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बंद दरवाजा

>> Monday, September 8, 2008

इधर और उधर के बीच
बंद दरवाजा है /
दरवाज़े पर /
हर क्षण
हल्की - हल्की /
थपथपाहट का एहसास /
इधर ज़िन्दगी की साँसे
हल्की या बोझिल ।
बंद दरवाज़े के इधर
तुम हर पल अपना लो
हर क्षण /
अपना बना लो ।
न जाने कब /
हवा के झोंके से
यह दरवाजा खुल जाए ।
और उधर अनंत में ,
देखते हुए हम /
केवल किवाड़ के पल्ले
हिलते देखते रह जाएँ.

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धुआं बनाम ज़िन्दगी

ज़िन्दगी ,
धुआं बनती जा रही है
कब तक तुम उसे
मुट्ठी में बांधने का प्रयास करोगे ?

बंधी मुट्ठी में तुम्हे लगेगा
कि शायद ज़िन्दगी बाकी है
जब भी खोलोगे मुट्ठी तो
मात्र एक जलन का एहसास लिए
खाली हाथ देखते रह जाओगे।

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ईर्ष्या

>> Monday, September 1, 2008

ये रिश्ता बहुत प्यारा है
जहाँ एक दूसरे पर
अधिकार हमारा - तुम्हारा है ।

इसी विश्वास पर
सारी उम्र तमाम होती है
नाज़ुक से रिश्ते की
उम्र बड़ी कम होती है।

मुझ पर जो तुम
इतना अधिकार जताते हो
मेरी हर साँस पर भी
जैसे पहरा लगाते हो
मैं ज़रा सा हंस कर
बोल लूँ किसी से
तो तुम -
धुआं - धुआं हुए जाते हो ।

ये आदत तुम्हारी
मुझे रास भी आती है
पर कभी कभी ये
मन की
फांस भी बन जाती है ।
जो तुम मुझे इतना चाहते हो
तो मुझ पर फिर विश्वास
क्यों नही कर पाते हो ?
चाहत के फूलों के बीच
न जाने कैसे - कैसे
कांटे बिछाते हो ।

मानती हूँ कि चाहत जितनी गहरी हो
ईर्ष्या भी साथ ही होती है
पर जब बंधन में जकड  लेते हो
तो हर इच्छा बड़ी रोती है

ना चाहो इस कदर कि
ज़िंदगी ही बेहाल हो जाए
तुम्हारी ऐसी चाहत से कहीं
जीना भी मुहाल हो जाए .

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ज़रूरत नही है

प्यार के वर्णो को कभी जाना नही
प्यार कि परिभाषा को भी पहचाना नही
इसीलिए मुझे -
प्यार पढ़ने की ज़रूरत नही है।

ना मुझे मुहब्बत का मालूम है
और ना ही इश्क़ का पता है
इसीलिए मुझे -
मुहब्बत जताने की ज़रूरत नही है ।

दिल की धड़कने धड़कती हैं बस
उन्होने मुझसे कभी कुछ कहा ही नही
इसीलिए मुझे -
धड़कनो को भी सुनने की ज़रूरत नही है ।

अगले जन्म के ख्वाबों में रह कर भी
शायद रूह बदलती नही हैं
इसीलिए --
पुन: जन्म की भी कोई अहमियत नही है ।
चाहूं किसी को या ना चाहूं मैं
ये मेरी किस्मत ही सही
पर कोई मुझे चाहे-
इसकी मुझे कोई आरज़ू नही है ।

हक़ीक़त में जीती हूँ लेकिन फिर भी
ख्वाबों की दुनिया में खुश हूँ बहुत मैं
पर इन ख्वाबों में --
आने की किसी को इजाज़त नही है ।

गुम हैं सारे रास्ते जो मुझ तक आते हैं
कोई रास्ता भी मुझ तक पहुँचता नही है
इसीलिए इन रास्तों पर -
कदम बढ़ाने की किसी को ज़रूरत नही है ।
पत्थर हूँ मैं , ये मैं जानती हूँ
और मुझे पिघलना भी आता नही है
इसीलिए-
इस पत्थर को तराशने की ज़रूरत नही है ।

अब तलक मैने यूँ ही ज़िंदगी जी ली है
और अब जो लम्हे बाकी हैं
इस बची ज़िंदगी में -
कुछ भी पाने की ख्वाहिश नही है.

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दोस्ती का एक दिन

कल अचानक ही

इस नेट की दुनिया ने

मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए

और मुझे पहली बार ही

पता चला कि --

साल भर में एक दिन

दोस्ती का भी होता है

शायद बाकी दिन

लोग दुश्मनी निबाहते हैं ।


ये पश्चिमी सभ्यता

भारतीय संस्कृति पर

कैसा कब्जा जमा रही है

दोस्ती के साथ साथ

माँ - बाप के लिए भी

साल में एक एक दिन

मना रही है ।


सोचती हूँ कि -

क्या कोई पश्चिमी देश

ऐसी दोस्ती निभा पायेगा ?

जो भारतियों ने निबाही है

दोस्ती की खातिर

अपनी जान तक गँवाई है ।


हमारे देश में दोस्ती के नाम से

इतिहास भरा पड़ा है

पांडवों का भाई होते हुए भी

कर्ण , दुर्योधन के साथ खड़ा है ।

द्रोपदी के साथ थे कृष्ण

जिन्होंने पग - पग पर दोस्ती निबाही थी

भरी सभा में उन्होंने ही

उसकी लाज बचाई थी ।


आज हम दोस्ती को भी

एक व्यवसाय समझ लेते हैं

जहाँ कुछ फायदा होता है

वहीँ दोस्ती कर लेते हैं ।

क्या कोई कृष्ण - सुदामा जैसी

दोस्ती निबाह पायेगा ?

बिना मांगे अपने दोस्त लिए

सब कुछ न्योछावर कर पायेगा ?


दोस्ती का झरना तो

हमारे देश में बहता है

वो चंद लफ्जों का मोहताज़ नहीं

ऐसा मुझे लगता है

इसीलिए कहती हूँ --

फ्रेंडशिप डे और वीक में

दोस्ती को मत बांधो

दोस्ती को दोस्ती रहने दो

इन चीज़ों में मत अंको

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हमारी वाणी

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