
जब व्यापता है
मौन मन में
बदरंग हो जाता है
हर फूल उपवन में
मधुप की गुंजार भी
तब श्रृव्य होती नहीं
कली भी गुलशन में
कोई खिलती नहीं ।
शून्य को बस जैसे
ताकते हैं ये नयन
अगन सी धधकती है
सुलग जाता है मन ।
चंद्रमा की चांदनी भी
शीतलता देती नहीं
अश्क की बूंदें भी
तब शबनम बनती नहीं ।
पवन के झोंके आ कर
चिंगारी को हवा देते हैं
झुलसा झुलसा कर वो
मुझे राख कर देते हैं
हो जाती है स्वतः ही
ठंडी जब अगन
शांत चित्त से फिर
होता है कुछ मनन
मौन भी हो जाता है
फिर से मुखरित
फूलों पर छा जाती है
इन्द्रधनुषी रंजित
अलि की गुंजार से
मन गीत गाता है
विहग बन अस्मां में
उड़ जाना चाहता है ..




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