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तुम यहीं कहीं हो

>> Thursday, September 29, 2011



जब मंद पवन के झोंके से 
तरु की डाली हिलती है 
पंछी  के  कलरव से 
कानों में मिश्री घुलती है 
तब लगता है कि तुम 
यहीं - कहीं हो 

जब नदिया की कल - कल से 
मन स्पंदित होता है 
जब सागर की लहरों से 
तन  तरंगित  होता है 
तब लगता है कि तुम 
यहीं - कहीं हो 

रेती का कण - कण भी जब 
सोने सा दमकता  है 
मरू भूमि में भी जब 
शाद्वल * सा  दिखता है 
तब लगता है कि तुम 
यहीं - कहीं हो 

बंद पलकों पर भी जब 
अश्रु- बिंदु चमकते हैं 
मन के बादल   घुमड़ - घुमड़ 
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं 
तब लगता है कि तुम 
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .


* शाद्वल --- नखलिस्तान 

96 comments:

रश्मि प्रभा... 9/29/2011 4:20 PM  

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .
bahut apnatv bhare ehsaason ko piroya hai

Sonal Rastogi 9/29/2011 4:41 PM  

behad pyaari rachnaa

वन्दना 9/29/2011 4:48 PM  

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .

वाह ……………मन के कोमल भावो का बहुत सुन्दर चित्रण किया है…………बेहद शानदार प्रेममयी प्रस्तुति।

ashish 9/29/2011 4:50 PM  

कोमल भावनाएँ शब्दों से बाहर झांकती हुई , होठों पर स्मित मुस्कान बिखेरने में सफल . मुबारक हो शाद्वल .

सदा 9/29/2011 5:02 PM  

ये नाजुक अहसास जो
...

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो
यकीनन सच से लगते हैं ...बहुत-बहुत अच्‍छी रचना ।

ब्लॉ.ललित शर्मा 9/29/2011 5:03 PM  

सुन्दर कविता, भाव भरे शब्दों के साथ

आभार

अनुपमा त्रिपाठी... 9/29/2011 5:24 PM  

wah ....bahut sunder ....
doori mit gayi hai ..jaise ....
sunder ehsaas...

NISHA MAHARANA 9/29/2011 5:24 PM  

lajbab.no words to say.

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri 9/29/2011 5:28 PM  

उच्च कोटि के अध्यात्मिक चिंतन को समावेशित करती अत्यंत गहन भाव युक्त प्रस्तुति ...महान रचनाकार परम पिता परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता जीवंत सम्प्रेषण ...

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .
आदरणीय बहन का कोटि कोटि अभिनन्दन !!!

shikha varshney 9/29/2011 5:34 PM  

वाह...यह हुई न बात.कोमल कोमल रेशम रेशम...बहुत ही प्यारी कविता.

kshama 9/29/2011 5:42 PM  

जब नदिया की कल - कल से
मन स्पंदित होता है
जब सागर की लहरों से
तन तरंगित होता है
तब लगता है कि तुम
यहीं - कहीं हो
Bahut sundar ehsaas!

दिगम्बर नासवा 9/29/2011 5:48 PM  

बहुत खूब ... वैसे सा च तो ये है की वो अगर कहीं जाएं तभी तो एहसास होगा इधर कहीं ही हैं ... वो तो हमेशा साथ ही हैं ...

रविकर 9/29/2011 5:55 PM  

पाठक-गण ही पञ्च हैं, शोभित चर्चा मंच |
आँख-मूँद के क्यूँ गए, कर भंगुर मन-कंच |
कर भंगुर मन-कंच, टिप्पणी करते जाओ |
प्रस्तोता का करम, नरम नुस्खा अपनाओ |
रविकर न्योता देत, द्वार पर सुनिए ठक-ठक |
चलिए रचनाकार, लेखकालोचक-पाठक ||

शुक्रवार

चर्चा - मंच : 653

http://charchamanch.blogspot.com/

सुज्ञ 9/29/2011 6:20 PM  

श्रद्धा समर्पण भाव से पगी रचना!! बेहद मोहक!!

prerna argal 9/29/2011 6:27 PM  

जब नदिया की कल - कल से
मन स्पंदित होता है
जब सागर की लहरों से
तन तरंगित होता है
तब लगता है कि तुम
यहीं - कहीं हो
बहुत ही अपनत्व भरी प्रस्तुति जैसे किसी के एहसास को हर पल अपने आस पास महसूस करते हुए उसकी यादों को संजोये बहुत ही भाब्नाओं से भरी सुंदर रचना /बहुत बधाई आपको /
आप और आपके परिवार को नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनायें /देवी माँ आपकी सारी मनोकामना पूर्ण करे /मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है/जरुर पधारें /

Kailash C Sharma 9/29/2011 7:13 PM  

बहुत सुन्दर..भावों और शब्दों का उत्कृष्ट संयोजन..नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 9/29/2011 7:42 PM  

संगीता दी!
कविता जिस भी भाव से लिखी गयी हो, एक आध्यात्मिक सुख प्रदान करती है और ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई पुकार पुकार कर उस परमात्मा, उस स्रष्टा की उपस्थिति को अनुभव कर रहा है!!

प्रवीण पाण्डेय 9/29/2011 8:08 PM  

प्रकृति तुम्हारे ही होने के संकेत कर रही है।

अनामिका की सदायें ...... 9/29/2011 8:54 PM  

waah kya baat hai.....kon hai ji yahi kahin.......?

sunder abhivyakti.

Maheshwari kaneri 9/29/2011 9:58 PM  

कोमल भावो की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति..सुन्दर ..

Dr Varsha Singh 9/29/2011 11:19 PM  

रेती का कण - कण भी जब
सोने सा दमकता है
मरू भूमि में भी जब
शाद्वल सा दिखता है
तब लगता है कि तुम
यहीं - कहीं हो .....

शाद्वल शब्द का बहुत सुन्दर प्रयोग....आपकी कविताएं मन को छूने में कामयाब रहती हैं | शुभकामनाएं |

Vaanbhatt 9/29/2011 11:22 PM  

ये एहसास भी क्या कम है...

सूर्यकान्त गुप्ता 9/29/2011 11:45 PM  

प्रकृति की सुंदरता संग संग के साथ किसी के नजदीक होने का एह्सास! शायद उस परमसत्ता का……मां भगवती जगत का कल्याण करे……नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं सहित आभार……।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 9/29/2011 11:52 PM  

रेशमी और मोम सी कल्पनायें.

Sadhana Vaid 9/29/2011 11:55 PM  

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .

बहुत ही कोमल, स्निग्ध एवं भावपूर्ण रचना ! हर एक शब्द मन को आंदोलित करता है और मानस पर गहन प्रभाव छोडता है ! नव रात्रि की शुभकामनायें स्वीकार करें !

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार 9/30/2011 12:03 AM  





आदरणीया संगीता मौसी जी
सादर प्रणाम !

आपकी कविता पढ़ने के बाद मेरा भी मन कह रहा है … तुम यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो
इश्क़े-हक़ीक़ी के रंग में रंगी इस रचना के लिए आभार !

# एक शंका का समाधान कर पाएं तो आभार मानूंगा … शाद्वल किस भाषा का मूल शब्द है … पहली बार ध्यान में आया है । आशय तो आपने दे ही दिया है …


नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाओं सहित
-राजेन्द्र स्वर्णकार

Dr (Miss) Sharad Singh 9/30/2011 12:13 AM  

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .....

कविता की प्रत्येक पंक्ति में अत्यंत सुंदर भाव हैं.... संवेदनाओं से भरी बहुत सुन्दर कविता...

नवरात्रि पर्व आपके एवं आपके परिवार के लिए सुखकर, समृद्धिशाली एवं मंगलकारी हो...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 9/30/2011 12:37 AM  

सभी पाठकों का आभार ..

राजेन्द्र स्वर्णकार जी ,

शाद्वल शब्द हिंदी भाषा में ही पढ़ा है ...
रामधारी सिंह दिनकर की रचना में भी आया है ... उर्वशी में



पुरुरवा
हाँ समस्त आकाश दीखता भरा शांत सुषमा से
चमक रहा चन्द्रमा शुद्ध शीतल निष्पाप हृदय-सा
विस्मृतियाँ निस्तल समाधि से बाहर निकल रही हैं
लगता है चन्द्रिका आज सपने में घूम रही है.
और गगन पर जो असंख्य आग्नेय जीव बैठे हैं
लगते हैं धुन्धले अरण्य में हीरॉ के कूपॉ-से.
चन्द्रभूति-निर्मित हिमकण ये चमक रहे शाद्वल में?
या नभ के रन्ध्रॉ में सित पारावत बैठ गये हैं?
कल्प्द्रुम के कुसुम या कि ये परियॉ की आंखें हैं?

और आपकी जिज्ञासा देख कुछ खीज बीन भी की है ..

शाद्वल - की परिभाषा शाद्वल , का अर्थ शाद्वल


शाद्वलसंज्ञा पुं० १ . हरी घास । दूब । २ . साँड़ । बैल । ३ . रेगिस्तान के बीच की वह थोड़ी सी हरियाली जहाँ कुछ हलकी बस्ती भी हो । नखलिस्तान [......]

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार 9/30/2011 12:54 AM  

आभार !

उर्वशी पढ़ा था … लेकिन वर्षों निकल गए …
पुनर्पठन का अवसर ही नहीं आया :)


आशा है, मेरे प्रश्न से बहुतों को लाभ हुआ …

आपने बुरा माने बिना इतनी सहजता से शंका-समाधान किया … प्रणाम !
( …अन्यथा , कुछ कुंठित स्वघोषित दिग्गज बने हुओं को पूछने पर बिदकते-घुड़कते भी पाने के अनुभव हुए हैं :(… )

मेरे द्वारा शस्वरं पर प्रयुक्त किसी शब्द /प्रसंग या अन्य शंका के समाधान के लिए मैं भी सदैव सहर्ष प्रस्तुत हूं …

वाणी गीत 9/30/2011 6:55 AM  

किस -किस तरह से लगता है कि तुम यहीं हो , -या किस तरह नहीं लगता कि तुम यही हो !

वाह ...

sushma 'आहुति' 9/30/2011 8:04 AM  

बहुत ही भावपूर्ण रचना....

Anita 9/30/2011 10:29 AM  

बहुत सुंदर ! समर्पण के भावों से सजी कविता पढकर तथा एक नए से शब्द से परिचय पाकर बहुत अच्छा लगा, आभार!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 9/30/2011 12:03 PM  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

veerubhai 9/30/2011 12:12 PM  

बहुत प्रांजल अभिवयक्ति मन को दुलारती सी .

देवेन्द्र 9/30/2011 2:12 PM  

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .

सुंदर भावाभिव्यक्ति।

रंजना 9/30/2011 4:09 PM  

वाह....वाह...वाह...

पावन स्नेह भावपूर्ण कोमल अतिसुन्दर अभिव्यक्ति...

बहुत ही सुन्दर रचना...

कविता रावत 9/30/2011 5:11 PM  

बहुत बढ़िया प्रस्तुति..
आपको नवरात्रि की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनायें.

NEELKAMAL VAISHNAW 9/30/2011 6:00 PM  

बहुत सुन्दर मार्मिक रचना बधाई हो आपको
आप भी मेरे फेसबुक ब्लाग के मेंबर जरुर बने
mitramadhur@groups.facebook.com

MADHUR VAANI
BINDAAS_BAATEN
MITRA-MADHUR

रचना दीक्षित 9/30/2011 8:44 PM  

सुन्दर कोमल भावों से सुसज्जित बेहतरीन प्रस्तुति

सुशील बाकलीवाल 9/30/2011 9:30 PM  

जिधर देखूँ ऊधर तुम हो ।
बेहद भावपूर्ण प्रस्तुति...

मनोज कुमार 9/30/2011 10:43 PM  

इस कविता की सरसता और कोमलता ने मन मोह लिया।
आपकी यह रचना मुझे सबसे अधिक पसंदीदा रचना में से एक है।
प्रवाह और भावात्मकता मन में रच बस जाती है।

कुश्वंश 10/01/2011 8:28 AM  

खूबसूरत अह्साशों से भरी बेहतरीन कविता प्रस्तुत की है आपने . इस काव्य के रसास्वादन का अनुभव करने के लिए बधाई

महेन्द्र मिश्र 10/01/2011 3:14 PM  

जब मंद पवन के झोंके से
तरु की डाली हिलती है
पंछी के कलरव से
कानों में मिश्री घुलती है
तब लगता है कि तुम
यहीं - कहीं हो

सुन्दर रचना अभिव्यक्ति....
आभार

डॉ.सोनरूपा विशाल 10/01/2011 3:46 PM  

प्रेम का खूबसूरत अहसास सुंदर शब्दों की माला पिरो कर उसे भाव के गले में पहना दे तभी इतनी सुंदर कविता जन्मती है

mridula pradhan 10/01/2011 5:30 PM  

तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .
ekdam theek lagta hai.......

mahendra srivastava 10/01/2011 6:07 PM  

बहुत सुंदर रचना। ऐसी रचनाएं कभी कभी पढने को मिलती हैं।

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो

mahendra verma 10/02/2011 9:12 AM  

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु-बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो

कोमल कल्पना, सुकामल अभिव्यक्ति।

अजय कुमार 10/02/2011 10:50 AM  

प्राक्रितिक सुंदरता से सराबोर ,कोमल एहसास वाली सुंदर रचना ।

अर्चना तिवारी 10/02/2011 2:50 PM  

रेती का कण - कण भी जब सोने सा दमकता है मरू भूमि में भी जब शाद्वल * सा दिखता है तब लगता है कि तुम यहीं - कहीं हो ....

कितना सुंदर चित्रण..

रजनीश तिवारी 10/02/2011 5:41 PM  

तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो
बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना

Udan Tashtari 10/03/2011 2:18 AM  

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु-बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो


-बहुत ही प्यारी रचना..

prerna argal 10/03/2011 8:43 AM  

आपकी पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली (११) के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/आप इसी तरह मेहनत और लगन से हिंदी की सेवा करते रहें यही कामना है /आपका
ब्लोगर्स मीट वीकली
के मंच पर स्वागत है /जरुर पधारें /

Kunwar Kusumesh 10/03/2011 8:46 AM  

रचना का शीर्षक पूरी रचना पर छाया हुआ है.बहुत सुन्दर.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 10/03/2011 1:20 PM  

आदरणीया संगीता जी ,
सादर अभिवादन |
बहुत ही प्यारा गीत है आपका ...
बिलकुल बहती नदी की जलधार की तरह प्रवाहमान ...
बहुत कुछ सीखने को मिलता है आपसे ...

Babli 10/03/2011 2:10 PM  

बहुत ख़ूबसूरत और प्यारी रचना ! शानदार प्रस्तुती!
दुर्गा पूजा पर आपको ढेर सारी बधाइयाँ और शुभकामनायें !
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

Arvind Mishra 10/03/2011 6:58 PM  

प्राकृतिक बिम्बों में प्रिय की झलक की सुन्दर सी कविता

Aslam Qasmi 10/03/2011 7:20 PM  

कोमल भावो की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति..सुन्दर ..

विशाल 10/03/2011 10:12 PM  

रेती का कण - कण भी जब
सोने सा दमकता है
मरू भूमि में भी जब
शाद्वल * सा दिखता है
तब लगता है कि तुम
यहीं - कहीं हो

bahut khoob.

Taru 10/04/2011 12:47 AM  

मेरा नाम आया मुझे उसी में सुख मम्मा :)

चरण स्पर्श !

प्रतिभा सक्सेना 10/04/2011 9:27 PM  

हर सुन्दर रूप में उसी की झलक -बहुत सुन्दर !

डॉ॰ मोनिका शर्मा 10/05/2011 1:52 AM  

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .

Gahan Bhav...... Hridaysparshi rachna

आशा जोगळेकर 10/05/2011 2:55 AM  

तुम यहीं कहीं हो कितना प्यारा खयाल है और उसके आस पास का परिवेश आपकी रचना की सुंदरता को चार चांद लगा रहे हैं । प्रिय का ख्याल जो रेत के कण कण को सोने सा दमकाता है अश्रुबिंदुओं में इंद्र धनुष रचता है सागर की लहरों में मन को बहाता है वह यहीं कहीं जो है ।

मेरा साहित्य 10/05/2011 7:48 PM  

जब नदिया की कल - कल से
मन स्पंदित होता है
जब सागर की लहरों से
तन तरंगित होता है
तब लगता है कि तुम
यहीं - कहीं हो
bahut khub
rachana

vandana 10/06/2011 6:05 AM  

रेती का कण - कण भी जब
सोने सा दमकता है
मरू भूमि में भी जब
शाद्वल * सा दिखता है
तब लगता है कि तुम
यहीं - कहीं हो .....
बहुत सुन्दर चित्रण

M VERMA 10/06/2011 8:54 AM  

एहसास का यह मधुरिम स्वर .. लाजवाब

Navin C. Chaturvedi 10/06/2011 12:52 PM  

विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह पर्व, सभी के जीवन में संपूर्णता लाये, यही प्रार्थना है परमपिता परमेश्वर से।
नवीन सी. चतुर्वेदी

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 10/06/2011 9:11 PM  

वाह दी! यह छायावादी रचना बहुत सशक्त और सुन्दर रची है आपने...

आप को/परिवार को विजयादशमी की सादर बधाईयाँ....
सादर.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 10/06/2011 10:43 PM  

बहुत सुन्दर...
संवाद मीडिया के लिए रचनाएं आमंत्रित हैं...
विवरण जज़्बात पर है
http://shahidmirza.blogspot.com/

Babli 10/07/2011 7:21 AM  

आपको एवं आपके परिवार को दशहरे की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

Kunwar Kusumesh 10/07/2011 9:37 AM  

विजयादशमी पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं.

Amrita Tanmay 10/07/2011 10:07 AM  

कमाल की है रचना .अत्यंत गहन भाव ..

Suman 10/07/2011 1:14 PM  

bahut sunder komal bhavbhari rachna ...

Bhola-Krishna 10/08/2011 10:23 PM  

संगीता जी ,आपके इस गीत ने बच्चनजी के "निशा निमंत्रण" के गीतों की याद दिला दी ! आपकी इस रचना को भी पढते ही स्वर देकर गाने की इच्छा हुई ! फिर उलझ गया और कमेन्ट करने में पिछड गया ! इस सुंदर कृति के लिए बधाई ,धन्यवाद ,और आभार !ऐसे ही ,लिखती रहें !
भोला एवं कृष्णा

Suman 10/09/2011 8:25 AM  

आदरणीय संगीता जी,
आपके बहुत जल्द स्वस्थ होने की
इश्वर से प्रार्थना है !

रचना दीक्षित 10/09/2011 8:48 AM  

रेती का कण - कण भी जब
सोने सा दमकता है
मरू भूमि में भी जब
शाद्वल * सा दिखता है
तब लगता है कि तुम
यहीं - कहीं हो.

बहुत ही सुंदर और प्यारी कविता. मन के भावों का मंद मंद झोंका मन प्रसन्न कर गया.

JHAROKHA 10/09/2011 9:58 PM  

Adarniya Sangita di,
abhi kuchh blogs se apke sath huyi durghatana ki jankari mili..apke shighra svasth hone ki ishvar se prarthana karati hun.
Poonam

Dr Varsha Singh 10/09/2011 11:15 PM  

प्रिय संगीता स्वरूप जी,
नयी पुरानी हलचल में आज आपके एवं भाई साहव जी के दुर्घटना मे घायल होने का समाचार मिला.....जान कर अत्यंत दुख हुआ...आप दोनों सहित आपके वाहन चालक के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना है।

Dr (Miss) Sharad Singh 10/09/2011 11:24 PM  

संगीता स्वरूप जी,
नयी पुरानी हलचल .....दुर्घटना में घायल होने का समाचार पा कर स्तब्ध रह गई....
आपके, भाई साहब के तथा वाहन चालक के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की ईश्वर से प्रार्थना है !

anita agarwal 10/10/2011 11:11 AM  

tum yahin kahin ho... kitna komal sa bhav hai...ye wakt shayad sabki zindagi me thode wakt ke liyae hi sahi ata to hai...

anita agarwal 10/10/2011 11:13 AM  

संगीता जी ....नयी पुरानी हलचल में आपकी दुर्घटना के बारे में पढ़ा ...अफ़सोस हुआ ...कैसे हुआ ये सब? इश्वर आपको , पति देव को और ड्राइवर को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ दे ....ऐसी हमारी कामना है ....

Unlucky 10/10/2011 5:09 PM  

Very interesting, excellent post. Thanks for posting. I look forward to seeing more from you. Do you run any other sites?

जगजीत सिंह आधुनिक गजल गायन की अग्रणी है.एक ऐसा बेहतरीन कलाकार जिसने ग़ज़ल गायकी के सारे अंदाज़ बदल दिए ग़ज़ल को जन जन तक पहुचाया, ऐसा महान गायक आज हमारे बिच नहीं रहा,
उनके बारे में और अधिक पढ़ें : जगजीत सिंह

सतीश सक्सेना 10/10/2011 10:43 PM  

यादें कहीं नहीं जातीं ....हमारे आसपास महसूस होती हैं !
खूबसूरत रचना के लिए बधाई !

संगीता स्वरुप ( गीत ) 10/11/2011 3:26 PM  

सुमन जी , पूनम , डा० वर्षा सिंह , डा ० शरद सिंह , अनिता अग्रवाल जी .

आप सबके स्नेह और शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

singhSDM 10/12/2011 3:49 PM  

बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो .

रचना मनभावन है....!

Babli 10/13/2011 8:45 AM  

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

अनुपमा पाठक 10/14/2011 7:30 PM  

तुम यहीं कहीं हो... इस आभास को बड़ी सुन्दरता से अभिव्यक्त किया है!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 10/14/2011 7:46 PM  

आद. संगीता दी,
आपकी दुर्घटना का समाचार व्यथित करता है....
अब आप की तबियत कैसी है?
आप के स्वस्थ्य होने की सादर विनती है इश्वर से...
सादर...

शकुन्‍तला शर्मा 10/15/2011 3:53 PM  

प्रभावशाली प्रस्तुति

Arvind Mishra 10/15/2011 6:58 PM  

वाह नैसर्गिकता को समेटे एक अद्भुत प्रस्तुति -!

Surendra shukla" Bhramar"5 10/15/2011 6:58 PM  

आदरणीया संगीता जी अभिवादन करवा चौथ पर्व पर हार्दिक शुभ कामनाएं ...सुन्दर रचना ..प्रेम की अभिव्यक्ति लाजबाब ....लगता है तुम यहीं कहीं हो
भ्रमर ५
बंद पलकों पर भी जब
अश्रु- बिंदु चमकते हैं
मन के बादल घुमड़ - घुमड़
जब इन्द्रधनुष सा रचते हैं
तब लगता है कि तुम
यहीं कहीं हो ...यहीं कहीं हो

sandeep sharma 10/16/2011 6:03 PM  

जब नदिया की कल - कल से
मन स्पंदित होता है
जब सागर की लहरों से
तन तरंगित होता है
तब लगता है कि तुम
यहीं - कहीं हो

Mukta Dutt 10/23/2011 5:02 PM  

बंद पलकों में भी डूबे एहसासों को बखूबी पिरोया है आपने। बेहतरीन कविता है।

DR. ANWER JAMAL 10/24/2011 12:26 PM  

प्रभावशाली प्रस्तुति ...

Human 10/31/2011 2:22 PM  

बहुत अच्छे से अपने भावों को व्यक्त किया है आपने!

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