और न ही लगाई
कंटीले तारों की बाड़
न ही की कभी
इस बगिया की देख भाल ।
वक़्त की हवा ने
यूँ ही छिटका दिए
बीज संवेदनाओं के
स्नेह धारा के अभाव में
अश्रु की नमी से ही
निकल आये अंकुर उनमें ।
नन्हे नन्हे बूटे
रेगिस्तान सी ज़मीं पर
नागफ़नी से दिखते हैं ।
इन दरख्तों पर
न ही कोई पत्ता है
यहां तक कि इस पर
कभी गुल भी नहीं खिलते हैं ।
सारी संवेदनाएं खुद के ही कांटों से
हो जाती हैं लहू लुहान
फिर किसी बीज के अंकुरण से
निकलती कोंपलें
कर देती हैं आशा का संचार
न जाने क्यों
ऐसा ही होता है हर बार ।