्द कर गई.इसे पढ़ कर हर एक के जेहन में डस कर जानेवाले बहुत से अपने, बहुत याद आये होंगे.

मनोज कुमार 9/22/2011 9:26 PM  

* आपके घर के बगल में बैठकर यह टिप्पणी लिखना किसी सर्पिली हरक्त से कम नहीं। दो दिन तक यहीं कुंडली मारे रहूंगा।

** लगता है आपने मेरे मन की बातें लिख दी हों।

*** इस कविता को पढने के बाद अज्ञेय की बरबस याद तो आ ही जाती है। कई मित्रों ने कविता भी कोट कर ही दी है, मेरा काम आसान हो गया है।

प्रतिभा सक्सेना 9/22/2011 9:35 PM  

आदमी के भीतर का ज़हर सबसे ज़्यादा दाहक होता है - एकदम लाइलाज!

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद 9/22/2011 10:19 PM  

बढिया कविता... अज्ञेय जी की याद में ॥

डॉ॰ मोनिका शर्मा 9/22/2011 10:45 PM  

निशब्द करती सशक्त रचना....

NISHA MAHARANA 9/22/2011 10:49 PM  

बिल्कुल सटीक रचना एक बार को
साँप का काटा पानी पी सकता है
पर इंसानी साँप का काटा पानी भी
नही पी सकता।

Kunwar Kusumesh 9/23/2011 8:56 AM  

आदमी साँप का बाप है.

ajit gupta 9/23/2011 10:09 AM  

पल रहे हैं विषधर शहर शहर में। अजी पल रहे हैं विषधर हर आस्‍तीन में। बहुत अच्‍छी रचना।

संतोष कुमार 9/23/2011 11:28 AM  

Sunder rachna.

Manav ke bheetar palnewala zahar behad ghatak hai.

shephali 9/23/2011 12:36 PM  

सही कहा इंसानी सापों से बच पाना नामुमकिन है
यथार्थवादी रचना

ईं.प्रदीप कुमार साहनी 9/23/2011 4:14 PM  

बहुत ही उम्दा रचना |

मेरे ब्लॉग में भी आयें-

**मेरी कविता**

Amrita Tanmay 9/23/2011 6:09 PM  

और डँस भी रहे हैं..सशक्त रचना |

Dilbag Virk 9/23/2011 8:13 PM  

सशक्त कविता
देवेन्द्र पाण्डेय से पूरी तरह सहमत हूँ

संतोष त्रिवेदी 9/24/2011 5:25 AM  

यह इंसानी जगत के लिए बहुत विचित्र और त्रासद है जब हम उनकी तुलना सांप,कुत्तों आदि से करते हैं,लेकिन इसके अलावा शायद विकल्प भी नहीं बचे हैं !हाँ,आपकी कविता से इंसान तो नहीं पर कुछ सांप ज़रूर अपना ज़हर नाराज़ हो जायेंगे,बकौल देवेन्द्र जी !!

फ़िरदौस ख़ान 9/24/2011 12:23 PM  

सही कहा है आपने...
सांप के ज़हर का तोड़ तो मिल भी जाता है, अलेकिन इंसान के ज़हर का तोड़ कहां से लाएं...

चंदन कुमार मिश्र 9/24/2011 2:46 PM  

इंसानी साँपों पर! अच्छा। पढ़ा था कभी…छिपकली(बिछमतिया) के सिर में, शायद बिच्छू के पूँछ में, सर्प के दाँत में विष होता है…लेकिन दुर्जनों के हर अंग में विष होता है…

Lalit Mishra 9/24/2011 4:43 PM  

आद संगीता जी,
सामयिक तथा वातावरण को प्रदुषण मुक्ति से युक्त "विषधर" जैसी रचना आज की आवश्यकता है...

रूप 9/24/2011 8:00 PM  

shaandar prastuti ! pal rahe hain wishdhar ab shahar-shahar me . Haqeeqat bayan karti kawita. meri badhai sweekar karein !

POOJA... 9/24/2011 9:09 PM  

waaaaahhh...
tremendous...
ati-uttam...
kitna sahi kaha hai aapne...

आशा जोगळेकर 9/24/2011 11:32 PM  

जितना विष है
इंसान के मन में
उसका शतांश भी नहीं
किसी भुजंग में
स्वार्थ के वशीभूत हो
ये सभ्य कहाने वाले
पल रहे हैं विषधर
शहर शहर में .
आज का सत्य यही है ।

JHAROKHA 9/25/2011 7:54 AM  

sangeeta di
apne bhavon ko ek anuthe tareeke se sajane me to aapko maharat hasil hai.har panktiyan aaj ke sach ko darshati hain .bahut hisa sahi likha hai aapne ye insaan rurpi saanp kab das le pata hi nahi chalta .saanp ke jahar ko to utaaraa ja sakta hai par insaani saanp------------?
bahut hi gahan vishhleshhan
badhai
sadar naman
poonam

mahendra verma 9/25/2011 8:02 AM  

जितना विष है
इंसान के मन में
उसका शतांश भी नहीं
किसी भुजंग में

यही है कटु यथार्थ।
आदमी की जुबान भी जहरीली हो गई है।

Babli 9/25/2011 11:06 AM  

गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! सटीक रचना!

कुमार राधारमण 9/25/2011 11:34 AM  

जाकिर जी के सर्प संसार ब्लॉग पर क्या इन साँपों की व्याख्या भी होगी ?

Dr Varsha Singh 9/25/2011 1:12 PM  

जितना विष है
इंसान के मन में
उसका शतांश भी नहीं
किसी भुजंग में
स्वार्थ के वशीभूत हो
ये सभ्य कहाने वाले
पल रहे हैं विषधर
शहर शहर में .

यथार्थ का काव्यमय सुन्दर वैचारिक प्रस्तुतिकरण...

Dr (Miss) Sharad Singh 9/25/2011 3:06 PM  

पर इंसानी साँप
कभी दिखता भी नहीं है ..
जब चढ़ता है ज़हर
और होता है असर
तब चलता है पता कि
डस लिया है किसी
मानवी विषधर ने

सच की तस्वीर दिखाती धारदार कटाक्षमय रचना...

veerubhai 9/25/2011 5:04 PM  

इंसान के मन में
उसका शतांश भी नहीं
किसी भुजंग में
तिस पर तुर्रा यह कहत ये विश्बीज़ -नारी कि झाईं पडत अंधा होत भुजंग .बहुत गहरा व्यंग्य .शहर का दंश ,शहरीपन का ज़हरीला पन समेटे है इस रचना का कैनवास .

Vaanbhatt 9/25/2011 11:54 PM  

आस्तीन वालों से बचना तो और भी मुश्किल है...

सतीश सक्सेना 9/26/2011 9:18 AM  


इंसान के जहर का कोई मुकाबला है , मरने के बाद भी दर्द देता है !
शुभकामनायें आपको !

anita agarwal 9/26/2011 8:46 PM  

adarneey agyeya ji ki bhi ek rachna kuch isi tareh hai...yaad to nahi kintu bhav yahi hain ki hey vishdhar tum to kabhi shaher mei rahe nahi to dasna kahan se seekha....vish kahan se aya?
sahi kaha aapne ki insani vishdhar ko to pehchanna bhi kathin hai..

Arunesh c dave 9/27/2011 11:40 AM  

विषधर मानव विश्वास मे लेकर डसता है इसलिये जहर भी सीधे हृदय मे फ़ंसता है

Vivek Jain 9/27/2011 1:20 PM  

सुन्दर प्रस्तुति, बधाई,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Kailash C Sharma 9/27/2011 3:00 PM  

जितना विष है
इंसान के मन में
उसका शतांश भी नहीं
किसी भुजंग में

....बहुत सटीक अभिव्यक्ति..गहन भावों की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..आभार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार 9/28/2011 5:11 AM  





आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

Mithilesh dubey 9/28/2011 10:20 AM  

आधुनिक मानव का सशक्त चित्रण । देवेन्द्र पाण्डेय जी का सवाल बङा वाजिब लगा ।

आशा 9/28/2011 7:56 PM  

इंसान की सांप से तुलना बहुत अच्छी लगी |अच्छी और सारगर्भित रचना |
इस पावन पर्व पर हार्दिक शुभ कामनाएं |
आशा

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 9/29/2011 1:31 PM  

बहुत सुन्दर रचना !

manukavya 9/30/2011 10:56 AM  

बहुत ही सामयिक रचना संगीता जी, आप की कविता पढ़ कर कुछ याद आ गया.. आप के साथ बाँटना चाहती हूँ...

चोट का निशान कहीं नहीं फ़िर भी ये सांप मर गया कैसे
जरूर इसने किसी आदमी को डस लिया होगा

manju

Udan Tashtari 10/03/2011 2:19 AM  

यथार्थ उकेर दिया रचना में...

M VERMA 10/06/2011 8:57 AM  

पल रहे हैं विषधर
शहर शहर में .
बेहद करीबी रचना ..

Onkar 10/14/2011 4:13 PM  

aadhunik paristhitiyon par sateek kavita

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri 10/19/2011 8:32 PM  

इंसान के भीतर पल रहे भुजंगो को देख पाना वास्तव में बहुत कठिन होता है...वर्तमान परिपेक्ष में सटीक ब्यंग करती सार्थक रचना... शुभकामनायें !!

M VERMA 5/18/2012 7:10 PM  

स्वार्थ के वशीभूत हो
ये सभ्य कहाने वाले
पल रहे हैं विषधर
शहर शहर में .
या शायद ...
ये अब तो किसी न किसी बहाने
घुस जाते हैं हर घर में

बहुत खूब

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