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लहूलुहान संवेदनाएँ

>> Wednesday, March 17, 2021

 


ज़िन्दगी के बाग को



न मैंने काटा न छांटा 

और न ही लगाई

कंटीले तारों की बाड़

न ही की कभी 

इस बगिया की देख भाल ।

वक़्त की हवा ने 

यूँ ही छिटका दिए 

बीज संवेदनाओं के 

स्नेह धारा के अभाव में

अश्रु की नमी से ही 

निकल आये अंकुर उनमें ।

नन्हे नन्हे बूटे

रेगिस्तान सी ज़मीं पर

नागफ़नी से दिखते हैं ।

इन दरख्तों पर 

न ही कोई पत्ता है 

यहां तक कि इस पर 

कभी गुल भी नहीं खिलते हैं ।

सारी संवेदनाएं खुद के ही कांटों से 

हो जाती हैं लहू लुहान 

फिर किसी बीज के अंकुरण से

निकलती कोंपलें 

कर देती हैं आशा का संचार 

न जाने क्यों 

ऐसा ही होता है हर बार ।







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हमारी वाणी

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