कल अचानक ही
इस नेट की दुनिया ने
मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए
और मुझे पहली बार ही
पता चला कि --
साल भर में एक दिन
दोस्ती का भी होता है
शायद बाकी दिन
लोग दुश्मनी निबाहते हैं ।
ये पश्चिमी सभ्यता
भारतीय संस्कृति पर
कैसा कब्जा जमा रही है
दोस्ती के साथ साथ
माँ - बाप के लिए भी
साल में एक एक दिन
मना रही है ।
सोचती हूँ कि -
क्या कोई पश्चिमी देश
ऐसी दोस्ती निभा पायेगा ?
जो भारतियों ने निबाही है
दोस्ती की खातिर
अपनी जान तक गँवाई है ।
हमारे देश में दोस्ती के नाम से
इतिहास भरा पड़ा है
पांडवों का भाई होते हुए भी
कर्ण , दुर्योधन के साथ खड़ा है ।
द्रोपदी के साथ थे कृष्ण
जिन्होंने पग - पग पर दोस्ती निबाही थी
भरी सभा में उन्होंने ही
उसकी लाज बचाई थी ।
आज हम दोस्ती को भी
एक व्यवसाय समझ लेते हैं
जहाँ कुछ फायदा होता है
वहीँ दोस्ती कर लेते हैं ।
क्या कोई कृष्ण - सुदामा जैसी
दोस्ती निबाह पायेगा ?
बिना मांगे अपने दोस्त लिए
सब कुछ न्योछावर कर पायेगा ?
दोस्ती का झरना तो
हमारे देश में बहता है
वो चंद लफ्जों का मोहताज़ नहीं
ऐसा मुझे लगता है
इसीलिए कहती हूँ --
फ्रेंडशिप डे और वीक में
दोस्ती को मत बांधो
दोस्ती को दोस्ती रहने दो
इन चीज़ों में मत अंको
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