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चंदा मामा दूर के

>> Monday, July 18, 2011


 

आज कल
चाँद मेरे घर 
रोज आता है 
और 
अपनी चांदनी से 
रोशन कर देता है 
कोना - कोना 
चांदनी में होती है 
भोली सी मुस्कान 
जो देती है मुझे 
मेरी पहचान 
उस मुस्कान को 
भर अपनी आँखों में 
झुलाती हूँ मैं उसे 
अपनी बाहों में , 
और चाँद 
उस समय 
बनाता है 
पुए बूर के 
पुए का इंतज़ार 
करते करते ही 
वो मुस्कान 
सो जाती है 
मेरी गोद में 
और मैं कह उठती हूँ 
चंदा मामा दूर के 
पुए पकाएं बूर के ...




65 comments:

सूर्यकान्त गुप्ता 7/18/2011 10:46 AM  

सुंदर रचना……आभार्।

सदा 7/18/2011 10:48 AM  

उस मुस्कान को
भर अपनी आँखों में
झुलाती हूँ मैं उसे
अपनी बाहों में ,
इस नन्‍हीं मुस्‍कान के लिये शुभकामनाएं .. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

ब्लॉ.ललित शर्मा 7/18/2011 10:57 AM  

चाँद को बहुत बहुत आशीष,
गोदी में झुलाने का आनंद लेती रहें

Suman 7/18/2011 11:05 AM  

चाँद यूँही हमेशा आपके घर का कोना-कोना
रौशन करता रहे ! शुभकामनाएं ...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 7/18/2011 11:15 AM  

बहुत ही प्यारी कविता.
---------------
कल 19/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Mukesh Kumar Sinha 7/18/2011 11:43 AM  

kabhi iss chanda ko kahna mera ghar bhi raushan kare:),

दर्शन कौर धनोए 7/18/2011 11:58 AM  

काश, हमे भी उस 'चाँद' के दर्शन हो जाए कभी ...जिनसे आपका घर -अंगना रोशन हो रहा हैं दी. अभी तो खुद ही पुए बना कर खा लेते हैं जी ..

वन्दना 7/18/2011 12:01 PM  

हम तो आपकी इस मुस्कान के साथ ही खो गये………इतनी मीठी मुस्कान पर कौन ना मर जाये…………आनन्द आ गया पढकर्।

ashish 7/18/2011 12:43 PM  

चाँद यू ही रोशन करता रहे आपके मन का कोना कोना . सुँदर रचना .

Anita 7/18/2011 12:46 PM  

वाह, चाँद, मुस्कान और पुए की मिठास से भरी यह कविता दिल को छू जाती है...

Amrita Tanmay 7/18/2011 12:52 PM  

मैंने तो सुना था पुए पकाए गुड़ के..पता नहीं. बहुत सुन्दर लिखा है.

shikha varshney 7/18/2011 12:54 PM  

ओले बाबा .....
कितना सुन्दर चित्र है..शब्दों का.
एक दम लोरी जैसी कोमल और पुरसुकून कविता.
आपके आँगन में चाँद यूँ ही उतरता रहे.

अनुपमा त्रिपाठी... 7/18/2011 12:58 PM  

वात्सल्य और ममता की चाशनी में डूबी एक प्यारी कविता ....
जैसे माँ का स्पर्श याद दिला रही है ...
पावन रचना ...बधाई.

Sadhana Vaid 7/18/2011 12:59 PM  

नन्हे-मुन्ने पोते को ऐसी विदुषी दादी जब अपनी बाहों में झुलायेंगी तो ऐसी कोमल, प्यारी और वात्सल्य से परिपूर्ण सुन्दर रचनाएं ही आकार लेंगी ! इस नन्हे से फ़रिश्ते की मुस्कान पर वारी जाऊँ ! उसे ढेर सारे आशीर्वाद एवं शुभकामनायें !

prerna argal 7/18/2011 1:55 PM  

aapki muskaan aur aapki chaand hamesha isi tarah bani rahe aur pooye khaati rahe.bahut sunder aur pyaari rachanaa.badhaai aapko.bahut hi pyaari pic.hamaraa bhi bahut saara pyaar,dulaar.




please visit my blog.thanks

Er. सत्यम शिवम 7/18/2011 2:03 PM  

बहुत सुंदर आंटी...बाबू को मेरा बहुत सा स्नेह और प्यार।

Maheshwari kaneri 7/18/2011 2:52 PM  

वात्सल्य से परिपूर्ण मासूम सुन्दर रचना...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 7/18/2011 4:37 PM  

बहुत ही कोमल-कोमल, प्यारी-प्यारी रचना ....

Bhushan 7/18/2011 4:40 PM  

गीत चाहे पुराना है लेकिन मिठास नई है.

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri 7/18/2011 4:51 PM  

पुए का इंतज़ार
करते करते ही
वो मुस्कान
सो जाती है
मेरी गोद में ..
स्नेह एवं दुलार से भरी कविता...आपको एवं नन्हे चाँद को कोटि कोटि शुभ कामनाएं !!!

sushma 'आहुति' 7/18/2011 6:02 PM  

बहुत ही खुबसूरत रचना...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 7/18/2011 6:21 PM  

सुन्दर रचना!
ईश्वर करे आपकी बगिया में चाँदनी हमेशा हँसती रहे!

girish pankaj 7/18/2011 6:25 PM  

aap jaisi mamata mile to chaand kyon n utaregaa aapke aangan mey?

mridula pradhan 7/18/2011 6:36 PM  

bahut hi pyari kavita hai.....

S.M.HABIB 7/18/2011 6:37 PM  

"चन्दा चमकता रहे यूँ ही
आँगन दमकता रहे यूँ ही"

सादर....

अनामिका की सदायें ...... 7/18/2011 6:53 PM  

kash aap ye bhi gati...

aao tumhe chand pe le jaye...
sapno ki duniyan dikhaye...

:):):)

aapko lori gate hue ankho me chalchitr sa ghoom raha hai apke chaand ke sath.

bahut sunder.

प्रवीण पाण्डेय 7/18/2011 6:53 PM  

बड़ी ही कोमल अभिव्यक्ति, बचपन के चन्दामामा सदा ही आनन्द जगा जाते हैं।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 7/18/2011 7:44 PM  

हमेशा कायम रहे चंदा से ये भावनात्मक रिश्ता...
बहुत अच्छी रचना है.

रविकर 7/18/2011 8:16 PM  

चंदा मामा की शीतलता,
मस्तक में आ जाए,
और हृदय में धवल चांदनी,
पावन ठौर बनाए |
चंदा मामा घूम-घूमकर,
सही राह दिखलाते--
बल-बुद्धि यश परम तेज से,
जग में नाम कमाए ||

निवेदिता 7/18/2011 9:35 PM  

बहुत ही सुन्दर चित्र और शब्द चित्र .....

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 7/18/2011 10:06 PM  

संगीता दी!
बहुत ही सुन्दर अंदाज़ है आज!! एक बच्ची की तरह मासूम... यह चाँद एक रोज चाँद छूने लगे, यही कामना है!!

Taru 7/18/2011 10:34 PM  

bahut pyaari si rachna hai mumma......:)

Akshat ko bahut pyaar

Taru 7/18/2011 10:35 PM  

bahut pyaari si rachna hai mumma......:)

Akshat ko bahut pyaar

Vaanbhatt 7/18/2011 11:26 PM  

ये चाँद कुछ ख़ास लग रहा है...जो गोद में सो जाता है...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 7/19/2011 12:01 AM  

ममत्व और वात्सल्य का मीठा बताशा हमने खा लिया.चंदा मामा के गुड़ वाले पुए की डिश आपके लिये छोड़ दी है.मामा-भांजी मिल कर खायें.

Dr Varsha Singh 7/19/2011 12:02 AM  

पुए का इंतज़ार
करते करते ही
वो मुस्कान
सो जाती है
मेरी गोद में
और मैं कह उठती हूँ
चंदा मामा दूर के
पुए पकाएं बूर के ...


नन्‍हीं मुस्‍कान के प्रति बहुत ही कोमल भावनाओं में रची-बसी खूबसूरत रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।

Dr (Miss) Sharad Singh 7/19/2011 12:22 AM  

भोली सी मुस्कान
जो देती है मुझे
मेरी पहचान
उस मुस्कान को
भर अपनी आँखों में
झुलाती हूँ मैं उसे
अपनी बाहों में ,


वत्सल स्नेह में डूबी बहुत ही कोमल सुन्दर कविता...हार्दिक बधाई...

monali 7/19/2011 12:29 AM  

Such a lovely kid.. nazar na lage.. aaj kal m bhi is sab ko mehsoos kar rahi hu.. bas fark itna h k aap daadi ban k aur m bua ban k... magar haan LORI ek hi h.. chanda mama dur k :)

कुश्वंश 7/19/2011 7:34 AM  

उस मुस्कान को
भर अपनी आँखों में
झुलाती हूँ मैं उसे
अपनी बाहों में ,

चाँद आपके वात्सल्य का रस लेता रहे और आप इस खुशी में निरंतर डूबती रहें शुभकामनाये भी बधाई भी

नूतन .. 7/19/2011 10:59 AM  

वाह ... खूबसूरत भावों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

दिगम्बर नासवा 7/19/2011 1:05 PM  

बच्चों की एक मुस्कान में सारा जीवन सिमटा होता है ... सुन्दर प्रस्तुति ..

Rachana 7/19/2011 7:34 PM  

उस मुस्कान को
भर अपनी आँखों में
झुलाती हूँ मैं उसे
अपनी बाहों में ,
kitna darshniye varnan hai .
bahut hi sunder
badhai
rachana

मुदिता 7/19/2011 9:14 PM  

दीदी ...

:) :) :) ..बहुत प्यारी कविता और मुझे भी महसूस हुई वो मुस्कान .. ४४ साल पहले की :) मैंने भी किया है ना इन पुओं का इंतज़ार :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/19/2011 11:14 PM  

सभी पाठकों का आभार ...

@@ मुदिता ,

:):) ..बहुत घुमाया है तुमने मुझे ..और बहुत पुए पकवाए हैं ऐसे ही :):)

Vivek Jain 7/19/2011 11:14 PM  

बहुत ही प्यारी रचना,
साभार,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) 7/20/2011 2:53 AM  

चंदामामा की ये वाली कविता को एक नए रूप में भी आज देख लिया... मासूमियत भरी है.....

vandana 7/20/2011 6:39 AM  

चांदनी में होती है
भोली सी मुस्कान
जो देती है मुझे
मेरी पहचान...
सचमुच एक नन्हा बच्चा व्यक्ति को खुद अपने आप से परिचित करवाता है ..बहुत प्यरी कविता

Navin C. Chaturvedi 7/20/2011 8:49 AM  

पुए बूर के


गनीमत है इन पर अभी तक किसी ने पेटेंट नहीं करवाया 'बूर के पुओं पर' और आप हम सभी को पढ़वा पाईं बचपन की यादों में दर्ज़ एक और कहानी|

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 7/20/2011 1:03 PM  

बेहद सुन्दर वात्सल्य में घुली सुन्दर रचना ...

Anand Dwivedi 7/20/2011 1:03 PM  

पुए का इंतज़ार
करते करते ही
वो मुस्कान
सो जाती है
मेरी गोद में
और मैं कह उठती हूँ
चंदा मामा दूर के
पुए पकाएं बूर के ...

दीदी इसमें ख़ुशी ज्यादा है या टीस ज्यादा है ...जो भी है.बहुत सुन्दर चित्रण किया है आपने !

रश्मि प्रभा... 7/20/2011 3:57 PM  

main janti hun chandamama kiske liye aate hain aur kaun bulata hai....

जयकृष्ण राय तुषार 7/20/2011 5:25 PM  

संगीता जी एक बेहतरीन शब्द रचना /कविता के लिए आपको बधाई और प्रणाम |

Surendra shukla" Bhramar"5 7/21/2011 8:46 AM  

आदरणीय संगीता जी ये प्यारी रचना ये चंदा ये चांदनी हमेशा मुस्कान को मुस्कान देती लोरी गाती झुलाती रहे -
शुभ कामनाएं -

संगीता जी मेरी बात पर थोडा गौर करियेगा और थोडा एडिट करियेगा -

चंदा मामा दूर के पुआ पकाएं गूर के ..

ये गूर से मेरा मतलब है गुड़ जो की गन्ने का बना होता है और शुद्ध भाग चीनी का है -
goor ya gud
शुक्ल भ्रमर ५

उस मुस्कान को
भर अपनी आँखों में
झुलाती हूँ मैं उसे
अपनी बाहों में ,

संगीता स्वरुप ( गीत ) 7/21/2011 10:10 AM  

सुरेन्द्र जी ,

शुक्रिया ...हमने बचपन से बूर ही सुना है और बूर का मतलब बूरा होता है जो खांड या चीनी से से बनता है ..इस लिए मैंने यही लिखा है ...वैसे गुड़ से बने या बूरे से होता तो मीठा ही है न :):)

Udan Tashtari 7/21/2011 10:28 AM  

बहुत बधाई...आजकल हम भी दिन रात इसी को गाने में मगन हैं पोते के साथ:


चंदा मामा दूर के
पुए पकाएं बूर के ...


:)

रंजना 7/21/2011 4:14 PM  

इस सुख को शब्दों में बाँध अभिव्यक्ति दे पाना कठिन है...पर आपने दिया...यही तो आपकी सिद्धहस्तता है...

manukavya 7/24/2011 2:55 PM  

संगीता जी बहुत ही प्यारी रचना, ईश्वर करे आपका चाँद और उसकी चांदनी यूँ दिन दुनी रात चौगुनी हँसती रहे और आपका जीवन रौशन करती रहे...

s.tiwari 7/28/2011 3:43 PM  

ati sundar.............

s.tiwari 7/28/2011 3:45 PM  

sach me hum bhi apne bachpan k dino me kho gaye............aabhar us duniya me jaane k liye or jindgi ki gahmagahmi se chand pal fursat paane ke liye............

s.tiwari 7/28/2011 3:46 PM  

ati sundar.............

Raj 8/21/2011 11:55 PM  

आपकी रचना बहुत प्यारी है. धन्यवाद

NISHA MAHARANA 9/25/2011 11:30 PM  

चंदा मामा दूर होकर भी
सबके दिलों पर राज करते हैं।
मनभावन रचना।

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