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न्याय ....???

>> Monday, June 9, 2014


Bodies of two girls found hanging together

आज भी किसी पेड़ पर 
टंगा है एक शव 
भीड़ भी जुटी है भव्य 
हो रही है आपस में बत कुचनी 
किसकी होगी भला ये करनी 
दांत के बीच उंगली दबाये 
दृश्य देख रहे थे लोग चकराए 
किसका होगा ये  दुस्साहस
किसने ये जघन्य कर्म किया 
टांगना ही था पेड़ पर तो 
अंग भंग क्यों  किया 
मिडिया ने भी बात को 
कुछ इस कदर उछाला 
शर्मसार हो नेताओं को 
जवाबदार  बना  डाला ।
कहा नेता ने इसकी 
सी बी आई  जांच करायेंगे 
दोषी को  इस अपराध की 
ज़रूर सजा दिलाएंगे । 
न जाने कितनी  टंगी देह का 
इंतज़ार  इंतज़ार ही रह गया 
अभी तक तो किसी भी देह को 
न्याय नहीं मिला 
उठ गया है विश्वास अब 
कानून और  न्याय से 
इसी लिए आज न्याय कर दिया 
अपने हाथ से ।
भीड़ ये विभत्स दृश्य देख रही थी 
पेड़ पर आज मादा की नहीं , 
नर की देह थी । 
है  ये मेरी  कल्पना 
पर सच भी हो सकती है 
कोई  ज़ख़्मी औरत 
रण चंडी  भी  बन सकती है ।


Bodies of two girls found hanging together



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हश्र ......

>> Tuesday, May 6, 2014




ज़र्द पत्तों की तरह 
सारी ख्वाहिशें झर गयी हैं 
नव पल्लव के लिए 
दरख़्त बूढ़ा हो गया है 
टहनियां भी अब 
लगी हैं चरमराने 
मंद समीर भी 
तेज़ झोंका हो गया है 
कभी मिलती थी 
छाया इस शज़र से 
आज ये अपने से 
पत्र विहीन हो गया है 
अब कोई पथिक भी 
नहीं चाहता आसरा 
अब ये वृक्ष खुद में 
ग़मगीन  हो गया है 
ये कहानी कोई 
मेरी तेरी नहीं है 
उम्र के इस पड़ाव पर 
हर एक का यही 
हश्र हो गया है ।



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शापित थी ....... शापित है ...

>> Tuesday, September 17, 2013




उद्गम था कंस का 
एक पापाचार 
नारी पर किया नर ने 
वीभत्स  अत्याचार , 
उग्रसेन की भार्या 
पवनरेखा थीं पतिव्रता 
रूप धर कर  पति का 
द्रुमिल ने था उसको छला , 
भान जब उसको हुआ तो 
विक्षिप्त सी वो हो गयी 
दुर्मिल के इस अंश को 
वो यूं शापित  कर गयी । 
बोया है जो तूने 
मुझमें अपना अंश 
खत्म करेगा उसे 
यादव का ही वंश  
समाज ने भी निर्दोष को 
तिरस्कृत  कर दिया 
पति ने भी उसे स्वयं से 
उपेक्षित कर दिया । 
ज्यों ज्यों बढ़ा बालक 
अचंभित होता रहा 
माँ के एकांतवास पर 
गहनता से सोचता रहा , 
सुन कर ऋषि नारद से 
अपने जन्म की कथा 
भर गया उसका हृदय 
सुन माँ की अंतर व्यथा । 
सबल हुआ जब यही बालक 
लिया बदला अत्याचार का 
पिता को उसने दिखाया 
मार्ग  कारागार  का । 
समाज से उसको कुछ ऐसी 
वितृष्णा सी जाग गयी 
प्रजा पर अत्याचार कर 
धधकती ज्वाला शांत की । 
बच नहीं पाया वो  लेकिन 
माँ के दिये श्राप से 
मुक्ति मिली कृष्ण हाथों 
उसके किए सब पाप से । 
अंतिम समय में  बस उसने 
कृष्ण से ये निवेदन किया 
गर स्वीकारता  समाज माँ को 
तो ये न होता , जो मैंने किया । 
नियति से शापित था वो 
इसलिए ये सब होना ही था 
अंत पाने के लिए   उसे 
ये  सब करना ही था । 

छोड़ दें इतिहास को तो 
आज भी नारी शापित है 
छल से या बल  से 
उसकी अस्मिता लुट जाती है । 
निर्दोष होते हुये भी समाज 
ऐसी नारी को नहीं स्वीकारता 
हृदय पर लगे ज़ख़्मों की 
गहराई को नहीं  नापता । 



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खिड़कियाँ

>> Wednesday, September 4, 2013



ये खुलती और  बंद
होती खिड़कियाँ 
उन पर टंगी 
दो आँखें 
फैलाती हैं 
कितना प्रवाद 
कुछ तर्क 
कुछ कुतर्क 
कर देती हैं 
पास के घरों का 
चीरहरण 
ये खुलती और बंद 
होती खिड़कियाँ , 

नहीं खोलते हम 
मन की खिड़कियाँ 
सारी कुंठाओं से ग्रस्त 
रहते हैं मन ही मन त्रस्त
नहीं करते परिमार्जन 
चलते रहते हैं 
पुरानी लीक पर 
परम्पराओं के नाम 
संस्कारों के नाम 
और धकेल देते हैं 
स्वयं को बंद 
खिड़कियों के पीछे .


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खोज सत्य की

>> Tuesday, July 9, 2013





सत्य की खोज में
दर बदर  भटकते हुये 
मिली सूर्य रश्मि से 
पूछा क्या तुम सत्य हो 
मिला जवाब ...हाँ हूँ तो 
पर सूर्य से निर्मित हूँ 
यूं ही कुछ मिले जवाब 
चाँद से तो कुछ तारों से 
दीये की लौ  से तो 
जगमगाते जुगनुओं से 
यानि कि
जहां भी उजेरा था 
या रोशनी का बसेरा था 
नहीं था खुद का वजूद 
किसी और के ही द्वारा था 
जब की बंद आँखें 
तो घना अंधेरा था 
अब सत्य को जान गयी 
अंधकार को पहचान गयी 
गर न हो किसी और की रोशनी 
तो --- 
ये तम ही तो सत्य है 
जो कि  सर्वत्र   है । 



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दरकार रोशनी की

>> Monday, June 17, 2013




मैंने खींच रखा  है 
अपने चारों ओर एक वृत 
और सजा रखा है 
चाँद सूरज को 
सितारे भी 
टिमटिमा रहे हैं 
अपनी मध्यम  रोशनी में
फिर भी 
सारे ग्रह ग्रसित हैं 
अंधेरी सी स्याही से 
इन ग्रहों की दशा और 
ब्रह्मांड  का चक्कर 
कब मनोकूल होगा 
कर रही हूँ 
बस इसका इंतज़ार 
अपने खींचे वृत में 
बस है झीनी सी 
रोशनी की दरकार ...


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माँ ..........

>> Saturday, May 11, 2013



माँ शब्द में ---  
मात्र  एक वर्ण 
और एक मात्रा 
जिससे शुरू होती है 
सबकी जीवन यात्रा 
माँ ब्रह्मा  की तरह 
सृष्टि  रचती है 
धरा की तरह 
हर बोझ सहती है 
धरणि बन  हर पुष्प 
पल्लवित  करती है 
सरस्वति बन 
संस्कार गढ़ती है 
भले ही खुद हो अनपढ़ 
पर ज़िंदगी की किताब को 
खुद  रचती है 
माँ हर बच्चे के लिए 
लक्ष्मी  रूपा  है 
खुद अभाव सहती है 
लेकिन बच्चे के लिए 
सर्वस्व देवा है ,
माँ बस जानती है देना 
उसे मान अपमान से 
कुछ नहीं लेना 
माँ के उपकारों का 
न आदि है न अंत 
जो  माँ को पूजे 
वही है सच्चा संत । 


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कविता कहाँ है ?????????

>> Friday, April 26, 2013




आठ - नौ साल की बच्ची 
माँ की उंगली थाम 
आती है जब मेरे घर 
और उसकी माँ 
उसके हाथों में 
किताब की जगह 
पकड़ा देती है झाड़ू 
तब दिखती है मुझे कविता ।



अंधेरी रात के 
गहन सन्नाटे को 
चीरती हुई 
किसी नवजात बच्ची की 
आवाज़ टकराती है 
कानो से 
जिसे उसकी माँ 
छोड़ गयी थी 
फुटपाथ पर 
वहाँ मुझे दिखती है कविता ॰


कूड़े  के ढेर पर 
कूड़ा बीनते हुये 
छोटे छोटे  बच्चे 
लड़  पड़ते हैं 
और उलझ जाते हैं 
पौलिथीन पाने के लिए 
उसमें दिखती है कविता ।


व्याभिचार  ही व्याभिचार 
बलात्कार ही बलात्कार 
सोयी हुई व्यवस्था 
अनाचार ही अनाचार 
मरी हुई  संवेदनाएं
भाषण पर भाषण 
भूख पर राशन 
निर्लज्ज प्रशासन 
लाचार कानून 
अब मुझे  नहीं दिखती 
कहीं कोई कविता । 



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घायल रिश्ते

>> Tuesday, April 16, 2013




परम्पराओं के नाम पर 
देखते हैं हम 
नयी पीढ़ी को ,
एक आलोचक की दृष्टि से ,
और भरते रहते हैं 
थोड़ा थोड़ा बारूद 
उनके मन आँगन में,
नहीं देना चाहते आज़ादी 
यह समझने की ,
कि इनसे होती हैं अपनी 
जड़ें मजबूत ,
बिना जाने बूझे 
बस निबाहते हैं 
जब परम्पराओं को ,
तो आस्था का तत्व 
नहीं होता उसमें ,
और एक दिन 
यही बन जाता है एक 
विध्वंसकारी  विस्फोटक ,
जब होता है विस्फोट तो ,
रिश्तों का जिस्म 
हो जाता है लहू - लुहान ,
और हम - 
हतप्रभ से रह जाते हैं 
अपनी परवरिश पर 
एक प्रश्न चिह्न  लिए हुये ......




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ठंडी औरत

>> Wednesday, April 3, 2013




प्रेम में पगी
हिरनी सी आँखें ,
ठिठक जाती हैं 
देख कर ,
उसकी आँखों में 
एक हिंसक पशु , 
वासना की देहरी पर ,
दम तोड़ देती है 
उसकी चाहत  ,
आभास होते ही 
हकीकत का,
जुटाती है 
भर पूर  शक्ति ,
लेकिन काली 
बनते बनते भी ,
रह जाती है ,
मात्र एक 
ठंडी औरत । 





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बसंत नहीं आता

>> Monday, February 18, 2013





मेरे इस शहर में 
बसंत नहीं आता , 
न गमकती 
बयार चलती है 
और न ही 
महकते फूल 
खिलते हैं 


कंकरीट  के उद्यानों से
छनती हुई 
विषैली हवा 
घोट  देती है दम
हर शख्स  का । 
मेरे इस शहर में
बसंत नहीं आता ...


एक खौफ है जो 
घेरे रहता है मन को 
कब  , कहाँ कोई भेड़िया 
दबोच लेगा 
अपने शिकार को 
और वह तोड़ देता है दम 
निरीह भेड़ सा बना 
मेरे इस शहर में 
बसंत नहीं आता । 


अट्टालिकाओं से 
निकले कचरे में
फटेहाल  बच्चे 
बीनते हुये कुछ 
 शमन करते हैं 
अपनी भूख का 
और यह दृश्य 
निकाल देता  है दम
हमारी संवेदनाओं का 
मेरे इस शहर में 
बसंत नहीं आता ।



गाँव की गंध छोड़ 
जो आ बसे शहरों में
दिहाड़ी के चक्र में 
घूमती है ज़िंदगी 
सपने जो लाया था साथ अपने 
निकल जाता है उनका दम
रह जाती है तो 
बस एक  हताशा 
मेरे इस शहर में 
बसंत नहीं आता ।

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कुछ बात तो है .....

>> Tuesday, February 5, 2013



दो कच्चे  धागों  को 
जोड़ कर आपस में 
दिया जाता है जब  वट
तो हो जाते हैं मजबूत , 
हल्के से तनाव से 
नहीं जाते वे टूट ,

वैसे ही तुम और मैं 
साल दर साल 
वक़्त के साथ वट 
लगाते लगाते 
जुड़ चुके हैं इस कदर 
कि आसान नहीं है 
कोई भी  परिस्थिति 
तोड़ सके हमें  ।

कुछ बात तो है --
कि एक दूसरे से 
हैं शायद 
ढेरों शिकवे - शिकायतें 
फिर भी 
एक - दूजे के बिना 
लगता है अधूरापन । 
और इसी खयाल से 
आज के दिन 
तोहफे के रूप में 
मैं तुम्हें देती हूँ 
अपनी सारी  संवेदनाएं , 
ख्वाहिशें और  खुशियाँ ।


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हमारी वाणी

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