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Wednesday, November 4, 2009

मौन



जब व्यापता है

मौन मन में

बदरंग हो जाता है

हर फूल उपवन में

मधुप की गुंजार भी


तब श्रृव्य होती नहीं


कली भी गुलशन में


कोई खिलती नहीं ।



शून्य को बस जैसे


ताकते हैं ये नयन


अगन सी धधकती है


सुलग जाता है मन ।


चंद्रमा की चांदनी भी


शीतलता देती नहीं


अश्क की बूंदें भी


तब शबनम बनती नहीं ।


पवन के झोंके आ कर


चिंगारी को हवा देते हैं


झुलसा झुलसा कर वो


मुझे राख कर देते हैं



हो जाती है स्वतः ही


ठंडी जब अगन


शांत चित्त से फिर


होता है कुछ मनन



मौन भी हो जाता है


फिर से मुखरित


फूलों पर छा जाती है

इन्द्रधनुषी रंजित

अलि की गुंजार से

मन गीत गाता है

विहग बन अस्मां में

उड़ जाना चाहता है ..

Tuesday, October 27, 2009

तृष्णा की आंच



यादों के रेगिस्तान में

भटकता है मन यूँ ही

कि जैसे

कस्तूरी की चाह में

भटकता है कस्तूरी मृग

जंगल - जंगल ।


ख़्वाबों के तारे


छिप जातें हैं जब

निकलता है

हकीक़त का आफताब

और उसकी तपिश से

ख्वाहिशों का चाँद भी

नज़र नहीं आता ।


और इस मन का


पागलपन देखो

चाहता है कि

ख्वाहिशों को

हकीक़त बना दे

और

ख़्वाबों को आइना ।

पर ये आइना

टूट जाता है

छनाक से

चुभ जाती हैं किरचें

मन के हर कोने में

और सुलग जाता है मन

तृष्णा की आंच से .



Sunday, October 25, 2009

चपला चंचला


एक दिन अचानक

भीड़ के बीच

बस स्टाप पर

मेरी नज़र पड़ गयी थी

तुम पर

मुझे लगा कि

बहुत देर से

टकटकी लगा कर

देख रहे थे तुम ।

तभी बस आई

और भीड़ के साथ

मैं भी सवार हो गयी थी

बस में ।

पर तुम

किंकर्तव्यमूढ़ से

खड़े रह गए थे ।

और ये सिलसिला

रोज़ का ही

हो गया था शुरू।


मैं

अपनी सहेलियों के साथ

हंसती थी , खिलखिलाती थी

मद मस्त हुई जाती थी ।

और कुछ जान बुझ कर भी

अदा दिखाती थी ।

और एक नज़र भर

देख कर

चली जाती थी।

तुम रह जाते थे

खड़े वहीँ के वहीँ।


और एक दिन

तुम

मेरे करीब से गुज़रे

और धीरे से

कहा कान में

चपला चंचला ।

सुनते ही जैसे मैं

जड़ हो गयी थी ।


आज भी वही

बस स्टाप है

रोज़ मेरी नज़रें

तुम्हें खोजती हैं

और निराश हो

लौट आती हैं ।

अब मेरे साथ

न सहेलियां हैं

न हंसी है

न खिलखिलाहट है

न मस्ती है ।

बस

है तो

बस एक ख्वाहिश

कि

एक बार फिर से

सुन सकूँ तुमसे

चपला चंचला

Friday, October 23, 2009

मोहब्बत


मैंने तुमसे

मोहब्बत की है

बेपनाह मोहब्बत की है ।

इसीलिए

कभी तुमसे

कुछ माँगा नहीं

सुना है मैंने

कि

मोहब्बत में

पाने से ज्यादा

देने की चाहत होती है

इसीलिए

कभी तेरे सामने

मैंने अपना हाथ

फैलाया नहीं।

और वैसे भी

भला मैं तुझे

क्या दूंगी ?

ये आंसू के

कुछ कतरे हैं

जिन्हें तेरे

चरणों पर रख दूंगी ।

सच में मैंने तुझसे

मोहब्बत की है

ऐ मेरे खुदा

बेपनाह मोहब्बत की है.

Sunday, October 18, 2009

दीपावली मनाएंगे


लौटे थे राम

वनवास से

इसलिए हम

दीपावली मनाएंगे

और अपने

अंतस के राम को

वनवास दे आयेंगे ।


बिजली से चमकते

अपने घर में

और दिए जलाएंगे

पर किसी गरीब की

अँधेरी कोठरी में

एक दिया भी

नहीं रख पायेंगे ।


जिनके भरे हों

पेट पहले से

उन्हें और

मिष्टान्न खिलाएंगे

लेकिन भूखे पेट

किसी को हम

भोजन नहीं कराएँगे


पटाखे चलाएंगे

फुलझडी छुटायेंगे

और इसी तरह से

हर साल दीपावली मनाएंगे ।