copyright. Powered by Blogger.

चक्रव्यूह

>> Sunday, September 25, 2016

Image result for images of sea


सागर के किनारे
गीली रेत पर बैठ
अक्सर मैंने सोचा है
कि-
शांत समुद्र की लहरें
उच्छ्वास लेती हुई
आती हैं और जाती हैं ।
कभी - कभी उन्माद में
मेरा तन - मन भिगो जाती हैं|

पर जब उठता है उद्वेग
तब ज्वार - भाटे का रूप ले
चक्रव्यूह सा रचा जाती हैं
फिर लहरों का चक्रव्यूह
तूफ़ान लिए आता है
शांत होने से पहले
न जाने कितनी
आहुति ले जाता है ।

इंसान के मन में
सोच की लहरें भी
ऐसा ही
चक्रव्यूह बनाती हैं
ये तूफानी लहरें
न जाने कितने ख़्वाबों की
आहुति ले जाती हैं ।

चक्रव्यूह -
लहर का हो या हो मन का
धीरे - धीरे भेद लिया जाता है
और चक्रव्यूह भेदते ही
धीरे -धीरे हो जाता है शांत
मन भी और समुद्र भी .

Read more...

पुस्तक समीक्षा ... " अँधेरे का मध्य बिंदु " लेखिका - वंदना गुप्ता

>> Wednesday, February 17, 2016

   

" अँधेरे  का  मध्य  बिंदु " वंदना गुप्ता  का प्रथम उपन्यास  है । मूल रूप से उनकी  पहचान  कवयित्री के रूप में  रही और फिर उन्होंने  अपनी क्षमता का लोहा अन्य विधाओं में भी मनवाया । अनेक  कहानियां  लिखीं और  पुस्तकों की  समीक्षा  भी करी । लेकिन  इतने  कम  समय में उनका एक उपन्यास  आ  जाना निश्चय  ही उनकी क्षमता को दर्शाता  है ।  कवयित्री  के  रूप  में भी  इन्होंने  अनेक  कवितायेँ ऐसे विषय  पर लिखीं  हैं जिन पर  कलम चलाने  का साहस विरले ही  करते  हैं । और  अब  उपन्यासकार  के रूप में भी एक  ऐसे  विषय को  लिया है जिसे आमतौर पर  समाज  सहज स्वीकार  नहीं  करता । यूँ तो लिव इन रिलेशनशिप  आज  अनजाना  विषय  नहीं  है  लेकिन  फिर भी  इसे सहज स्वीकार  नहीं किया  जाता । जहाँ तक  आम लोगों की  सोच  है  ऐसे रिश्तों  को अधिक  महत्त्व  नहीं दिया जाता जहाँ कोई प्रतिबद्धता  न हो । लेकिन  आज  की पीढ़ी  विवाह  के  बंधनों  में जकड़  कर  अपनी स्वतंत्रता को खोना  नहीं  चाहती ।  
        वंदना  ने  इसी विषय  को मूल में रख  उपन्यास की रूपरेखा बुनी  है । इनके  नायक और  नायिका  अपने लिव इन  रिलेशनशिप के रिश्ते  में  अधिक  प्रतिबद्ध  दिखाई  देते हैं । प्रेम  विश्वास  और स्पेस  ये तीन चीज़ें ऐसी हैं जो  अंत तक  नायक  नायिका को आपस में जोड़े  रखती हैं ।  यदि यही तीनो बातें किसी वैवाहिक जोड़े की ज़िन्दगी में हों तो उनकी ज़िन्दगी भी सुकून से भरपूर  हो । विवाह  के  पश्चात  स्त्री और  पुरुष  दोनों की ही  एक दूसरे  से अपेक्षाएं इतनी बलवती  हो जाती  हैं  कि वो एक दूसरे  पर अपना  अधिकार  जमाने  लगते  हैं । धीरे धीरे इस रिश्ते में कटुता  आ जाती है । वंदना  के  नायक  नायिका  जानते हैं कि उनका  रिश्ता  बहुत  नाज़ुक  है इस लिए वो एक दूसरे से अपेक्षाओं  के बजाये एक दूसरे के प्रति  समर्पित  रहते हैं । इस  उपन्यास  को  पढ़ कर  एक  बात तो स्पष्ट  है कि इस  तरह के रिश्तों  में आपस में अधिक वचनबद्धता  की आवश्यकता है । 
           लेखिका  ने इस  उपन्यास में  जहाँ  लिव इन रिलेशन  के रिश्ते को खूबसूरती से एक ख़ुशगवार  रिश्ता  बुना  है  वहीँ  इस तरह के रिश्तों  के भीषण दुष्परिणामों  से  भी अवगत  कराया है । दीप्ती के पिता के साथ होने वाले संवाद ऐसे रिश्तों के दुष्परिणामों  पर रोशनी डालते हैं ।  स्त्री विमर्श  को  भी  नायिका  शीना के  संवाद  द्वारा  लेखिका ने  स्पष्ट किया है  कि मात्र पुरुष विरोधी सोच  नहीं होनी चाहिए । सही और गलत का निर्णय सोच  समझ  कर लिया  जाना  चाहिए । 
            छोटे  छोटे  गाँव  में आज  भी  चिकित्सा  की  उचित सुविधाएँ  नहीं  हैं इस  पर भी लेखिका की  कलम चली है जिसके परिणामस्वरूप  नायिका शीना  एच आई वी की शिकार  हो  जाती  है ।ऐसे  कठिन दौर से गुज़रते  हुए भी नायक रवि  अपने रिश्ते को  बखूबी निभाता  है ।आपस में न तो कोई अनुबंध था और न ही कोई सामाजिक दबाव फिर भी दोनों एक दूसरे के प्रति पूर्णरूपेण एक दूसरे के प्रति समर्पित थे |पूरे  उपन्यास में नायक  नायिका  का रिश्ता एक दूसरे  पर बोझ  प्रतीत नहीं होता । यही इस उपन्यास के कथानक की सफलता है ।
          एक आलोचक  की दृष्टि से देखा  जाए तो कहीं कहीं लेखिका  ने  घटनाओं को समेटने में थोड़ी शीघ्रता दिखाई है । और एक प्रकरण जहाँ रवि ( नायक )  अपने लिव इन रिलेशनशिप के रिश्ते के लिए अपने  माता पिता से बात करने अनूपशहर  जाता  है । घर पहुंचने के लिए गली में प्रवेश भी कर लेता है और कुछ  जान पहचान वालों से दुआ  सलाम  भी हो जाती  है । यहाँ तक कि सुमन चाची की बेटी  रवि भैया आ  गए यह कह कर घर की ओर दौड़ भी जाती  है ,उसके बाद  गंगा  नदी पर रवि का  पहुँचना  और अपने अशांत मन को शांत करने में समय बिताना मेरी दृष्टि से उचित नहीं था ।क्योंकि एक तो वो माता पिता को बिना सूचना दिए आया था और उसके आने की खबर यदि किसी अन्य  व्यक्ति से उनको मिल जाती तो वो उसके देर से घर पहुँचाने से अत्यधिक चिंतित हो  उठते ।  यही प्रकरण यदि शहर पहुँचने  से पहले आता तो मेरी दृष्टि से शायद ज्यादा उचित होता । संध्या की भूमिका का भी कुछ ज्यादा  औचित्य  नहीं  लगा फिर भी शायद लेखिका नायक के चरित्र  की दृढ़ता  को पाठक  तक  पहुंचाना  चाहती थीं । जिसमें वो सफल भी रहीं ।
      कुल मिला  कर ये उपन्यास आज की युवा पीढ़ी  के लिए ही  नहीं वरन  हर  दम्पति के लिए प्रेरणास्रोत  है । आपस के रिश्तों  का किस तरह से निर्वाह किया जाना  चाहिए और किस तरह एक दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना ही किसी रिश्ते को मजबूती प्रदान  करती  है ये बात लेखिका ने बड़ी कुशलता से समझायी है । भाषा  बहुत सहज सरल और  ग्राह्य  है । सबसे  बड़ी बात कि  कहीं भी  कथानक की रोचकता  गायब नहीं होती और  न ही कहीं उबाऊ उपदेश प्रतीत  होते हैं । 
इस उपन्यास के लिए  जो उनका पहला प्रयास है लेखिका निश्चय  ही  बधाई की पात्र  हैं। पुस्तक का आवरण  और  कलेवर आकर्षक है . 

इसके लिए  प्रकाशक बधाई के पात्र हैं . 
         लेखिका  को मेरी  शुभकामनाये। आने  वाले  समय में उनके और उपन्यासों  का इंतज़ार  रहेगा |




पुस्तक  का नाम -   अँधेरे  का  मध्य  बिंदु 

लेखिका --- वंदना गुप्ता 

प्रकाशक --एपीएन  पब्लिकेशन 
संपर्क --9310672443
apnlanggraph@gmail.com

ISBN No ---978-93-85296-25-3








Read more...

मधुसूदन

>> Friday, January 15, 2016


ऐ मेरे , 
क्या सम्बोधन दूँ तुमको 
मैं तुमको सर्वस्व मानती हूँ 
इसीलिए  तुमको मधुसूदन 
पुकारती हूँ , तो 
ऐ मेरे मधुसूदन ! 
नहीं चाहती कि , 
मैं बनू  कोई राधा ,
या फिर मीरा , 
न ही रुकमणि
और न ही सत्यभामा । 
मैं तो चाहती हूँ 
बनू बांसुरी तेरी 
जो रहती थी 
तेरे अधरों पर , 
एक हल्की सी 
फूँक से ही 
सारी सृष्टि 
खिलखिला जाती थी 
मंत्रमुग्ध सी 
तेरे कदमों में 
झुक  जाती थी । 
मेरी भी ख़्वाहिश है 
कि तुम मुझे अपनी 
वंशी  बनाओ 
और अधरों पर रख 
कोई ऐसा राग सुनाओं 
कि , सारी कायनात 
तुझमें समा जाए 
और उसमें 
एक ज़र्रा मेरा भी हो , 
ऐ मेरे मधुसूदन 
मैं तुम्हें 
कृष्ण बनाना  चाहती हूँ । 


Read more...

सिमटी यादें

>> Sunday, November 29, 2015






सपने हों गर आँखों में तो आंसू भी होते हैं 
अपने ही हैं जो दिल में ज़ख्मों को बोते  हैं |

मन के आँगन में बच्चों  का बचपन हँसता है 
सूने नयनों से लेकिन बस पानी रिसता  है |


नया नीड़ पा कर  पंछी कब वापस  आते हैं 
हर आहट पर बूढ़े फिर क्यों उम्मीद  लगाते  हैं |


नयी नस्ल की नयी फसल ही तो लहराती है 
पुरानी फसल की हर बाली तो मुरझा  जाती है |


वक़्त गुज़रता है तो उम्र भी गुज़र जाती है 
बची ज़िन्दगी बीती यादों में सिमट  जाती है|


सिमटी  यादों में ही तो बस  हम जीते  हैं 
गर सपने हों आँखों में तो आंसू भी होते हैं |



Read more...

पुस्तक समीक्षा .... बदलती सोच के नए अर्थ .... वंदना गुप्ता

>> Tuesday, January 20, 2015



हिंदी अकादमी दिल्ली के  सौजन्य से प्रकाशित सुश्री  वंदना गुप्ता जी का काव्य संग्रह “ बदलती सोच के नए अर्थ “ सोच को बदलने की पूर्ण क्षमता  रखता है . इस काव्य संग्रह को पढ़ते हुए कई बार ये महसूस हुआ कि आज मात्र सोच ही नहीं बदल रही है वरन उसके अर्थ भी बदल रहे हैं . वंदना  के लेखन की एक अलग ही विशेषता है . वो अपनी  रचनाओं के मध्यम से एक ही विषय पर  अपने मन में उठने वाले संशयों  को विस्तार से रखती हैं और  फिर उन संशय के उत्तर खोजती हुई अपना एक पुख्ता विचार रखती हैं और  पाठक उनकी प्रवाहमयी शैली से बंधा उनके प्रश्न उत्तर को समझता हुआ उनके विचार से सहमत  सा होता प्रतीत होता है . इस  काव्य संग्रह में काव्य सौन्दर्य से परे विचार और भाव की  महत्ता है इसीलिए  इसका नाम “बदलती सोच के नए अर्थ”  सार्थक है .
अपने इस काव्य संग्रह को वंदना जी  ने चार भागों में विभक्त  किया है ... प्रेम , स्त्री विषयक , सामजिक  और दर्शन . प्रेम एक  ऐसा विषय जिस पर न जाने कितना कुछ लिखा गया है लेकिन वंदना जी जिस प्रेम की तलाश में है वो मन की उड़ान और गहराई दोनों ही दिखाता है . वह प्रेम में देह को गौण  मानते  हुए लिखती हैं ...
जानते हो / कभी कभी ज़रूरत होती है / देह से इतर प्रेम की ... राधा कृष्ण सा /

एक अनदेखा अनजाना सा व्यक्तित्त्व जिसके माध्यम से प्रेम की पराकाष्ठा का अहसास होता है –

चलो आज तुम्हे एक बोसा दे ही दूँ ....उधार समझ कर रख लेना /कभी याद आये तो .. तुम उस पर अपने अधर  रख देना / मुहब्बत निहाल हो जाएगी . 

कुछ ऐसे विषय जिन्हें आज भी लोग वर्जित समझ लेते हैं  उस पर इन्होने अपनी बेबाक  राय देते हुए अपने विचार  रखे हैं इसी कड़ी में उनकी एक रचना है प्रेम का अंतिम लक्ष्य  क्या .... सैक्स ? अपने विचारों को पुख्ता तरीके से रखते हुए उनका कहना  है कि सैक्स  के लिए  प्रेम का होना ज़रूरी नहीं  तो दूसरी ओर जहाँ आत्मिक प्रेम होता है वहां देह का भान भी नहीं होता .

उनका प्रेम सदाबहार है .... तभी कहती हैं कि प्रेम कभी प्रौढ़ नहीं होता .

स्त्री विषयक  रचनाओं में उन्होंने सदियों से स्त्री के मन में घुटे , दबे भावों को शब्द दिए हैं . पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियाँ अब अपने वजूद की तलाश में हैं और शोषित होते होते  अघा गयी हैं .... अब विस्फोट की स्थिति  आ गयी है तो विद्रोह तो होना ही है ....
मर्दों के शहर की अघाई औरतें / जब उतारू हो जाती हैं विद्रोह पर / तो कर देती हैं तार तार / साडी लज्जा की बेड़ियों को / उतार देती हैं लिबास हया का / जो ओढ़ रखा था बरसों से  , सदियों ने / और अनावृत हो जाता है सत्य / जो घुट रहा होता है औरत की जंघा और सीने में . 

स्त्रियों  में जो प्राकृतिक शारीरिक परिवर्तन होते हैं और उसके कारण होने वाले बदलाव पर भी वंदना जी ने अपनी लेखनी चलाई है ... ऋतुस्राव से मीनोपाज़  तक का सफ़र . ... ये  ऐसे विषय हैं जिन पर शायद ही इससे पहले किसी रचनाकार का ध्यान गया हो . स्त्री विषयक रचनाओं में विद्रोह के स्वर मुखरित हुए हैं . “कागज़ ही तो काले करती हो “ में स्पष्ट रूप से इंगित कर दिया है कि ये लिखना लिखाना बेकार है जब तक कोई अर्थ ( पैसा )  नहीं मिलता . अंतिम पंक्तियों में भावनाओं को निचोड़ कर रख दिया है ...
ये वो समाज है / जहाँ अर्थ ही प्रधान है / और स्वांत: सुखाय का यहाँ कोई महत्तव  नहीं / शायद इसीलिए / हकीकत की  पथरीली ज़मीनों पर पर पड़े फफोलों  को रिसने की इजाज़त  नहीं होती ...

विद्रोह के स्वर की एक बानगी ये भी  ----
हाँ बुरी औरत हूँ मैं / मानती हूँ ../ क्यों कि जान  गयी हूँ /  अपनी तरह / अपनी शर्तों पर जीना

इनकी  कविताओं के शीर्षक से ही विद्रोह का स्वर गूंजने लगता है ... जैसे ... खोज में हूँ  अपनी प्रजाति के अस्तित्व  की , आदिम पंक्ति की एक क्रांतिकारी रुकी हुई बहस हूँ मैं ... क्यूँ कि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते . 

कवयित्री की लेखनी जहाँ प्रेम , समाज और स्त्री विषयक  विषयों  पर चली है वहीँ कुछ दार्शनिक भावों को भी समेटे हुए है .जीवन दर्शन के लिए मन  को मथना पड़ता  है बिलकुल उसी तरह जैसे मक्खन   निकालने के लिए दूध को .... "प्रेम , आध्यात्म और जीवन दर्शन”  में इस भाव को वंदना जी ने बखूबी वर्णित किया है .
“सम्भोग से समाधि  तक “ ने इन शब्दों के शाब्दिक अर्थ और परिभाषा को समझाते हुए ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त किया है . कुछ पंक्तियाँ देखिये ...
जीव रूपी यमुना का / ब्रह्म रूपी गंगा के साथ / सम्भोग उर्फ़  संगम होने पर / सरस्वती में लय हो जाना ही / आनंद या समाधि है . ...
कभी कभी शब्दों के तात्विक अर्थ इतने गहन होते हैं जो समझ से परे होते हैं और उन्होने उन्ही अर्थों को खूबसूरती से विवेचित किया है और ऐसा तभी संभव है जब कोई उन लम्हात से गुजरा हो या गहन चिन्तन मनन किया हो ।

कवयित्री ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी दर्शन में समा लिया है ...ईश्वर की खोज जिसे सब खोज रहे हैं मात्र एक अणु.... और एक अणु ही तो है “मैं  “ इसी की खोज में प्रयासरत है .

इस काव्य संग्रह की एक दो रचनाओं को छोड़ दें तो सभी लम्बी  कविताओं का रूप लिए हैं . और इनका लम्बा होना लाज़मी भी था क्योंकि  सभी विचार प्रधान रचनाएँ हैं . हो सकता है कि पाठक लम्बी कविताओं को पढ़ने का हौसला न रखे  पर मैं ये दावे से कह सकती हूँ कि ...   वंदना जी की प्रवाहमयी शैली और उनके तर्क वितर्क पाठकों को बांधे रहेंगे  और पाठक कविता ख़त्म करते करते उस विषय से जुदा महसूस करेगा . यह काव्य संग्रह  पाठक की भावनाओं को उद्द्वेलित  करने में पूर्णत:  सक्षम है .
वंदनाजी के ब्लॉग की  नियमित पाठिका हूँ और उनके लेखन की प्रशंसिका भी . इस काव्य संग्रह में ब्लॉग से इतर भी रचनाओं का संकलन है ... इस काव्य सग्रह के लिए मैं उनको हार्दिक बधाई देती हूँ  और कामना करती हूँ कि उनके ये स्वर यूँ ही बुलंद रहें और जो उन्होंने एक ख्वाहिश इस संग्रह में रखी है (  विद्रोह के स्वर सहयोग के स्वर में परिवर्तित हों )  पूरी हो . शुभकामनाओं के साथ ...

हिंदी चेतना पत्रिका के जनवरी से मार्च अंक में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा . 


Read more...

हमारी वाणी

www.hamarivani.com

About This Blog

आगंतुक


ip address

  © Blogger template Snowy Winter by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP