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खोज सत्य की

>> Tuesday, July 9, 2013





सत्य की खोज में
दर बदर  भटकते हुये 
मिली सूर्य रश्मि से 
पूछा क्या तुम सत्य हो 
मिला जवाब ...हाँ हूँ तो 
पर सूर्य से निर्मित हूँ 
यूं ही कुछ मिले जवाब 
चाँद से तो कुछ तारों से 
दीये की लौ  से तो 
जगमगाते जुगनुओं से 
यानि कि
जहां भी उजेरा था 
या रोशनी का बसेरा था 
नहीं था खुद का वजूद 
किसी और के ही द्वारा था 
जब की बंद आँखें 
तो घना अंधेरा था 
अब सत्य को जान गयी 
अंधकार को पहचान गयी 
गर न हो किसी और की रोशनी 
तो --- 
ये तम ही तो सत्य है 
जो कि  सर्वत्र   है । 



97 comments:

गिरधारी खंकरियाल 7/09/2013 3:26 PM  

ये तम ही तो सत्य है-- कुछ विरोधाभास लगता है।

रविकर 7/09/2013 4:08 PM  

अंतर्द्वंद-
कागद पर-
शुभकामनायें दीदी-

तमसाकृत से है घिरा, निश्चय सत्य तमाम |
मार तमाचा तमतमा, सत्य ताक ले आम |
सत्य ताक ले आम, ख़ास इक बात बताई |
तम ही तो है सत्य, समझ में रविकर आई |
मनुवा सत्य निकाल, डाल दे थोड़ा घमसा |
भरत-सत्य साकार, पार कर जाए तमसा -

रविकर 7/09/2013 4:09 PM  

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 7/09/2013 4:10 PM  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
साझा करने के लिए आभार!

सतीश सक्सेना 7/09/2013 5:00 PM  


गहन कथन है और वाकई सत्य है ..
आँखे खोलने में समर्थ, आपकी यह अद्भुत रचना संग्रहणीय है !
बधाई और शुभकामनायें !

Amrita Tanmay 7/09/2013 5:17 PM  

बिना आँख का सत्य है तम.. कृति अति उत्तम..

yashoda agrawal 7/09/2013 5:19 PM  

आपने लिखा....
हमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए बुधवार 10/07/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
पर लिंक की जाएगी.
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
लिंक में आपका स्वागत है .
धन्यवाद!

ताऊ रामपुरिया 7/09/2013 5:59 PM  

जब की बंद आँखें
तो घना अंधेरा था
अब सत्य को जान गयी
अंधकार को पहचान गयी
गर न हो किसी और की रोशनी
तो ---
ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है.

वाकई यही परम सत्य है, बहुत ही उत्कृष्ट रचना.

रामराम.

Suman 7/09/2013 6:03 PM  

@ सत्य की खोज में
दर बदर भटकते हुये
मिली सूर्य रश्मि से
पूछा क्या तुम सत्य हो
मिला जवाब ...हाँ हूँ तो
पर सूर्य से निर्मित हूँ
सूर्य की रश्मि ही नहीं खुद सूर्य भी
महा सूर्यों से जुड़ा है ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/09/2013 6:17 PM  

पाठकों की प्रतिक्रिया के लिए हृदय से आभार ....

मेरे विचार से न तो अंधेरा कोई विरोधाभास है और न ही बिन आँख का सत्य ..... प्रकाश के लिए प्रयास करना होता है जबकि अंधेरा स्वयंभू है ... कहीं कुछ गलत कहा हो तो क्षमा चाहूंगी ।

shikha varshney 7/09/2013 6:29 PM  

सत्य की खोज..आखिर कर ही ली. तम ही तो सच है वाकई ..
अद्भुत

expression 7/09/2013 7:11 PM  

बहुत सुन्दर बात दी....
तम ही तो स्वयं से मिलवाता है.....
गहन भाव!!

सादर
अनु

Kailash Sharma 7/09/2013 7:17 PM  

गर न हो किसी और की रोशनी
तो ---
ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ।

....बहुत गहन और सार्थक अभिव्यक्ति..

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 7/09/2013 9:06 PM  

अब सत्य को जान गयी
अंधकार को पहचान गयी
गर न हो किसी और की रोशनी तो
ये तम ही तो सत्य है जो कि सर्वत्र है ।

बहुत उम्दा लाजबाब प्रस्तुति,,,

RECENT POST: गुजारिश,

Anju (Anu) Chaudhary 7/09/2013 9:12 PM  

खुद के भीतर सच को तलाशना अभी बाकि है

sadhana vaid 7/09/2013 9:38 PM  

बहुत ही गहन अभिव्यक्ति संगीता जी !
गर न हो किसी और की रोशनी
तो ---
ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है.
कितना सच है ! यह तम ही तो है जो अपना भी है और सर्वव्यापी भी ! किसी और की रोशनी पर निर्भरता कैसी ? बहुत ही उत्कृष्ट रचना !

ब्लॉग बुलेटिन 7/09/2013 10:00 PM  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन फिर भी दिल है हिंदुस्तानी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Ranjana Verma 7/09/2013 10:05 PM  

बहुत ही गहन बातें ......ताम ही अंतिम सत्य है जो अपना है

Ranjana Verma 7/09/2013 10:05 PM  

बहुत ही गहन बातें ......ताम ही अंतिम सत्य है जो अपना है

प्रतिभा सक्सेना 7/09/2013 10:13 PM  

तम ने ढाँक लिया है सत्य को ,यह सही है !

shashi purwar 7/09/2013 10:15 PM  

बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (10-07-2013) के .. !! निकलना होगा विजेता बनकर ......रिश्तो के मकडजाल से ....!१३०२ ,बुधवारीय चर्चा मंच अंक-१३०२ पर भी होगी!
सादर...!
शशि पुरवार

डॉ. मोनिका शर्मा 7/09/2013 10:16 PM  

वैचारिक भाव लिए बहुत ही गहरी अभिव्यक्ति ..

सु..मन(Suman Kapoor) 7/09/2013 11:11 PM  

बहुत बढ़िया

Ashok Saluja 7/10/2013 2:20 AM  

संगीता जी,
आप का सन्देश दिल को लगता है ...और छूता भी है
सत्य की ओर बड़ता कदम ....
स्वस्थ रहें!

निहार रंजन 7/10/2013 6:45 AM  

....और सूर्य की ताकत तो अणु-परमाणुओं से ही है. अगर हम लघु ठहरे तो कोई बात नहीं.ज़रुरत है उस लघुता से भी ज्योत जलाने की. लेकिन अपने अन्दर का बहुरुपिया मरता नहीं और हावी रहता है असत्य. सत्य का मार्ग वाकई बहुत मुश्किल है. बहुत गहरी रचना. अति सुन्दर.

vandana 7/10/2013 7:48 AM  

यानि कि
जहां भी उजेरा था
या रोशनी का बसेरा था
नहीं था खुद का वजूद
किसी और के ही द्वारा था

सच है

वाणी गीत 7/10/2013 8:03 AM  

अपने भीतर का जो भी है , वही सत्य है ! वह तम है तो भी !!
मगर सूरज के लिए तो उसका प्रकाश उसका स्वय का ही है :)

Virendra Kumar Sharma 7/10/2013 9:10 AM  

बेहद सुन्दर रचना है .अन्धेरा उजेरा बढ़िया शब्द प्रयोग .उजेरा ब्रह्मा का दिन (ज्ञान मार्ग )है अन्धेरा (भक्ति मार्ग )बोले तो भटकाव है .ईश्वर को ही नहीं जानते हैं भक्त .३ ३ करोड़ देव कुल को ही ईश्वर माने बैठें हैं उसे मत्स्य और कच्छप में भी ठोक दिया है .कण कण में भी कई तो अहं ब्रह्मास्मि का भ्रम लिए हैं .

(दीया ,दीये )

vandana gupta 7/10/2013 11:18 AM  

एक अलग दृष्टिकोण ………… सत्य की खोज चाहे किसी भी मार्ग से की जाये सत्य सत्य ही रहता है फिर तम हो या प्रकाश सबमें है उसी का वास

Maheshwari kaneri 7/10/2013 12:59 PM  

सत्य को खोजता मन..सुन्दर अभिव्यक्ति..आभार

hridyanubhuti 7/10/2013 2:35 PM  


ये तम ही तो सत्य है जो कि सर्वत्र है ...
बेहद प्रभावशाली रचना सत्य से निकटता ....

Vikesh Badola 7/10/2013 3:21 PM  

कविता का विचार बहुत बढ़िया है।

प्रवीण पाण्डेय 7/10/2013 3:21 PM  

तम भेदने,
जीवन धरे,
एक किरण निकली।

सु..मन(Suman Kapoor) 7/10/2013 3:44 PM  

बहुत ही बढ़िया

***Punam*** 7/10/2013 3:57 PM  

ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ।

गज़ब....

रश्मि शर्मा 7/10/2013 10:34 PM  

ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ....मगर उजालों का भी तो अस्‍ति‍त्‍व है

रश्मि शर्मा 7/10/2013 10:34 PM  

ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ....मगर उजालों का भी तो अस्‍ति‍त्‍व है

महेन्द्र श्रीवास्तव 7/10/2013 11:18 PM  

बहुत सुंदर रचना
ऐसी रचना कभी कभी ही पढने को मिलती है।
बहुत सुंदर


कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री असली चेहरा : पढिए रोजनामचा
http://dailyreportsonline.blogspot.in/2013/07/like.html#comment-form

Rajput 7/11/2013 6:48 AM  

बहुत खूबसूरत रचना, लाजवाब!

मनोज कुमार 7/11/2013 12:16 PM  

तम से मुंह क्या मोड़ना। सच तो सच ही है!!

दिगम्बर नासवा 7/11/2013 2:27 PM  

गहरा चिंतन ...
क्या हम जो जीव हैं चलते फिरते ... पर किसी और की देन नहीं हैं ... आत्मा या ये शरीर भी किसी दूसरे का दिया नहीं है .... फिर तम से कम हम भी कहाँ ...

रविकर 7/11/2013 2:58 PM  

पुन: आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

Madan Mohan saxena 7/11/2013 3:00 PM  


वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

Ramakant Singh 7/11/2013 4:28 PM  

गर न हो किसी और की रोशनी
तो ---
ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ।

गहन कथन और पूरी ईमानदारी

Majaal 7/11/2013 6:44 PM  

अहम् ब्रह्म ... सत्य वचन

लिखते रहिये

Ankur Jain 7/11/2013 9:31 PM  

गहन, गंभीर भाव लिये रचना..

Aziz Jaunpuri 7/12/2013 7:19 AM  

सुन्दर प्रस्तुति

कविता रावत 7/12/2013 11:59 AM  

बहुत उम्दा प्रस्तुति...

सदा 7/12/2013 3:52 PM  

ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ।
सच ....

Anurag Sharma 7/12/2013 6:45 PM  

सत्यम् वचनम्

Anita (अनिता) 7/12/2013 11:04 PM  

आँखें बंद करने पर अंधेरे में जो उजाला मिले..... वही अमूल्य है!

~सादर!!!

VenuS "ज़ोया" 7/13/2013 12:11 AM  

namste didi
kaisi hain aap........aaj bde dino baad...is aur aanaa huya......waqt kuch busy ho rkhaa he....
aur aaj aapki ye rchnaa pri......ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ।

sach he dii.....bahut saarthak rchnaa.......ek sukhad ehsaas huya pr ke
take care

VenuS "ज़ोया" 7/13/2013 12:23 AM  
This comment has been removed by the author.
Onkar 7/13/2013 2:59 PM  

बहुत गहन विचार

Anita 7/13/2013 3:41 PM  

इसी तम में छुपा है प्रकाश...जो स्वयंभू है..

कुशवंश 7/13/2013 4:39 PM  
This comment has been removed by the author.
कुशवंश 7/13/2013 4:40 PM  

सत्य की सास्वत खोज , सटीक अभिव्यक्ति संगीता जी बेहतरीन काव्य

Dr. Sarika Mukesh 7/13/2013 7:25 PM  

बात कुछ विरोधाभास लगती है...तम ही सत्य है??
हमारी तो प्रार्थना है:
तमसो माँ ज्योतिर्गमय...
अँधेरे से उजाले की ओर की यात्रा सत्य की ओर यात्रा है, तो फिर तम कैसे सत्य हुआ??
इसकी व्याख्या करेंगी तो हमारा भला होगा!
सादर/सप्रेम,
सारिका मुकेश

Shikha Gupta 7/13/2013 9:10 PM  

कमाल की कल्पना ........ बंद आँखों का तम सत्य का परिचय देता है .
वाह .....
सादर शुभकामनायें

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/13/2013 11:28 PM  

सभी पाठकों का और उनकी प्रतिक्रिया का बहुत बहुत आभार ....

सारिका जी ,
आपने बिलकुल सही कहा है ...हमारी प्रार्थना है कि तमसो माँ ज्योतिर्गमय.....

यानि अंधेरे से उजाले कि ओर जाना .... यानि कि सच तो यही है कि हर जगह अंधेरा है .... और हमें उजाला पाने के लिए , उस ओर जाने के लिए प्रयत्न करना होगा .... रोशनी भी तभी चाहिए जब अंधेरा है बिना किसी प्रकाश पुंज के हम केवल अंधेरा ही देखते और महसूस करते हैं । रोशनी के लिए हम सूरज पर निर्भर हैं या फिर तारों पर या फिर कृत्रिम प्रकाश पर जिसमें दिये , मोमबत्ती से ले कर बिजली तक शामिल है .... पर अंधेरा ?

बस यही भाव थे मेरी इस रचना के .... बाकी सबके अपने विचार हैं .... शुक्रिया आपने मुझे अपनी बात रखने के लिए कहा ।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 7/14/2013 9:50 AM  

सत्यम् शिवम् सुंदरम्
इस सौंदर्य का दर्शन उजाले-अंधेरे से परे है. यही वास्तविक सत्य है.

Aditya Tikku 7/14/2013 8:42 PM  

bhav- shabd- tasveer - eno - Adutiy

आशा जोगळेकर 7/14/2013 9:25 PM  

तम होने पर ही अपनी स्वयं की रोशनी दिखाई देती है ।
सुंदर प्रस्तुति ।

Virendra Kumar Sharma 7/14/2013 10:11 PM  


गर न हो किसी और की रोशनी
तो ---
ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ।

आत्म स्वरूप में टिक परमात्म प्रकाश से आत्मा को आलोकित होने दो .

देवेन्द्र पाण्डेय 7/15/2013 5:45 PM  

पता नहीं सत्य क्या है!

रोशनी कहती है
सत्य मैं हूँ
अंधेरा भी कहता है
सत्य मैं हूँ
जब गुजरती है कोई अंतिम यात्रा
तो यह आवाज भी सुनता आया हूँ..
राम नाम सत्य है।

पता नहीं सत्य क्या है!

शिवनाथ कुमार 7/15/2013 8:05 PM  

तम ही सत्य है और उस सत्य में निहित तत्व को देखने के लिए प्रकाश तो चाहिए ही
बहुत कुछ कहती, सोचने को विवश करती
सादर !

jyoti khare 7/17/2013 1:05 PM  

ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है । -------

जीवन के सत्य पथ को दर्शाती सुंदर रचना
सादर

Dr (Miss) Sharad Singh 7/17/2013 2:03 PM  

अब सत्य को जान गयी
अंधकार को पहचान गयी
गर न हो किसी और की रोशनी
तो ---
ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ।

जीवन दर्शन से परिपूर्ण बहुत सुन्दर पंक्तियां.....

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 7/17/2013 5:13 PM  

बहुत सुन्दर, अगर रोशनी न मिले तो जीवन भी अन्धकारमय ही है!

Virendra Kumar Sharma 7/18/2013 6:39 AM  

शुक्रिया आपकी निरंतर टिप्पणियों का .ॐ शान्ति

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी 7/19/2013 5:28 AM  

वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

डॉ. जेन्नी शबनम 7/19/2013 5:47 PM  

सत्य यही है... अति उत्तम, शुभकामनाएँ.

Naveen Mani Tripathi 7/19/2013 7:57 PM  

जब की बंद आँखें
तो घना अंधेरा था
अब सत्य को जान गयी
अंधकार को पहचान गयी
utkrisht rachana ......saty ke aas pas ...aabhar Sangeeta ji .

हरकीरत ' हीर' 7/19/2013 8:11 PM  

ये तम ही तो सत्य है-- अँधेरा और उजाला दोनों सत्य हैं .....

बहुत अच्छी रचना ......

Swapnil Shukla 7/20/2013 6:18 PM  

वाह ! शानदार प्रस्तुति . एक - एक शब्द का चयन बहुत ही खूबसूरती से किया गया है .बधाई .

मेरा ब्लॉग स्वप्निल सौंदर्य अब ई-ज़ीन के रुप में भी उपलब्ध है ..एक बार विसिट अवश्य करें और आपकी महत्वपूर्ण टिप्पणियों व सलाहों का स्वागत है .आभार !

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-स्वप्निल शुक्ला

कंचनलता चतुर्वेदी 7/20/2013 9:37 PM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...

Anupama Tripathi 7/23/2013 4:12 PM  

बहुत गहन और सुंदर लिखा है दी ....तुम बिन जीवन कैसा जीवन ....
मैंने एक टिप्पणी दी तो थी दिख क्यों नहीं रही ....??
शानदार रचना ...!!

mahendra verma 7/25/2013 9:41 PM  

‘हर तमस में उजास का उत्स है‘ की व्याख्या करती अच्छी रचना।

ajay yadav 7/28/2013 10:12 PM  

बहुत ही सुंदर काव्य हैं ,आदरणीया |
पढ़कर अच्छा लगा |सादर आभार |

Anjana kumar 7/30/2013 11:24 PM  

सुन्दर प्रस्तुति...

Dr.NISHA MAHARANA 7/31/2013 3:21 PM  

gahan anubhootiyon se bhari hui rachna ine ka marg prast karti hai .....

हरकीरत ' हीर' 8/01/2013 8:32 AM  

क्या बात है कितने उदाहरण देकर आप बात को स्पष्ट कर देती हैं ....

Saras 8/06/2013 9:59 AM  

संगीताजी ...इसे पढ़कर काफी देर तक सोचती रही...और जितना सोचा .....उतनी यथार्थ के करीब लगी ...बहोत सुन्दर ...!!!!

laveena rastoggi 8/11/2013 2:16 AM  

बहुत सुन्दर ...गहन अभिव्यक्ति है ! संगीता जी !

ARUNIMA 8/12/2013 3:15 PM  

बहुत अच्छा लगा आपको पढ़कर
अच्छी रचना

mahendra mishra 8/16/2013 11:03 AM  

शिखा वार्ष्णेय जी की पुस्तक की बहुत सुन्दर समीक्षा की है । आभार

अभिषेक कुमार झा अभी 9/03/2013 7:28 PM  

आत्म ज्योत ही असली उजाला है।
बस आत्मसाध करने की आवश्यकता है, हर इंसान को।

ब्लॉग बुलेटिन 10/08/2013 4:52 PM  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन गुनाह किसे कहते हैं ? मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

कविता रावत 10/08/2013 10:34 PM  

बहुत सुन्दर रचना ...

रश्मि शर्मा 10/08/2013 10:36 PM  

ये तम ही तो सत्य है
जो कि सर्वत्र है ..बि‍ल्‍कुल सही

abhishek kant pandey 10/27/2013 6:46 PM  

सत्यता की खोज, पूर्णता की खोज और सत्य प्रकृति की गोद में विचरित स्वप्न में नहीं।

Asha Joglekar 11/19/2014 9:32 PM  

अंधेरे और उजाले के परे जो है वही है सत्य और उसके प्रकास में ही अंधेरा उजाला सब दिखता है।
सुंदर अलग सा सत्य।

Savita Mishra 11/25/2014 10:46 PM  

बहुत सुन्दर रचना ...सादर नमस्ते दी

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