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स्याह रात

>> Tuesday, July 27, 2010



मेरी ज़िंदगी में,


अमावस क्यों है


स्याह रात की ये 


तन्हाईयां क्यों हैं


चाँद भी आसमाँ पर


दिखता नही है


चाँदनी का भी कोई


नामों निशाँ नही है


तारों की झिलमिलाहट ही


सुखद लग रही है


जैसे कि ना जाने


कितने स्वप्न


आसमाँ पे टंग गये हैं 


यहाँ से खड़ी मैं


देखती हूँ जब


जैसे कि सपने सब 


जीवंत हो उठे हैं


सुकून मिलता है


उन सपनों को देखने से


लगता है कि ज़िंदगी में


पूर्णिमा आ गयी है


पर ----


सपने तो बस सपने हैं


हक़ीकत में तो--


ये स्याह रात आ गयी है..





43 comments:

कविता रावत 7/27/2010 6:14 PM  

पर ----
सपने तो बस सपने हैं
हक़ीकत में तो--
ये स्याह रात आ गयी है..
....man mein jab dard kee hook uthti hai to har tarf syaah raat nazar aane lagti hai...
Vedana ko bakhubi mukhrit kya hai aapne.
Haardik shubhkamnayne







Read More: http://geet7553.blogspot.com/

kshama 7/27/2010 6:18 PM  

Jo syaah raat se guzarte hain,wahi aisi khoobsoorst rachana kar sakte hain....dard jhele bina dard kaa aisa anootha bayan kaun kar sakta hai?

वन्दना 7/27/2010 6:27 PM  

स्याह रात के स्याह अन्धेरे
हर ख्वाब को निगल जाते हैं
और रह जाती हैं सिर्फ़ और सिर्फ़
सिसकती , तडपती स्याह रातें
बेहद गहन अभिव्यक्ति………………।दर्द की अनुभूति का गहन चित्रण्।

shikha varshney 7/27/2010 6:28 PM  

स्याह रात के बाद पूर्णिमा भी आती है और सुबह भी पर उनका एहसास अधूरा ही रह जाये अगर स्याह रात न हो ..
बहुत दर्द भरी अभिव्यक्ति ..सुन्दर.

मनोज कुमार 7/27/2010 6:30 PM  

ज़िन्दगी एक ख़ाब है ......!

M VERMA 7/27/2010 6:36 PM  

सपने तो बस सपने हैं

सपने जो अपने है
महज़ वो सपने हैं
अत्यंत भावपूर्ण रचना

प्रवीण पाण्डेय 7/27/2010 6:38 PM  

स्वप्नों की पूर्णिमायें एक दिन आयेंगी।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 7/27/2010 6:59 PM  

बहुत सुन्दर रचना ... दर्दभरी अनुभुतियों को समेटे हुए ...

Deepak Shukla 7/27/2010 7:00 PM  

नमस्कार दी...

जीवन मैं अमावस है तो...
संग पूर्णिमा भी तो रहती...
अगर निराशा आये भी तो...
संग मैं आशा भी तो रहती...

भले स्वप्न देखे हों तुमने..
और पूर्णिमा लगी तुम्हें...
मगर रात गर स्याह रही हो..
आशा संग मैं रही बसे...

दीपक...

swaarth 7/27/2010 7:07 PM  

स्याह रात के बाद भी
चमक सूर्योदय की फैलेगी जरुर
दिन तो निकलेगा ही

पूर्णिमा सपनीली न रहकर
सच में छटा बिखेरेगी जरुर

यही चक्र है

रचना दीक्षित 7/27/2010 7:29 PM  

सपने तो बस सपने हैं


हक़ीकत में तो--


ये स्याह रात आ गयी है..





सपने तो बस सपने हैं
हक़ीकत में तो--
ये स्याह रात आ गयी है..

अच्छी लगी ये कविता पर हर स्याह रात के बाद सवेरा तो आना ही है भले कुछ इतजार ही क्यों न करना पड़े

Virendra Singh Chauhan 7/27/2010 7:40 PM  

सपने तो बस सपने हैं...Kya baat hai .....

Bahut hi achhi kavita hai.Padhkar bahut achha lagaa.

अनामिका की सदायें ...... 7/27/2010 8:02 PM  

आज खाबों की मल्लिका रातों की स्याही में कैसे उलझ गयी???? कोई दिन कभी एक समान रहे हैं...? धूप के बाद छाँव का आना लाज़मी है.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 7/27/2010 8:05 PM  

संगीता दी,
जऊन आदमी के किस्मत में अमावस लिखा है, जो पूरनमासी से जनम जनम से बिछड़ा हुआ है, जिसके जीबन में अंधकार भरा हुआ है... ऊ बेचारा आपका कबिता का सितारा में छन भर के लिए उजाला देखकर खुस हो गया था... उसको लगा कि दूर टिमटिमाने वाला तारा पूरनमासी का चाँद है... लेकिन अंतिम पंक्ति तक आते आते बेचारा का सब सपना टूट गया... सच्चाई से भरपूर ईमानदार रचना (हमेसा के तरह).
सलिल

rashmi ravija 7/27/2010 8:08 PM  

जैसे कि ना जाने


कितने स्वप्न


आसमाँ पे टंग गये हैं

झिलमिल तारों की झिलमिलाते सपनो से
तुलना... काबिल-ए-तारीफ़ है.
पर हाथ स्याह रात ही आती है...एक कडवी हकीकत

अजय कुमार 7/27/2010 8:16 PM  

अच्छी अभिव्यक्ति ,सपने साकार भी होते हैं ।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' 7/27/2010 8:17 PM  

तारों की झिलमिलाहट ही


सुखद लग रही है


जैसे कि ना जाने


कितने स्वप्न


आसमाँ पे टंग गये हैं


ye baat sabse achhi hai mummaa....... :)

मनोज कुमार 7/27/2010 8:44 PM  

हक़ीकत में तो--
ये स्याह रात आ गयी है..
आपकी कविता पढकर दुबारा आया हूं, आप तो बंगाल में रह चुकी हैं, तो गुरुदेव की कुछ पंक्तियां आपको समर्पित करने के लिए आया हूं --
यदि आलो ना घरे, ओरे, ओरे, ओ अभागा-
यदि झड़ बादले
आधार राते दुयार देय धरे-
तबे वज्रानले
आपुन बुकेर पांजर जालियेनिये एकला जलो रे!
यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।

रश्मि प्रभा... 7/27/2010 9:30 PM  

स्याह रात ! जब रातें स्याह लगे तब उन सपनों की पूर्णता पैर भरोसा करें, काली रात ही कृष्ण के आने की सूचना देती है न

Udan Tashtari 7/27/2010 10:44 PM  

सुन्दर गहन अभिव्यक्ति!!

सम्वेदना के स्वर 7/27/2010 10:56 PM  

चूर चूर हुए ख़्वाब, बिखरे हैं तारों की शकल में, पूरे आसमान में… बस सुबह के चिराग की तरह रोशनी की एक झलक दिखाकर बुझ जाने को...अंजाम एक ही..टूटे ख़्वाब, और तारीक अंधेरा!!
बहुत ख़ूबसूरत वर्णन.

राजभाषा हिंदी 7/28/2010 7:52 AM  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

Avinash Chandra 7/28/2010 8:01 AM  

सपने तो बस सपने हैं
हक़ीकत में तो--
ये स्याह रात आ गयी है..

:( :(
एकदम सच्ची कविता,लेकिन सुबह आएगी ना...

रात स्याह और काली छाया,
सूरज से पहले की माया.
किरणे लेती क्षणिक परीक्षा,
तम से कौन बली लड़ पाया.

विनोद कुमार पांडेय 7/28/2010 8:24 AM  

स्याह रात भी जिंदगी का एक रूप है..सुख और दुख दोनों साथ साथ चलते है..सुंदर रचना बधाई

Mrs. Asha Joglekar 7/28/2010 8:32 AM  

Syah rat..........
Rat tabhee gehratee hai jab bhor najdeek ho.
Rat jitani bhee sangeen hogee subah utani hee rangeen hogee. Rat bhar ka hai mehman andhera kiske roke ruka hai sawera.

डॉ. हरदीप सँधू 7/28/2010 9:09 AM  

Bahut acchee rachna...
Sunder bahv....
Agar chand par aasheeyana bnane kee baat ho....
to.....
Shabdon ka Ujala aa karke....puree kee ja saktee hai.
http://shabdonkaujala.blogspot.com

संजय भास्कर 7/28/2010 1:46 PM  

दर्द की अनुभूति का गहन चित्रण्

डा. अरुणा कपूर. 7/28/2010 1:59 PM  

चाँद भी आसमाँ पर


दिखता नही है


चाँदनी का भी कोई


नामों निशाँ नही है
किसी की आंतरिक व्यथा को आपने शब्दों में ढाला है!...वाह!... बहुत बढिया कृति!

रेखा श्रीवास्तव 7/28/2010 4:09 PM  

सब मन कि कल्पना से होता है. अगर अमावस्या को पूर्णिमा समझ कर जिए तो वही लगेगी. प्रकृति के संग खेल कर रचना बहुत सुन्दर लगी.

ajay saxena 7/28/2010 4:21 PM  

सुन्दर अभिव्यक्ति………………

महफूज़ अली 7/28/2010 4:37 PM  

बहुत भावपूर्ण रचना...


उन सपनों को देखने से


लगता है कि ज़िंदगी में


पूर्णिमा आ गयी है


पर ----


सपने तो बस सपने हैं


हक़ीकत में तो--


ये स्याह रात आ गयी है..

यह पंक्तियाँ बहुत दिल को छू गयीं....

Arvind Mishra 7/28/2010 4:52 PM  

स्याह रात -प्राची पर देखिये लालिमा दीखने लगी है !

दीपक 'मशाल' 7/28/2010 5:21 PM  

ह्म्म्म.. विरोधाभासी कविता...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ 7/28/2010 5:57 PM  

बहुत खूब कहती हैं आप।
--------
सावन आया, तरह-तरह के साँप ही नहीं पाँच फन वाला नाग भी लाया।

anjana 7/28/2010 6:47 PM  

बहुत सुन्दर रचना ..

Priyankaabhilaashi 7/28/2010 8:45 PM  

संगीता आंटी..

यूँ लगा..अंतर्मन के संदूक से निकाल लायीं हैं आप..!!!

महामंत्री - तस्लीम 7/29/2010 11:21 AM  

’तस्‍लीम’ द्वारा आयोजित चित्र पहेली-86 को बूझने की हार्दिक बधाई।
----------------
सावन आया, तरह-तरह के साँप ही नहीं पाँच फन वाला नाग भी लाया।

अनामिका की सदायें ...... 7/29/2010 7:53 PM  

आप की रचना 30 जुलाई, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
http://charchamanch.blogspot.com

आभार

अनामिका

JHAROKHA 7/30/2010 10:10 AM  

syah raat ke (amawas) baad hi to aati hai puranmaasi ki raat ,jo andheri raat ki kaalima ko
kam kar deti hai..aur fir ujale man ke saath hiswapn punah aankho ke saamne tairne lagte hain.
bahut hi prabhavshali dard ki gahan anubhuti.
poonam

ज्योति सिंह 7/30/2010 9:00 PM  

पर ----
सपने तो बस सपने हैं
हक़ीकत में तो--
ये स्याह रात आ गयी है.
adbhut rachna

बेचैन आत्मा 7/31/2010 8:54 AM  

जब मन अवसाद से घिरा होता है तो ऐसे विचार आते हैं मगर इन्हें झटक देना चाहिए. इनसे किसी का भला नहीं होगा.

Akanksha~आकांक्षा 7/31/2010 1:47 PM  

स्याह रात के बाद सुन्दर उजाला भी तो आयेगा..खूबसूरत भावाभिव्यक्ति..बधाई.

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